समकालीन जनमत
पुस्तक

नाउम्मीदी की राख तले ‘ उम्मीद चिनगारी की तरह ’

 

प्रशांत जैन

 

एक कवि या लेखक, जो अपने मनुष्य होने की मूलभूत पहचान के प्रति सजग होता है, स्वभाव से ही स्वाभिमानी और सर्वतोमुखी न्याय का आग्रही होता है। अपने रचनाकर्म के माध्यम से वह न केवल अपनी इस सदिच्छा को प्रकट करता है, बल्कि उसके शब्दों में अक्सर न्याय को बाधित करने वाले तत्वों के प्रति विद्रोह का स्वर भी सुनाई देता है। ख़ास तौर पर वाम दृष्टि के कवियों की रचनाओं में यह प्रतिरोध अत्यंत स्पष्ट एवं मुखर होता है। इस संदर्भ में बहुधा यह देखा जाता है कि क्रांति का अलख जगाने वाले अधिकतर कवि या लेखक कागज़ और क़लम तक ही सीमित रहते हैं। सर्वतोमुखी न्याय की आकांक्षा के साथ एक एक्टिविस्ट के रूप में सड़क पर उनकी सक्रियता कम ही देखी जाती है। जो भी कलाकर्मी सक्रिय प्रतिरोध की राह चुनते हैं वे विशेष प्रशंसा के पात्र तो हैं ही। एक समतापूर्ण समाज के स्वप्न को साकार करने हेतु उनकी इस भूमिका को स्वीकार तो किया ही जाना चाहिए। बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि ऐसे सक्रिय रचनाकारों की रचनाओं के मूल्यांकन के समय भी उनकी इस भूमिका को दृष्टि में रखा जाना चाहिए।

कविता के क्षेत्र में वर्तमान में कौशल किशोर ऐसे ही एक व्यक्तित्व हैं। पचास वर्षों से भी अधिक के रचनात्मक जीवन के दौरान विभिन्न संगठनों एवं आंदोलनों के माध्यम से लगातार वे अपनी सामाजिक भूमिका का सक्रिय रूप से निर्वाह करते आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वे अपनी कविता को जीते हैं। अपनी कविता के स्वर को सड़क पर उतर कर भी बुलंद करने का उनका यह सिलसिला सत्तर पार की इस उम्र में भी जारी है। सच्चे अर्थों में वे एक आंदोलनधर्मी कवि हैं।

कौशल किशोर का कवि एक मुस्तैद सिपाही की तरह लगातार जनहित के मोर्चे पर तैनात रहता है, और दुश्मन को चिन्हित करते ही बिना किसी दुविधा के क़लम की बंदूक और शब्दों के कारतूस से उसे ढेर कर देता है। संभवतः सक्रिय संघर्ष की इसी प्राथमिकता की वजह से इतने लंबे रचनात्मक जीवन के दौरान कौशल किशोर पत्र-पत्रिकाओं में तो निरंतर प्रकाशित होते रहे, किंतु अपनी रचनाओं के पुस्तकाकार प्रकाशन की ओर उनका ध्यान न गया। उनका पहला कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ पैंसठ की उम्र में प्रकाशित हुआ था। इस बीच उनकी गद्य की भी दो वैचारिक कृतियां आई हैं। ‘उम्मीद चिनगारी की तरह’ उनका तीसरा कविता-संग्रह है।

कौशल किशोर की कविताओं से गुजरना एक ऐसा अनुभव होता है मानो आप किसी अंतरंग मित्र के साथ सुख-दुख की बातें कर रहे हों। उनकी कविता किसी दार्शनिक का रूढ़ एकालाप नहीं बल्कि व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के कटु यथार्थ को रेखांकित करते एवं इस घटाटोप से बाहर आने की राह सुझाते किसी वार्तालाप की तरह होती हैं। वार्तालाप ऐसा कि जैसे सीधी-सादी भाषा में कोई सहृदय मित्र अपनी बात कह रहा हो, और वह सीधे हमारे हृदय को छू रही हो।

कौशल किशोर का विचार-संसार जितना व्यापक है, अनुभव-संसार भी उतना ही व्यापक एवं विविधतापूर्ण है। उनकी कविताएँ  किसी  भावभूमि मात्र पर नहीं बल्कि विचार की ठोस भूमि पर खड़ी होती हैं। शायद इसीलिए अपनी भावप्रवणता के बावजूद पाठक के मन-मस्तिष्क को आंदोलित करने में सफल होती हैं, जो कि किसी भी रचना का अंतिम उद्देश्य होता है। कौशल जी की कविताएँ आज के मनुष्य, समाज एवं राजनीति पर तज़किरा मात्र नहीं करतीं, बल्कि बाकायदा उसकी क़लई भी खोलती हैं। इन कविताओं का मूल स्वर जनवादी है, और इसीलिए समाज या शासन व्यवस्था में मौजूद विद्रूप इन कविताओं का विषय बनते हैं।

 ‘उम्मीद चिनगारी की तरह’ की कविताएँ दो खंडों में संकलित की गई हैं। पहला खंड है – ‘भेड़िया निकल आया है मांद से’ और दूसरा है ‘कोरोना का रोना’। ‘भेड़िया निकल आया है मांद से’ पहले खंड की पहली कविता है जिसका रचना-वर्ष 2014 अपने-आप में ही बहुत कुछ कहता है। इस कविता की पंक्तियाँ देखिए –


वह आ सकता है
लोकतंत्र के रास्ते आ सकता है
स्मृतियों को रौंदता
संस्कृति का नया पाठ पढ़ाता
वह आ सकता है
जैसे वह आया है इस बार

