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शख्सियत

भीष्म साहनी का लेखन और ज़िन्दगी के नए फ़लक : डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव

(आज हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार भीष्म साहनी का जन्मदिन है
अपने उपन्यास और टेलीविजन पटकथा ‘तमस’ के लिए उन्हें विश्व स्तर की ख्याति मिली, जो भारत के विभाजन का एक प्रामाणिक और भावुक दस्तावेज़ है। उन्हें 1998 में साहित्य के लिए पद्म भूषण, और 2002 में साहित्य अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। भीष्म साहनी के जन्मदिन पर अपने एक लेख के माध्यम से उन्हें याद कर रहीं हैं दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव) -सम्पा.


किसी भी रचना या साहित्य का विवेचन एवं विश्लेषण उसके संवेदनात्मक एवं रचनात्मक विधान को ही आधार बना कर किया जाता है | आज का नया साहित्य आज के वर्त्तमान सन्दर्भों को पारदर्शिता के साथ रूपायित करता है |

आधुनिक रचनाकारों के बीच अपनी एक ख़ास पहचान को लिए हुए भीष्म साहनी का लेखन भी आधुनिक परिवेश एवं परिस्थितियों में व्याप्त जीवन के विविध पक्षों को उजागर करता है जो आधुनिकता बोध को स्वर देते हुए नये स्वरुप को प्रदर्शित करता है | इनके साहित्य में आधुनिकता बोध उनकी अपनी खास रचनादृष्टि के अनुसार प्रतिफलित हुआ है | इसलिए उनकी सर्जनात्मक मानसिकता के अनुसार ही आधुनिकता-बोध के नये नये रूपों और विविध पक्षों को उनके साहित्य में देखा जा सकता है |

भीष्म साहनी के साहित्य में आधुनिकता-बोध या नया बोध निश्चित रूप से अपने सकारात्मक, आस्थायुक्त एवं प्रगतिशील प्रतिफलन के रूप उद्घाटित हुआ है | यहाँ यह स्पष्ट कर देना यथोचित होगा कि साहनी की रचनाओं में आधुनिकता-बोध की अभिव्यक्ति के लिए जीवन के नकारात्मक पक्षों जैसे मृत्य-बोध, अनास्था एवं नियतिवादी स्थितियों की अभिव्यक्ति (जो वास्तव में आधुनिकता वाद को परिभाषित करतें हैँ ) को नकारते हैं |

अत: उनके साहित्य में व्यक्त आधुनिकता-बोध के विविध पक्ष जीवन के प्रति जुझारू दृष्टिकोण को लिए हुए है जो अक्सर आस्था और अनास्था के द्वंद्व में उलझें होने के बावजूद कहीं न कहीं आस्थापूर्ण दृष्टिकोण को ही व्यंजित करते हैं |
साहनी की रचनादृष्टि वस्तुत: प्रगतिशील मानदंडों को लेकर निर्मित हुई है, परन्तु अपने साहित्य की रचना-प्रक्रिया में वें कहीं भी किसी सैद्धांतिक आग्रह से बंधे हुए नही हैं |

साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति को सर्वोपरि मानने वाले साहनी किसी सिद्धांत को उतना ही महत्त्व देते हैं जितना कि वह जीवन एवं मानवीय सरोकारों को सार्थकता प्रदान करता है | प्रतिबद्धता उनके लिए किसी विशेष प्रवृति या सिद्धांत न होकर सामाजिक संपृक्तता है | इसलिए उनकी रचनाओं को हम किसी विशेष सिद्धांत का घोषणापत्र नहीं मान सकते हैं, क्योंकि वे जीवन की व्यापकता को उसकी गहराइयों के साथ अवलोकित करती हैं | सैद्धांतिक विचारधारा उनकी रचनाओं में एक अंत:सलिला की तरह बहती रहती है जो धरातल पर उपस्थित ज़िन्दगी को पोषित करती रहती है l इसलिए मार्क्सवाद इनकी रचनाओं में जिजीविषा के विविध स्वरुप लेकर उपस्थित हुआ है, जीवन के स्पंदन की प्रेरणा के रूप में कार्य करता है जो आधुनिकता के बोध का ही एक पक्ष है l

इस प्रकार जीवन, समाज और मानवीय संवेदनाओं के आधुनिक सन्दर्भों को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करते हुए वे आधुनिकता-बोध के विविध पक्षों को ही अभिव्यक्त करते हैं और आधुनिकता का बोध एक दृष्टि-प्रक्रिया है कोई सिद्धांत नहीं l

