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आदिवासियत : एक यात्रा (पहली किस्त)

(अखड़ा राँची और औराविल फिल्म इंस्टिट्यूट की ओर से चौबीस दिवसीय  डॉक्यूमेन्ट्री रिट्रीट एंड वर्कशॉप “आदिवासियत” की यह रिपोर्ट केवल सिनेमा वर्कशाप की रिपोर्ट नहीं है बल्कि झारखंड के जन जीवन के विविध पहलुओं की व्यापक ग्राउंड रिपोर्ट भी है जिसे इस कार्यशाला की एक प्रतिभागी श्रद्धा ने लिखा है. रिपोर्ट की यह पहली किस्त है: सं.)

श्रद्धा श्रीवास्तव

अखड़ा राँची और औराविल फिल्म इंस्टिट्यूट की ओर से चौबीस दिवसीय, दिनांक 9/3/2026 – 2/4/2026, डॉक्यूमेन्ट्री रिट्रीट एंड वर्कशॉप “आदिवासियत” में जाना हुआ। बिरसा मुंडा के नाम से रांची एअरपोर्ट में उतरना ही इस भूमि में किये गए बार-बार हूल, मुक्ति संघर्ष की सार्थक परंपरा की याद दिला रहा था। आदिवासियत प्रकृति के साथ संतुलन, सामुदायिक जीवन, परम्पराओं और आत्मनिर्भरता पर आधारित जीवन दर्शन है। डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम हैं। कार्यशाला में दोनों संस्थानों के संचालक बिज्जू टोप्पो व रिबू लाहा शामिल हैं। प्रतिभागी विभिन्न पृष्ठभूमि व देश-विदेश से शामिल हुए। भोपाल से मैं, देहरादून से जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण और समाजशास्त्र के शोधकर्ता अमृता लाहा (Amrita Laha), तिरुपति से फिल्मकार, दिल्ली से सिनेमैटोग्राफर संकेत रे (Sanket Ray), राँची से एनिमेटर एवं 2डी आर्टिस्ट इशुराज उराँव (Ishuraj Oraon), पेशे से वकील अनुराग मलिक (Anurag Malik), प्रेस्ड बॉटैनिकल आर्टिस्ट अकाय झरिया टोप्पो, ऑस्ट्रिया से मार्कोस फ्राइमुलर (Markus Freimuller) भी शामिल हैं, जो एक इंजीनियर हैं और दर्शनशास्त्र के छात्र हैं।

अलग-अलग दिशा से आए प्रतिभागी अखड़ा रांची ही सीधे पहुँचे। कमरे में फोटोग्राफ्स, अवार्ड्स, पोस्टर्स और किताबें देखकर ख़ुशी हुई। आदिवासी सिनेमा और जनपक्षधर डॉक्यूमेन्ट्री परंपरा में मेघनाथ और बिज्जू टोप्पो का कार्य एक मिसाल है। दोनों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से आदिवासी जीवन, संघर्ष, विस्थापन, जल-जंगल-जमीन के प्रश्न और सांस्कृतिक अस्मिता को केंद्र में रखा है। उनकी दृष्टि केवल दस्तावेजीकरण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह एक प्रतिरोधी विमर्श का निर्माण करती है, जिसमें आदिवासी समाज स्वयं अपनी कहानी कहता है। अखड़ा में उनकी उपस्थिति और संवाद ने यह स्पष्ट किया कि सिनेमा केवल दृश्य माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप और वैचारिक प्रतिरोध का सशक्त औज़ार भी है।

यह वर्कशॉप केवल तकनीकी प्रशिक्षण के लिए नहीं थी, पर हाँ, कहा जा सकता है कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम हो सकी है। आदिवासियत दर्शन को जिया गया, महसूस किया गया। वर्कशॉप में मुंडा, उराँव और असुर समुदायों को करीब से देखा।