इस कविता में कवि बिल्कुल भी मुरव्वत नहीं करता और क़लम की तलवार से मनुष्यद्रोही शासन तंत्र को क्षत-विक्षत करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ता। कवि की तुलनात्मक रूप से लंबी इस कविता में उसके अंतर्मन को पढ़ा जा सकता है। सत्य एवं न्याय के प्रति उसके आग्रह को सुना जा सकता है। और यह आग्रह इतना गंभीर और तीव्र है कि कविता की पंक्तियां क्रूर एवं ग़ैरज़िम्मेदार सत्तातंत्र के साथ आँख में आँख मिलाकर दो दो हाथ करती प्रतीत होती हैं। अंत में उम्मीद की चिनगारी देख बदलाव के संदेशवाहक के रूप में कवि कहता है –

उठो, तुम मशाल जलाओ
भेड़ियाँ निकल आया है माँद से
तुम मशाल को ऊँचा उठाओ

एक तानाशाह के लिए यह ज़रूरी होता है की वह भय और प्रलोभन का प्रयोग कर पहले मीडिया को अपना ग़ुलाम बना ले फिर उसके माध्यम से जनता को भेड़ों में बदल दे। इसके लिए गोएबल्स का फॉर्मूला तो है ही कि एक ही झूठ को सौ बार बोला जाए। अपने देश में तो पिछले कुछ सालों में हज़ारों झूठ हज़ारों बार पूरी बुलंदी और बेशर्मी के साथ बोले गए हैं। इतिहास, समाज एवं बीते समय की राजनीति के बारे में झूठी एवं आधारहीन जानकारियाँ संचार माध्यमों द्वारा बड़े पैमाने पर फैलाकर जनता के एक बड़े हिस्से का मन-मस्तिष्क बुरी तरह से प्रदूषित कर दिया गया है। तानाशाह के लिए जनता के एक हिस्से को अपनी ही तरह के भेड़ियों में बदलना भी ज़रूरी होता है, जिनका इस्तेमाल वह भेड़ों के खि़लाफ़ एक औज़ार की तरह कर सके। भेड़िये के ही रूपक पर आधारित कवि की एक अन्य कविता ‘गुजरात – अक्टूबर दो हजार अट्ठारह’ में जनता के इस ‘भेड़ियाकरण’ की प्रक्रिया एवं प्रयोग को देखा जा सकता है।

इनके लिए जनतंत्र लबादा है
जन के खोल में
इन्होंने भीड़ को पाला है
वे इसे पुचकारते हैं
इसकी भूख को ज़िंदा रखते हैं
और ख़ास समय में
भीड़ को भेड़िया बना डालते हैं

आज के इस चुनौतीपूर्ण समय में, जबकि अभिव्यक्ति पर हज़ार पहरे हैं, इस तरह के कहन को कवि का दुस्साहस ही कहा जाएगा। आज अक्सर हम देखते हैं कि शासन एवं व्यवस्था के प्रति तमाम असंतोष एवं वितृष्णा के बावजूद आमतौर पर कलाकर्मी अपने स्वर को मद्धम रखने में ही भलाई समझते हैं। देशभक्ति के नाम पर इन दिनों खेले जा रहे राजनीति के कुत्सित खेल पर कवि की ये पँक्तियाँ देखिए –

देशभक्ति के लिए
आँख, कान, मुँह सब बंद रखना
बोलना भी तो सोच-समझ कर
सँभल-सँभल कर
कोई चाहे जितना उकसावे
या अपने अन्दर उबाल आ जावे
सब पी जाना
जरूरी है देशभक्ति के लिए

 

कौशल किशोर की कविताओं में तंज़ शैलीगत विशिष्टता के रूप में बार-बार हमें दिखाई देता है। कविताओं के कथ्य एवं मूलभूत भाव को देखते हुए तंज़ सहज ही कहन के एक आवश्यक एवं  महत्वपूर्ण टूल के रूप में प्रयुक्त होता है। और यह स्वाभाविक भी है, विशेष रूप से तब जब सारी ही व्यवस्था अपने आप में लोकतंत्र के एक विद्रूप प्रहसन में बदल गई हो। ऐसी स्थिति में कवि जो कि एक जागरूक नागरिक भी है, आखिर क्या करे। हथियार के नाम पर उसके पास एक तंज़ ही तो है, जिसके माध्यम से वह अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति कर सकता है। कौशल किशोर का तंज़ बहुत तीखा और धारदार होता है। कुछ ऐसा कि अगर सत्तातंत्र के लोग अपनी मूढ़ता से बाहर आकर इस तरह की अभिव्यक्तियों का संज्ञान लें तो तिलमिला उठें। किसी सत्ताधारी के हृदय के किसी कोने में यदि मानवीयता नाम की कोई चीज बची हो, तो हो सकता है उसके ज्ञानचक्षु खुल जाएँ। हालांकि असीमित शक्ति से विभूषित झूठे एवं आक्रामक सत्तातंत्र से ऐसी किसी सद्बुद्धि की उम्मीद करना व्यर्थ ही है।

कौशल किशोर का तंज़ जितना तीखा होता है उसमें छिपी करुणा उतनी ही गहरी होती है। इस तरह की भावाभिव्यक्ति सिर्फ उसी रचनाकार के लिए संभव है जो अपनी कविता को जीवन में चरितार्थ करता है, और कविता  में अभिव्यक्त भाव जिसकी मानवीय एवं सामाजिक चेतना की गहराइयों से उद्भूत होते हैं।सवालों से पिंड छुड़ाने की वर्तमान सरकार की प्रवृत्ति पर कुछ पंक्तियाँ देखिए –

