Monday, October 3, 2022
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शेफाली की कविताएँ जीवन की सुंदरता से संवाद हैं

अरुणाभ सौरभ


शेफाली की कविताएँ उस युवा पीढ़ी की आवाज़ हैं जिसके सपने, मूल्य और संवेदना को यह व्यवस्था और तंत्र निरंतर तोड़ रहा है। ईश्वर यहाँ राजा नहीं है न राजा बेटा। एक विराट विपदा की मार झेलती कविता है जिनमें विपदाएँ ईश्वर की परिभाषा बदल देती हैं। इन कविताओं में बचाने का आग्रह है ।

जीवन और जीवन की सुंदरता इन कविताओं के बीच से झलकती है जिसमें शेफाली अपने लोग, अपनी दुनिया और अपने पात्रों से नियमित संवाद करती हैं । जिस संवाद में उस सब कुछ को बचाने की चेष्टा है जिससे यह दुनिया इतनी सुंदर है । बचाना जीवन को, जीवन की  प्राथमिकताओं को और अपनी प्रतिबद्धता को बचाना कवि धर्म है यहाँ ! इस धरती से बाहर आने के लिए और थोड़ा-थोड़ा सभी चीजों में समा जाने के लिए!

ये कविताएँ शहरी मध्यवर्ग की मानसिक जटिलता से हमें सीधे जोड़तीं हैं। भोगे हुए जीवन को कविताई का स्वरुप और गुणधर्म प्रदान करने की पूरी चेष्टा यहाँ दीखती है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सार्थक अंतर्संबंध और पारिस्थितिक अनुकूलनता का विस्तार यहाँ है।

कहीं-कहीं वैज्ञानिक दर्शन की क्लासिकल परिणति कविताओं में हुई  है जिसकी फैंटेसी  में हर तरह से जीवन के सौंदर्यबोध में डूब जाना सहज आकांक्षा  बन जाती है। भावों की उत्तप्त गहराइयों में उतरने की कोई अतिरिक्त चेष्टा नहीं है, बल्कि जटिल से जटिलतम परिस्थितियों  में अपनी पक्षधरता तय कर लेना कवि  की प्राथमिकता है, जिसके लिए छोटी से छोटी चीज़ें, आस-पास की बनती-बिगड़ती चीज़ें कविताई का हिस्सा बन जाती हैं।
शेफाली की कविताओं को हिन्दी कविता प्रेमियों का भरपूर प्यार मिलेगा, ऐसी उम्मीद जरूर की जा सकती है।

शेफाली शर्मा की कविताएँ

1. विपदा में ईश्वर

गिनती, पहाड़ों और ढेर सी कहानियों की तरह
हमें यह भी कंठस्थ था
कि विपदा में ईश्वर आते हैं

मैंने चाहा न विपदा आए न ईश्वर

विपदा आई ईश्वर भी आए
जब भव्य मंदिरों के दरवाजे बंद थे
वो छोटे-छोटे घरों से निकलकर आए

ईश्वर अब राजा नहीं
राजा का बेटा नहीं
सारथी और सेवक भी नहीं
न शस्त्र, न आभूषण, न चमत्कार

साधारण शरीर में असाधारण मन वाले ईश्वर
विपदाएँ ईश्वर की परिभाषा बदल देती हैं।

2. मृत्यु के बाद

मैं हूँ
नानी के हाथ का अचार
नाना के लाए फुटाने
दादी का बनाया कलाकंद
और बाबा की तोड़ी कचरिया
सभी की तरह एक दिन
मुझे भी वही हो जाना है
जिस से मैं बनी हूँ

जब कभी दिखाई न दूँ
और आवाज़ भी न आए
तो समझ लेना

किसी बच्चे ने मुट्ठी में
कसकर पकड़ रखा है
किसी ने मोती की तरह चमकते दो दाँतों से
अभी-अभी छुआ है मुझे
कभी भिखारन की गोदी में बैठे बच्चे को
दया से पकड़ाया है किसी ने
तो कभी किसी फलवाले ने साहब को खुश करने के लिए
साहब के बाबू को पकड़ा दिया है मुझे
खाने की छुट्टी में मैं ही महक रही हूँ