कार्यशाला के दौरान झारखण्ड के पाट इलाकों की यात्रा की गयी। झारखण्ड का मतलब ही होता है – जंगल-झाड़ वाला प्रदेश। पाट में बारिश खूब होती है। गर्मी में भी ठंडक बनी रहती है। दिन में धूप खाते, पर रात में ओढ़ने के लिए गर्म चादर जरूरी होती। लुपुनपाट, डोंगापाट, बरपाट, डूम्बरपाट, जूरिपोखर, टूटुवापानी व लुरगुरमी में ठहरना, वहाँ के रहवासियों के जीवन का अवलोकन किया गया। उनसे बेशुमार बातें हुईं। तस्वीरें, साक्षात्कार लिए गए।

रांची से चैनपुर बस से आए। चैनपुर में हमने अपना होटल में दोपहर का खाना खाया। अपना होटल के दीपक भाई जो सत्तू भरकर रोटी बनाकर हमें खिला रहे थे। खाते-खाते अचानक मेरी नज़र उनके हाथ पर गयी, तो वहीं ठहर गयी—मैं यह पूछे बिना नहीं रह सकी, आपकी हथेली को क्या हुआ? इस अधूरी हथेली और बिना पूरी पाँच अँगुलियों से आप कैसे भोजन बना पा रहे हैं? बस फिर क्या था, इस सवाल का जवाब मिला, पर बहुत लंबा-चौड़ा। इस बीच कोई “चिकन और चाहिए” की पुकार लगाता, तो कोई “और भात दे दो”, “अरे आलू की भुजिया और दे दो।”

दीपक ने बताया—आप यकीन नहीं करोगे, हमारे घर पर एक जिन्न का साया था। मेरी माँ पिता को भोजन करवा कर रवाना करती, तो वे फिर लौट आते और रोटी माँगते। माँ कहती—अरे अभी तो भरपेट खाकर निकले थे। ऐसा रोज़ होने लगा। माँ ने पिता से कहा—एक बार में नहीं खाते? पिता चकराए। माँ-पिता में लड़ाई होने लगी। पिता को शक होने लगा, मेरी माँ किसको खाना खिलाती है। माँ के साथ दादी थीं, उन्होंने कहा—तू ही तो लौट-लौट आता है, खाता है। अब घर चिंतित हो गया। चाचा को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने कहा—आने दो उसको, मार डालूँगा। उसके आने और चाचा के घात लगाए बैठे रहने पर उसने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया—हाथी से भी बड़े-बड़े पैर। चाचा डर के मारे बेहोश हो गए। फिर सब चुप। तभी गाँव में ओझा आए। उनसे यह बात बतायी गयी। उन्होंने शंखू नदी का जल लाने को कहा और घर में पानी छिड़कने को कहा। मंत्र-तंत्र से घर मुक्त हुआ और चूल्हे के पास से बम के गोले फूटे, छज्जा तोड़कर आसमान में विलीन हो गए। लेकिन हाथ? अरे उसी समय की बात है—मैं दो साल का रहा होऊँगा, मैं चूल्हे में गिर पड़ा था, पर जला नहीं, बस हाथ जल गया। हमारा घर उस साये से मुक्त हुआ। कैसे यकीन करूँ? पर दीपक के यकीन पर यकीन कोई न करे, ऐसा भी नहीं हो सकता। तो चैनपुर की इस कहानी से आदिवासियत की यात्रा शुरू हो गयी।

फिर चैनपुर से लुपुंगपाट के लिए एक पिकअप गाड़ी ली। गाड़ी खास थी—खास इसलिए कि कई रंगों वाली। रास्ता तो ऐसा था कि लग रहा था, मंज़िल आए ही न। फूल-फूल, फूलों की बारात—कचनार, पलाश, आम-मंजरियाँ, बाँस—सब अपने शबाब में थे। गुलमोहर जैसे बैंगनी फूलों की बहार थी। महुआ की मीठी बयार थी।