मैं सवाल करना चाहता हूँ
पर मेरे सवाल हैं
कि उसके कैमरे में अँट नहीं पा रहे
वह भागता है
मेरे सवाल उसका पीछा करते हैं

शब्द की आत्मा उसके अर्थ में निहित होती है, और अर्थ उससे संबद्ध विचार में ध्वनित होता है। यह विचार ही जीवन में अभिव्यक्त होता है। कहा जा सकता है कि आज के इस निरंकुश सत्ता तंत्र का आधार जो तथाकथित वैचारिक संगठन है, वह यह बात भली-भाँति समझता है। शायद इसीलिए उसने सत्ता के माध्यम से न सिर्फ संवैधानिक संस्थाओं को कुचलने का रास्ता अख़्तियार किया है, बल्कि सामान्य जीवन में उपयोग होने वाले शब्दों के अर्थों का अनर्थ करने या प्रकारांतर से उनकी हत्या करने का उपक्रम भी बड़े पैमाने पर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत शुरू कर दिया है। इसे हम आज सर्वाधिक प्रचलित कुछ शब्दों एवं वर्तमान में उनके लोकप्रिय अर्थों का विश्लेषण कर समझ सकते हैं।

यहां मैं दो शब्दों का ज़िक्र करना चाहूंगा – भक्त एवं देशभक्त। मनुष्य के बौद्धिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास के आधार पर यदि देखा जाए तो कुछ वर्ष पहले तक ये दोनों ही शब्द अत्यंत सात्विक, सार्थक एवं सकारात्मक अर्थ रखते थे। लेकिन राजनीति की महिमा देखिए कि आज ये शब्द और ऐसे ही बहुत से अनुषंगी शब्द न केवल अपनी परंपरागत भाषात्मक अर्थवत्ता खो चुके हैं, बल्कि इन शब्दों का विद्रूप अर्थ व्यक्ति और समाज की चेतना में अपना अमिट स्थान बना चुका है। आजकल ‘भक्त’ शब्द का संबंध ईश्वर-भक्त, गुरु-भक्त या मातृ-भक्त से कम और राज-भक्त से ज़्यादा हो गया है। इसी तरह देशभक्त शब्द भी, जो कुछ ही वर्षों पहले तक एक आवश्यक चारित्रिक गुण का प्रतीक बन हमारे मन-मस्तिष्क में उभरता था, अथवा एक अत्यंत सकारात्मक विशेषण या उपाधि की तरह प्रयुक्त होता था, कुत्सित साम्प्रदायिक राजनीति का ग्रास बन जाने की वजह से एक तरह की वितृष्णा पैदा करने लगा है। यदि ‘देशभक्त’ शब्द की अर्थवत्ता धूमिल होगी तो ‘देशद्रोही’ शब्द की भी निश्चित रूप से होगी ही, और यह हुआ भी है। कुछ साल पहले तक किसी व्यक्ति विशेष के लिए देशद्रोही शब्द का उपयोग एक अनहोनी सा होता था, लेकिन आज कोई भी व्यक्ति किसी को भी देशद्रोही की उपाधि से विभूषित करने लगा है। यह दुर्भाग्य ही है कि इस सबके पीछे वर्तमान सत्ता-तंत्र कारक, उत्प्रेरक एवं संरक्षक की भूमिका में तमाम लोक-लाज छोड़कर खुलेआम खड़ा है। अपनी कविता ‘देशद्रोही कहीं का’ में कवि लिखता है –

मै उनसे सवाल करता हूँ
और वे बौखला उठते हैं
क्योंकि मेरे सवाल का
नहीं है उनके पास जवाब
इसीलिए तो वे मुझे कहते हैं –
देशद्रोही कहीं का

आखिर हम किस तरफ़ जा रहे हैं? देश किस तरफ़ जा रहा है? भाषा व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और विश्व के स्तर पर परस्पर अंतर्संबंधों को परिभाषित करती है और इन संबंधों के निर्वाह का नाम ही जीवन है। यदि शब्द अपना अर्थ खो देंगे तो ये संबंध किस तरह परिभाषित होंगे, और इनका निर्वाह कैसे हो सकेगा। दूसरे शब्दों में यदि भाषा अपने मानक खो देगी तो जीवन की क्या सार्थकता रह जाएगी। कवि भविष्य के इन खतरों के प्रति सचेत है। इसलिए वह ऐसी कविता रचता है जो जनमानस को आंदोलित कर सावधान कर सके। ‘झूठ बोलो’ ऐसी ही एक कविता है। इस कविता का स्वर तो अमूमन वही है जिसके लिए कवि जाना जाता है, लेकिन इस कविता के तेवर और शिल्प कुछ विशिष्ट हैं –

राम-राम पे बोलो
गांधी नाम पे बोलो
सबके साथ पे बोलो
विकास राग पे बोलो
झूठ बोलो, झूठ बोलो!

