समकालीन जनमत
जनमत

विश्व आदिवासी दिवस पर सामाजिक तलछट में छटपटाते कुछ सवाल

आदमी ही नहीं समय भी बहरूपिया हो गया है। मनुष्य, समाज और दुनिया के तमाम पंथ अबूझ हो गए हैं। हर कहीं, हर तरफ धुंआ-धुंआ सा है। साफ चीजें पर्दा कर चुकी हैं। समाधान को छोड़िए, समस्या ही समझ में नहीं आती है। दुनिया का इतिहास देख लें, कहीं भी, कभी भी समय इतना जटिल नही रहा। धूसर रंग ने हमारे समय के हर हिस्से को घेर सा लिया है। एकल चरित्र की चीजें और धारणाएं बहुचारित्रिक रूप अख्तियार कर चुकी है। जिसे पारदर्शी समझते है, वह अपारदर्शी अथवा अर्धपारदर्शी कुछ भी हो सकता है। हम बहुरूपिए समय का उत्पाद बनने को अभिशप्त हैं।

एक समय था, जब आंदोलन करना, काम माना जाता था, अब बोलना ही आंदोलन माना जाना लगा है। गजब की स्थिति है जहां, उबरना होता है, वहॉ लोग डूब रहे हैं। जहॉ डूबने का अंदेशा था, वहॉ लोग उबर रहे हैं। जिसे मित्र समझते हैं, वह शत्रु साबित होता है। जिसे दवा समझ रहे होते  हैं, वह विष का काम कर रहा होता है।

एक प्रकार से अनन्त विरोधाभास भरे समय का उत्पाद बन जाना हमारी नियति हो गई है। तिजारती बिचौलिए और साम्राज्यवादी ताकतें विकास एवं विनाश एक साथ कर रही हैं, बारूद और ब्रेड साथ- साथ फेंके जा रहे हैं (इराक, इरान, फलस्तीन, दक्षिण अमरीका एवं दक्षिण अफ्रीका के कई मुल्क)। अस्मत बचाने, लुटाने एवं  लूटने की कोशिश साथ-साथ हो रही है। विकास, शान्ति एवं सहयोग की तमाम कोशिशों एवं दावों के बावजूद, सर्वत्र विनाश, हिंसा एवं असहयोग का माहौल निर्मित हो रहा है।

समाज को शिक्षित एवं संस्कारित बनाने वाले संस्थान घोटालों एवं नैतिक पतन के केन्द्र के रूप में उभर रहे हैं। दुनिया ने अविश्वास का ऐसा माहौल शायद ही देखा होगा। यथार्थ के साथ भ्रम का ऐसा गठजोड़ पहली बार देखने को मिल रहा है। वस्तुत: हमारी स्थिति सत्य एवं असत्य के बीच फंसे फुल स्टाप के से अधिक की नही रह गई है।

बड़ी शक्तियॉ दावा करती पाई जा रही हैं कि प्रौद्योगिकी से तरक्की तक तक पहुंचा जा सकता है, गरीबी को कम किया जा सकता है और इसके इस्तेमाल से दुनियॉ के तमाम पेटों में रोटी पहुंचाई जा सकती है। पूरी दुनियॉ में तकनीकी ज्ञान द्वारा लगातार जीवन को आसान बनाने की कोशिशें एवं वायदे किए जा रहे हैं परन्तु जीवन है कि उत्तरोत्तर मुश्किल में फंसता जा रहा है। दावे कुछ किए जा रहे हैं, हो कुछ रहा है, नियंत्रण किसके पास है और नियंता कौन है ?

