समकालीन जनमत
कविता

देवयानी की कविताएँ ग़लती करने की ख़ुदमुख्तारी को हासिल करने की जद्दोजहद हैं

हिमांशु पण्ड्या


प्रारंभिक दौर के स्त्री लेखन में परम्परा के नाम पर बनी शृंखला की अदृश्य कड़ियों को नज़र के सामने लाने पर बल रहा, दूसरे दौर में स्त्री की सबलता और उसके प्रतिरोध के स्वर को पाठकों तक पहुंचाने के दमदार हस्तक्षेप हुए. बेशक, वह जरूरी भी था. लेकिन हम दमन और प्रतिरोध के प्रतिद्वंद्वी स्वरों से होते हुए अब एक नए दौर में आ गए हैं.

देवयानी भारद्वाज की कविताएँ इस तीसरे और आलोडन वाले फैसलाकुन दौर का प्रतिनिधित्त्व करती हैं. देवयानी की कविताओं में हम एक नयी स्त्री को देख सकते हैं. आदर्श नायक ( मैं ‘नायिका’ नहीं जोड़ रहा हूँ. ‘नायक’ को यहाँ जेंडर न्यूट्रल पद मानें. ) गढ़ने की कोशिशों ने विमर्श और साहित्य को ख़ासा नुक्सान पहुँचाया है. यहाँ कोई आदर्श स्त्री नहीं है. कम से कम परम्परागत आदर्शों की कसौटी पर तो नहीं.

देवयानी की कविताओं की स्त्री उस मुश्किल दौर से गुजर रही है जहाँ प्रेम के बावजूद उस प्रेम में निहित अदृश्य हिंसा को चिह्नित करने की जिम्मेदारी उस पर आ गयी है.

वह इस विलक्षण विडम्बना को पहचान गयी है कि जब हमारे ह्रदय में प्रेम उमड़ रहा होता है तब हमारे नाखून सबसे ज्यादा पैने और दांत सबसे ज्यादा तीखे होते हैं. प्रेम निरपेक्ष नहीं है, वह जो जगह घेरता है उसमें अपना आप खो जाता है. इस अपने आपसे जुदा होने के बहुत गुणगान पूर्व में किये गए हैं लेकिन इस अपने आप के खोने की रिक्तता को कोई मीर नहीं पहचान सकता था.

निर्भया क्षण ने भारत के स्त्री आन्दोलन को एक नए आयाम दिए. उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण ये था कि उसने सुरक्षा के नाम पर दबे पाँव आ रहे संरक्षणवाद को अपनी सही जगह दिखाई. ‘why loiter’ नाम से पूरा अभियान चला जिसमें स्त्रियों ने देश के अनेक शहरों में आधी रात आवारगी करने का हौसला दिखाया.

शहर की रात में नाशादो नाकारा फिरना- जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरना तो पुरुष के विद्रोह का रूमानी पैमाना रहा है. अब पहली बार इस आवारगी का परचम स्त्री ने उठाया है और क्या खूब उठाया है.

स्त्री को आवारगी का भी हक है, उसे आदर्श स्त्री के सारे पैमानों को चूर चूर कर देने का हक है, उसे गलतियां करने का हक है और सबसे बढ़कर – उसे ठोकर खाकर सँभलने के बाद दोबारा गलती करने का हक है !

गलती करने की खुदमुख्तारी – यही देवयानी की कविता का वो केन्द्रीय स्वर है जो उसकी कविता को विशिष्ट बनता है. उनकी एक कविता में स्त्री द्वारा किये गए और छोड़ दिए गए प्रेमों का हिसाब करती हुई खुदसे सवाल करती है कि आखिर क्या बेहतर था ? और जवाब जो आता है वो इस नयी स्त्री की पहचान है.