झूठ पर आधारित सत्ता को बिना लाग-लपेट बेनक़ाब करने वाली ऐसी सीधी-सहज किंतु सशक्त अभिव्यक्ति वर्तमान काव्य-परिदृश्य में दुर्लभ है। लक्षणा और व्यंजना के माहिर कौशल किशोर अक्सर अपनी बात कहने के लिए अभिधा का प्रयोग करते हैं। लेकिन बिना किसी बनाव-सिंगार के भी कौशल किशोर की कविताएँ पाठक  के अंदर तक गहरे उतर जाती हैं, एवं उसे चिंतन के लिए बाध्य करती हैं। ‘फासिस्ट’ कविता में कवि नागरिकों की सामान्य समझ को प्रदूषित करने के लिए सत्ता-प्रतिष्ठान के कुत्सित प्रयासों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है। वह सावधान करता है कि सत्ता व्यापक रूप से जनता की मानसिकता, बौद्धिकता एवं वैचारिकता को अपने क़ाबू में कर उसे अपने जैसा ही सोचने वाले रोबोट में बदल देना चाहता है –

इसीलिए फासिस्टों ने तय किया है
कि लोकतंत्र के लोक को भीड़ में बदल दिया जाय
तब इस भीड़ को भेड़ में बदलना होगा आसान
उसे हाँकना होगा और भी आसान

 

कौशल किशोर की एक चर्चित कविता ‘वह हामिद था’ भी इस संग्रह में संकलित है। यह कविता, जो प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की याद दिलाती है, हामिद को वर्तमान संदर्भ में अत्यंत सूक्ष्मता एवं संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। आज की क्षुद्र सांप्रदायिक राजनीति की बख़िया उधेड़ती यह कविता मूलतः  तीव्र आक्रोश की कविता होते हुए भी अत्यंत मार्मिक है, और यही कौशल जी का रचनात्मक वैशिष्ट्य भी है। उनकी अधिकांश कविताओं में विद्यमान प्रतिरोध एवं मार्मिकता का संगम सहज ही पाठक को अपने साथ खड़े रहने के लिए मजबूर कर देता है। इस कविता का कथ्य सिर्फ आक्रोश ही नहीं जगाता, बल्कि वंचितों, पीड़ितों एवं क्रूर सांप्रदायिकता के शिकार समाज की पीड़ा को स्वर देते हुए पाठक के मर्म को भी छू जाता है।

और हामिद के साथ जो हुआ
उसे सारे देश ने देखा
कि जिस चिमटे को
उसने बड़े प्रेम से खरीदा था
उसे ही उतार दिया गया उसके जिस्म में
जहाँ बेखौ़फ बाल-हँसी थी
वहाँ ठहाके की गूँज थी

कौशल किशोर के कवि की विशेषता यह है कि वह पीड़ित के साथ एकाकार होकर उसकी पीड़ा को समझता और अनुभूत करता है। अंग्रेज़ी की एक कहावत को आधार बनाकर यदि कहें तो वह भुक्तभोगी के जूते में पाँव रखकर यह देखने की सलाहियत रखता है कि जूता कहाँ और कैसे चुभता है। वह कल्पना कर सकता है कि पूरी तरह सांप्रदायिक हो चुके पुलिस-तंत्र की एक धर्म विशेष के लोगों को रह-रह कर निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति के शिकार समुदाय की माताओं पर क्या गुज़रती होगी, जब उनके निरपराध बच्चों को पुलिस द्वारा न सिर्फ़ उठा लिया जाता है बल्कि कई बार ग़ायब भी कर दिया जाता है। ऐसे ही दारुण दुख का मार्मिक चित्र है कविता ‘वह रोए तो क्यों, वह हँसे तो किस पर’ –

उस औरत की गोद आज ख़ाली है
गुम हो गए हैं उसके बेटे
रह-रह कर विक्षिप्त सी
वह भागती है राजपथ पर
हर नौजवान को झिंझोड़ती है
उससे लिपट कर रोती है
उनमें नज़र आता है अपना ही बेटा

 

पुराने समय के आततायी राजतंत्रों को भी मात देती, शक्ति के घमंड में चूर तथाकथित लोकतांत्रिक  सत्ता से सीधे मुठभेड़ करने वाले कवि-लेखक आज कम ही मिलेंगे। ‘उम्मीद चिनगारी की तरह’ का कवि उसी विरल बिरादरी का एक प्रतिनिधि है। व्यवस्था परिवर्तन में कवि महिलाओं की आवश्यक एवं महत्वपूर्ण भूमिका को भी देखता और स्वीकार करता है। गौरी लंकेश की हत्या के बाद सड़क पर उतरी महिलाओं के प्रतिरोध में संभावित क्रांति की प्रसव वेदना को कवि बख़ूबी पहचानता है –

दुख उनका बढ़ता गया है
पहाड़ बनता गया है
उसके भीतर
उन्होंने पाला है ज्वालामुखी
कभी भी शुरू हो सकती है
प्रसव वेदना

हम देखते हैं कि कुछ वर्षों पहले जो बातें सामान्य कही जाती थीं, आज वैसी ही बातें मौत को बुलावा देने वाली साबित होने लगी हैं। झूठ एवं लंपटता पर आधारित राजनीति ने देश और समाज को कई स्तरों पर बाँट दिया है। बल्कि यह विभाजन परिवार के स्तर तक भी उतर आया है। समूचे वातावरण में एक असुरक्षा एवं अनिश्चितता छाई हुई दिखाई देती है। सांप्रदायिक उन्माद के गाढ़े अँधेरे से भयाक्रांत समय में काम पर जाते हुए बेटे की सुरक्षा के प्रति एक माँ की चिंता का जिस मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता के साथ जीवंत एवं यथार्थ वर्णन ‘अँधेरा ही अँधेरा’ कविता में कवि ने किया है, वह देखने योग्य है। हिदायतें देते हुए माँ अपने बेटे से कहती है –

सँभल कर जाना
भीड़ से बचकर रहना
बात-बात पर बहस करने की
अपनी आदत पर रखना कंट्रोल
लोग बार-बार पूछें भी तो
नहीं बताना अपना नाम

