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सुआ नृत्य : छत्तीसगढ़ी लोक का आलोक

पीयूष कुमार

कार्तिक का अंधियारी पाख लग गया है। खेतों में कटने को खड़े धान पर घाम की तपिश कम हो रही है। सिलयारी के फूल जत – खत दिख रहे। अभी घास पर औंटाया हुआ हरियर रंग बाकी है। छत्तीसगढ़ में साँझ हो रही है और गली – आंगन में तालियों की आवाज के साथ स्वरलहरी गूंजने लगी है- तारि हारि नाहना मोर नाह नारी नाहना हो…

ये है छत्तीसगढी संस्कृति का चिन्हार सुआ नृत्य। यह देवारी (दीवाली) के पहले से गांव – गलियों में दिखना शुरू हो जाता है। यह सुरहोती या सुरहुति, जिसे नागर समाज दीवाली कहता है, उस दिन छत्तीसगढ़ी लोक में ईसरदेव-गौरा के विवाह को गौरा-गौरी पर्व के रूप में मनाया जाता है। ईसरदेव अर्थात शिव शंभु। गौरतलब है कि यह ध्रुव गोंड समाज जो कि आदिवासी समाज है, उसका मूल पर्व है। यहां सुआ नृत्य और गीत जिसके निमित्त किया जा रहा है वह प्रचलित दीवाली नहीं है वरन स्थानीय लोक परम्परा है। यहां इसरदेव गौरी का विवाह है जो तीन दिन चलता है। ऐसे में यह भी समझ आता है कि छत्तीसगढ़ में देवउठनी जैसा मामला भी नहीं है जिसके बाद बिहाव आदि कार्य सम्पन्न होते हैं। यहां तो कार्तिक अमावस्या में संभु – गौरी का बिहाव हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जिस पर और भी चर्चा की जानी चाहिए।

संग्रहालय में निर्मित सुआ नृत्य का दृश्य

मूल परम्परा और उद्देश्य है इस बिहाव का न्योता देना। यह न्योता देने और आयोजन हेतु धन धान्य संग्रहण हेतु महिलाएं तथा बच्चियां शाम को समूह में घरो-घर जाकर सुआ नाचती हैं। एक टोकरी में सुआ (तोता) मढ़ाकर (रखकर) उसके चारों ओर घेरा बनाकर गोल घूमते हुए नृत्य करती हैं। इसमें किसी वाद्ययंत्र का प्रयोग नहीं होता बल्कि ताली बजाकर ही यह नृत्य गाते हुए किया जाता है। महिलाएं झूमकर नयनाभिराम नृत्य करती हैं और नारी ह्रदय अपनी भावना के साथ मुखरित हो उठता है-

तारि हारि नाहना मोर नाह नारी नाहना रे सुवना
छोड़ के चले हे बनिहार रे सुवना
सास संग खइबे, ननद संग खेलबे रे सुवना
छोटका देवर मन भाए रे सुवना
तरि हरी ना मोरे ना…

सुआ गीतों में नारी हृदय छलछलाता है। इसमें इसके गृहस्थ जीवन की कहानियां प्रश्नोत्तर के माध्यम से या कथन के माध्यम से गीत रूप में कही जाती हैं। प्रश्नोत्तर कहन का उदाहरण देखें –

कोन सुवा बइठे मोर आमा के डारा म
कोन सुवा उड़त हे अगास
ना रे सुवा मोर कोन सुवा उड़त हे अगास
हरियर सुवा बइठे मोर आमा के डारा म
पिवरा सुवा उड़त हे अगास
ना रे सुवा मोर पिवरा सुवा उड़त हे अगास
हे अगासे रे सुवा मोर, तरिहरी ना मोरे ना…

इसमें अविवाहित लड़कियों संभावित पति के लिए, नई बहुएं जिनका पति काम के लिए बाहर गया है और गृहस्थ स्त्रियों की दशा दुर्दशा का वर्णन होता है। परदेश गए प्रिय के लिए सुआ गीत की पंक्तियाँ देखें –

कोन सुवा लावत हे मोर पिया के सन्देशिया
कोन सुवा करत हे मोर बाच
ना रे सुवा मोर कोन सुवा करत हे मोर बाच
हरियर सुवा लावत हे मोर पिया के सन्देशिया
पिवरा सुवा करत हे मोर बाच
ना रे सुवा मोर पिवरा सुवा करत हे मोर बाच
ए दे बाच ए सुवा रे मोर, तरिहरी ना मोरे ना…