संविधान में पिछड़ों, दलितों एवं आदिवासियों के विकास के प्रावधान होने के बावजूद, लगातार ये लोग पिछड़ते जा रहे हैं। इनके नाम पर जारी विकास परियोजनाओं के आवंटित राशि में लगातार वृद्धि (कई देशों ने आंवटित राशि को घटा दिया है) के साथ भ्रष्टाचार, घोटालों एवं शोषण में भी वृद्धि हो रही है। यह दृश्य किसी एक देश का नहीं है, तमाम मुल्कों में ऐसा ही हो रहा है।

बात स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। “24 साल की उम्र में ही सीमा आईन किसी प्रौढ़ महिला जैसी दिखने लगी हैं…………. उन्हें क्या मर्ज है, पता नहीं चला, लेकिन मर्ज परेशान कर रहा है। फिर भी सीमा को बीमारी से ज्यादा फिक्र आगे की जिंदगी की है,एल.के.जी में पढ़ने वाली उनकी बेटी मनीषा का स्कूल छूट चुका है। छोटे बेटे गुलशन का क्या होगा, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। सीमा सुशील आईन की पत्नी हैं। सुशील आईन को 12 फरवरी 2012 को घर के सामने बुलाकर मार डाला गया था। जी हां, यह झारखंड में सारंडा एक्शन प्लान के तहत विकास कार्य द्वारा उपजे विनाश कार्य की एक छोटी सी इबारत है।

सारंडा में नक्सलवादियों को हतोत्साहित तो कर दिया गया है किंतु विकास के किए गए वायदे भी हतोत्साहित करने वाले हैं। आखिर अशिक्षा, नक्सलवाद एवं गरीबी का मार झेलने वाले आदिवासी, जीवन जीने की पूंजी कहां से संयोजित करें, जब लोककल्याणकारी की योजनाएं अपर्याप्त एवं मिथ्या साबित हो रही हो ? पूंजीपती घरानों एवं मीडिया के संतुलन एवं आम सहमति से जिस तरह का माहौल निर्मित हो रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है, उसमें इरोम शर्मिला, सोनी शोरी एवं इमरती देवी उइके जैसों की आवाज के लिए कोई जगह नही है। साथ ही आदिवासी नस्ल मिटाने की कोशिश जोरों पर है। उनके गुणसूत्रों और परंपरागत ज्ञान को लाइब्रेरियों में संरक्षित किया जा रहा है, ताकि विलुप्त होने पर आनुवांशिकी, उत्तरजीविता और परंपरा से सजोए ज्ञान के अध्ययन से पूजीपतियों एवं उनकी आने वाली पीढ़ियों को फायदा पहुंचाया जा सके। मानवशास्त्र व आदिम मानव आनुवांशिकी आदि विद्याशाखाएं आदिवासियों को इतिहास बनाने के लिए स्थापित की गई हैं और इसी तरह के कार्य के लिए कई अन्य संस्थानों की स्थापना प्रस्तावित है।

         बढ़ते मनोरंजन का दबाव, पूंजी की आवारगी एवं जंगली जानवरों के संरक्षण संबन्धी सरकारी नियमों की कड़ाई से ट्राइबल सफारी का प्रचलन इन दिनों खूब तेजी से पनप रहा है। इस रोमांचक खेल में आदिवासी स्त्रियों का नृत्य कराया जाता है। आदिवासी पुरुषों को आपस में लड़ाया जाता है (जैसे दो मुर्गों को कभी लड़ा कर मनोरंजन किया जाता था)। इस पूरे कृत्य से आदिम समुदाय यौनजनित रोगों का शिकार होता जा रहा है। कई जातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। गोवा की जोरवा जनजाति इन्हीं करणों से अवशेष होने की स्थिति में पहुंच चुकी है।

    हैरान कर देने वाली परियोजनाओं एवं अतुलित धन के आवंटन के बावजूद ,स्वतंत्रता के 66 साल के बाद भी, आदिवासी समाज विकास के विपरित दिशा में यात्रा करने को मजबूर है। अब तक जितनी राशि इनके विकास के नाम पर खर्च की गई है, उतनी राशि से सभी आदिवासी क्षेत्रों में नोटों की फोर लेन सड़कें बिछा दी गई होतीं। परंतु नहीं बनाई जा सकी तो, विकास की एक पाक साफ रूपरेखा। पूरी दुनियॉ में मनुष्यता की रक्षा में सबसे अधिक शहादतें आदिवासियों की देनी पड़ती हैं और दुनियॉ में विकास का सबसे कम हिस्सा आदिवासियों तक पहुंच पाता है।