प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थोंमुखता को ही आगे बढाते हुए भीष्मजी ने अपना साहित्य में आधुनिकता-बोध के विविध आयामों को जीवनगत यथार्थ चित्रण एवं उससे जुड़े अन्तर्विरोधों ,विद्रोह एवं संघर्ष को उनके परिवेशगत परिस्थितियों के प्रति सजग दृष्टिकोण रखते हुए विविध मन: स्थितियों के सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं |

साहनी के साहित्य में आधुनिकता-बोध की अभिव्यक्ति निम्नांकित इन रूपों में हुई है –

 

  • युगीन-चेतना का महत्त्व एवं अनुभूति की व्यापकता, गहराई तथा प्रामाणिकता
  • परिवेशगत परिस्थितियों के प्रति सजग दृष्टिकोण मूल्यबोध की परिवर्तनशीलता
  • विद्रोह एवं अस्वीकार की प्रवृति
  • संघर्षशीलता
  • नवीन मूल्यों की स्थापना
  • मानवीय सरोकारों की महत्ता |

आधुनिकता-बोध की मुख्य प्रवृति युगीन-चेतना की अनुभवगत-प्रामाणिक अभिव्यक्ति है | भीष्मजी की रचनाओं में युगीन-चेतना की प्रामाणिक एवं प्रासंगिक उपस्थिति उनके अनुभव की व्यापकता एवं गहराई के अभिव्यक्त रूपों में प्राप्त होती है |

आधुनिकता-बोध में युगीन चेतना का महत्त्व है इसलिए उसमें परिपवेश के प्रति सचेत दृष्टि भी विद्यमान होती है | साहनी की रचनाएँ इस दृष्टि से परिपूर्ण हैं क्योंकि उनमें विविध परिवेश एवं परिस्थितियों के प्रति सचेत संवेदनशीलता परिलक्षित होती है |

यह जागरूक नज़रिया जो वैज्ञानिक तर्कशीलता और विवेक पर आधारित है, आधुनिकता-बोध की परिचायक है | साहनी के इस सूक्ष्म निरीक्षण एवं संवेदनाओं को उनकी कुछ रचनाओं में देखा जा सकता है :- ‘झरोखे’ उपन्यास में तत्कालीन परिवेश एवं परिस्थितियों के प्रति सचेत दृष्टि का प्रतिफलन एक छोटे बालक के माध्यम से सामाजिक एवं पारिवारिक वातावरण में व्याप्त रूढ़िग्रास्तताओं एवं उनके कुप्रभावों के रूप में हुआ है |

यहाँ साहनी की तर्कशील दृष्टि रूढ़ियों के विरोध के रूप में आधुनिकता-बोध को व्यंजित करती है | इसी प्रकार ‘तमस’ की संवेदना बंटवारे की परिस्थितियों में व्याप्त अमानवीयता के प्रति क्षोभ प्रकट करती है और साम्प्रदायिक वैमनस्य की परिस्थितियों में विवेकशील संवेदनाओं की पक्षधरता के रूप में आधुनिकता-बोध की मानवीय दृष्टि को रूपायित करती हुई धार्मिक एवं राजनैतिक गठजोड़ से उत्पन्न विद्रूपताओं का विरोध उस विशेष परिवेश एवं परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में करती है |

परिवेश के प्रति जागरूक दृष्टिकोण की प्रबल अभिव्यक्ति इनके नाटक ‘ कबीरा खड़ा बाज़ार में ’ में तत्कालीन परिवेश में व्याप्त धर्मान्धताओं एवं आडम्बरों के प्रति तीखे विद्रोह के रूप में प्राप्त होती है |