एक मशरूम की शक्ल में अभी-अभी आँखे खोली हैं
नदी के उस छोर पर जहाँ कोई नहीं आता
हरा चादर ओढ़े सोई हूँ
देख रहीं हूँ धनिया को इठलाते
कि फसल कितनी अच्छी हुई है
बेरी का सबसे लाल बेर
मैं ही हूँ

अग्नि मिले न मिले
तेरहवीं या श्राद्ध हो या कि न हो
कोई फर्क नहीं पड़ता

मुझे और हम सभी को इस धरती के भीतर ही जाना है
इस धरती से बाहर आने के लिए
और थोड़ा-थोड़ा सभी चीजों में
समा जाने के लिए।

3. कागज़ का फूल

कविताओं जाओ
अख़बारों तक जाओ
किताबों में साँस लेना मुश्किल है

अख़बार तुम्हें उस चौराहे तक पहुँचा देंगे
जहाँ अब भी पाँच रुपये के चने ख़रीदे
और बेचे जा रहे हैं

किसी ज़रूरत पर तुम्हें फाड़ा जाएगा
कुछ चादरों को गंदा होने से बचा लेना
कोई बुरी बात नहीं

हो सकता है चकरी की शक्ल में तुम
किसी दिन पोला के मेले पहुँचो
और जी भर नाचना नसीब हो तुम्हें

एक दिन कुछ बच्चे
तुम्हें फूल बना देंगे

लाइब्रेरी की धूल भरी अलमारी से कहीं बेहतर है
कागज़ का फूल हो जाना।

4. रोकना होगा

मैं इस वक्त जहाँ हूँ
वहाँ से एक हजार सात सौ सत्रह किलोमीटर दूर
कुछ लोग एक औरत को धमका रहे हैं
हथियार उठाकर धमकाते, चिल्लाते ये लोग
कितने समय में पार कर लेंगे,
एक हजार सात सौ सत्रह किलोमीटर की दूरी?

कितने समय में पहुँच जाएगा
इस औरत के चेहरे का खौफ़,
मेरे और मेरे आस-पास की औरतों के चेहरों तक ?

हो सकता है वे खुद न आयें
भेज दें केवल विचार
जिनकी गति कई हजार गुना ज्यादा होती है
और पलक झपकते ही हम तब्दील हो जाएँ
किसी हथियार में

मैंने सतर्कता बरतते हुए

टोका मिश्राइन को; जब उसने कहा
“इन लोगों के बच्चों ने खा ली हमारे बच्चों की नौकरी”

“दो से ज्यादा बच्चे पैदा करके
ये मुसलमान आबादी बढ़ा रहे हैं”
कहने वाली अपनी सबसे पक्की सहेली से पूछा
कि कितने भाई बहन हैं तुम्हारे पिताजी के

समझाया उसके बाबू को
कि साहब का डांटना
साहब के डांटने की तरह भी लिया जाना चाहिए
जाति की बैसाखी से
जातिवाद खत्म नहीं होगा

कहा अपने समाज से
कि ये बहुत सतर्क रहने का समय है
हथियार उठाकर धमकाते, चिल्लाते लोगों को
सेना रोक लेगी
लेकिन विचार…

विचारों को हमें
हम सभी को रोकना होगा।

5. चेतावनी

क्यूँ ढूंढते हो
मंगल सूत्र मेरी गर्दन में;
माथे की बिंदी और मांग के सिंदूर से
तय करते हो अपना आचरण

यदि मेरे आभूषण,
तुम्हारी सोच को नियंत्रित करते हैं;
और तुम्हारे शरीर को नियंत्रित करते हैं-
‘मेरे वस्त्र’