पूरे देश में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण संसार में शांति के तमाम प्रयासों के बावजूद शांति कहीं नहीं है। विश्व के तमाम देश सामरिक उपकरणों के विकास में लगातार लगे हुए हैं, सत्तासीन शक्तियां विदेशी आक्रमण का भय दिखाकर, इतना शक्तिशाली हो जाना चाहती हैं कि भविष्य में उन्हें किसी जनान्दोलनों का भय, शेष न रह जाए। एक तरह से पूर्ण निरंकुश एवं खूनी सत्ता के निर्माण की पटकथा लिखी जानी शुरू हो गई है। मतलब जनता एवम सत्ता के बीच अविश्वास एवं अनात्मीयता लगातार बढ़ती जा रही है। यदि ठीक से शिनाख्त करें, तो पाएंगे कि सत्ता द्वारा गोले- बारुद, बंदूकों, रायफलों का उपयोग, देश की सीमाओं के बाद, सबसे अधिक आदिवासियों की हत्या एवं उनके मनोबल को तोड़ने में किया जाता है। स्थितियां कुछ इस तरह  से बन गई हैं कि आदिवासी आक्रोश, विद्रोह, आत्मसंघर्ष एवं अविश्वास के चौराहे पर किंकर्तव्य विमूढ़ खड़ा है।

बात को ज्यादा स्पष्ट करने के लिए सारंडा एक्शन प्लान से ही एक उदाहरण लें. “सारंडा विकास समिति के कुंदा चंपिया कहते हैं,”हमारे इलाके में दीर्घकालिक विकास के लिए जिन चीजों की ज़रूरत है, उन्हें छोड़कर हमें दूसरी चीजों का लालीपप दिखाया जा रहा है। बिजली आएगी तो हम स्वरोजगार भी कर सकते हैं। लेकिन एक्शन प्लान में बिजली की प्राथमिक्ता नही है। जिन 56 गांवों में एक्शन प्लान चलाया जाना है, उनमें कहने को तो 79 स्कूल हैं, लेकिन वे खुलते नहीं।” विकास का यह कैसा स्वरूप है, कि जिसकी प्राथमिकता में शिक्षा है ही नहीं। परंतु शिक्षा से आदिवासी समाज को वंचित करने की यह कोशिश ऐतिहासिक सत्य है। और यह भी सत्य है कि, जब किसी विशेष देश, समाज, समुदाय या व्यक्ति की दीर्घकाल से उपेक्षा की जाती है, तो संघर्ष, प्रतिशोध, विद्रोह, एवं अविश्वास का माहौल निर्मित होने लगता है।

विश्व की तमाम क्रांतियां इस बात की गवाही देती हैं। एक उदाहरण से इस तथ्य को शायद ज्यादा प्रमुखता से समझा जा सकेगा- ‘बस्तर का मुक्ति संग्राम’ में डाँ. हीरालाल शुक्ल लिखते हैं,’ 1876 अनेकानेक कारण थे। ब्रिटिश शासन द्वारा किये गए विभिन्न भू-राजस्व – विषयक प्रयोगों की वजह से आदिवासियों में अभूतपूर्व असंतोष उत्पन्न हुआ। अंग्रेज सरकार का, राजा भैरमदेव के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप भी मूरियाओं की संवेदना को झकझोरने वाला था………गोपीनाथ की तानाशाही रवैया भी मूरिया- विद्रोह का कारण बना। अंग्रेजों की फूट- डालो और शासन करो।की नीति भी 1876 की मुरिया- विद्रोह के लिए उत्तदाई थी।’

