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महिलाओं की आज़ादी पर पाबन्दियाँ उन्हें सुरक्षित नहीं असुरक्षित ही बनाती हैं : कविता कृष्णन

(भाकपा (माले) लिबरेशन की पोलित ब्यूरो की सदस्य और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (AIPWA) की सचिव कविता कृष्णन की किताब ‘फीयरलेस फ्रीडम’ पर उनसे इशिता सेनगुप्ता की यह बातचीत इंडियन एक्सप्रेस में  8 मार्च को प्रकाशित हुई है. हम इसका हिंदी अनुवाद समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. अनुवाद दिनेश अस्थाना का है. सं. )

 

कविता कृष्णन अपनी रचना ‘फीयरलेस फ्रीडम’ में महिलाओं के प्रति प्रयोग किये जानेवाले प्रत्यक्ष रूप से घिनौने विशेषणों से आहत नहीं होती वरन उन्हें आगे बढ़कर स्वीकार करती हैं।

ट्विटर पर कविता कृष्णन का परिचय दुस्साहसिक है। उनका संक्षिप्त परिचय, ‘‘टीवी, ट्विटर, फेसबुक, यू-ट्यूब हर जगह अभद्र और चिल्लानेवाली महिला!’’ उनके बारे में प्रायः की जानेवाली टिप्पणियाँ और उनके सही होने और ऐसी ही होने की विद्रोही जिद को ही व्यक्त करती है। अपनी नयी रचना ‘फीयरलेस फ्रीडम’ में भी वह ऐसा ही कुछ करती हैंः महिलाओं के प्रति प्रयोग किये जानेवाले प्रत्यक्ष रूप से घिनौने विशेषणों से वह आहत नहीं होती वरन आगे बढ़कर उन्हें स्वीकार करती हैं। उनका मानना है कि इस समस्या की उत्पत्ति महिलाओं के एक तयशुदा रास्ते को स्वीकार करने की, न कि उनके विशिष्ट रूप से अलग व्यवहार करने की, स्वाभाविक प्रत्याशा में है।

विभिन्न कटु अनुभवों के माध्यम से बारम्बार महिलाओं की आवाज बनी यह कार्यकर्ता, जाति एवं वर्ग के प्रतिबन्धां से परे, महिलाओं पर किये जानेवाले अत्याचार, उसकी सर्वव्यापकता और असीम अनाचार पर एक विश्लेषक के तौर पर पूरे अधिकार और सूक्ष्मता के साथ अपनी बात रखती हैं।

उन्होंने अपनी रचना में बेख़ौफ़ आजादी और महिलाओं के हित में प्रयोग किये जानेवाली, पर पुरुषों के ही हकों की पुष्टि करनेवाली धूर्त भाषा को लेकर जो मत व्यक्त किये हैं उन पर इंडियनएक्सप्रेस.कॉम से बात की।

 

बातचीत के कुछ चुनिंदा अंशः

अपनी किताब, ‘फीयरलेस फ्रीडम’ में आप लिखती हैं कि, ‘‘आप कुछ भी बचाना चाहती हैं, हमारी ‘बेख़ौफ़ आजादी’ बचाना चाहती हैं।’’ ‘बेख़ौफ़ आजादी’ से आपका आशय क्या है?

मैं ‘बेख़ौफ़ आजादी’ को आजाद रहने के बिना-शर्त अधिकार से कुछ अधिक नहीं मानती। मैं यह नहीं कह रही हूँ कि महिलाओं को सुरक्षित रखने की आवश्यकता का यह मतलब नहीं है कि वे अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। बजाय इसके मेरा संकेत यह है कि भारत में महिलाओं से यह आशा की जाती है कि वे अपनी सुरक्षा के लिये अपनी आजादी का सौदा कर लें। महिलाओं पर पाबन्दियों का औचित्य यह कहते हुये सिद्ध किया जाता है कि यह उनकी ‘सुरक्षा’ के लिये लगाया गया है। जबकि सच यह है कि भारत में महिलाओं की आजादी पर पाबन्दियाँ सम्भवतः लैंगिक हिंसा का सर्वाधिक व्यापक स्वरूप हैं। इसके उलट मेरा ख्याल है कि वे यह सुनते सुनते पक चुकी हैं कि उन्हें ‘सुरक्षित’ रखने के लिये ही उन्हें सात तालों में बन्द रखना पड़ता है। हमारी आजादी पर पाबन्दियाँ हमें सुरक्षित नहीं रखतीं- बल्कि वे हमें असुरक्षित ही बनाती हैं। यह प्रायः मान लिया जाता है कि भारत में महिलायें स्थायी रूप से बलात्कार और लैंगिक हिंसा के भय में रहती हैं। लेकिन हम इस तथ्य की अक्सर अनदेखी कर देते हैं कि बलात्कार ही भारत में महिलाओं का एकमात्र भय नहीं है। भारत में महिलाओं को ‘बेशर्म’ कहलाये जाने का भी भय होता है। वे हमेशा इस दबाव में होती हैं कि घर से बाहर कदम निकालने के लिये उन्हें आदेश लेना होता है या एक सम्मानजनक स्पष्टीकरण देना पड़ता है।