यानी अपना नाम बताना भी किसी के लिए मौत का सबब बन सकता है। क्या यह आज के समय का कड़वा और शर्मनाक सच नहीं है? लेकिन ज़माने का इससे भी भयानक सच देखिए कि ऐसी कविताएँ तो क्या, रोज़हा घटती ऐसी घटनाएँ भी अधिकांश लोगों के ज़मीर को नहीं जगातीं। ख़ैर, कवि को तो अपना काम करना है। उम्मीद की मशाल जलाए रखनी है। ऐसी ही मारक काव्य-पंक्तियाँ कौशल किशोर को सच्चे अर्थों में जन-सरोकार का कवि साबित करती हैं। इस संदर्भ में ‘गड्ढा’ शीर्षक से चार कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं –

मुक्तिबोध को मिलते हैं
क़दम-क़दम पर चौराहे
हमें मिलते हैं
जगह-जगह गड्ढे

ये हैं तो बहुत सामान्य पँक्तियाँ लेकिन इनके पीछे छिपे हुए व्यंज्यार्थ को समझना मुश्किल नहीं। देश की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए शहरों का नाम बदलने की राजनीति वर्तमान सत्ता का एक महत्वपूर्ण शग़ल है। ‘मुग़लसराय’ कविता में एक युवक जो पंजाब में नौकरी करता है और जो बहुत दिनों बाद अपने शहर लौट रहा है, जानता नहीं है कि उसके शहर का नाम बदला जा चुका है। पंक्तियाँ देखिए –

जब ट्रेन स्टेशन पर रुकी
ख़ुशी से उसके मुँह से फूट पड़ा
यही तो है मुग़लसराय
फ़िर भी साथ के सफ़र करने वाले कह रहे थे
यह पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन है
पर वह उनकी कुछ भी सुनना नहीं चाहता था
मुग़लसराय उसके भीतर कहीं गहरे समाया था।

 

कौशल किशोर कवि तो हैं ही, अपने समय के प्रति सजग एवं यथावश्यक हस्तक्षेप हेतु सन्नद्ध नागरिक भी हैं। समाज एवं राजनीति के स्तर पर व्याप्त विसंगतियाँ उनकी नज़र से तनिक भी बच नहीं पातीं। इसीलिए उन्होंने अमूमन हर ऐसी विडंबना पर क़लम चलाई है जो आज की राजनीति की पहचान बन चुकी है। जिस तरह से देश की आज़ादी एवं निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापुरुषों को विस्थापित कर अपने नकली महापुरुषों की प्राण-प्रतिष्ठा का एक देशव्यापी अभियान सत्ता-तंत्र द्वारा चलाया जा रहा है, उसे रेखांकित करते हुए ‘ गांधी ‘ शीर्षक कविता में कवि कहता है –

पर कमाल का है यह गाँधी
हर बार इसका क़द ऊँचा हो जाता है
हड्डियाँ मज़बूत हो जाती हैं
लाठी और तन जाती है

तथाकथित विकास के नाम पर जनता को बरग़ला कर वोट बटोरने का आयोजन और अभियान पिछले कई वर्षों से चल रहा है। विकास तो कहीं दिखाई नहीं देता, अलबत्ता देश की आर्थिक-सामाजिक समस्याएँ सुरसा की तरह बढ़ती जा रही हैं। संग्रह की ‘विकास’ कविता इस मुद्दे पर सरकार की अच्छी-ख़ासी ख़बर लेती है –

ऊपर से नीचे तक
अंदर से बाहर तक
खूब सजे-धजे हैं
इस लोकतंत्र में उनके मज़े ही मज़े हैं
वह आम नहीं ख़ास हैं
नाम उनका विकास है

कौशल किशोर की ऐसी अनेक कविताएं हैं जो देश के किसानों की समस्याओं, चुनौतियों एवं दुख-दर्द को संबोधित करती हैं. इस क्रम में बीते समय में हुए किसानों के विभिन्न आंदोलन उनकी नज़र और क़लम से अछूते नहीं रहते। नाशिक से मुंबई के किसान मार्च को विषय बनाकर रची गई एक कविता में  वंचितों के रक्त पर पलने वाली व्यवस्था को जोंक की संज्ञा देकर कवि ने इस एक ही शब्द के माध्यम से समस्त सत्ता-तंत्र को परिभाषित कर दिया है। वर्ष 2020 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन में कवि आशा की एक किरण देखता है। आततायी शासन के विरुद्ध उनका मज़बूती से खड़े रहना भविष्य में जनतंत्र की अक्षुण्णता के प्रति कवि को आश्वस्त करता है। किसानों के जज़्बे को सलाम करती ये पँक्तियाँ देखिये –

शहीद होना हमारी परम्परा में है
ऐसी ही ज़िद है किसानों की
यह उनकी ज़िद ही है जिस पर आज
टिकी है लोगों की उम्मीद
टिका है देश का जनतंत्र!

