समकालीन जनमत
कहानी साहित्य-संस्कृति

अंतिम कक्षा- अल्फोंस दोदे

उस सुबह, मुझे स्कूल जाने में बहुत देर हो गई थी और मुझे डर लग रहा था कि श्रीमान हैमल मुझे डांटेंगे क्योंकि उन्होंने कहा था कि वे हमसे कृदंत के बारे में पूछेंगे और मुझे कृदंत का क भी नहीं पता था। एक क्षण के लिए मेरे मन में विचार आया कि आज स्कूल न जाऊं और यहीं मैदान में खेलूँ।

उस दिन मौसम बिल्कुल सुहाना और आसमान एकदम साफ़ था।

मैं पेड़ों से आ रहे पक्षियों के चहचहाने की आवाज को साफ-साफ सुन सकता था और फिर मैंने आरा मशीन के पीछे रीपर् मैदान में प्रुसियन सेना को मार्च करते देखा। यह सब मुझे कृदंत के नियमों से बहुत अच्छा लग रहा था, पर मैं इन सब को छोड़कर तेज़ी से स्कूल की तरफ़ दौड़ा।

मैंने टाउनहाल से गुजरते हुए देखा कि वहाँ के नोटिसबोर्ड के आस-पास लोग इकट्ठे हैं। विगत दो वर्षों से, इस जगह से ही हमें सारे बुरे समाचार प्राप्त होते हैं; जैसे युद्ध में हार, अधिग्रहण, हेडक्वाटर के आदेश; और मैंने बिना रुके सोचा :

“अब क्या हुआ ?”

फिर, जब मैं दौड़ते हुए उधर से गुजर रहा था, तब वाचर लोहार, जो अपने सहायक के साथ वहाँ पोस्टर पर लिखे को पढ़ रहा था, मेरी तरफ़ चिल्ला कर कहा:

“दौड़ो मत बच्चे, आज तुम्हें स्कूल पहुँचने में देर नहीं होगी।”

मुझे ऐसा लगा जैसे वो मेरा मजाक उड़ा रहा हो और मैं हांफते हुए श्रीमान हैमल के अहाते में पहुँचा।

सामान्यत: कक्षा शुरू होने पर काफ़ी शोर होता था जो गली तक सुनाई देता था। कुछ डेस्क खुले होते और कुछ बंद, हमलोग अच्छी तरह से याद करने के लिए कान पर हाथ रखकर ज़ोर से पाठों को दुहराते और शिक्षक अपनी लंबी इंच को मेज़ पर पटकते हुए कहते:

“थोड़ा धीरे!”

मैं सोच रहा था कि कैसे मैं बिना ध्यान में आए, अपने बेंच पर बैठ जाऊँ पर उस दिन वहाँ नीरव शांति पसरी थी जैसे कि कोई रविवार का दिन हो। खुली खिड़की से मैंने देखा कि मेरे सभी सहपाठी अपनी जगह पर पहले से बैठे हुए हैं और श्रीमान हैमल लोहे की वही इंच लिए कक्ष में इधर-उधर चिंतामग्न टहल रहे हैं। इसी घनघोर शांति में मुझे दरवाजा खोलना और अंदर प्रवेश करना था। आप सोच सकते हैं मैं कितना लज्जित और डरा-सहमा होगा।

ख़ैर! कुछ नहीं हुआ। श्रीमान हैमल ने मुझे बिना क्रोध के देखा और बड़ी धीरे से कहा:

“मेरे नन्हें फ्रांज़, जल्दी से अपनी जगह पर जाओ; हम तुम्हारे बिना ही शुरू करने जा रहे थे।”