देश के कोर्ट कचहरियों में बित्ते भर की ज़मीन के लिए लाखों मुकदमेंस लम्बित पड़े है। मुख्यधारा का सभ्य समाज़ अंगुल भर या सूत भर की ज़मीन के लिए जान ले लेता है या देता है। जहां रेशे भर की ज़मीन पर दूसरे का अधिकार, सभ्य समाज को गंवारा नहीं, वहीं आदिवासियों की, हजारों एकड़ जमीन पर एक झटके में कब्जा करने, उन्हें जान से मारने, उनकी अस्मत से खिलवाड़ करने एवं उनकी संस्कृति को विनष्ट करने की साजिश, सभ्य समाज, सरकार एवं सफेदपोश बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा रची जा रही है। ऐसे में आदिवासियों का संघर्ष, वाजिब लगने की जगह, नागवार, फिजूल, राष्ट्रविरोधी एवं विकास विरोधी नजर आता है।

सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता के तमाम दोहाई दिए जाने के बावजूद, आदिवासियों की संस्कृति, इतिहास एवं परंपरागत ज्ञान को हथियाने की जुगत जोरों पर है। विगत दो-तीन महीने पूर्व ‘इंडिया टुडे’ में अंग्रेजों द्वारा सन् 1913 में, लगभग 1500 आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिए जाने वाले मानगढ़ कांड पर एक रिपोर्टिंग छपी थी। इस जघन्य हत्याकांड पर गुजराती के लेखक अरुण वघेला एवं  उनके उपन्यास ‘अजादिना जंगो आदिवासी रंग’ एवं उनके शोध का बार- बार जिक्र किया गया था, जबकि इसी हत्याकांड पर हरिराम मीणा द्वारा  संवेदनात्मक एवं शोधपरक उपन्यास ‘धूणीतपे तीर’ की उल्लेख रिपोर्टिंग में कहीं नहीं थी।

आदिवासी लेखन पर आदिवासी लेखक को ही नज़रअंदाज करने की, यह कोई नई घटना नहीं है।  परंतु आदिवासियों के ज्ञान का उपयोग कर, उन्हें ही गुमनाम करने की साजिश, सभ्य समाज को नैतिक रुप से कटघरे में खड़ा करने वाला कृत्य है। वैश्विक स्तर पर भी सरकार,पूंजीपती घरानों एवं मीडिया के साहूकारों की मिलीभगत से, आदिवासियों की हत्याओं एवं शोषण इबारतें लिखी जा रही हैं। गौरतलब है एक उदाहरण –  “अमेंजन में यानोमामी  आदिवासियों पर स्वर्ण खादान वालों द्वारा आक्रमण, दर्जनों आदिवासियों की मौत” (Miners’ attack on Yanomami   Amazon tribe ‘kills dozens’— 29 august,2012, BBC)। खबर में आगे बताया गया है—“An attack by gold miners on a group of Yanomami tribes people in Venezuela has left up to 80 people dead, according to campaign groups………The attack is reported to have taken place last month in the remote Irotatheri community, close to the border with Brazil.The miners allegedly set fire to a communal house, with witnesses reporting finding burnt bodies.” ( वेनजुवेला की आदिवासीयों के समूह पर स्वर्ण खादान वालों द्वारा आक्रमण,80 आदिवासियों  की मौत,……यह आक्रमण माह के अंत में, सुदूर ब्राजिल सीमा पर रहने वाले आदिवासी ‘यानोमामी’ समुदाय पर किया गया)।

भारत से भी एक उदाहरण लें—“The Muria don’t know anything about rape, as they say, their word for it is closer to ‘baalatkaar’ than anything else. But when four tribal girls were allegedly gang-raped by SPOs in the village of Samsetti in 2006, neither does the entire state machinery of Chhattisgarh”. ……अर्थात मुरियायों को बलात्कार के विषय में ज्ञान नहीं परंतु पुलिस कर्मियों द्वारा चार आदिवासी लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और छत्तीसगढ़ राज्य तंत्र द्वारा कुछ नहीं किया गया। ख़बर का उत्तरांश बड़ा भयावह है, जिसे कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं। इस तरह के खबरों की लम्बी फेहरिस्त है। कहना गलत न होगा कि,संपूर्ण जगत वैश्विक हुआ हो या न हुआ हो,परंतु आदिवासियों पर जुर्म एवं शोषण अवश्य वैश्विक हुआ है।