सही हो या गलत, उसने अपने बीहड़ और मरुस्थल खुद चुने हैं. यही आज की स्त्री है. उनकी एक बहुचर्चित कविता में स्त्री रेगिस्तान के आंधी में खिड़की का पल्ला खुला छोड़ देती है ताकि ठंडी हवा का झोंका आये, चाहे फिर बाद में रेत की मोटी परत बुहारनी पड़े या अपनी कुछ बेहद प्यारी खो गयी चीज़ों को ढूँढने की अंतहीन तलाश करनी पड़े. (इस कविता पर हम अंत में फिर बात करेंगे. )

यह एक गुमराह समय है जब आपको पता नहीं कि जो आग आपके हाथ में है वह चूल्हे की है या चिता की है लेकिन इंसान आग का इस्तेमाल छोड़ तो नहीं देगा न. अनहोनी के डर से निषिद्ध रास्तों पर चलना स्थगित नहीं किया जा सकता.

स्वर्ण मृग का शिकार सिर्फ राम का अधिकार नहीं है. देवयानी की एक विलक्षण कविता , जो मिथकों के पुनर्पाठ के लिए आगे तक याद रखी जायेगी, में आज आवारगी/गलती करने वाली स्त्री की पुरखिन सीता को याद किया गया है जिसने पहली बार पुरुष की बनायी लक्ष्मणरेखा को लांघ कर गलती की खुदमुख्तारी को अर्जित किया.

एक रचनाकार अपने जीवन अनुभवों को रचना में सार्थक ढंग से प्रयुक्त करता है. ऐसे में उसके जानने वालों के लिए उन बिन्दुओं की पहचान करना आसान होता है जब उसने लिखना छोड़ दिया या जब बहुत आवेग के साथ लिखा. ऐसे में परिचित व्यक्ति के लिए पहली कसौटी यह है कि वह कविता को आत्मकथा की तरह न पढ़े. एक रचना की कसौटी भी यही है कि उसके अनुभव की सार्वजनिक गूँज ज्यादा प्रभावी रहे.

इस कसौटी पर देवयानी की कविताएँ खरी उतरती हैं. उनकी कविता में अपने डर को झूठ कहकर खुद को दिलासा देने वाली स्त्री के मारे जाने की चेतावनी है. यह प्रेम को दैवत्त्व से मुक्त कराने वाला स्त्री स्वर है.

देवयानी के लिए जीवन एक लिखी जा रही कविता है जो अभी पूरी नहीं हुई. यही उनकी कविता यात्रा में दिखाई देता है. उनकी कविता में फीनिक्स की तरह अपनी राख झाड कर उठ खड़ी होने वाली स्त्री नज़र आती है. ‘दोबारा नहीं होता’ या ‘संज्ञान’ में वह स्त्री नज़र आती है. ‘तेरह साल के लड़के’ कविता बताती है कि उनके सामाजिक सरोकारों का व्यापक विस्तार हो रहा है. हालाँकि एक कविता में वे ट्रोल्स की पशुओं से तुलना करती हैं जो मुझे खीझ के कारण आ गयी असंवेदनशीलता लगी. लेकिन कुल मिलाकर, उनकी कविताओं में गुस्सा शनैः शनैः कम हुआ है और इस बात का आत्मविश्वास आया है कि निरपेक्ष होकर अपने आंसुओं को देखने वाली स्त्री उन्हें थाम भी सकती है. यही गलती की खुदमुख्तारी का सबसे साहसिक ऐलान है.

देवयानी की कविता की स्त्री इच्छा नदी के पुल पर बैठी है, पुल में दरारें है और नदी का वेग बहुत तेज है. ( ‘इच्छा नदी के पुल पर’ यह देवयानी के कविता संग्रह का शीर्षक भी है. )
जब आंधियां चलेंगी तब मरुस्थल की बेटी ठंडी हवा की आस में फिर खिड़की का पल्ला खोल देगी. जो होगा, देखा जाएगा.