तो चेतावनी देती हूँ-
किसी नवजात बच्ची को;
गोद में मत उठाना।

6. मेरा विश्वास है

मेरा विश्वास है कि
ज्यादातर अपंगताएं और निष्क्रियताएं
शारीरिक न होकर मानसिक होती हैं

हमारे आस पास से गुज़रतीं
ये सारी बिल्लियां, वो शेर हैं
जिन्होंने डरना स्वीकार किया

कोमोडो ड्रैगन का एक पूरा समुदाय
अपनी पूँछ हिलाने का इस कदर आदी हो गया
कि पूँछ कट जाने पर
उसे फिर फिर उगा लेना, उसने मुनासिब समझा

वो सारे सांप जिन्होंने गर्दन उठाकर
फन फैलाना छोड़ दिया
हमारे लिए खाद बनाते हैं
चूहों को किसी का भय नहीं रहा
वो धड़ल्ले से लगाते हैं सेंध
खलिहानों गोदामों थालियों में

ये संभावनाएं हमेशा रहेंगी कि किसी दिन
छतों से उतर आए शेर
गमलों से निकल आएं फन फैलाए सांप
और महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे से शक्तिशाली ड्रैगन।

7. अपनी हथेलियों से घुमाकर बाँध लूँ

अपनी हथेलियों से घुमाकर बाँध लूँ
तो हवा भी इन बालों को छूने की कोशिश नहीं करती

ये जो दो रंग हैं मेरी पीठ पर
सूरज की हद तय करते हैं

जब तक न पकड़ा दूँ अपने आँचल का छोर
तालाब का पानी भी मेरे करीब आने से डरता है

हमारी भाषा में जिन शब्दों को
औरत का पर्यायवाची माना जाता रहा
हकीकत में वे विलोम थे

इस एक ग़लती ने
जो हकीकत में चालाकी थी

समाज को हीनांग बना दिया।

8. भगवान

किसी दिन बहुत ज़रूरी लगे
तो मान लेना उसे अपना भगवान
जो सूरज की तरह हो

बच्चों से कहना न पड़े
कि आँखें बंद कर के सिर झुकाओ
और जब रंगों की बात आए
तो सब उस से हों
सब उस के हों

उस तक पहुँचने के लिए काफ़ी हो
और ज़रूरी भी
चंद खिड़कियों को खोल देना

जो पीठ किए बैठे हों
वो उन तक भी पहुँच जाए
किसी चाँद के ज़रिए

जिसकी रौशनी को इस बात से फर्क न पड़े
कि हवाओं में लहराते झण्डे का रंग कौन सा है
बेहिचक उसका हाथ थामे चमक उठें सारे परचम

और उसे बाँटने की कोशिश
धूप को बाँटने की तरह
फ़िज़ूल हो।

9. निशान

रूगर वाली, चैने वाली
पाली वाली, बनी के पुरा वाली
यहाँ वाली- वहाँ वाली;

कुछ शहरों के नाम
और थोडा- थोड़ा उन शहरों को भी;
हमने सिर्फ इसलिए जाना
क्यूँकि हमारी-
दादियाँ, चाचियाँ, भाभियाँ…
आईं थीं वहाँ से।

उन शहरों का स्वाद;
तौर-तरीके, तीज-त्यौहार
हमने उन्हीं से जाना
उन्हीं ने उन शहरों को हम में बसाया।

ये बात और है कि;
अब वो शहर भी उनका नाम नहीं जानते
वो क्या,
उनका नाम तो हम भी नहीं जानते
और शायद भूल गई होंगी
वो ख़ुद भी।

याद रखे गये-
वारिस;
जिनके अंगूठे के निशान
जिंदा हैं कागजों पर
इन  बेनाम औरतों के हाथों के निशान
कंडों से, रोटियों से
हमारी आत्मा तक उतर गये।

दीवारों पर उनकी तस्वीर
भले ही न हो
पर आज भी अपना फर्श उधेड़ पाओ;
तो ताज़े मिलेंगे
लीपते वक्त, हथेलियों से बनाए गए
घुमावदार निशान।