ऐसा क्यों है कि आधुनिक राजनैतिक व्यवहार में भी उनके लिये ‘‘फ्री’’ का प्रयोग गाली के तौर पर किया जाता है? क्या कुछ दकियानूस खाप ही महिलाओं को कैद रखना चाहते हैं? या फिर आधुनिक कारखाने, कार्यस्थल और राजनीतिक संस्थायें भी ऐसा ही करती हैं? मेरी किताब भारत में लिंग-आधारित हिंसा, सुरक्षा और खतरों के इर्द-गिर्द बुने गये मिथकों का पर्दाफ़ाश करना चाहती है।

महिलाओं पर लादी गयी विभिन्न पाबन्दियों और उनके निश्चयन में जाति की भूमिका के बारे में लिखते समय आप कहती हैं कि, ‘‘हिन्दू, मुस्लिम और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की महिलाओं के बीच कोई विशेष अन्तर नहीं है। क्या आप मानती हैं कि उत्पीड़न के मामले में भी धार्मिक वर्गीकरण अर्थहीन हो जाते हैं ?

मुझे आश्चर्य है कि उत्पीड़न के मामले में धर्म, जाति, शिक्षा, वर्ग सब अर्थहीन हो जाते हैं। यह तथ्य है पर आश्चर्य नहीं कि राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे-4 के अनुसार केवल 41 प्रतिशत भारतीय महिलाओं को अकेले बाहर जाने की अनुमति मिलती है। लेकिन मैंने कल्पना की थी कि दलित, पिछड़ी जातियों और आदिवासी समुदायों की और शिक्षित और नौकरीशुदा महिलाओं को भी प्रकटतः और अधिक गतिशीलता प्राप्त हो। पर आँकड़े कुछ और ही कह रहे हैंः जहाँ तक घरों से बाहर जाने की अनुमति मिलने प्रश्न है, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों और दूसरी जातियों की महिलाओं के मामले में इसमें बहुत मामूली फ़र्क़ आया है। अगर आप यह समझते हैं कि शिक्षा महिलाओं को और अधिक आजादी दे देती है, तो आप गलत हो सकते हैंः राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे-4 के अनुसार कभी स्कूल न गयी महिलाओं में से केवल 42.9 प्रतिशत और 12 साल स्कूल गयी महिलाओं में से केवल 45.3 प्रतिशत महिलाओं को बाहर आने-जाने की सुविधा प्राप्त है। हम जब भारत मानव विकास सर्वे (आई0एच0डी0एस0) के आँकड़ों का अवलोकन करते हैं तो यह बात और भी साफ हो जाती है जिसमें ‘‘स्वेच्छा से बाहर निकलने वाली और बाहर निकलने के लिये अनुमति माँगने वाली महिलाओं’’ के आँकड़ों में उल्लेखनीय अन्तर दिखायी देता है।

आप देश में अनेकों ऑनर किलिंग की घटनाओं पर लिखती हैं और उनमें महिलाओं की भूमिका को नकारती नहीं। आप इसमें महिलाओं को किस हद तक दोषी मानती हैं और क्या पितृसत्ता के खिलाफ़ उनकी लड़ाई सालों से दी गयी ट्रेनिंग के चलते उनके खुद के खिलाफ़ लड़ाई में नहीं बदल जाती ?