 स्थाई कुछ भी नही है। मध्यकाल में डायनासोर संपूर्ण पृथ्वी पर राज्य करते थे परंतु आज उनके अस्तित्व एवं अवशेषों की खोज की जा रही है। पूरे भारत पर शासन करने वाले मुगलों,अलाउद्दीनों के एवं सिकंदर लोदियों  के नाते-पोतों का कहीं अता-पता नहीं है।  न जाने कितनी ऐतिहासिक हस्तियां इतिहास हो गईं। यदि आदिवासियों में संविधान चेतस जागरुकता, शिक्षा के प्रति चाव एवं क्षेत्रीय कबिलाई मानसिकता से ऊपर उठकर लामबद्ध होना आ जाए, तो इससे निर्मित सात्विक क्रांति के प्रभाव से ज़ुर्म एवं शोषण के अस्तित्व को जड़ से मिटाया जा सकता है और सम्मानपूर्ण  जीवन की सुविधा अर्जित की जा सकती है।

  शिक्षित होकर, अपने इतिहास को सहेजने का वक्त भी यही, क्योंकि इस समय ऐतिहासिक नायकों, आंदोलनों एवं स्थानों को हथियाने की कोशिशें जोरों पर हैं।  इस पर एक दिलचस्प उदाहरण याद आ रहा है। सबको पता है कि भील एक बहादुर आदिवासी समुदाय है। इसी समुदाय का एक बहादुर सरदार पूंजा भील बहादुर योद्धाओं के साथ, महाराणा प्रताप सिंह का पग-पग पर साथ दिया। “भील जाति की पैदायशी गुण धर्नुधर होना, त्वरित गति से खबर पहुंचाना, मुंह से किलकारी या ढोल बजाकर सांकेतिक समाचार, देने आदि  का भरपूर लाभ राणा प्रताप को युद्ध के दौरान मिला। दर्रों की नाकेबंदी, छापामार युद्ध से मुगल सामग्री अपने अपने कब्जे में कर लेना, संकट के समय अन्न का प्रबन्ध करना, जंगलों एवं कंदराओं में प्रताप के परिवार की रक्षा करना आदि में भील सरदार की अप्रितम सेवाओं से प्रभावित होकर ही महाराणा प्रताप ने पूंजा भील को राणा के ओहदे से अलंकृत किया। आज के मेवाण राज्य चिन्ह में, सूर्य के चित्र के नीचे दोनों ओर प्रतिकात्मक रूप से, एक ओर महाराणा दूसरी ओर पूंजा भील और बीच में तीर -कमान का  चिन्ह है। राज्य चिन्ह पर लिखा गया वाक्य,’ जो दृढ राखे धर्म को, तेही राखे प्रतिपालअंकित है।” पिछले दिनों राजस्थान के राजपूत लाबी द्वारा, पूंजा भील को राजपूत साबित करने की भोथरी कोशिश जोर-शोर से शुरु की गई, परंतु ऐतिहासिक प्रमाण के आगे, उन्हें मुंह की खानी पड़ी। हालांकि आदिवासी प्रतीकों, साक्ष्यों, शब्दों एवं लोकविश्वासों के साथ मनमाना खिलवाड़ करने का सिलसिला अनवरत जारी है।