एक एतिहासिक सन्दर्भ के माध्यम से आधुनिकता-बोध की व्यंजना वास्तव में भीष्मजी की परिवेश के प्रति सजग चेतना की परिचायक है | नाटक ‘ हानूश ‘ एक आधुनिक सर्जनेच्छु कलाकार की विसंगतियों का निर्माण करने वाली विषम परिस्थितियों को व्यक्त करता है तो ‘ माधवी ‘ आधुनिक परिवेश में नारी के संघर्षशील जीवन को रूपायित करता है | माधवी के ही समान आज की नारी को घर और बाहर की दोहरी भूमिकाएं निभाते हुए भी विषम परिस्थितियों के कारण कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है|
नाटकों की भांति भीष्मजी की कहानियों में भी इस प्रवृति को कहानियों की विषयवस्तु के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता है, जो कभी मध्यवर्गीय आडम्बरों के चित्रण में ( चीफ की दावत, मेड इन इटली, पटरियां आदि ) तो कभी निम्नवर्गीय जीवन के विविध पहलुओं के रूप में ( राधा-अनुराधा, पिकनिक आदि ) तो कभी साम्प्रदायिक वैमनस्य ( अमृतसर आ गया है, प्रादुर्भाव, झुटपुटा, पाली, निमित्त आदि ) को सजग एवं सूक्ष्म दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है | कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है की साहनी की विविध रचनाओं में व्यक्त परिवेश एवं परिस्थितियों के विभिन्न पक्षों का तर्कपूर्ण एवं विवेकसम्मत सोच से निरीक्षण करके आधुनिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में उनकी सार्थकता या निरर्थकता को प्रस्तुत किया गया है |

आधुनिकता-बोध का संबंध मूल्य-बोध से भी है जिसके अंतर्गत परिवर्तित होती हुई मानवीय अवधारणाएं, मानवीय संबंधों के स्वरूप में परिवर्तन, नवीन मूल्यों की स्थापना एवं नैतिक मान्यताओं में परिवर्तन आते हैं | भीष्मजी की बहुचर्चित कहानी ‘ चीफ की दावत ‘ में मध्यवर्गीय-चेतना को निरुपित करते हुए आज की विषम-जटिल परिस्थितियों में मानवीय संबंधों को प्रस्तुत किया गया है | जिसमें माँ एवं शामनाथ के चरित्रों की विशेषताओं के माध्यम से वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की परिस्थितियों में ऊंचे पद की लालसा में स्वार्थजनित मनोवृत्ति एवं जोड़-तोड़ के प्रयासों द्वारा किस प्रकार मानवीय संबंधों का नैतिक अवमूल्यन होता चला जाता है | यह भी आधुनिकता-बोध के मूल्यों के विघटनात्मक पक्ष को दर्शाता है |

परिवर्तित होते हुए मूल्यों के स्वरूप को ‘ कडियां ‘ में महेंद्र की अहंकारी महत्त्वाकाक्षाओं के परिणामस्वरूप विवाहेत्तर प्रेम-संबंधों में उसका एक-एक करके सभी से असंतुष्ट होते जाना, एवं हाई-स्टेटस को प्राथमिकता देते हुए नैतिकता को छिन्न-भिन्न कर देना मूल्यों के परिवर्तन को दर्शाता है | मूल्य परिवर्तन को उसकी क्रमिक गतिशीलता के रूप में उपन्यास ‘ मय्यादास की माड़ी ‘ में मय्यादास के पुत्र धनपतराय के पुत्र की जीवन शैली के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते विभिन्न परिवर्तनों द्वारा स्पष्टता से जाना जा सकता है | परिस्थितियों के अनुसार बदलती अवधारणाओं को नाटक ‘ मुआवज़े ‘ में देखा जा सकता है | जहां समाज के विभिन्न तबकों की मनोवृत्ति को दंगे से पूर्व एवं बाद की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में दर्शाया गया है |

इसमें विशेष रूप से निम्नवर्गीय अभावों को प्रस्तुत करते हुए इसी मनोवृत्तियों को उद्घाटित किया गया है जिनका स्वरूप बहुत विद्रूप है | यहाँ मानवीय संबंधों की सार्थकता उन अभावों की पूर्ति तक ही सीमित रह गयी है, उनके मूल अर्थ से उनका कोई वास्ता नहीं रह गया है |

इसके अतिरिक्त परिवर्तित होते मूल्यों एवं नैतिक मान्यताओं को अन्य वर्गों एवं तबकों की स्वार्थसिद्धि हेतु देखा जा सकता है |

उपन्यास ‘बसंती ‘ में निम्नवर्गीय नैतिक मान्यताओं के परिवर्तित स्वरूपों को बसंती के माध्यम से दर्शाते हुए मध्यवर्गीय खोखले आदर्शों एवं मूल्यहीनता को उपस्थित करते हुए आधुनिकता-बोध के मुख्य आयाम की पुष्टि करता है |

मूल्य की परिवर्तनशीलता के अंतर्गत जब नवीन युगानुकूल मूल्यों की स्थापना की प्रक्रिया एवं अस्वीकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है जो आदुनिकता-बोध की महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है |