 

देवयानी भारद्वाज की कविताएँ

 

1. कविता

बड़े कमरे के रोशनदान में
तिनके जुटाती
घने हरियल पेड़ की डाली में
चहचहाती
नीले नभ में विचरती
चिड़िया
कितनी जगह घेरती है दृश्य में !
दृश्य के अनुपात में !

और कितनी जगह पाती है
मन में
स्मृति में
कविता में !

चिड़िया दृश्य में नहीं
हमारे भीतर रहती है
जैसे रहती है कविता
बहुत सारे अनावश्यक के बीच
एक आवश्यकता
एक आश्वस्ति की तरह
हमारी कामनाओं में

रचे जाने के बाद ही नहीं
अपने रचे जाने की चाह में भी

 

2.धत्त पगली! 

फिर एक दिन जब तुम पूछोगी ‘क्या’
जवाब में नहीं कहेगा वह ‘तुम’
तुम पुकारोगी नाम
और बदले में गूंजता रहेगा सन्नाटा

तुम जब बच के चल रही थी
वह तुम्हें बुला रहा था
तुम जब निरस्त्र खड़ी थीं
उसे बुला रहे थे
ज़माने भर के काम

नहीं वह आखेट पर नहीं था
यह बस ऐसा ही है
आदमी और औरत का मन
वह फतह करने निकलता है
और तुम
पगली
प्रेम कर बैठती हो!

अब तुम क्या करोगी बोलो!
कैलेंडर देख कर तो नहीं धड़कता न तुम्हारा दिल
न घड़ी देख कर जागती है
मिलने की ख्वाहिश
देह देख कर नहीं कर पाती हो प्रेम
देखना देखती हो
आवाज़ को सुनती हो
अपने डर को खुद ही कह देती हो झूठ
जब वही सच होने लगता है
तुम खोज लेती हो कोई और दिलासा

धत्त पगली!
मारी जाओगी किसी दिन ऐसे ही

 

3. दोबारा नहीं होता 

वह जो छुप गया था
बादलों के पीछे सूरज
दोबारा नहीं निकलता
उसी जगह

वह निकलता है
थोड़ा और तल्ख
धरती कर चुकी होती है
थोड़ा और घूर्णन
दृश्य बदल चुका होता है
चाय की प्याली अब खाली है
सुबह का अखबार
हो चुका बासी

रोज़ाना की सैर
दोबारा नहीं होती
हर दिन
थोड़ा नए मिलते हैं रास्ते
थोड़ा बढ़ता जाता है परिचय
किसी दिन
आप निकल पड़ते हैं खोजने
एक नई पगडंडी
थोड़ा और रोमांच

किसी एक शहर में फिर से जाना
दोबारा जाना नहीं होता
हर बार बदल जाता है
शहर के साथ रिश्ता
पहली बार का अपरिचय
नहीं पाया जा सकता
दोबारा के जाने में
दूसरी बार
एक परिचित शहर से मिलते हैं आप

दोबारा नहीं होता प्रेम
दोबारा का मातृत्व
नहीं होता पहली बार के मातृत्व सा
एक नया जीवन
एक अधिक अनुभवी स्त्री की बाँहों में
अलग होता है नितांत

बची रहे आँखों में
पहली बार की हैरत
बचा रहे नए को जीने का आवेग
बार-बार

दूसरी बार पकड़ना किसी दोस्त का हाथ
दोबारा नहीं होता
हर बार एक नया अर्थ देता है जीवन
हर बार
थोड़े से नए होते हैं हम

 

4. तेरह साल के लड़के

तेरह साल के लड़के के पास
दुनिया-जहान की प्यास है

संसार को जानने की
जीवन को जीने की
चांद को छूने की
समंदर को पीने की
झरनों में नहाने की
नदियों में तैरने की

उसके पास हर वर्जित फल को
चखने की प्यास है
ईश्वर को ललकारने की प्यास है

ईश्वर यदि होता तो
मंदिर ही नहीं
आसिफ कहीं भी पानी पी सकता था
आसिफा कहीं भी लंबी तान कर सो सकती थी
जुनैद अपने घर ईद मनाने जाता
अखलाक के घर बिरयानी खाने
तुम बिन बुलाए चले जाते