10. बुरा समय

वो बुरा समय होता है जब कुछ बंदूकें
बच्चों को अनाथ कर देती हैं

आँगन में रखे जाते हैं बच्चों के शव

बम स्कूलों को ध्वस्त करते हैं
किताबें जला दी जाती हैं

खेल के मैदानों में
खड़ी कर दी जाती हैं तोपें

वो और भी बुरा समय होता है
जब खिलौने की दुकान में
रख दिए जाते हैं
बम, बंदूक और तोपें

खेल-खेल में ही सही
बच्चे जान लेते हैं
कि जान ली जा सकती है

और इस से भी ज़्यादा बुरा समय वो होता है
जब बच्चे सीख लेते हैं
हथियार चलाना।

11. मजबूर

अपने पेट से मजबूर
कुछ हिंदू
महीनों पालने के बाद
बकरों को बेच रहे हैं

अपने धर्म से मजबूर
कुछ मुसलमान
इन बकरों का गला काट रहे हैं

इन्हें एक दूसरे पर उंगली उठाते देख
आनी तो चाहिए
लेकिन हँसी भी नहीं आती

ये कितने मजबूर लोग हैं
ये राजनीति के मजदूर लोग हैं।

12. सुनो सुल्ताना

सुनो सुल्ताना
क्या तुम्हारे बेटे को भी आटे की लोई से खेलना पसंद है?
क्या वो भी भिंडी, पनीर या चिकन न बने तो रोटी नहीं खाता?
क्या उसे भी दाल में धनिया पसंद नहीं?
क्या वो भी डरता है कुकर की सीटी से…
और बड़ा होकर स्पाइडरमैन बनना चाहता है?
क्या उसे भी कुर्ते से ज़्यादा टीशर्ट
और पायजामे से ज़्यादा जींस पसंद है?
क्या वो भी शापिंग ज़ोन पहुँचते ही ट्राली कुरकुरे, क्रीम बिस्किट और मैगी से भर लेता है?

उस से कहना सीता चाची का बेटा भी
बिल्कुल ऐसा ही करता है

और ये भी बताना कि जब तक बोलना नहीं सीखे
तब तक तुम दोनों के हँसने और रोने की आवाज़
बिल्कुल एक सी थी

सर्दी-खाँसी होने पर तुम उसकी और वो तुम्हारी
दवाइयाँ पीता था
मोहल्ले में जब माता फैली तो तुम दोनों को हुई

एक सा दर्द
एक सा बुखार
एक सी तकलीफ़…

जाओ जल्दी बता दो
दंगाई आजकल सड़कों पर निकले बिना ही
घरों में पहुँच जाते हैं

राम-रहीम उनके कब्ज़े में हैं
तुम और मैं
इसी तरह बचा सकेंगे इस मोहल्ले के बच्चों को।

13. इमाम-ए-हिंद

हो सकता है नाम मिलता हो
शक्ल और पहनावा भी
लेकिन मेरा राम तुम्हारे राम से
बिल्कुल अलग है

मेरे राम का राज्य तब से है

जब जीवन था धर्म नहीं
रंग थे वस्त्र नहीं
भाषा थी भजन नहीं
आस्था थी कर्मकाण्ड नहीं

मन था मंदिर नहीं

मेरा राम सरहदें नहीं जानता
उसके नाम पर कत्ल नहीं होते
उसे चुनाव में पर्चों की तरह नहीं बाँटा जाता

मेरा राम वो है
जिसे अल्लामा इक़बाल इमाम-ए-हिंद कहते हैं

मेरा राम सलीब पर चढ़ा है
संभव कर रहा है गुरुद्वारों में लंगर

रौशनी और हवा की तरह
मेरा राम किसी की जकड़ और पकड़ से
एकदम मुक्त है।

14. उम्मीद

बच्चों से उम्मीदें हैं
बच्चों से सपने जिंदा हैं
है जितना जहाँ भी धुंधलापन
वो सारा सब धो डालेंगे