भीष्मजी के साहित्य में यह लगभग प्रत्येक रचना के विषय फलक पर कहीं न कहीं अवश्य दृष्टिगत होती है | इसका सशक्त रूप उपन्यास ‘ बसंती ‘ में बसंती की जिजीविषापूर्ण एवं विद्रोही व्यक्तित्व के माध्यम से प्रकट होता है |

वह खोखले आदर्शों एवं नैतिकता के रूढ़िग्रस्त मान्यताओं का तीखा विरोध करते हुए उन सभी थोथी मान्यताओं को भी नकारती है जो उसे उसके जीवन को सम्पूर्ण अर्थों में जीने में बाधक हैं |

यह विद्रोह एवं अस्वीकार जो थमी हुई एवं व्यर्थ की परम्पराओं के खिलाफ है, नाटक ‘ कबीरा खड़ा बाज़ार में ‘ प्रखरता से उपस्थित हुआ है | इसमें आधुनिकता-बोध धार्मिक कट्टरताओं एवं जातिगत भेदभाव के विरोध के रूप में अभिव्यक्त हुआ है | नाटक ‘ माधवी ‘ में यह विरोध तथा अस्वीकार अपने आत्मस्वाभिमान की गरिमा की रक्षा हेतु अंत में गालव का त्याग करने के दृढ़ निश्चय के रूप में वास्तव में परम्परागत रूप से चली आ रही नारी की परावलंबित-शोषितावस्था को समाप्त करने के लिए उपस्थित हुआ है जो पूर्णत: आधुनिक नारी की स्थिति को साकार करता है |

इसी प्रकार इनके आखिरी उपन्यास ‘ नीलू,नीलिमा,नीलोफर ‘ में भी बड़े ही सीधे-सादे ढंग से परम्परागत रूढ़ियों के स्थान पर नए स्वस्थ आदर्शों की स्थापना की गई है | यह उपन्यास भीष्मजी की सृजनात्मक मानसिकता के प्रगतिशील आयाम की पक्षधरता को बखूबी दर्शाता है | बड़े ही सहज ढंग से भीष्मजी प्रेम-तत्व को किसी भी तरह की अमानवीयता और खोखले संस्कारों से ऊपर स्थापित करते हैं |

इसमें बुद्धिजीवियों पर भी तीव्र कटाक्ष किया है जिनके लिए सच्चाई के लिए अनुसन्धान करना एक बात है और उस पर अमल करना अलग |

जब समाज में खोखली परम्पराओं और रूढ़ियों के नाम पर नैतिकता का हनन हो रहा हो, तब इस वर्ग की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है , परन्तु तब यह भी उन्हीं की चपेट में आ जाते हैं |

इस प्रवृत्ति को उनकी कहानी ‘ राधा-अनुराधा ‘ की राधा का अपने जीवन को सही मायनों में जीने की उत्कट अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु अपने समाज में व्याप्त खोखली नैतिकता के विरोध के रूप में अस्वीकार की प्रवृत्ति को दर्शाता है | इस अस्वीकार का एक और रूप, पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण के विरोध के रूप में ‘ रामचंदानी’, ‘बीवर’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘मेड इन इटली’ एवं ‘ओ हरामजादे’ कहानियों में किसी न किसी रूप में दिखाई देता है |

आतंकवाद का समर्थन करने वाली मनोवृत्तियों का विरोध एवं अस्वीकार ‘नौसिखुआ’ कहानी में अमरजीत के माध्यम से हुआ है | इनकी अन्य कहानियां भी मानवीय सरोकारों की पक्षधरता को दिखाता हुआ अमानवीयता के प्रति अस्वीकार विभिन्न सन्दर्भों में परिलक्षित हुआ है |

विद्रोह और अस्वीकार का परिणाम संघर्ष के रूप में होता है और भीष्मजी के साहित्य की संवेदना का यह महत्त्वपूर्ण पक्ष है | इनके अधिकतर पात्र अपने जीवन को सम्पूर्ण अर्थों में जीने के लिए उसमें व्याप्त अंतर्विरोधों एवं विषमताओं के मध्य संघर्षशील रहते हैं | साहनी आधुनिकता-बोध की सही अर्थों में अभिव्यक्ति वस्तुत: जीवन के संघर्षशील पक्षों को उद्घाटित करने में मानते हैं | साथ ही वे जीवन के सकारात्मक पक्षों, जिनमें संघर्ष प्रमुख है, को रचना में महत्त्व देते हैं |