इन्हीं नारी ह्रदय के भावों की लोक अभिव्यक्ति है सुआ गीत। यह नारी विरह सीधे तौर पर नहीं कहा गया है बल्कि संदेशवाहक का माध्यम सुआ अर्थात तोते को माध्यम बनाकर यह गीत गाया जाता है। एक उदाहरण और देखें –

कोन सुवा करत हे मोर रामे रमइया
कोन सुवा करत हे जोहार
ना रे सुवा मोर कोन सुवा करत हे जोहार
हरियर सुवा करत हे मोर रामे रमइया
पिवरा सुवा करत हे जोहार
ना रे सुवा मोर पिवरा सुवा करत हे जोहार
ए जोहारे रे सुवा रे मोर, तरिहरी ना मोरे ना…

इसी तरह गृहस्थ जीवन मे होनेवाली तकलीफों का भी वर्णन इन गीतों में होता रहा है। यह पंक्तियाँ देखें –
पइयाँ मै लागौं चंदा सुरज के रे सुअना
तिरिया जनम झन देय
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर
जहाँ पठवय तहं जाये।
अंगठित मोरि मोरि घर लिपवायं रे सुअना
फेर ननद के मन नहि आय
बांह पकड़ के सइयाँ घर लानय रे सुअना

कुछ इन्हीं भावनाओं के आधार पर सुआ गीतों का एक अलग ही अर्थ देखने को मिलता है, विख्यात साहित्यकार अमृता प्रीतम की किताब ‘दीवारों के पार’ में। वे लिखती हैं – “आदिवासी औरतें तोते को ऐसा कासद मानती हैं जो ईश्वर के पास उनकी फरियाद लेकर जा सकता है, इसलिए वह कार्तिक के महीने में सुआ नृत्य करती हैं। नृत्य के समय औरतों की गिनती 12 होती है जिसमें वे उन 12 राशियों का प्रतीक हो जाती हैं जिनसे पूरा ब्रह्मांड देखा जा सकता है। वक्त का कोई टुकड़ा इन 12 राशियों से बाहर नही रहता इसलिए उनकी फरियाद पूरे काल मे से गुजरती है।

इस नाच के साथ कोई साज नही होता, सिर्फ तालियों की लय होती है। फिर वे आहिस्ता आहिस्ता अपने बदन को हिलाती हैं हर ओर। तालियों के अलावा नाच के समय उनके हाथ पैरों और कलाइयों पर पड़े हुए जेवर ताल देते हैं। इन 12 औरतों में जो सबसे छोटी होती है, उसके सिर पर बांस की डलिया होती है जिसमे मिट्टी का, हरे रंग का तोता रखा जाता है-संदेशवाहक का प्रतीक। उस समय सब औरतें अपनी कमर के गिर्द कपड़े के छह बल देती हैं। आज इस 6 अंक का उनके पास कोई जवाब नही, पर अनुमान होता है, ब्रह्मांड की 12 राशियों में 6 पुरुष और 6 स्त्री राशियां होती हैं और कमर के गिर्द कपड़े के जो बल दिए जाते हैं, उनका संकेत 6 स्त्री राशियों से है और यह केवल स्त्री की व्यथा कथा है।

इस तरह गाती नाचती गांव के हर द्वार पर जाती हैं। गीत की पंक्ति होती है, तिरिया जनम झन देव। यानी हमें फिर स्त्री जन्म मत देना। यह बात तोता कहेगा ईश्वर से जाकर। औरत का जन्म पाकर घरों में जिन दुखों से गुजरना रहता है, उसका संकेत दूसरी पंक्तियों में मिलता है – “ससुर के संग चलूं तो बोझा उठाना पड़ता है। सास के संग चलूं तो उलाहने सुननी पड़ती हैं और अकेली चलूं तो लोग बातें करते हैं। वे तोते के माध्यम से फरियाद करती हैं- ईश्वर ! मुझे फिर से नारी का जन्म मत देना।”

सुआ छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का बड़ा लैंडमार्क है। यह महत्वपूर्ण है कि यह छत्तीसगढ़ की अपनी आदिम संस्कृति है जो प्रकृति आधारित है। सुआ नृत्य और गीत का आलोक इस लोक में सदैव बना रहे, यही कामना है।

(फीचर्ड इमेज: बसंत साहू)

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