तेरह साल के लड़के के पास
जिंदगी से अथाह प्यार की प्यास है

तुम जो कभी तेरह साल के लड़के रहे होंगे
तुम्हें किसी ने मंदिर में नहीं
घर में बाप ने पीटा होगा
स्कूल में मास्टर से मार खाए होंगे
गली में गुंडों से डर कर रहे होंगे
चौराहे पर पुलिस ने थप्पड़ लगाए होंगे
तुम्हारे भीतर तेरह साल का लड़का
प्यासा ही मर गया होगा

तुम खुद को बचा लो
मंदिर जाओ
प्याऊ बनाओ
आसिफ को
जुनैद को
अखलाक को
बुला कर लाओ
माफी मांगो
पानी पिलाओ
यह नफरतों का बोझ
तुम्हें जीने नहीं देगा

तुम तेरस साल के लड़के की
प्यास का कुछ नहीं बिगाड़ सकते
बस खुद को बचा सकते हो
खुद को बचा लो

 

5. गुमराह करने का समय

यह समय गुमराह करने का समय है
आप तय नहीं कर सकते
कि आपको किसके साथ खड़े होना है
अनुमान करना असम्भव जान पड़ता है
कि आप खड़े हों सूरज की ओर
और शामिल न कर लिया जाए
आपको अन्धेरे के हक में

रंगों ने बदल ली है
अपनी रंगत इन दिनो
कितना कठिन है यह अनुमान भी कर पाना
कि जिसे आप समझ रहे हैं
मशाल
उसको जलाने के लिए आग
धरती के गर्भ में पैदा हुई थी
या उसे चुराया गया है
सूरज की जलती हुई रोशनी से
यह चिन्गारी
किसी चूल्हे की आग से उठाई गई है
या चिता से
या जलती हुई झुग्गियों से
जान नहीं सकते हैं आप
यह किसी हवन में आहूती है
या आग में घी डाल रहे हैं आप

यह आग कहीं आपको
गोधरा के स्टेशन पर तो
खड़ा नहीं कर देगी
इसका पता कौन देगा

6. मरुस्थल की बेटी

क्या तुम्हें याद हैं
बीकानेर की काली पीली आन्धियाँ
उजले सुनहले दिन पर
छाने लगती थी पीली गर्द
देखते ही देखते स्याह हो जाता था
आसमान

लोग घबराकर बन्द कर लेते थे
दरवाज़े खिड़कियाँ
भाग-भाग कर सम्हालते थे
अहाते में छूटा सामान

इतनी दौड़-भाग के बाद भी
कुछ तो छूट ही जाता था जिसे
अन्धड़ के बीत जाने के बाद
अक्सर खोजते रहते थे हम
कई दिनों तक
कई बार इस तरह खोया सामान
मिलता था पड़ोसी के अहाते में
कभी सड़क के उस पार फँसा मिलता था
किसी झाड़ी में
और कुछ बहुत प्यारी चीजें
खो जाती थीं
हमेशा के लिए

मुझे उन आन्धियों से डर नहीं लगता था
उन झुलसा देने वाले दिनों में
आँधी के साथ आने वाले
हवा के ठंडे झोंके बहुत सुहाते थे मुझे
मैं अक्सर चुपके से खुला छोड़ देती थी
खिड़की के पल्ले को
और उससे मुंह लगा कर
बैठी रहती थी आँधी के बीत जाने तक

अक्सर घर के उस हिस्से मे
सबसे मोटी जमी होती थी धूल की परत
मैं बुहारती उसे
अक्सर सहती थी माँ की नाराज़गी
लेकिन मुझे ऐसा ही करना अच्छा लगता था