जब दुबके-दुबके होंगे सब
वो चुपके-चुपके निकलेंगे
और हथियारों में कैद हुआ
सारा लोहा पिघला देंगे

ये धरती जितनी रीती है
वो उसको उतना भर देंगे
सारे लोगों से आँख बचा
बीज प्यार के बो देंगे

बारूद यहाँ पर जितना है
सब फूँकों से उड़ जाएगा
गूँजेंगे हँसी ठहाके यूँ
उन्माद धरा रह जाएगा

खेल-खेल में फिर एक दिन
वो युद्ध क्षेत्र में पहुँचेंगे
और रंग बिरंगी गेंदों से
तोपों के मुँह बंद कर देंगे

वो इंसानों के हाथों से
जंजीर आज़ाद कराएंगे
और डाल के झूला जंजीरों का
ऊँची पेंग बढ़ाएंगे।

15. धरती की वसीयत

बच्चे कह रहे हैं
मटर हरी नहीं लाल होनी चाहिए
गाजर पीली, धनिया नीली
भिंडी सतरंगी होनी चाहिए

फूलों के पेड़ ऊँचे
फलों के नीचे होने चाहिए
या तो कैरी, अमरूद रंग बदल दें
या पत्तियां सफेद होनी चाहिए

उनका चीजों को यथावत् स्वीकार न करना
भविष्य में बदलाव का सूचक है
उनके दिमाग से निकलकर
एक दिन यह सब
हमारी आँखों के सामने होगा

वे एक दिन अस्वीकार कर देंगे
जातियाँ और प्रथाएँ
छोटा या बड़ा होने की
स्त्री या पुरुष होने की परिभाषाएँ

वे एक दिन खोज लेंगे
धरती की वसीयत
किस को कितना मिलना है
तय हो जाएगा एक दिन…

कवयित्री शेफाली शर्मा, जन्म- 28 अगस्त 1987 को दिल्ली में हुआ। शिक्षा एम.एस.सी. बायोकेमेस्ट्री, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से। कार्यक्षेत्र- (बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा एवं विकास) शाला प्रमुख, अमित किडजी छिंदवाड़ा अध्यक्ष, मेजर अमित एजुकेशन सोसाइटी छिंदवाड़ा

मध्य प्रदेश साहित्य सम्मेलन द्वारा स्थापित पुनर्नवा पुरस्कार 2020 से सम्मानित। जे एम डी पब्लिकेशन द्वारा श्रेष्ठ युवा रचनाकार सम्मान। इनर व्हील क्लब द्वारा वर्ष 2017 का नेशन बिल्डर अवार्ड।

साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं श्री दिविक रमेश द्वारा संपादित “बाल कविता संचयन” में भी बाल कविता शामिल। बच्चों की सुरक्षा को लेकर “बातें अपनी सुरक्षा की” नामक पुस्तिका प्रकाशित।

मोबाइल नम्बर- 9907762973
ई.मेल- shefali_2887@yahoo.com

टिप्पणीकार अरुणाभ सौरभ भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन सम्मान और साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार समेत कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित कवि अरुणाभ सौरभ चैनपुर, सहरसा बिहार के रहने वाले हैं। पीएचडी की उपाधि प्राप्त हैं . इनके ‘एतबे टा नहि’, ‘तेँ किछु आर’, नाम से दो मैथिली कविता संग्रह और ‘दिन बनने के क्रम में’, आद्य नायिका (लम्बी कविता), किसी और बहाने से नाम से तीन हिंदी कविता संग्रह प्रकशित हो चुका है. आलोचना पुस्तक ‘लम्बी कविता का वितान’ प्रकाशित है। अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में भी इन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए हैं. प्रो एम. एम. कलबुर्गी के साथ ‘वचन’ साहित्य का अनुवाद, भारतीय ज्ञानपीठ से अनुवाद की कुछ किताबें प्रकाशित।

संपर्क: 9871969360

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