गाड़ी को देखकर कुछ लोग लिफ्ट लेने के लिए रोकते। ड्राइवर चाचा गाड़ी रोकते और सामने वाले से ही सवाल करते—गाड़ी वैसे ही इतनी लदी है, कहाँ बैठोगे? फिर उन्होंने हमसे कहा—गाड़ी रोकने से सामने वाला खुश हो जाता है कि देखो, गाड़ी ने हमें नज़रअंदाज़ नहीं किया।

गाँव पहुँचते ही गाँव वाले स्वागत के लिए पाँच-छह लोग आए। “जुहार-जुहार” कहते हुए सबने सबसे हाथ मिलाए।

लुपुंगपाट (दिनांक 10 मार्च 2026 – सुबह 17 मार्च 2026) – लुपुंगपाट में हम एक सप्ताह रुके। यह असुर आदिम जनजाति वाला इलाका है। वहाँ की ग्रामसभा ने आवास व खाने की व्यवस्था की। समूह को ITDA के सामुदायिक भवन में ठहराया गया। मुझे प्रफ्फुल और प्रदीप के घर ठहरने का मौका मिला। बरगद के पेड़ के नीचे बिज्जू टोप्पो ने कार्यशाला की रूपरेखा बतायी। निरंजन कुमार खुजूर, जो जाने-माने फिल्मकार हैं और लोहरदग्गा में प्रोफेसर हैं, दिन में रिसोर्स पर्सन के रूप में बातें कीं। उन्होंने अपने जीवन को खोला कि किस तरह Satyajit Ray Film and Television Institute ने उनके अपने होने को बचाया। यही रोशोमान, बैसैकिल थीफ, जापानी सिनेमा, फ्रेंच सिनेमा देखने के बाद सिनेमा का मतलब बदल गया। ऋत्विक घटक की फ़िल्म अजांत्रिक ने उन्हें अपने होने का अर्थ दिया। अब वह अपने आदिवासी होने को सेलिब्रेट करते।

शाम को उनकी बनाई कुछ फिल्में देखीं, जैसे पहाड़ा, दुर्गा। खासतौर पर ‘एडपा काना’ फ़िल्म का ज़िक्र करना चाहूँगी। फ़िल्म एक तनाव व द्वंद्व को दिखा पाती है। यह आदिवासी संघर्षों को किसी समाधान की दिशा में नहीं ले जाती, बल्कि उन्हें उनकी जटिलता में प्रस्तुत करती है—यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यह फ़िल्म विशेष रूप से इस बात को रेखांकित करती है कि एक ही जनजाति के भीतर सरना और ईसाई समुदायों के बीच कैसे एक अदृश्य, किन्तु प्रभावी दूरी निर्मित हो गई है। फ़िल्म का नायक अशोक जिस लड़की के साथ शहर में रह रहा है, प्रेम में है, उस प्रेम में धर्म आड़े आ रहा है। यहाँ प्रेम एक निजी भावना न रहकर, एक सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न बन जाता है।

इस सत्र के बाद लगा—‘आदिवासियत’ एक समग्र जीवन-दृष्टि है, जो प्रकृति, समुदाय और परंपरा के साथ गहरे संबंध पर आधारित है। यह केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि एक प्रतिरोधी चेतना भी है, जो मुख्यधारा के वर्चस्ववादी विमर्शों का प्रतिकार करती है।

कुछ तौर-तरीके भी उसी सहजता से सामने आए। हम गोलाकार में बैठे थे। एक साधारण-सी बात कही गई—“परिचय एंटीक्लॉकवाइज़ दीजिए।”