सरकार की किसान-विरोधी नीतियों से त्रस्त होकर उनके द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं को लक्ष्य करती हुईं कवि की ये मर्मभेदी पंक्तियाँ देखिए –

सामने जो पेड़ है, वहाँ वे मिलेंगे लटके हुए
घर की छत ने भी उन्हें मुक्त किया है
मुक्ति ही जीवन की राह है
उन्होंने खोज ली हैं मुक्ति की अनेक राहें

यहां ‘मुक्ति’ शब्द के लक्ष्यार्थ की गहनता देखिए। इस तरह के उदाहरण कौशल किशोर की कविताओं में बहुत मिलते हैं जहाँ शब्द अपने सामान्य अर्थ से आगे जाकर बहुत कुछ अभिव्यक्त करता है। ‘नीम बेहोशी में एक स्वप्न’ कविता में कवि देश की तुलना एक बीमार शरीर से करता है जिसके विभिन्न अंग एक-एक कर जवाब देते जा रहे हैं। इस स्वप्न के बहाने कवि ने देश की वर्तमान शोचनीय स्थिति का अत्यंत प्रभावी चित्रण किया है। इस कविता का अंत एक लोकगीत की पंक्तियों से होता है –

शरीर पर जकड़न बढ़ जाती है
मेरे ऊपर नीला आसमान फैल रहा है
दूर से औरतों के गाने की आवाज़ें आती  हैं
‘सुतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया’।

इस संग्रह की शीर्षक कविता ‘ उम्मीद चिनगारी की तरह’ में कवि ने साहिर की पंक्ति ‘वह सुबह कभी तो आएगी’ को याद किया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं संविधान विरोधी इस तंत्र पर कवि प्रश्न उठाता है, लेकिन साथ ही उम्मीद भी जताता है कि ज़रूर वह दिन आएगा जब दमनकारी शासन का अंत होगा –

भले ही निराशा हमलावर हो गई है
और उम्मीद भूमिगत
पर यह उम्मीद ही है
हाँ, हाँ उम्मीद ही है
जो राख के इस ढेर में
कहीं बहुत गहरे चिनगारी की तरह
अब भी सुलग रही है

पुस्तक का दूसरा खंड है ‘कोरोना का … का … रोना’। इस खंड में कवि ने कोरोना काल की त्रासद परिस्थितियों, मौत के तांडव और अपनों की गोद में दम तोड़ते लोगों के विचलित कर देने वाले दृश्य उकेरे हैं। इस सब के बीच सरकार की अक्षम्य लापरवाहियों एवं राजनीति की रोटियाँ सेंकनेवाले क्रूर सत्ताधारी वर्ग की कुत्सित मानसिकता एवं तौर-तरीक़ों की कवि ने ख़बर ही नहीं ली है, बल्कि बखि़या भी उधेड़ी है। खंड की पहली ही कविता ‘कोरोना का … का … रोना’ कोरोना काल की व्यवस्थागत विसंगतियों एवं विद्रूप का अत्यंत यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है –

 

यह जीवन क्या है ?
घटनाओं, दुर्घटनाओं, आपदाओं, विडंबनाओं का दूसरा नाम है
मौत के सौदागर ही यहाँ जीवन के ठेकेदार हैं

कोरोना काल की एक घटना में पटरी पर सो रहे मज़दूरों की ट्रेन से कट कर हुई दुर्भाग्यपूर्ण मौतों के बाद पटरियों पर पड़ी हुई रोटियों का विचलित कर देने वाला दृश्य हम शायद जीवन भर भूल न सकेंगे। साथ ही हज़ारों किलोमीटर की यात्रा पर निकले, सड़कों पर पैदल चलते लाखों लोगों की भूख और बीमारी से हुई मौतों को भी भुलाया न जा सकेगा। कोरोनाकाल में रचा गया साहित्य निश्चित ही उस काल के ऐतिहासिक दस्तावेज़ से कम नहीं। कौशल किशोर की कोरोना कालीन कविताएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए इस दस्तावेज़ का महत्वपूर्ण  अंग साबित होंगी। ‘रोटियाँ उनकी हत्या की गवाही दे रही थीं’ कविता में वे लिखते हैं –

आखिर मरता क्या न करता
सड़क छोड़ी तो रेल की पटरी पकड़ ली
वे गाँव पहुँचे या नहीं
उनमें कितने मरे बिलाए यह नहीं पता
बस इतना पता है कि वे इतना थके थे
कि रेल की पटरियों पर ही ढेर हो गये

कोरोना के प्रकोप में जब वैज्ञानिक समझ के साथ इसका मुक़ाबला करने की दरकार थी तब सरकार दलिद्दर भगाने के अंदाज़ में ताली-थाली पीटकर और मोबाइल की रोशनी चमका कर कोरोना से मुक़ाबला करने के गुर जनता को सिखा रही थी। ‘ट्रंप कार्ड बाकी है’ कविता की ये पंक्तियाँ देखिए –

इसी भ्रम को उन्होंने
आधुनिक लिबास पहनाया है
इसमें ताली-थाली की गूँज है
मोबाइल की चमक है
इसमें आवाज़ें हैं, रोशनी है, धमक है।
अब तक जो चली गईं
वे सामान्य चालें थीं
ट्रंप कार्ड अभी बाकी है

देशवासियों को धर्म और संस्कृति की अफ़ीम चटाकर, मूलभूत समस्याओं से नागरिकों का ध्यान हटाकर जिस तरह से सरकार अपने गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है, कवि ने उसे ‘तैयारी मुकम्मल है’ कविता में बहुत ही मुकम्मल तरीक़े से अभिव्यक्त किया है –

मदारी नचा रहा है और नाच रहा है देश
नई संस्कृति के गोले दागे जा रहे हैं
बुद्धिजीवी हैं तो बोलने का ठेका नहीं मिल गया आपको
वे ही बतायेंगे क्या बोलना है, कैसे बोलना है, कितना बोलना है

कोरोना के मुश्किल दौर में लोग चाहकर भी मुसीबत में घिरे अपने मित्रों-संबंधियों की मदद के लिए उपस्थित नहीं हो पा रहे थे। इस विवशता को कवि ने ‘दौर-ए-मुश्किल’ कविता में इन शब्दों में अभिव्यक्त किया है –