बीते इन बरसों में
कितने ही ऐसे झंझावात गुज़रे
मैं बैठी रही इसी तरह
खिड़की के पल्लों को खुला छोड़
ठण्डी हवा के मोह में बंधी
अब जब की बीत गई है आँधी
बुहार रही हूँ घर को
समेट रही हूँ बिखरा सामान
खोज रही हूँ
खो गई कुछ बेहद प्यारी चीजों को
यदी तुम्हें भी मिले कोई मेरा प्यारा सामान
तो बताना ज़रूर

मैं मरुस्थल की बेटी हूँ
मुझे आन्धियों से प्यार है
मै अगली बार भी बैठी रहूँगी इसी तरह
ठण्डी हवा की आस में

7. फ़ितरत

सड़क पर चले जा रहे हों आप
और उड़ता हुआ कबूतर कर दे
पीठ पर बींट
तो क्या करेंगे आप?
यही न कि कोई कपड़ा या कागज़ खोज
पोंछ लेंगे उसे
और चल देंगे अपनी राह

घर के बाहर खड़ी गाय
जिसे अभी खाने को रोटी दी आपने
वह कर जाए घर के आगे गोबर
या खा जाए वह पौधा
जिसे आपने बहुत प्यार से लगाया था
और जिसमें अभी फूल खिलने ही को था
तब क्या करेंगे सिवाय इसके
कि गोबर को दरवाज़े के आगे से हटाएँगे
और पौधे की थोड़ी पुख्ता
करेंगे सुरक्षा

गली का कुत्ता
जिसे आप रोज़ दुलारते हैं
कर ही जाता है कई बार
बच्चों की गेंद पर पेशाब
तब कुत्ते को समझाने तो नहीं जाते आप
समझाते बच्चों को ही हैं
और गेंद को कर लेते हैं पानी से साफ़

आपकी अपनी फ़ितरत है
और दुनिया की अपनी
इसमें कैसी शिकायतें
जिसे जो आता है
मनुष्य भी वही करता है

8. संज्ञान

जब आँखें खोलो तो
पी जाओ सारे दृश्‍य को
जब बंद करो
तो सुदूर अंतस में बसी छवियों
तक जा पहुंचो

कोई ध्‍वनि न छूटे
और तुम चुन लो
अपनी स्‍मृतियों में
संजोना है जिन्‍हें

जब छुओ
ऐसे
जैसे छुआ न हो
इससे पहले कुछ भी
छुओ इस तरह
चट्टान भी नर्म हो जाए
महफूज हो तुम्हारी हथेली में

जब छुए जाओ
बस मूंद लेना आंखें

हर स्‍वाद के लिए
तत्‍पर
हर गंध के लिए आतुर तुम

9. बच्चे
१.
वे रंगों को बिखेर देते हैं कागज पर
और तलाशते रहते हैं उनमें
औघड़ रूपाकार

सब चीजों के लिए
कोई नाम है उनके पास

हर आकार के पीछे
कोई कहानी
बनती-बुनती रहती है उनके मन में

कभी पूछ कर तो देखो
यह क्या बनाया है तुमने
झरने की तरह बह निकलती हैं बातें

नहीं, प्रपात की तरह नहीं
झरने की तरह
मीठी
मन्थर
कहीं थोड़ा ठहर जाती
और फिर
जहाँ राह देखतीं
उसी दिशा में बह निकलतीं

भाषा जहाँ कम पड़ने लगती है
उचक कर थाम लेते हैं कोई सिरा
मानो
गिलहरी फुदक कर चढ़ गई हो
बेरी के झाड़ पर

उनसे जब बात करो
तो बोलो इस तरह
जैसे बेरी का झाड़
बढ़ा देता है अपनी शाख को
गिलहरी की तरफ
वे
फुदक कर थाम लेंगे
आपके सवालों का सिरा
पर जवाब की भाषा
उनकी अपनी होगी

२.
उसने अपनी अंगुलियों के पोरों को
डुबोया हरे रंग में
और
खींच दी हैं लकीरें
हृदय पर

उसने गाढ़े नीले से
रंग दिया है फलक को

सुर्ख लाल रंग को
बिखेर दिया है उसने
घर के आँगन मे

पीले फूलों से ढँक दिया है उसने
आस-पास की वनस्पतियों को
उसे हर बार चाहिए
नया सफैद कागज
जिसे हर बार
सराबोर कर देना चाहता है वह रंगों से

बच्चा रंगरेज़!