संघर्ष को वे मनुष्य का नैसर्गिक गुण मानते हैं क्योंकि मनुष्य आज निरंतर सफलता अर्जित करते हुए सभ्यता के जिस पड़ाव पर खडा है, वहां वह संघर्ष करते हुए ही पहुंचा है और इस संघर्ष ने उसे जीवन के प्रति आस्था रखना सिखाया है| उनकी रचनाओं के पात्र कहीं भी अनास्था या मृत्युबोध जैसे नकारात्मकताओं का शिकार नहीं हैं, अपितुं संघर्षशील परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्थाजनित मनोवृत्तियों को व्यक्त करते हैं |

इसी सन्दर्भ में दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भीष्मजी ने अपनी रचनाओं में मुख्य रूप से मध्य-वर्ग एवं निम्न-वर्ग के जीवन का यथार्थ चित्रण करते हुए दोनों वर्गों को समानांतर रूप से विश्लेषित करते हुए उनके जीवन के अंतर्विरोधों एवं संघर्ष को स्पष्ट किया है |

वस्तुत: उन्होंने वर्ग-वैषम्य के यथार्थपरक चित्रण के द्वारा संघर्ष के विविध रूपों को व्यक्त करते हुए आधुन्क्ता-बोध की इस विशेष प्रवृत्ति को और भी स्पष्टटा से उजागर किया है |

उपन्यास ‘ बसंती ‘ की बसंती की संघर्षशीलता अपने वर्ग में व्याप्त नैतिक मान्यताओं एवं रूढ़ियों के विरोध में दीनू के रूप में पाखंड, धूर्तता जैसी अमानवीयता के विरोध में व्यक्त होती है तो ‘ मय्यादास की माड़ी ‘ में रुकमनी की संघर्षशीलता परम्परागत रूढ़ियों का विरोध करते हुए अपने अस्तित्व की रक्षा में दिखाई देता है | ’ कड़ियाँ ‘ उपन्यास महेंद्र की संघर्षशीलता को उसकी महत्त्वाकाक्षाओं की पूर्ति के लिए देखा जा सकता है तो ‘ कुन्तो ‘ में मनुष्य की संघर्षशीलता को एक अलग ही रूप में देखा जा सकता है | इसमें कुछ पात्र जैसे प्रोफेस्साब, जयदेव, गिरीश आदि परम्परागत रूढ़ियों का चाहकर भी परित्याग करने में असमर्थ साबित होते है और साथ ही आधुनिक मान्यताओं को चाहकर भी अपना नहीं पाते |

अपने पूर्वाग्रहों का त्याग न कर पाने की स्थिति में स्वयं तो मानसिक द्वंद्व का शिकार तो होते ही हैं उनके साथ साथ कुन्तो, थुलथुल, सुषमा आदि भी इससे बुरी तरह से प्रभावित होते हैं | इन सभी उपन्यासों की विशेष बात यह रही है कि भीष्मजी ने अपने पूर्वाग्रहों को कहीं भी आरोपित करने का प्रयास नहीं किया, अपितु बदलती हुई परिस्थितियों ,नए मूल्यों की स्थापना में, ज़िंदगी की कसौटी पर जो बात सही उतरे उसे ही अपना लेखन बिंदु बनाया |

इनके प्रत्येक उपन्यास में एक-न-एक पात्र ऐसा सदैव उपस्थित रहता है जो अपनी वास्तविक स्थिति को त्याग कर जीवन को सही अर्थों में जीना चाहता है | उनका संघर्ष नवीन आदर्शों और मान्यताओं को उपस्थित करता रहा है जो निरंतर ऐसे नवीन मूल्यों की स्थापना के प्रति सजग रहे हैं जो मानवीय गरिमा के अनुकूल हैं |

इस संघर्ष को उनके नाटकों के पात्रों में बखूबी देखा जा सकता है | ‘ माधवी ‘ में माधवी का गालव की गुरु-दक्षिणा हेतु अपने अस्तित्व को टुकड़ों में बांटते जाना वास्तव में उसके जीवन के विकट संघर्ष को दर्शाता है जो आज की आधुनिक नारी की दशा को भी परिभाषित करता है | आज इतनी तरक्की होने के बावजूद भारतीय समाज में उत्तराधिकारी के रूप में पुत्र की कामना सर्वोपरि है और इस मानसिकता से जुडी तमाम विसंगतियों का शिकार आज की स्त्री है | ‘ हानूश ‘ तो आधुनिक रचनाकार की सर्जनेच्छा एवं उसके संघर्ष को पारिवारिक ,सामाजिक एवं व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में रूपायित करते हुए उसकी विभिन्न स्थितियों एवं मन:स्थितियों को प्रस्तुत करता है |