आँकड़े बोलते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का बड़ा अनुपात घरेलू हिंसा के औचित्य के पक्ष में मुखर होता है। हमें इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिये। दूसरे दमनकारी सम्बन्धों की तरह ही पितृसत्तामक सामाजिक सम्बन्ध भी केवल उत्पीड़न में विश्वास नहीं करते- वे बहुत ज्यादा इस बात में विश्वास करते हैं कि वे इस हेतु अधीनस्थ वर्गों और क्षेत्रों के लोगों की सहमति प्राप्त कर लेंगे। युवा महिलायें निगरानी और पाबन्दियों का दंश इसलिये झेलती हैं ताकि उनकी यौनेच्छा नियंत्रित की जा सके और उन्हें घरेलू दासता हेतु अनुशासित किया जा सके। ‘सुरक्षा’ के नाम पर महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता है; और नतीजे में घरेलू दासता के लिये उनकी सहमति का निर्माण किया जाता है। ज्यों-ज्यों महिलायें उम्रदराज़ होती हैं त्यों-त्यों उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपनी बहुओं पर श्रम और अधीनता आरोपित करेंगी और उनपर निगरानी रखेंगी जब कि उस समय तक उन्हें खुद की निगरानी और अधीनता से थोड़ी-बहुत राहत मिल चुकी होती है।

मैं कौसल्या के दलित पति शंकर की जाति आधारित ‘ऑनर किलिंग’ पर बनी दस्तावेजी फिल्म के दृश्यों की चर्चा करती हूँ। एक दृश्य में कौसल्या की माँ बड़े गर्व से याद करती हैं कि कौसल्या दोसा बनाना अच्छी तरह जानती थीः ‘मैं जब बीमार थी तो वह मेरे लिये दोसा बनाती थी।’ अगले ही फ्रेम में वह कहती है कि उसने कौसल्या को चेता दिया था कि ‘अगर तुम हमें धोखा देकर प्रेम करके कहीं भाग जाओगी तो मैं तुम्हें मार डालूँगी।’

समस्या यह है कि पितृसत्ता के प्रचारक इन तथ्यों का प्रयोग अपने लिंगाधारित भेदभाव और हिंसा में अपनी संलिप्तता के बचाव में करते हैं। वे कहते हैं कि ‘‘महिलायें ही महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं’’ और इससे उनका आशय होता है कि, ‘‘यदि महिलायें ही दूसरी महिलाओं का दमन करती हैं तो निश्चित तौर पर पितृसत्ता को इससे छूट मिल जाती है, महिलाओं पर दमन को स्वीकृति मिल जाती है और निश्चित तौर पर महिला आन्दोलन की धार कुन्द हो जाती है।’’ मैं इस स्वपोषित बहाने को चुनौती देना चाहती हूँ। मेरा कहना है कि सामूहिक सामाजिक आन्दोलन ही पितृसत्तामक शक्ति-संरचनाओं को चुनौती दे रहे हैं और वही वास्तव में महिलाओं का ‘सशक्तीकरण’ कर रहे हैं- न कि उन शक्ति-संरचनाओं का संरक्षण करने वाली और उनका औचित्य सिद्ध करने वाली सरकारी नीतियाँ।

इस किताब में आप सरकार के विभिन्न अभियानों (बेटी बचाअे, बेटी पढ़ाओ आदि) का विश्लेषण करती हैं और पाती हैं कि उनमें प्रयुक्त भाषा महिलाओं की सुरक्षा के लिये पितृसत्ता की आवश्यकता पर ही बल देती है। आपके तर्कों से वही ध्वनि निकलती है कि जो आउड्रे लॉर्डी ने कहा थाः ‘‘मालिक के औजार कभी मालिक के मकान नहीं गिराते।’’ क्या आप मानती हैं कि भुला देना और कोई चालाकी न करना ही महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिये आगे बढ़ने का रास्ता होगा ?