३.
धूप और बारिश के बीच
आसमान में तना इन्द्रधनुष हैं
मेरे बच्चे

आच्छादित है फलक
उनकी सतरंगी आभा से
जिसके आर-पार पसरा है
हरा सब ओर
उनके पीछे
कहीं ज्यादा गाढ़ा हो जाता है
आसमान का नीला
कहीं ज्यादा सरसब्ज हो जाती है धरती

 

10.जान इस बार मत करना किसी से प्यार

जान
तुम्हारी कविताएँ मेरे भीतर एक कोहराम मचा देती हैं

मैं जैसी भी हूँ
ठीक ही हूँ
हवाएँ अब भी सहलाती हैं मुझे
बस तुम्हारी छुअन नहीं तो क्या
धूप अब भी उतनी ही तीखी है
बस अब बारिशों का इंतज़ार नहीं रहा
एक रास्ता है
जो दूर अनंत तक जाता है
एक चाह है
जो उस अनंत के पार देखती है हमें साथ
तुम बैठे हो मूढ़े पर
तुम्हारी गोद में मेरी देह ढुलक रही है
तुम्हारे हाथ गुदगुदा रहे हैं मुझे
और मेरे चेहरे पर तैर रही रही हंसी का अक्स
झलक रहा है तुम्हारी आँखों में
और तुम्हारी उँगलियों की सरगम में भी

यह तुम्हें फंसाने की साजिश नहीं
याद है विशुद्ध
जिसका छाता तान
चलना सोचा है मैंने
इस लम्बी तपती राह पर
जो अनंत तक जाती है
जिस अनंत के छोर पर
हम खड़े हैं साथ
तुम्हारे सीने में धंसा लिया है
मैंने अपना चेहरा
तुमने कस कर भर लिया है मुझे अपनी बाँहों में
यह बात दीगर है कि
शेष प्राण नहीं हैं उस देह में
यह अंतिम विदा का क्षण है

हमने सड़कों पर पागलपन में भटकते हुए बिताई है रातें
करते हुए ऐलान अपने पागलपन का
हमने बिस्तर में झगड़ते हुए बिताई है कई दोपहरें
ढूँढते हुए प्यार
हमारी यही नियति है
कि हम लिखें इस तरह
कि कर दें लहु-लुहान
और देखें एक दूसरे की देह पर
अपने दिए
नख-दन्त-क्षत के निशान

हम प्रेम और घृणा को अलग अलग देखना चाहते हैं
हमारे हृदय में जब उमड़ रहा होता है प्रेम
उस वक़्त पाया है मैंने
सबसे ज्यादा पैने होते हैं हमारे नाखून
तीखे होते हैं दाँत उसी वक़्त सबसे ज़्यादा

प्रेम तुम्हारी यही नियति है
तुम निरपेक्ष नहीं होने देते
न होने देते हो निस्पृह
तुम क्यों घेर लेते हो इस तरह
कि खो जाता है अपना आप
कि उसे पाया नहीं जा सकता फिर कभी

मुझे कभी-कभी उस बावली औरत की याद आती है
जो भरी दोपहरियों में भटकती थी सड़कों पर
भांजती रहती थी लाठी यहाँ-वहां
किसी के भी माथे पर उठा कर मार देती थी पत्थर
उसका पति खो गया था इस शहर में
जिससे उसने किया था बेहद प्यार
उसकी याद में उसे सारा शहर सौतन सा नज़र आता था
प्रेम में इंसान कितना निरीह हो जाता है
कितना निरुपाय और निहत्था