विद्रोहात्मक प्रवृत्ति के कारण समाज एवं शासन-व्यवस्था के साथ संघर्ष की स्थिति नाटक ‘ कबीरा खड़ा बाज़ार में ‘ द्रष्टव्य है और ‘ मुआवज़े ‘ आमजन या निम्न-जन, विभिन्न व्यवसायी-वर्ग शासन-व्यवस्था के अधिकारी वर्ग की की मनोवृत्तियों के माध्यम से उनके संघर्ष को व्यंग्यात्मक शैली में निरुपित करता है | इनके आखिरी नाटक ‘ आलमगीर ‘ में संघर्ष का वह रूप प्रस्तुत हुआ है जो व्यक्ति का अपने ही साथ होता है |

इस नाटक में भीष्मजी ने मानवीयता एवं अमानवीयता के बीच के सूक्ष्म तंतु को यथार्थ रूप दिया है | यहाँ संघर्ष औरंगजेब के काल की राजनितिक हलचल और उसके फलस्वरूप उत्पन्न अमानवीयता के सशक्त दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत हुआ है |

औरंगजेब का यह संघर्ष शाहजहाँ, दाराशिकोह, जहांआरा के साथ तो है ही, साथ ही उसका संघर्ष स्वयं अपनी अमानवीय जटिलताओं के साथ भी है | साहनी ने इसे पकड़ने का यथासंभव प्रयास किया है और सम्पूर्ण नाटक का ताना-बाना इसी के ओर –छोर से निर्मित है | इस नाटक के माध्यम से भीष्मजी आधुनिक भाव-बोध को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में में प्रस्तुत करते हैं|

आधुनिक विसंगतियों के मूल में कहीं न कहीं अमानवीय तंतु विद्यमान होते हैं जिससे स्थितियां और भी उलझती चली जाती हैं और व्यक्ति अपने ही शिकंजे में फंसता चला जाता है | उसी प्रकार जैसे औरंगजेब का संघर्ष और भी निर्मम होता चला जाता है जबकि वह सबसे अधिक शक्तिशाली होता है |

साहनी के कहानियों के पात्र भी विविध परिस्थितियों में संघर्षरत रहते हैं | शासन-व्यवस्था एवं राजनीति के प्रभावस्वरूप आम-जन की संघर्षशीलता को ‘ वांगचू ‘ कहानी के माध्यम से भली-भांति जाना जा सकता है जिसमें दो देशों के मध्य परिवर्तित होती राजनीतिक परिस्थितियों का कुप्रभाव वांगचू की विकट विसंगतियों के रूप में पड़ता है |

वर्त्तमान व्यवस्था में ऊंची पदवी या हाई-स्टेटस की महत्त्वाकांक्षा मध्यवर्गीय चेतना का मुख्य पहलू है जो इस वर्ग की संघर्षपरक स्थितियों का मुख्य कारण है | इसके लिए तरह तरह के जोड़-तोड़ एवं व्यवस्था की विसंगत अवस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में इस संघर्षशीलता को देखा जा सकटा है | कहानी ‘ खूंटे ‘ अफसरशाही, चमचागिरी एवं आत्मस्वाभिमान के हनन को केवल ऊंचा पद पाने के लिए प्रस्तुत किया गया है | इसी प्रकार ‘ पटरियां’,’ सिफारिशी चिट्ठी ‘,’ कुछ और साल ‘,’ खिलौने ‘,’ लीला नन्दलाल की ‘,’ मुर्ग-मुसल्लम ‘, कहानियां भी वर्तमान व्यवस्था में विशेष रूप से मध्य-वर्ग की संघर्षशीलता का परिचय देते हुए महानगरीय संस्कृति को भी दर्शातें हैं जो आधुनिकता-बोध की इस प्रवृत्ति के निर्माण के लिए विशेष रूप से सहायक है |