जिस तरह बेहतरीन इमारत, रचनात्मक और कल्याणकारी विचार व सिद्धांत एवं महत्वपूर्ण पेंटिंग आदि बनाने में वर्षों का श्रम, परंपरागत एवं आधुनिक ज्ञान के संयोजन एवं संयोग की आवश्यकता होती है, उसी तरह राग- रागनियों के विकास में भी अनवरत साधना एवं पहाड़ सी धैर्य की ज़रुरत होती है। आदिवासी जनों नें भी अनेक राग- रागनियों का विकास किया है, जिसमें पहाड़ सा ठहराव, झरने सी कलकल छनछन, नदी सी गतिशीलता, बसंती मादकता, चिड़ियों सी चहचहाहट एवं बादलों सा गर्जन है। किंतु जब व्यक्ति का ही मोल नहीं, तो इन राग- रागिनियों का संरक्षण तो दूर की कौड़ी है। वस्तुत: आदिवासियों के नष्ट होने के साथ मनुष्यता के विकास का मार्ग प्रशस्त करने वाले ज्ञान के ये आदिम उत्स भी नष्ट हो रहे हैं।  किसी संस्कृति का मरना एवं ललित कलाओं का मरना, एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षति है। यह समय का एवं हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस विडम्बना का साक्षी बनने को अभिशिप्त हैं।

 जहां एक तरफ इन राग ध्वनियों को सहेजने की कोशिश नहीं हो रही है, वहीं बचे लोकधुनों की चोरी कर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मंचों  पर वाह-वाही लूटी जा रही है व पुरष्कार जीते जा रहे हैं। सांस्कृतिक चोरी का यह माहौल लगातार बढ़ती जा रहा है। राजस्थानी लोकगीत ‘केशरिया बालम पधारो म्हारे देश’ गाने वाली बिरहन के विषय में किसी को ज्ञात नहीं है ,जैसा कि लोकगीतों की सामान्य विशेषता है। परंतु आज यह गीत राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोक प्रशंसा व नोटों की बौछार कर रहा है; इससे भारत की आतिथ्य प्रधानता को रेखांकित होती है। परंतु लोकगायकों की बेकदरी बदस्तुर जारी है। अभिजन कलाकारों द्वारा लोकगीतों का गायन उनकी विराटता का परिचायक है किंतु लोकगायक द्वारा ऐसे गीतों का गायन मूर्खता की श्रेणी में रखा जाता है। इस दोमुहेपन से  आदिवासी लोक धूनों की दुर्गति का परिवेश निर्मित हुआ है। इसी दुर्गति पर कवि रामजी यादव सवाल करते हैं —”……

                                 कितने किलोमीटर तक चला होगा इतिहास

                                     टूटी होंगी कितनी तलवारें   

                                     गढ़ा होगा कितना झूठ

                                     क्या इसीलिए इतिहास में मिलते हैं

                                     केवल लुटेरों के नाम कि सच कहने की हिम्मत

                                     नहीं थी इतिहासकारों में……”

आदिवासियों के असंतोष को बढ़ाने में इस तरह के शर्मनाक हरकतों की बड़ी भूमिका है। आलेख के प्रारंभ में जाहिर किया गया है कि समय का अंतर्विरोध वस्तुत: समयगत नहीं वरन मनुष्यगत है,जो वर्चस्ववादी मनोभूमि से पोषित और संचालित होता है। गलत हरकत, फितरती और वर्चस्ववादी लोग करते हैं और छूरी समय पर चल जाती है।  आवश्यकता है, इन नस्लवादी तिकड़मधर्मिता को समाप्त कर, एक समतावादी, मानवतानदी, एवं शिक्षित समाज की स्थापना करने की, जिससे समय गरिमामय हो सके। समय को ठीक करने की जिम्मेवारी उन पर है, जिनके पास हक-हकूक और अख्तियार है। सांम्प्रदायिकता से कोसों दूर प्रकृतिवादी आदिवासी समाज पर, समय को गौरवपूर्ण बनाने की ऐतिहासिक जवाबदेही का सही व़क्त भी यही है। जिस तरह से प्रकृति का क्षरण हो रहा है, उसे देखते हुए आदिवासियों की हर कोशिश सलाम करने लायक है। सभी सगाजनों को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। सभी को सेवा जोहार!

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