जान
इस बार मत करना किसी से प्यार
यदि करो भी तो
कम से कम उसे यकीन मत दिलाना
बार-बार इस तरह किसी का दिल दुखाना
तुम्हारे चेहरे पर जंचता नहीं है

या कम से कम इतना करना
कि बस थोड़े से सरल हो जाना

 

11. सीता आज भी धरती के गर्भ में समा जाती है 

सड़क पर खड़े निरीह पुतले रावण के
कहते हैं पुकार पुकार
देखो,
बुराई का प्रतिमान नहीं हूँ मैं
सिर्फ कद बहुत बड़ा है मेरा

हम आर्यावर्त के लोग
सह नहीं पाते
जिन्हें हमने असुर माना
उनकी तरक्की और शिक्षा
उनके ऊँचे कद से डर जाते हैं
डर जाते हैं स्त्रियों के
अपनी कामनाओं को खुल कर कह देने से
स्त्री मुक्ति की बातें
हमें घर को तोड़ने वाली ही बातें लगती हैं

हम लक्ष्मण रेखाओं के दायरे में ही रखना चाहते हैं सीता को
और डरी सहमी सीता जब करती है पार लक्ष्मण रेखा
तो फँस ही जाती है किसी रावण के जाल में
लेकिन क्या रावण ने जाल में फँसाया था
या ले गया था उसे लक्षमण रेखा की कैद से निकाल
और कहा हो उसने
” प्रणय निवेदन मेरा तुम करो या न करो स्वीकार
यह सिर्फ तुम्हारा है अधिकार
तुम यहाँ रहो प्रेयसी
अशोक वाटिका में
जहाँ तक पहुँच नहीं सकेगा
कोई भी सामंती संस्कार ”

जो जेवर सीता ने राह में फेंके थे उतार उतार
क्या वह राम को राह दिखा रही थी
या फेंक रही थी उतार उतार
बरसों की घुटन और वे सारे प्रतिमान
जो कैद करते थे उसे
लक्ष्मण रेखा के दायरों में
जबकि राम कर रहे हों स्वर्ण मृग का शिकार

यह मुक्ति का जश्न था
या थी मदद की पुकार
इतिहास रचता ही रहा है
सत्ता के पक्ष का आख्यान
कौन जाने क्यों चली गयी थी तारा
छोड़ सुग्रीव को बाली के साथ
और किसने दिया मर्यादा पुरुषोत्तम को यह अधिकार
की भाइयों के झगड़े में
छिप कर करें वार

कब तक यूं ही ढोते रहेंगे हम
मिथकों के इकहरे पाठ
और दोहराते रहेंगे
बुराई पर अच्छाई की जीत का नाम
जबकि तथ्यों के बीच मची है कैसी चीख पुकार
‘घर का भेदी लंका ढाए’

केकयी ने तो सिर्फ याद दिलाई थी रघुकुल की रीत
पर यह कैसी जकड़न थी
कि पादुका सिंहासन पर विराजती रहीं
जिसे सिखाया गया था सिर्फ चरणों को पूजना
और पितृसत्ता का अनुचर होना
उसने इस तरह जाया किया
एक स्त्री का संघर्ष

जीवन भर पटरानी कौशल्या के हुकुम बजाती केकयी ने
बेटे के लिए राज सिंहासन मांग कर पाला था एक ख्वाब
भूली नहीं होगी केकयी
बरसों के अनुभव ने छीन लिया होगा
अपने ही सुलगते सपनों को जीने का आत्मविश्वास
कुछ पुत्रमोह भी बाँध रहा होगा पाँव
आखिर दलित रानी की
और भी दलित दासी ने चला दाँव
और रघुकुल की रीत निभायी राम ने
जैसे आज भी निभाते हैं रघुकुल की रीत को कलयुगी राम
औरतें और दलित सब ही बनते हैं पञ्च और सरपंच
सिंहासन पर अब भी पादुकाएँ बिराजती हैं