एंटीक्लॉकवाइज़ क्यों? हमें तो क्लॉकवाइज़ की आदत है। इस पर निरंजन ने मुस्कुराकर कहा—“आपको धीरे-धीरे पता चलेगा।” और सचमुच, धीरे-धीरे कुछ संकेत दे दिए—बस उतने ही, जितने समझ के द्वार खोल दें। यात्रा के अंत तक हम समझ गए थे—झारखंड की आदिवासी परंपराओं में वामावर्त (anticlockwise) केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक-दार्शनिक दृष्टि का हिस्सा है। यहाँ जीवन को सीधी रेखा नहीं, एक लौटते हुए चक्र की तरह देखा जाता है—जहाँ हर अंत फिर किसी आरंभ में खुलता है। वामावर्त उस चक्र की स्वीकृति है, प्रकृति की उसी लय में शामिल हो जाना है,

जिसमें ऋतुएँ लौटती हैं, मिट्टी से जीवन बार-बार जन्म लेता है।

वामावर्त दिशा को कई जगह पूर्वजों की दिशा माना जाता है। अनुष्ठानों में इस दिशा में चलना उनके प्रति श्रद्धा और संवाद का रूप है। इसमें पूर्वजों की एक शांत, अदृश्य उपस्थिति भी जुड़ी रहती है—जैसे वे इसी दिशा में हमारे साथ-साथ चल रहे हों और हम उनके साथ एक मौन संवाद में हों। इसके बरक्स, मुख्यधारा में प्रचलित दक्षिणावर्त (clockwise) एक व्यवस्थित, नियत, आगे बढ़ती रेखा का बोध कराता है, जबकि वामावर्त हमें ठहरकर, लौटकर, अपने भीतर और अपनी जड़ों की ओर देखने का अवसर देता है। मुझे याद आया—किसी ने बताया नहीं, फिर भी हम मंदिर की परिक्रमा क्लॉकवाइज़ ही करते हैं, फेरे भी उसी दिशा में लेते हैं।

इसलिए सरहुल, करमा, सोहराय जैसे पर्वों में, अखड़ा के नृत्य में, सरना स्थल की परिक्रमा में यही वामावर्त क्रम दिखाई देता है। पूरी यात्रा में हमने इसे घटित होते देखा। यहाँ तक कि पंगत में साथ बैठकर भोजन करते समय भी यह दिशा यूँ ही नहीं निभाई जाती—वह उनके भीतर की उस स्मृति और लय का हिस्सा है, जिसे वे जीते हैं, बिना कहे.

उनका एक आग्रह और था—आप शूट करने से पहले बोल दो, अनुमति ले लो, पेड़ से अनुमति लो, नदी में उतरने के पहले बोल दो। हमारे समाज में अनुमति का रिवाज़ है। पेड़ से अनुमति लो और यह वास्तव में आपको प्रकृति से जोड़ेगा। विनम्र होना पड़ेगा। ध्यान देना है—एंटी क्लॉकवाइज चलता है।

निरंजन का यह सूत्र कि—“मैं फिक्शन की लर्निंग को डॉक्यूमेंट्री में अप्लाई करता हूँ, यानी एस्थेटिक पार्ट में फिक्शन से लेता हूँ”—यही पर व्यक्ति की स्वतंत्रता और समुदाय की अपेक्षाओं के बीच टकराव को मैंने एक 12 वर्ष की किशोर अंजलि असुर में देखा। उसके अंदर पढ़ने की ललक थी और उसका समाज उसे रोक रहा था। लुपुंगपाट में विनीत असुर और अंजलि असुर हमारे ग्रुप में डॉक्यूमेंट्री वर्कशॉप में शामिल हुए थे। वे कैमरा चलाना सीख रहे थे। विनीत ने जहाँ पहले लोहा गलाने की भट्ठी हुआ करती थी, वहाँ सुरंगनुमा जगह में नीचे उतरकर फोटोग्राफी की। वह स्थानीय गाइड का भी काम कर रहे थे। खास रहा—हमने परंपरा से चली आ रही लौह गलाने के औज़ार व भट्ठी के अवशेष देखे। जाना गया कि कैसे लोहा बनाया जाता था।