मध्य-वर्ग के साथ-साथ निम्न-वर्ग की संघर्षधर्मिता को भी इनकी कहानियों में देखा जा सकता है | ‘ साग-मीट ‘ का जग्गा के जीवन का संघर्ष उच्चवर्गीय खोखली नैतिकता के कारण निर्मित हुआ तो ‘ राधा-अनुराधा ‘ की राधा थोथी मान्यताओं को नकारती है | ‘ निशाचर ‘ कहानी भी निम्नवर्गीय स्त्रियों की विसंगतियों का चित्रण करते हुए आधुनिक-बोध को दर्शाती है जहाँ मनुष्य अर्थ की शक्ति के आगे कुछ नहीं रह गया है |

वर्तमान परिस्थितियों में एक लेखक और रचनाकार के कौन से संघर्ष हो सकते हैं इसे ‘ दिवास्वप्न ‘ ‘ जहूरबख्श ‘ और ‘ देवेन ‘ कहानियों में भली-भांति समझा जा सकता है | बंटवारे के समय उत्पन्न साम्प्रदायिक भेद-भाव , धर्मान्धताओं एवं राजनीतिक विद्रूपताओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली कहानियों के पात्र मानवीय सहिष्णुता के लिए अमानवीय कृत्यों का विरोधपूर्ण संघर्ष करते हुए प्रस्तुत हुए हैं, जैसे ‘ सरदारनी ‘ ‘ निमित्त ‘ ‘जहूरबख्श ‘ ‘ पाली ‘ ‘ झुटपुटा ‘ आदि |

आधुनिकता-बोध को परिभाषित करने वाली इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप नवीन मूल्यों की स्थापना और इसके लिए किया जाने वाले प्रयासों को भी विभिन्न रचनाओं में प्रस्तुत किया है |

उपन्यास ‘ तमस ‘ में वर्णित विभिन्न मनोवृत्तियों एवं उनके संघर्ष के माध्यम से भीष्मजी ह्रास होती हुई मानवीयता एवं सहिष्णुता को स्पष्ट करते हुए उपन्यास के कुछ पात्रों द्वारा उन्हीं मूल्यों की रक्षा एवं उनकी स्थापना के लिए तत्परता को देखा जा सकता है, जिनका बंटवारे की विद्रूपताओं के कारण ह्रास हो चुका था |

इसी प्रकार ‘ बसंती ‘ परंपरित रूढ़ियों को तोड़कर निराधार मूल्यों का बहिष्कार कर नवीन मान्यताओं को स्थापित करता है| ‘ मय्यादास की माड़ी ‘ में रुकमणि अंतत: माड़ी एवं समाज की परंपरागत रूढ़ियों से टकराती हुई एक अध्यापिका के रूप में नवीन मूल्यों की स्थापना की ओर संकेत करती है |

झरोखे’ में भी भीष्मजी की दृष्टि पारिवारिक एवं सामाजिक रूढ़ियों के अप्रत्यक्ष विरोध के रूप में तुलसी के व्यक्तित्व एवं मानसिकता के द्वारा नवीन मूल्यों की स्थापना के प्रयास के रूप में प्रतिफलित हुई है |

नवीन मान्यताओं की स्थापना को ‘ कबीरा खड़ा बाज़ार में ‘के अंत में आम जनता की कबीर के पक्ष में एक ध्वनी के माध्यम से, ‘ माधवी ‘में सदियों से चली आ रही नारी के प्रति सोच के कारण उसकी दयनीय दशा को अपने अस्तित्व की गरिमा बनाए रखने के लिए परित्याग करने में तथा ‘ हानूश ‘ व ‘ मुआवज़े ‘में युगानुकूल मूल्यों की पक्षधरता के रूप में देखा जा सकता है | इसके साथ ही भीष्मजी की कहानियों ‘ रामचंदानी ‘ में राष्ट्रीय भावना को ‘ ओ हरामजादे ‘ में विदेश में रहने वाले एक भारतीय की निजता की पहचान के रूप में भारतीयता का महत्त्व दर्शाते हुए उन्ही मान्यताओं पर बल दिया है, जो अपने जो अपने परिवेश से जुड़ी हैं |

इस प्रकार इनकी ‘ अनोखी हड्डी ‘ ‘ शोभा यात्रा ‘ ‘पाप-पुण्य ‘ ‘समाधि भाई रामसिंह ‘ ‘ पहला पाठ ‘ ‘एक धर्म सनातन: ‘ ‘ पाली ‘ कहानियां धार्मिक कट्टरताओं का विरोध करते हुए उन मूल्यों की स्थापना करती हैं जो मानवीयता के धरातल पर सार्थक सिद्ध होते हैं |