दोस्त के पिता के मरने की खबर आयी है
और अतीत मेरे सामने सजीव हो उठा है
दोस्त, माफ़ करना मैं नहीं पहुँच पा रहा हूँ
अपने कंधे में ही मेरा कंधा समझना

कवि केदारनाथ सिंह की प्रसिद्ध पँक्ति ‘जाना हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है’ को आधार बनाकर ‘लौटना’ कविता में कौशल किशोर कहते हैं –

लौटा हूँ
जैसे लौटती है चिड़िया अपने घोंसले में
मैं भी लौटा हूँ
मेरा लौटना उसी की तरह है
अंतर बस इतना कि वह सुबह गयी
लौटी शाम में
और मैं लौटा चालीस बरस बाद

इन पंक्तियों में एक ओर जहाँ जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करने वाला तीव्र नॉस्टेल्जिया दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति को काल्पनिक स्वर्ग से बाहर ला पटकने वाला मोहभंग भी उतनी ही शिद्दत के साथ मौजूद है। यह आज के समय की सच्चाई भी है। कोरोना काल में शहरों में रोज़ी-रोटी छिन जाने पर हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर गाँव पहुँचने वाले अनेक लोगों ने इस कटु सत्य को देखा और भोगा है। वैसे यह कविता कोरोना से काफी पहले 2015 में लिखी गई थी। इस खंड में एक और कविता है ‘जाना, लौटना और भटकना’। ‘जाना-लौटना’ के इस युग्म में ‘भटकना’ को भी जोड़कर कौशल किशोर ने न केवल एक अर्थपूर्ण शब्दत्रयी को जन्म दिया है, बल्कि जाने और लौटने के बीच मौजूद जीवन की एक अनिवार्य सच्चाई की ओर भी इशारा किया है। और यह सच्चाई है – भटकना। फिर वह चाहे किसी विवशता की वजह से हो या किसी दुविधा की वजह से। इस तरह कवि ने इस शब्दत्रयी के माध्यम से जीवन का एक यथार्थ एवं मार्मिक चित्र सामने रखा है। इस कविता को मैं लगभग पूरा ही यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा।

एक कवि को
जाना हिन्दी की सबसे खौ़फ़नाक क्रिया लगे
फिर भी उसे जाना पड़े दूसरे को लौटना असंगत नज़र आए
इस क़दर कि
वह अपने गाँव में खड़ा हो
इस दुरूस्वप्न के साथ कि
वह उखड़े वृक्ष की तरह
धरती पर पड़ा है

तीसरे को क़दम-क़दम पर
चैराहे मिले
सही दिशा लुप्त हो
और भटकना नियति बन जाय

जाना, लौटना और भटकना
त्रिभुज की सीधी-सरल रेखाएँ नहीं
जीवन की ऊबड़-खाबड़ क्रियाएँ हैं
हमारे समय का सबसे बड़ा सत्य हैं

तीसरा पैरा स्पष्टतः मुक्तिबोध की पंक्तियों से प्रेरित है। जो भटकने की क्रिया का आधार बनी हैं। कविता का सफल समाहार अंतिम पैरा में जिस तरह होता है उससे यह छोटी सी कविता पूरे मनुष्य-जीवन को परिभाषित करती दिखाई देती है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि यह कविता संग्रह की श्रेष्ठतम कविताओं में एक है और केदारनाथ सिंह एवं मुक्तिबोध के माध्यम से जीवन की नई थीसिस प्रस्तुत करती है।  ‘जाना’ और ‘लौटना’ विषय को ही संग्रह की एक अन्य कविता ‘गाँव वापसी’ एक अलग संदर्भ में कुछ इस तरह आगे बढ़ाती हैः

यह भी है बहुत खूब
कि जागते कभी गाँव न जा पाया
और सपने में
कभी गाँव से लौट न पाया

आज के इस समय में जबकि चारों तरफ़ शोर-शराबा और बाज़ार का कोलाहल है, मनोरंजन के तरह-तरह के साधन उपलब्ध हैं, यह सचमुच एक विडंबना ही है कि व्यक्ति अकेला होता जा रहा है। ‘लोकल वोकल’ कविता की पंक्तियाँ देखिए –

कोई नहीं आता, कोई नहीं जाता
जिस अकेलेपन को हिकारत से देखा
दूर छिटकाता रहा अपने से
वही इन दिनों का सबसे सच्चा साथी है
कहते हैं ग्लोबल हो गई है दुनिया
पर इसमें अपना लोकल भी नहीं रहा

लॉकडाउन की क़ैद को कवि ने किस शिद्दत से महसूस किया है, इसका बेहतरीन नमूना ‘क़मीज़’ कविता में देखा जा सकता है। मानव-मन की एक मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी इस कविता में मौजूद है, कि यदि मनुष्य लंबे समय के लिए अपने घर की चहारदीवारी तक सीमित हो जाए और बाहरी संपर्क पूरी तरह से कट  जाए तो न सिर्फ़ परिवार के सदस्यों के साथ अंतरंगता बढ़ने की गुंजाईश बनती है, बल्कि घर की निर्जीव चीज़ों से भी व्यक्ति भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकता है, एवं दोस्त की तरह उनसे बातें भी कर सकता है। दूसरे शब्दों में विवशता का एकाकीपन अपने आसपास को समझने एवं उससे जुड़ने में मनुष्य का सहयोगी हो सकता है। इस कविता की कुछ पँक्तियाँ देखिए –

क़मीज़ खूँटी पर टंगी है
पानी की जगह धूल से नहा रही है
कह सकते हैं अपनी ड्यूटी से छुट्टी पर है
आराम फ़रमा रही है