इसी एक दिन रणेंद्र जी हमारे बीच थे। हिंदी साहित्य में आदिवासी विमर्श के जाने-माने लेखक हैं। वे प्रशासनिक अधिकारी रहे और आदिवासी इलाकों को घूम-घूमकर देखा, समझा। उनके ग्लोबल गाँव का देवता, गायब होता देश, गूंगी रुलाई का कोरस उपन्यास उनके इसी जीवन अनुभव से आए हैं।

उन्होंने बताया कि ट्राइबल इतिहास को कैसे पढ़ा जाना चाहिए और कैसे उसे लगातार बिगाड़ा भी गया। कैसे कई डायनेस्टी का राजपूतीकरण हुआ, कैसे आदिवासी देवी-देवताओं का ब्राह्मणीकरण कर दिया गया, कैसे उनकी लोकस्मृतियों को दूसरी कथाओं में बदल दिया गया। जो समुदाय अपनी धरती, अपने जंगल, अपनी परंपराओं के साथ केंद्र में था, उसे धीरे-धीरे पेरीफेरी में धकेल दिया गया।

जब वेरियर एल्विन की बात निकली तो उन्होंने टोका और तर्कसम्मत ढंग से बताया कि घोटुल संस्कृति को किस तरह गलत रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि बाहरी दृष्टि अक्सर आदिवासी जीवन को उसके संदर्भों से काटकर देखती रही है। डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के प्रमुख का दायित्व निभा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जनजातीय शोध संस्थान में डॉ. रामदयाल मुंडा जैसे लोगों ने महत्वपूर्ण दायित्व निभाए और आदिवासी समाज को उसकी अपनी दृष्टि से समझने की परंपरा विकसित की।

अपने ‘पाट’ के अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि वे फील्ड पर रहते थे, संचिकाएँ स्वयं लेकर जाते थे ताकि लोगों को दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। उन्होंने कहा—“मेरी लालच रहती थी कि वहाँ रात में रहेंगे तो कुछ कहानियाँ सुनने को मिलेंगी, जो शहरों में नहीं सुन पाते—पटना या रांची में नहीं। चीजें अवचेतन में बैठती गईं। मैंने कोई नोट्स नहीं लिए। काम करने गया था और पंद्रह-पंद्रह दिन लगातार गाँवों में रहता था। लेकिन जो आत्मीयता विकसित हुई, जब दिल से दिल का मिलन हुआ, उसने इस किताब को बनाया। यह किताब कोई एंथ्रोपोलॉजी की किताब पढ़कर नहीं लिखी जा सकती थी। उनके संघर्ष में जब तक आप शामिल नहीं होंगे, उन्हें सहयोग नहीं करेंगे, आप ऐसी रचना नहीं लिख सकते। मैं उनके लिए जो नहीं कर सका, जो मन में कचोटता रहा, वह इस रचना के तौर पर सामने आया। मेरा सौभाग्य है कि वे चीजें क्लिक कर गईं और हिंदी साहित्य में आदिवासी विमर्श को देखने का एक नया नज़रिया लोगों को मिला।”

हँसते हुए उन्होंने कहा कि अब उनकी किताब प्रेमचंद के साथ पाठ्यक्रम में लगी है।

उन्होंने कई डरावनी घटनाएँ भी बताईं। जैसे ‘मुड़ी कटवा’ की कथा—यह मान्यता कि धान के बीजड़े को मनुष्य के खून से सींचने पर फसल अच्छी होती है, इसलिए धान रोपने से पहले ‘मुड़ी कटवा’ लोग घूमते रहते थे। उन्होंने लाल देव जी से जुड़ी कथाएँ सुनाईं, एक गाँव का नाम कटिया क्यों पड़ा यह बताया, ‘उलट बग्गा’ की कथा सुनाई, जहाँ स्त्रियाँ बाघ बन जाती हैं—ऐसे अनेक मिथक और लोकविश्वास उन्होंने साझा किए।