वास्तव में यह एक मिथक है कि मालिक के औजार मालिक का मकान गिरा सकते हैं। कल ही मेरी ट्विटर पर खाप पंचायत के नेता सुनील जगलान से बातचीत हुयी। वे अविवाहित पुरुष संगठन और बेटी बचाओ और चुनिंदा गर्भपात के खिलाफ़ सेल्फी विथ डॉटर अभियान के प्रणेता हैं जिन्हें बाद में मोदी सरकार का भी समर्थन मिल गया। जगलान को लगता है कि मेरी आलोचना उनके अत्यधिक प्रशंसित अभियानों की तौहीन है। मैंने अपनी किताब में जिस ओर इशारा किया है उसे उन्हें समझाना चाहाः वह यह है कि उनका अभियान सही जाति और गोत्र की अनुशासित, विनीत और ‘भाग जाने’ की अल्प सम्भावना वाली पत्नियों (न कि दूसरे राज्यों की पत्नियाँ जो ‘भाग सकती हैं और भाग जातीं हैं) पर पुरुषों के एकाधिकार पर आधारित है। ऐसे पितृसत्तामक आधारों पर आधारित अभियान उस संरचना को तोड़ नहीं सकते जो महिलाआें का अवमूल्यन करते हैं और उन्हें जन्म देने से रोकते हैं।

इस सम्बन्ध में क्या आप फ्रांसीसी नारीवादी एलेन सिक्सू के एक्रीच्यू फेमिनिन के विचार- लेखन की एक ऐसी शैली विकसित करना जिसमें प्रयुक्त अलंकार लेखन के पारंपरिक मर्दाना अलंकारों से अलग हां और जो महिलाओं के स्वयं की अभिव्यक्ति कर सकें, से सहमत हैं? क्या आपको लगता है कि महिलाओं के पक्ष में और उनके विरुद्ध प्रयुक्त भाषा, जितना हमें बताया जाता है उससे भी बड़ी समस्या है ?

ठीक, ईमानदारी की बात यह है कि, महिला लेखन पर दबावों को लेकर वर्जीनिया वुल्फ के विचार मुझे सिक्सू के एक्रीच्यू फेमिनिन की बनिस्बत ज्यादा सार्थक लगते हैं। वुल्फ ने लिखा कि कैसे हर लेखिका को अपनी आत्म बलिदानी ‘‘घर की देवी’’ वाली प्रेतछाया से लड़कर उसे मारना पड़ता है जो उसे यह बताने की कोशिश करती है कि उसे पुरुष के बारे में ईमानदारी से, बिना चापलूसी किये नहीं लिखना चाहिये और किसी को यह आभास नहीं होने देना चाहिये कि उसके पास अपना भी एक मस्तिष्क है। कुल मिलाकर उसे शुद्ध होना चाहिये। वुल्फ कहती हैं और उन्हें सन्देह भी है कि अपनी बुद्धिमत्ता को छुपा लेने की गुहार करने और अपने विचारों को नरम रखने का दबाव डालने वाली घर की देवी की हत्या कर देने के बाद भी अधिकांश लेखिकाओं को ‘‘एक शरीर के तौर पर अपने अनुभवों और सच्चाइयों’’ को बयान करने के लिये लम्बा संघर्ष करना होता है। जब शरीर और मनोभावों के बारे में लिखने का अवसर आया तो उन्होंने लिखा किः ‘‘……….. यद्यपि इन मामलों में पुरुष पूरे होशोहवास में खुद को ज्यादे आजादी देते हैं, फिर भी मुझे सन्देह है कि महिलाओं की आजादी की निन्दा को भी वे उसी तीव्र उग्रता से महसूस या नियंत्रित कर सकते हैं।’’

मेरा ख्याल है कि महिलाओं को कैसे लिखना, बोलना या वार्तालाप करना चाहिये, इसे लेकर हमारी अपेक्षायें अभी भी एक समस्या है। अक्सरहा बहुत ही नेकनीयत लोग मुझे समझाते हैं कि मेरे स्वर में क्रोध या धमकी या डराने का भाव नहीं होना चाहिये (और मैं स्वीकार करती हूँ कि मेरे मन का भी स्वर यही होता है)। मैं समझती हूँ कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर ‘अच्छी’ दिखने का दबाव बहुत अधिक होता है। हमें खुद से पूछना चाहिये कि हम यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि महिलाओं का स्वर (राजनीति में, पत्रकारिता में, साहित्य में, जीवन में) पुरुषों की तुलना में कम तीखा, कम कठोर, कम ऊँचा और कम निर्णायक होना चाहिये।

क्या महिलाओं की नयी पीढ़ी जो आज शाहीन बाग और दूसरी जगहों पर नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों में अगुवाई करती है और सच कहने को तत्पर दिखायी देती है, बेखौफ़ आज़ादी को मान्यता देने और उसकी चाहत बयान करने के करीब पहुँच रही है ?