मैं अपनी बेंच की तरफ गया और धम्म से अपनी जगह पर बैठ गया। तब जाकर मैं अपने डर से उबरा और ध्यान दिया कि हमारे शिक्षक ने आज अपनी ख़ास हरे रंग की कोट, झालरदार टाई और रेशमी काली टोपी पहनी है जो वे स्कूल निरीक्षण के दौरान या फिर पुरस्कार वितरण के दिन पहना करते थे। इसके अलावा, पूरी कक्षा आज असाधारण रूप से शांत एवं गंभीर थी। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक मुझे यह देखकर लगा कि क्लास के पीछे की सीटें जो अक्सर खाली रहती थीं, वहाँ आज गांव के लोग बैठे थे और वे सब भी हमारी तरह शांत थे; त्रिकोर्न टोपी में वृद्ध हौसर, पूर्व मेयर-डाकिया और फिर और भी लोग मौजूद थे। सभी लोग दुखी दिख रहे थे और हौसर एक पुरानी कुतरी हुई ककहरा की किताब लाये हुए थे जिसे उन्होंने अपनी गोद में खोल कर रखी हुई थी और अपने मोटे चश्मे से अक्षरों को देखने की कोशिश कर रहे थे। यह सब देख कर मैं हैरत में था तभी श्रीमान हैमल अपने कुर्सी से उठे और उसी धीर-गंभीर और शांत आवाज में सभी बच्चों को संबोधित किया :

“मेरे बच्चों! यह आखिरी पाठ है जो मैं पढ़ा रहा हूँ। बर्लिन से आदेश आया है कि अब आलसास और लोरैन के स्कूलों में सिर्फ जर्मन भाषा पढ़ाई जाए। कल नए शिक्षक आ रहे हैं। आज, यह फ़्रेंच का अंतिम पाठ है। मैं आपसे सभी से आग्रह करता हूँ कि आप ध्यान से सुनें।”

ये शब्द मुझे परेशान एवं दुखी कर रहे थे। आह! कितना मनहूस दिन था यह! अब मुझे समझ में आया कि यह वही आदेश था जो टाउन हाल पर लगा हुआ था। मेरा फ़्रेंच का अंतिम पाठ…

और मैं बड़ी मुश्किल से लिख पाता था! अब क्या मैं कभी सीख पाऊँगा! इसलिए मेरा वहाँ ठहरना जरूरी था!… अब मुझे अपना गुज़रा हुआ वक़्त वापस चाहिए था; जो कक्षाएँ मेरी, घोसलों के पीछे दौड़ने और सार नदी में तैरने के कारण छूट गयी थीं, उन्हें मैं फिर से करना चाहता था। जो पुस्तकें अभी कुछ समय पहले तक बहुत उबाऊ और बोझिल जान पड़ती थीं, मेरा व्याकरण, मेरा गौरवमयी इतिहास; अब वे सब मुझे पुराने अंतरंग मित्र लगने लगे जिनसे बिछड़ने का दर्द मेरे लिए असह्य था। श्रीमान हैमल भी मुझे अच्छे लग रहे थे और उनके दंड एवं उनके इंच की मार मैं भूल चुका था क्योंकि अब लग रहा था कि मैं उन्हें फिर कभी देख नहीं पाऊँगा।

बेचारे, श्रीमान हैमल बहुत अच्छे आदमी थे!

अब जाकर मैं समझा कि आज ऐसा क्यों है, क्यों आज गांव के बूढ़े लोग कक्ष में आकर पीछे बैठे हैं और क्यों रविवार की अच्छी आदतें आज दिखायी दे रही हैं। आज ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वृद्ध लोग पछतावा कर रहे हैं कि वे पहले प्राय: क्यों नहीं इस विद्यालय में आए। यह एक तरीका था जिससे उस शिक्षक के प्रति कृतज्ञता व्यक्त हो जिसने बड़ी लगन से अपने जीवन के बहुमूल्य चालीस वर्ष इस विद्यालय एवं गांव की सेवा को समर्पित किया हो एवं दूसरा, यह अपने देशप्रेम को प्रदर्शित करने का जरिया था।

अभी मैं अपने इन्हीं विचारों में खोया ही था कि सुना कि मेरा नाम पुकारा जा रहा है। अब मेरे बोलने की बारी थी। मुझे कृदंत का लंबा एवं प्रसिद्ध नियम ऊँची एवं स्पष्ट आवाज में बताना था और कोई गलती भी नहीं होनी चाहिए थी। पर, मैं पहले ही शब्द पर लड़खड़ा गया; भारी मन से सर झुकाए अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैंने श्रीमान हैमल को कहते सुना:

“मेरे प्यारे फ्रांज़, मैं तुम्हें अब नहीं डांटूँगा, पहले ही तुम बहुत ज्यादा डांट खा चुके हो… तुम्हारे लिए उतना काफी है। रोज हम खुद से कहते हैं: वाह! अभी तो काफी समय है। मैं कल पढ़ लूँगा। और अब तुम देख रहे हो क्या हुआ… ओह! हमारे आलसास के लिए बहुत दुर्भाग्य है कि हम आज का काम कल पर टाल देते हैं। अब वे लोग अधिकार से कह सकते हैं कि कैसे फ्रांसीसी हो; अपने आप को फ्रांसीसी कहते हो एवं अपनी भाषा को न पढ़ना जानते हो और न ही लिखना। पर, मेरे बदनसीब फ्रांज़! इन सब में तुम्हारा दोष उतना नहीं है, जितना हम सबका है। हम सभी इसके लिए समानरूप से जिम्मेदार हैं। हम सभी को खुद से पूछना होगा कि हमने अपनी तरफ से क्या किया?”

“तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारी पढ़ाई पर उचित ध्यान नहीं दिया। वे तुम्हें कुछ चंद पैसों की ख़ातिर खेतों में एवं मिल में काम करने के लिए भेजते रहे। खुद मैं भी कम दोषी नहीं हूँ। क्या मैंने तुम्हें पढ़ने के बजाय बाग में पौधों को सींचने के लिए नहीं भेजा? और जब मुझे ट्राउट मछली पकड़ने जाना होता था तो क्या तुम्हें छुट्टी देने में मुझे झिझक होती थी?…”

और इस तरह से, बात करते-करते, श्रीमान हैमल ने फ्रेंच भाषा के बारे में बोलना शुरू किया। उन्होंने बताया कि फ्रेंच भाषा दुनिया की सबसे बेहतरीन भाषा है, यह सबसे ज्यादा सुगठित, संगठित एवं स्पष्ट है। हमें इसे अपने बीच जिंदा रखना होगा एवं इसे कभी भूलना नहीं होगा क्योंकि जब आदमी गुलाम होता है तब उसके लिए उसकी गुलामी से आजादी की एक मात्र कुंजी, उसकी अपनी ज़बान होती है।… फिर उन्होंने व्याकरण लिया और हमें एक पाठ पढ़ाया। मैं यह देखकर हतप्रभ था कि इतनी आसानी से मैं कैसे समझ गया। उन्होंने जो कुछ मुझसे कहा मुझे बेहद सरल लगा। मुझे महसूस हुआ कि पहले कभी मैंने इतनी तन्मयता से उन्हें नहीं सुना और न ही उन्होंने पहले कभी इतने धैर्य के साथ हमें समझाया। कोई भी कह सकता है कि यह सज्जन आदमी आज जाने से पहले अपना समूचा ज्ञान जन्म-घुट्टी की तरह हमें एक ही झटके में पिला देना चाहता है।

पाठ समाप्त होने पर हमने लिखने का काम शुरू किया। उस दिन के लिए श्रीमान हैमल ने बिल्कुल नए शब्दों को तैयार किया था, उन्होंने बेहद सुंदर अक्षरों में लिखा फ़्रांस, अलसास, फ़्रांस, अलसास। ऐसा लग रहा था कि पूरे कक्ष में हमारे डेस्क के डंडे में ये शब्द झंडे की तरह लहरा रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात थी कि हम पढ़ रहे थे और कक्ष में एकदम सन्नाटा पसरा था। हम केवल कागज पर कलम के घिसने की आवाज़ सुन सकते थे। तभी कुछ कोकचाफ़ कीड़े कक्ष में प्रवेश किए पर उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, यहाँ तक कि उन छोटे बच्चों ने भी ध्यान नहीं दिया जो केवल लकीरें खींच रहे थे, वे इतनी तन्मयता एवं लगन से अपने काम में लगे थे जैसे लकीर भी फ्रेंच में खींच रहे हों। विद्यालय की छत पर बहुत हल्की आवाज में कबूतर गुटर्गूं कर रहे थे और उन्हें सुनकर मैंने खुद से पूछा:

“क्या इन्हें भी जर्मन में गाने के लिए मजबूर किया जाएगा?”

