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सिनेमा

फ़िल्म ‘द सोर्स’ : ‘से नो टू सेक्स फॉर वाटर’

प्रतिभा कटियार


मेरे घर के ठीक सामने एक कुआँ था. कुआँ अपनी सामन्य भव्यता के साथ मुस्कुराता था. यानी वो पक्का कुआँ था. उसकी जगत पक्की थी, मुंडेर उठी थी और पानी खींचने की गडारी (पहियेनुमा चकरी जिसमें रस्सी डालकर पानी खींचना आसान होता था.) थी. वो कुआं मुझे आज क्यों याद आ रहा है, यह बाद में बताऊंगी अभी यह बताने का मन है कि कुँए की बाबत क्या-क्या याद आ रहा है.

जैसे उस कुँए से पानी लेने जाने के वक़्त घर के भीतर स्त्रियों की चहल-पहल, सजना-संवरना, कुँए पर स्त्रियों की हंसी-ठिठोली, कुँए के किसी कोने पर अपने सुख दुःख साझा करती स्त्रियाँ.

ज्यादातर ब्याहता महिलाएं लम्बे घूँघट में होती थीं और कुंवारियां अपने कुंवारेपन की ठसक में. घर कैद की दीवारों से मुक्ति जैसा था कुँए से पानी भरने जाना या नहर पर कपड़े धोने जाना.

इस कुँए की बाबत दूसरी बात याद आती है कि सुबह की पानी भरने की पाली खत्म होने के बाद पुरुषों का कुँए पर आकर नहाना. वैसे ही जैसे वो आज भी कहीं भी कैसे भी नहाने के लिए आज़ाद मानते हैं खुद को. नहाते हुए बेडौल पुरुषों को देख स्त्रियों की खुसुर-फुसुर और मसखरी भी शामिल होती ही थी.

कुँए को लेकर एक याद और है कि शादी के वक्त (लडके की शादी) लड़के की माँ कुँए में एक पैर लटकाकर बैठती थी और तब लड़का उसे मनाता था और तब बरात जाती थी. यह ब्याह की एक रस्म थी. कहा जाता है कि लड़के की माँ बेटे से कहती थी कि वो वादा करे कि बहू आने के बाद भी वो उसकी बात मानेगा तब बारात जाने देगी वो वरना कुँए में कूद जायेगी. लड़का माँ को वादा करता था और बारात लेकर बहू यानी आज्ञाकारी स्त्री जो घर के काम संभाले, माँ बाप की सेवा करे और पति की इच्छाएं पूरे करे को ब्याह लाता था.

फिर वो स्त्री इसी कुँए से पानी भरने आती और सखियों से अगर वो बनी हैं तो अपने मन की पीर कहती वरना घूँघट में सिसकते हुए पानी भरकर मटके पर मटके रखकर घर को पानी से भर देती. हालाँकि उसकी आँखों के पानी को कोई नहीं देखता.

स्त्रियों का पानी से गहरा नाता है. ये स्मृतियाँ मेरे बचपन की हैं. मैदानी इलाके के गाँव की. ऐसी ही मिलती-जुलती छवियाँ राजस्थान, पहाड़ों की भी हैं जहाँ स्त्रियाँ पानी भरने के लिए न जाने कितना मुश्किल और लम्बा सफर तय करती हैं. स्त्रियाँ बीमार हों, गर्भवती हों किसी भी हाल में पानी उन्हें ही भरना होता था. जब मैं ‘था’ लिख रही हूँ तो बहुत उदास हूँ क्योंकि जानती हूँ अब भी यह कई जगहों पर ‘है’ ही है. इसे ‘था’ बनने में न जाने कितना समय लगेगा अभी.

अब आती हूँ उस बात पर जिसकी वजह से वो कुआँ मेरी स्मृतियों से निकलकर बाहर आ गया. मैंने कल रात एक हॉलीवुड फिल्म देखी The Source. 2011 में रिलीज हुई यह फिल्म उत्तरी अफ्रीका के एक ऐसे गाँव की कहानी है जहाँ पानी और बिजली जैसी जरूरी चीज़ें नहीं हैं. वह सूखे पहाड़ों वाला कोई गाँव है वो और वहां दूर एक पानी का सोता है जहाँ से स्त्रियों को पानी भरकर लाना होता है. स्त्रियाँ सदियों से इस काम को एक परम्परा की तरह निभा रही हैं. इस परम्परा को निभाते हुए न जाने कितनी स्त्रियाँ पानी भरकर लौटते हुए गिरकर मर गयीं, कितनी स्त्रियों के बच्चे उनके गिरने से गर्भपात के कारण मर गए, नौवें महीने की प्रसूताओं को भी कोई रियायत नहीं थी वो भी डंडे में दोनों छोर पर बाल्टियाँ लटकाकर घर में पानी लाती थीं. जबकि ठीक उस वक्त गांव के मर्द शराब पी रहे होते, बैठकी में गपशप कर रहे होते या कुछ और मनोरंजक काम कर रहे होते थे.

लडकियों को पढ़ाना नहीं चाहिए, उनका दिमाग बेकाबू हो जायेगा फिर वो धर्म की बात मानने से इंकार कर देंगी, स्त्रियों का काम है मर्दों की बात मानना और उनकी सेवा करना, पुरुषों की हुक्म उदूली धर्म के खिलाफ है जैसी बातों को गाँठ में बांधे ये स्त्रियाँ एक यातना शिविर से जीवन में जीने को अभिशप्त थीं और इसे ही नियति माने जिए जा रही थीं. 18, 20, 16 , 12 बच्चे पैदा करने वाली स्त्रियों ने कुछ ही जीवित संतानों को गले लगाया. ज्यादातर संतानें यातना शिविरों में जन्म लेने से पहले ही मर गयीं या कुछ जन्म लेने के बाद.