इसी भांति साम्प्रदायिक द्वेष एवं आतंक के वातावरण में भी उनकी कहानियां ‘ निमित्त ‘ ‘जहूरबख्श ‘ ‘सरदारनी ‘ झुटपुटा ‘के पात्रों के संघर्ष वास्तव में स्वस्थ मूल्यों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ है |

इन कहानियों के अतिरिक्त भीष्मजी की अन्य कहानियां भी किसी न किसी रूप में उन मूल्यों की स्थापना की ओर संकेत अवश्य करती है जिनका संबंध मनुष्य की प्रगतिशीलता से है | रचना के लिए जीवन को सर्विपरी मानने वाले भीष्मजी की दृष्टि मूलत: समाजोन्मुखी है जो व्यापक स्तर पर जागरूकता एवं विवेकशीलता पर आधारित है |
इस प्रकार भीष्मजी के साहित्य में आधुनिकता-बोध मुख्य रूप से जीवन-गत यथार्थ चित्रण द्वारा उसमें व्याप्त संघर्षों, अंतर्विरोधों, विसंगतियों तथा विद्रोह एवं अस्वीकार जैसे विविध प्रतिफलित स्वर्रूपों के द्वारा परिलक्षित होता है |

आधुनिकता-बोध की अभिव्यंजना भीष्मजी की अपने परिवेश एवं परिस्थितियों में बिखरी चीजों को जानने-समझाने की सचेत, तर्कशील एवं प्रश्नाकुल दृष्टि तथा मनुष्य एवं परिवेश के अन्र्स्नब्न्धों का सूक्ष्म निरीक्षण करके उनके विश्लेषण द्वारा और भी स्पष्ट रूप से होता है |
इनके साहित्य में आधुनिकता-बोध के विविध पक्षों की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए उनकी रचनाधर्मिता भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है |

आधुनिक-बोध को व्यंजित करती हुई विविध संवेदनाओं को उनके उपयुक्त भाषा-शैली, संवाद,एवं रूप-विधान जो किसी रचना की संरचना के प्रमुख आयाम हैं, को भीष्मजी के साहित्य में देखा जा सकता है | विविध परिवेश जन्य परिस्थितियों, अलग अलग वर्ग एवं तबकों तथा उनसे जुड़े विविध सन्दर्भों के अनुसार ही भीष्मजी की भाषा बिना किसी कृत्रिम आवरण के सहज रूप में ही जीवन की जटिलताओं एवं सहजताओं को भली-भांति स्पष्ट कर देती है |

आधुनिकता-बोध की पहचान रचना में किसी प्रश्न या समस्या के स्वरूप को दर्शाते हुए उससे संबंधित विभिन्न तथ्यों एवं उनके समाधान को ढूँढने के प्रयास के रूप में होती है | इसलिए उनकी रचनाओं के अंत ‘ अंत-समाप्ति ‘ नहीं अपितु ‘ अंतहीन-अंत ‘ के रूप में होता है, अर्थात उनका अंत रचना के बाहर होता है | उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त समस्याएं और प्रश्न अंत में संभाव्य समाधान की ओर संकेत करते हुए भविष्य की नवीन संभावनाओं को प्रदर्शित करते हैं जो आधुनिकता-बोध की प्रबल पहचान है |

इस प्रकार साहनी की रचनाओं में व्याप्त संवेदनाएं बड़े ही सहज रूप में एक-एक करके प्रस्फुटित होते हुए जीवन की सार्थकता को भूत, भविष्य एवं वर्तमान के पर्रिप्रेक्ष्य में सिद्ध करते हुए वृहत्तर मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण एवं प्रगतिशील तत्त्वों के साथ जीवन के सकारात्मक पक्षों से ओत-प्रोत आधुनिकता-बोध की ही अभिव्यक्ति है.

 

 

 

(डॉ० अनुपमा श्रीवास्तव दिल्ली विश्वविद्यालय के
जीसस एंड मेरी कॉलेज  में पढ़ाती हैं।
Ph. D. दिल्ली विश्वविद्यालय
संगीत विशारद : गान्धर्व महाविद्यालय
विभिन्न प्रकाशित कार्य (लेखन)
विभिन्न संगीत संकलन (स्वतंत्र गायन)

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