इस संग्रह में एक विशिष्ट कविता है ‘निःशब्द हूँ मैं’। यह कविता कौशल किशोर ने दिवंगत कवयित्री श्रीमती शुक्ला चौधुरी की स्मृति में लिखी है, जो अपनी कहानियों एवं छोटी किंतु अत्यंत अर्थगर्भित कविताओं के लिए प्रसिद्ध थीं। मानवीय करुणा से सिक्त उनकी कविताओं में प्रकृति के प्रेमल-कोमल रूपक सहज रूप से आवाजाही करते थे, जिनमें चाँद उन्हें विशेष प्रिय था। सबके प्रति मैत्री एवं स्नेह-भाव रखने वाली शुक्ला चौधुरी सभी मित्रों-परिचितों को अपने ही परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य सी लगती थीं। कोरोना से बहादुरीपूर्ण लंबे संघर्ष के बाद शुक्ला जी का इस संसार से विदा लेना उनके सभी जानने वालों को स्तब्ध कर गया था। ऐसे में कौशल किशोर का संवेदनशील मन क्यों न उन्हें याद करता ?

महामारी आई
तो सामने पीठ नहीं सीना था
योद्धा की तरह लड़ीं, खूब लड़ीं, लड़ती रहीं
वह रात थी, आसमान में चाँद था
और इधर दीये की लौ टिमटिमा रही थी
वे दूर जा रही थीं
हाथ छूट रहा था, साथ छूट रहा था
हम देखते रहे
उन्हें जाते नम आँखों से बस देखते रहे

संग्रह का अंत कोरोना केंद्रित कुछ कविताओं से होता है, जिनमें महामारी के दौर के भयावह एवं उद्वेलित कर देने वाले दृश्य हैं। संग्रह का यह भाग टाईम मशीन की तरह पाठक को शारीरिक व मनोवैज्ञानिक संत्रास के उसी दौर में ले जाकर खड़ा कर देता है। इन कविताओं में महामारी के तांडव, इलाज के लिए मची आपाधापी, प्राणवायु के अभाव में अपनों की गोद में दम तोड़ते लोगों, गंगा में बहा दी गई लाशों, माता-पिता को खो देने वाले बच्चों आदि सभी के दारुण चित्र हैं। इन सब के बीच प्रशासन की अक्षम्य एवं शर्मनाक लापरवाहियाँ और निरंतर जारी कुत्सित राजनीति आदि पर भी कवि ने व्यथित हृदय से क़लम चलाई है। इन कविताओं की कुछ पंक्तियाँ सम्मिलित रूप से यहाँ देना समीचीन होगा।

सारी ज़िंदगी
यही कोशिश रही कि पॉज़िटिव रहूँ
पर यह क्या?
जब मेरी रिपोर्ट पॉज़िटिव आई
जी धक्-सा रह गया…….

साँसों की जंग छिड़ी थी
शहर सौदागरों के क़ब्ज़े में था
बोली लग रही थी
एक के दस, दस के बीस…

………..

बच्चा रो रहा है
रोते-रोते वह चीखने लगता है
पड़ोसी सँभाल रहे हैं
पर कुछ भी सँभल नहीं रहा है
कौन समझाए उसे कि
अब नहीं आएँगे उसके मम्मी-पापा

संग्रह के अंत की कुछ कविताएँ एक बार फ़िर समय की नब्ज़ पर हाथ रखती हैं। आज के इस अमानवीय समाज के लिए युद्ध भी खेल की ही तरह एक मनोरंजन का साधन बन चुका है, मात्र इसीलिए कि वह किसी दूरस्थ देश में लड़ा जा रहा है। ‘युद्ध और खेल’ कविता मानव-सभ्यता की तथाकथित सार्वभौमिकता की क़लई खोलती है। इसी क्रम में दशकों से युद्ध का अखाड़ा बने फिलीस्तीन का एक दृश्य इसी शीर्षक की एक कविता में देखिए –

यहाँ किसी के पास कोई दुख नहीं
वे इस नदी के पार जा चुके हैं
उनकी आँखों में नींद नहीं स्वप्न है
यह स्वप्न ही उनकी आजादी है

संग्रह की अंतिम कविता में कौशल किशोर महाप्राण निराला को याद करते हैं। इस भयावह समय में जबकि सत्ता मदमत्त हाथी की तरह राष्ट्रीयता और सामाजिकता ही नहीं बल्कि मनुष्यता को भी कुचलने पर आमादा है, और सपने देखना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है, नाउम्मीदी की राख तले छिपी उम्मीद की चिनगारी ही नई सुबह लेकर आएगी। कौशल किशोर की यह क़िताब हमारे साझा सपनों को पंख और उम्मीद की चिनगारी को हवा देती है। राज भगत के आवरण चित्र के साथ रुद्रादित्य प्रकाशन ने आकर्षक कलेवर में इस क़िताब को छापा है। अपनी रीडिंग लिस्ट की किसी क़तार में न रखकर इस क़िताब को प्राथमिकता के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

( प्रशान्त जैन मुम्बई में रहते हैं और इंजीनीयरिंग काॅलेज में प्राध्यापक हैं। कविता लिखते हैं और आलोचना भी। ‘कविता मुम्बई’ और ‘कहानी मुम्बई’ के आयोजकों में शामिल हैं। पता है: 5/9, कोंडिविटा सोसायटी, मरोल पाइपलाइन, अंधेरी – कुरला रोड, अंधेरी (इस्ट) मुम्बई – 400059. मोबाइल – 98202 62706, ई मेल – pjain68@gmail.com )

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