कहानी तब शुरू होती है जब एक रोज लैला नामक युवा स्त्री जो गाँव की बहू है और थोड़ी पढ़ी-लिखी भी है स्त्रियों से कहती है पानी लाना हमारा ही काम क्यों? तर्क मिलता है क्योंकि पानी घर के कामों में खर्च होता है इसलिए यह स्त्रियों को ही लाना चाहिए क्योंकि घर के काम स्त्रियों को ही करने चाहिए ऐसा धर्म की किताब में लिखा है. धर्म की वो किताब जिसे कोई स्त्री पढ़ नहीं सकती. लैला ने धर्म की किताबें भी पढ़ी हैं और बेहतर जिन्दगी का सपना भी देखा है. वो गाँव में पानी लाने के लिए गाँव की स्त्रियों को एक अजीब सी हड़ताल करने का आवाहन करती है. हड़ताल ये कि सभी स्त्रियाँ पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने बंद कर दें. कब तक? जब तक गाँव में पानी न आ जाए.

जैसा कि हमेशा से होता है ज्यादातर स्त्रियों ने इस बात का मजाक उड़ाया और पानी लाने के काम को अपना धर्म बताया. लेकिन धीरे-धीरे स्त्रियों को बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी और उन्होंने हड़ताल शुरू कर दी. वो रात में पुरुषों से मार खातीं, दिन भर काम करतीं लेकिन उन्होंने सम्बन्ध बनाने नहीं दिए. सुनने में लगता है क्या यह इतनी बड़ी बात थी? लेकिन थी. क्योंकि गाँव के पुरुष असुरक्षित हो रहे थे, उनकी स्त्रियों ने पहली बार उन्हें इंकार किया था. स्त्रियों पर धर्म का दबाव डाला गया लेकिन लैला ने धर्म की किताबें पढ़ी थीं जिसमें स्त्री और पुरुष की बराबरी की सम्मान की बात लिखी थी स्त्री को पुरुष का गुलाम नहीं कहा गया था.

बहरहाल, इस अनोखी हड़ताल ने उस गाँव में तो पानी ला ही दिया मेरी आँखों में भी पानी भर आया. दुनिया के किसी भी कोने में स्त्रियाँ सिर्फ सह ही रही हैं. दुनिया के हर कोने में स्त्री को गुलाम बनाकर रखने की फितरत क्यों परवान पर है. और प्यार का मतलब सेक्स ही समझकर उस पर धर्म का लबादा उढ़ाकर स्त्रियों को सहेजने को क्यों दे दिया गया है आखिर. शहरी खुद को पढ़ी-लिखी समझने वाली एक बड़ी आबादी को यह बात अजीब लग सकती है कि इसी हिन्दुस्तान में अब भी न जाने कितनी स्त्रियाँ जिन पतियों के बच्चे पैदा करती हैं उनकी शक्लें उन्होंने कई बरस बाद देखीं, और इसे प्रेम का नाम दिया गया.

बहुत सारी लैलायें चाहिए जो अपनी बात को समूचे गाँव की समुदाय की आवाज बना दें. और ऐसा करने का यह अर्थ भी नहीं कि वो पुरुषों से नफरत करती हैं. नहीं, बल्कि वो खुद को भी थोड़ा सा प्यार करना चाहती हैं, खुद को भी इन्सान की तरह जीते हुए देखना चाहती हैं गुलाम की तरह नहीं. बस इतना ही सा तो ख्वाब है…वह भी क्यों चुभ रहा है.

इस फिल्म में पानी के बहाने स्त्रियों के तमाम मुद्दों पर बात हुई है. मसलन तन ढंकने का अधिकार. गरीब औरतों को तन ढंकने का अधिकार नहीं होता था. जिसे देखते हुए मुझे याद आई हिंदुस्तान की नंगेली जिसने निचली जाति की स्त्रियों के तन ढंकने के अधिकार के लिए अपने स्तन काट दिए थे.

स्त्रियों की गुलामी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आँखें भर आती हैं. तब और जब उन्हीं परम्पराओं का पोषण करने वाली कुछ स्त्रियाँ इतराते हुए उन परम्पराओं पर ‘माय च्वायस’ का लेबल लगाती हैं. क्या वो सच में नहीं जानतीं कि वे उन परम्पराओं पर ‘माय च्वायस’ का लेबल लगा रही हैं जिन परम्पराओं को तोड़ने को स्त्रियों ने जानें दी हैं, और उन्हें निभाते हुए भी जाने गंवाई हैं.

यह फिल्म स्त्री विमर्श की कई लेयर्स पर तो बात करती ही है साथ ही पुरुषों से भी संवाद करती है कि सेक्स ऑब्जेक्ट भर नहीं हैं स्त्रियाँ उन्हें भी इन्सान की तरह जीने का हक है और सेक्स प्यार नहीं होता. प्यार, प्यार ही होता है.

 

(समीक्षक प्रतिभा कटियार, लखनऊ में जन्मी, पली-बढ़ी. राजनीति शास्त्र में एम ए, एलएलबी, पत्रकारिता में डिप्लोमा. 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता. कहानियाँ और कविताएँ  कई पत्रिकाओं और हिंदी अखबारों में प्रकाशित. व्यंग्य संग्रह ‘खूब कही’ और मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कारों पर आधारित पुस्तक ‘चर्चा हमारा’ का संपादन. रूसी कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी प्रकाशित. इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन देहरादून में कार्यरत.

सम्पर्क: [email protected])

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