गुंजन इरिक मुंडा ने हमें असुर, उराँव और मुंडा समाज में परलित संस्कारों के बारे में बताया। कहानी सुनायी। वो अपने पिता के देखे हुए सपने को जैसे साकार करने में रत दिखे। वो शोध कार्य में सलग्न हैं। उनके पिता पर हमने पिछले दिन ही बातें की थीं, फ़िल्म लोहरदगा में उन्हें देखा-सुना था। रामदयाल मुंडा झारखंड के दिउड़ी गाँव से निकलकर यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो तक पहुँचे, पर अपनी मिट्टी नहीं छोड़ी। लौटकर रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खड़ा किया और आदिवासी भाषाओं को सम्मान दिलाया।

वे केवल विद्वान नहीं थे, मांदर की थाप और लोकधुनों के रसिक भी थे। झारखंड आंदोलन को उन्होंने वैचारिक दिशा दी। दुनिया के मंचों पर आदिवासी समाज की आवाज़ बने। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित हुए। नाची सो बांची अर्थात जो नाचेगा वो बचेगा शीर्षक से फ़िल्म है। पता चला यह फ़िल्म उनके मरने के बाद बनी थी.

जब रणेंद्र जी, SDO पूनम कुमारी से बैठक चल रही थी, हमारे एक साथी विशाल के इस सवाल पर कि इस गाँव में ड्रॉपआउट किशोर बहुत सारे हैं और प्रशासन क्या इस पर अपनी नज़र रखता है, अंजलि का ड्रॉपआउटहोना सामने आया और तत्काल उसका स्कूल में, कस्तूरबा आवासीय गुमला में एडमिशन हो गया। उसने मेरे कान में धीरे से कहा—घर की कलह से वास्तव में वह कहीं भाग जाना चाहती थी, और यह पढ़ने का अवसर उसके लिए जीवनदान जैसा है।

उसी शाम हमें सरिता करकेट्टा ने चाय पर बुलाया। चाय के साथ चावल के चीले व देसी चने की सब्जी थी। यह वही घर है जहाँ जसिंता करकेट्टा रुकती हैं, और जसिंता की डायरी वाले पेज सजीव हो उठे, जिसे पत्रिका साइकिल में मैं पढ़ती हूँ। इस यात्रा में जसिंता की ईश्वर और बाज़ार किताब मेरे साथ है। जिस माटी से वे कविताएँ उपजी हैं, वहीं उस कविता का आस्वादन एक अलग ही अनुभव है, जो मैंने लिया। सरिता अस्सी के दशक भारतीय हॉकी टीम की खिलाड़ी रही हैं।

एक बात बेहद अखरती रही—मडुआ, मक्का उनके अनाज-गृह में तो हैं, पर उनकी रोज़ की भोजन की थाली से गायब हो चुके हैं। तेल, साबुन, चिप्स, मैगी आदि के लिए मडुआ की बोरी औने-पौने दामों में बेच देते हैं। मक्का बारह रुपए किलो में बेच देते हैं। लोहा-लंगड़ बटोरकर, उसके बदले आइसक्रीम के मज़े लेते हुए छोटे बच्चों को देखा गया।

एक सुबह हमारे ग्रुप के साथी अनुराग दातून की तलाश में बाहर घूम रहे थे कि करंज का पेड़ कौन-सा है, करंज की दातून कहाँ से मिले। अनुराग का कहना था—यहाँ ब्रश और पेस्ट बहुत ही गैरज़रूरी लग रहे हैं। मेरा मन नहीं हो रहा अपने दाँत उनसे साफ करूँ। कुछ देर बाद उसके हाथ में दातूनका एक बण्डल था। उस दिन से अनुराग की देखा-देखी सबने दातून ही की, जब तक वहाँ रहे तब तक की।

(इस रिपोर्ट की अगली किस्त आने वाले शुक्रवार को प्रकाशित होगी.)

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