जिस नव यौवना सीता को पाने चले गए थे राम
अपार जलधि के भी पार
वह प्रेम था या अहम पर खाई चोट की ललकार
आख्यान कहाँ बताते हैं पूरी बात
या रचते हैं रूपकों का ऐसा महाजाल
सीता स्वेच्छा से देती है अग्नि परीक्षा
और गर्भावस्था में कर दिया जाता है उसका परित्याग
न राम के पास था नैतिक साहस
और लक्ष्मण का भी था मुंह बंद
सत्ता की राजनीति में सीता
बार बार होती रही निर्वासित
और वाल्मीकि के आश्रम में पाती रही शरण
राम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े स्वतंत्र घूमते रहे

लव कुश लौट – लौट कर जाते हैं
अयोध्या के राज महल
सीता आज भी धरती के गर्भ में समा जाती है

————————————–

 

(देवयानी भारद्वाज
शिक्षा – एम.ए. हिन्दी साहित्य, 1995 राजस्थान विश्वविद्यालय

पुस्तकें
कविता संग्रह – इच्छा नदी के पुल पर, 2016 दखल प्रकाशन, दिल्ली
सहभागी लेखक – बेदाद द इश्क, रुदाद ए शादी, दखल प्रकाशन, दिल्ली
लघु अध्ययन – इम्पेक्ट स्टडी, दिगंतर
राजस्थान राज्य संदर्भ केंद्र से नव साक्षरों के लिए अनेक पुस्तकें प्रकाशित
अनुवाद – लंदन जंगल बुक्स – भज्जु श्याम – तारा बुक्स

पुरस्कार- सम्मान और फ़ेलोशिप
राजस्थान पत्रिका साहित्य सृजन पुरस्कार, वर्ष 2015
मेजर दिवजोत कौर चावला सम्मान, सृजन गाथा डॉट कॉम – वर्ष 2016-17
युवा पत्रकारिता केलिए प्रेम भाटिया मेमोरियल फेलोशिप, वर्ष 2001

अनेक ब्लॉग्स एवं पत्र-पत्रिकाओं एवं ब्लॉग्स में कविताएँ और लेख प्रकाशित।
दस वर्ष पत्रकारिता में रहने के बाद विगत 17 वर्ष से अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ शिक्षा पर काम। वर्तमान में ह्युमाना पीपुल टू पीपुल, इंडिया दिल्ली में कंटेंट डवलपमेंट स्पेशलिस्ट के रूप में कार्यरत। अजीम प्रेजी फाउंडेशन, दिगंतर, अलारिप्पु सहित शिक्षा में विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों के साथ भाषा संदर्भ व्यक्ति के रूप में काम करते हुए विगत 15 वर्षों में भाषा की पाठ्यचर्या, पाठ्य पुस्तकों और शिक्षक प्रशिक्षणों के लिए मॉडूयल निर्माण और सुगमकर्ता के रूप में योगदान और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लेख और अनुवाद विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित।
वर्ष 1994 से 2004 तक राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में पत्रकार के रूप में काम करते हुए युवा पत्रकार के रूप में प्रेम भाटिया मेमोरियल फैलोशिप 2001 के तहत विकास की असमानता और विस्थापन के विषय पर शोध अध्ययन। नियमित फिल्म समीक्षा का कॉलम लिखने के साथ ही इस दौरान हाशिए के समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर फीचर लेखन किया।
अजमेर में महिला जन अधिकार समिति के साथ मिल कर अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक आदि ज़िलों में महिला हिंसा और प्रतिरोध की कहानियों को दर्ज किया।
संपर्क – [email protected]

टिप्पणीकार हिमांशु पंड्या साहित्य के अध्येता और पेशे से प्राध्यापक हैं और जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं।

सम्पर्क: [email protected])

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