कभी-कभी, मैं अपनी कॉपी से नज़र उठाता तो मुझे श्रीमान हैमल अपनी कुर्सी में स्तब्ध-स्थिर नज़र आते एवं उनकी नज़रें आस-पास की चीजों को अपलक देखतीं दिखती; ऐसा प्रतीत होता मानो वे अपनी नज़रों में स्कूल की हर चीज को क़ैद कर लेना चाहते हों।… सोचिए! पिछले चालीस वर्षों से, वे इसी जगह पर हैं; वही अहाता, वही कक्ष, सबकुछ उनकी आँखों के सामने बिल्कुल उसी तरह से है। केवल बदले हैं- डेस्क एवं बेंच जो रगड़ने से घिस चुके हैं; अहाते का अखरोट जो अब काफी लंबा हो गया है एवं हॉप की लताएँ जो अब खिड़कियों से लेकर छत तक की शोभा बढ़ा रही हैं। यह क्षण इस नि:सहाय आदमी के लिए कितना कष्टकर एवं हृदय विदारक होगा जो अपनी चीजें छोड़कर जा रहा है। उनकी बहन ऊपर के कमरे में आ-जा रही थीं और ट्रंक बंद करने की आवाज आ रही थी क्योंकि उन्हें हमेशा के लिए कल यह प्रांत छोड़ कर जाना था।

फिर भी, उनमें आखिर क्षण में भी हमें पढ़ाने का साहस था। सुलेख की कक्षा के बाद, हमने इतिहास का एक पाठ पढ़ा; तदोपरांत छोटे बच्चों ने एक साथ ककहरा का पाठ पढ़ा- बा बे बी बो ब्यु। कक्ष के अंतिम पंक्ति में बैठे वो वृद्ध हौसर अपना चश्मा पहने हुए थे और उनकी वर्णमाला की पुस्तक उनके हाथ में थी एवं बच्चों के साथ वे भी वर्णों का उच्चारण कर रहे थे। हम देख रहे थे कि वह किस तरह से इसमें भाग ले रहे थे; उनकी आवाज भावुकता की वजह से लड़खड़ा रही थी, यह सुनने में बड़ा ही हास्यास्पद लग रहा था और हमें इस पर रुलाई और हंसी दोनों आ रही थी। ओह! मुझे यह अंतिम कक्षा हमेशा याद रहेगी।…

अचानक चर्च की घड़ी ने बारह बजाये और फिर आंजेलस की प्रार्थना का समय हो गया। ठीक उसी क्षण, ड्रिल से वापस लौट रहे जर्मन सैनिकों के ट्रंपेट की आवाज खिड़की से आने लगी।… श्रीमान हैमल अपनी कुर्सी से उठ खड़े हो गए और उनका चेहरा एकदम पीला पड़ गया था। इतने बड़े आज तक वे मुझे पहले कभी नहीं लगे।

“उन्होंने कहा- मेरे मित्रो, मेरे दोस्तो! मैं… मैं…”

पर उनका गला रुँध गया और वे कहते-कहते रुक गए। वे अपना वाक्य पूरा नहीं कर सके।

फिर वे एक खड़िया लेकर श्यामपट्ट की तरफ मुड़े और अपना सारा साहस बटोरकर पूरी शक्ति के साथ, वे जितना बड़ा लिख सकते थे उतने बड़े अक्षरों में लिखा:

“फ़्रांस जिंदाबाद!”

फिर वे कुछ क्षण वहाँ रुके रहे, अपना सिर दीवार पर टिकाए, बिना कुछ बोले उन्होंने अपने हाथ से इशारा किया:

“बस हो गया… आप लोग जाइए

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