मेरा ख्याल है कि पूरे भारत के शाहीन बागों में और समस्त नागरिकता विरोधी आन्दोलनों में महिलायें हमारी आज़ादी के लिये लड़ रही हैं। वे आज नागरिकता और संविधान पर हमारे सामूहिक दावे के बचाव में और उसपर अधिकार के लिये आज़ादी की एक लड़ाई में भागीदारी कर रही हैं। पर तथ्य यह है कि इतने खतरों के और दमन झेलते रहने के बावजूद वे अपनी स्वायत्तता पर डटे रहने और नेतृत्व और भाईचारे के लिये अपनी क्षमता की तलाश करते हुये एक तरह की खुशी महसूस कर रही हैं। कल को यदि सीएए, एनपीआर और एनआरसी वापस ले लिये जाँय तो भी ये महिलायें अपनी घरेलू भूमिकाओं में अलोप हो जाने के लिये वापस नहीं जायेंगी। वे भारतीय संविधान के वचनों को साकार करने और हमारे समाज को बेहतर जगह बनाने के आन्दोलनों की अगुवाई करती रहेंगी।

आपने अपनी किताब की शुरुआत 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड से की है। मृत्युदण्ड के बारे में आपका क्या ख्याल है ?

मृत्युदण्ड न्याय के समतुल्य नहीं है, इससे बलात्कार में कोई कमी नहीं आनेवाली है। बजाय इसके जिन मूलभूत समस्याओं पर केन्द्रित होने की आवश्यकता है उनसे यह ध्यान भटकाता है। दिसम्बर ’16 की शिकार के माता-पिता की पीड़ा और क्रोध से हमें सहानुभूति है, अगर उसके हत्यारों को फाँसी हो जाती है तो उन्हें थोड़ी-बहुत शान्ति तो अवश्य मिलेगी। पर जो राज्य महिलाओं को हर तरह से हर दिन निराश करता हो उसे कुछ जानें लेकर और महिलाओं के जीवन को हिंसा से अधिक सुरक्षित और अधिक आज़ाद बनाना सुनिश्चित करने के लिये मूलभूत बदलावों की आवश्यकता से ध्यान खींचकर उसके पापों से मुक्त नहीं किया जा सकता। फाँसी एक छलावा जरूर पैदा करती है कि बलात्कार अजनबियों और जानवरों द्वारा किया गया ‘‘दुर्लभ में से दुर्लभतम’’ कुकृत्य है। सच यह है कि बलात्कारी आमतौर पर अजनबी नहीं होते, बल्कि वे ही व्यक्ति होते हैं जिन्हें हम जानते हैं और सम्मान भी देते हैं, और बलात्कार हमारे पितृसत्ताक समाज का ही उत्पाद है, कोई अलग से दुर्लभ घटना नहीं है। जब हमारा ध्यान फाँसी पर केन्द्रित कर दिया जाता है तो हमारी सोच का केन्द्र, सरकार की जिम्मेदारी तय करने से भटक जाता हैः जैसे 24 घंटे का सार्वजनिक परिवहन, ताकि गलियाँ महिलाओं से भरी रहें, ताकि किसी को मजबूरन शोहदों की बस न पकड़नी पड़े; न्यायालयों और जजों की संख्या बढ़ायी जाय ताकि समस्त मामलों का तीव्र निस्तारण हो सके; ऐसी पुलिस और न्याय व्यवस्था बने जहाँ जाँच-प्रक्रिया और मुकदमे का परीक्षण बलात्कार पीडि़ता के लिये दण्ड न बन जाय।

मेरी किताब एक सन्देश देती है कि बलात्कारियों के लिये मृत्युदण्ड की माँग का कोई मतलब नहीं है। इसके स्थान पर हमें यह सुनिश्चित करना चाहिये कि किसी महिला का जीवन और उसकी आज़ादी ज्यादे कीमती है। बलात्कारियों को फाँसी पर लटका देने की राज्य की शक्ति का हमें उत्सव नहीं मनाना चाहिये, हमें एक ऐसे समाज के निर्माण का कार्य जारी रखना चाहिये जो न तो बलात्कारी पैदा करे, न उसका बचाव करे और न बलात्कार के लिये महिला को ही दोषी ठहराये।

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