“यह थी भूमिका हम-तुम मिले थे जब” मुक्तिबोध स्मरण (जन्मदिन 13 नवम्बर)

जनमत शख्सियत स्मृति

मुक्तिबोध और उनकी कविता के बारे में लोग कहते हैं कि वो विकल-बेचैन, छटपटाते कवि हैं. लेकिन देखिये तो दरअसल, मुक्तिबोध कविता की विकलता के रचनाकार हैं. जो बेचैनी, विकलता उनके यहाँ आपको दिखती है यह उनकी नहीं, सही अर्थों में वह उनके समय की कविता की बेचैनी है. ये बात मैं कह रहा हूँ तो अपनी इस बात को साफ करने के लिए उन्हीं की कविता की पंक्तियाँ आप देखिये-

“नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नहीं होती
कि वह आवेग-त्वरित काल-यात्री है.
व मैं उसका नहीं कर्ता,
पिता-धाता
कि वह कभी दुहिता नहीं होती,
परम स्वाधीन है वह विश्व-शास्त्री है.
गहन-गंभीर छाया आगमिष्यत की
लिये, वह जन-चरित्री है.
……….
कि मैं अपनी अधूरी बीड़ियाँ सुलगा,
खयाली सीढियां चढ़कर
पहुंचता हूँ
निरखते चाँद के तल पर,
अचानक विकल होकर तब मुझी से लिपट जाती है.”

मुक्तिबोध कहते थे कि मैं हर तरह से केवल एक बात लिख रहा हूँ, कविता लिख रहा हूँ तो, कहानी लिख रहा हूँ तो, साहित्यिक टिप्पणी लिख रहा हूँ तो और आलोचनात्मक निबंध लिख रहा हूँ तो, केवल एक बात मुझे कहनी है और वह एक बात वही जो कई लोगों ने दुहराई है-

“कि सारे प्रश्न छलमय
और उत्तर और भी छलमय
समस्या एक
अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में
सभी मानव सुखी, सुन्दर व शोषणमुक्त कब होंगे!”

और ये ‘कब’ केवल कवि की नहीं, हमारे समय की बेचैनी है. उस समय की कविता बेचैन है, और उस कविता की बेचैनी मुक्तिबोध लिख रहे हैं.

मुक्तिबोध की समझ या मुक्तिबोध की रचनाधर्मिता की दृष्टि क्या है?

आज़ादी आ रही है, एक उदार संसदीय जनतंत्र इस देश में आ रहा है. मुक्तिबोध उस उगते सूरज के भीतर स्याह धब्बे, विकराल विवर, दरारें देख रहे हैं। उसके इस रोग लक्षणों को पहचान रहे हैं कि इसका परिणाम क्या होने वाला है और इसका अवसान कैसे होने वाला है. कहाँ यह अस्त होने वाला है. और यह आज़ादी कितनी हमारी और कितनी दूसरों की है.

कविता की जिस विकलता को देख रहे हैं तो वो यह देख रहे हैं कि यह तो समाज की विकलता है और सोचते हैं कि आखिर उसमें इतनी विकलता क्यूँ है. ये मोहभंग वंग शब्द मुझे बहुत जंचता नहीं है. उनके लिए मोहभंग क्या है. वो अपने समय और समाज को बहुत गहरे देख रहे थे. देखिये तो नेहरु को लेकर मुक्तिबोध में कोई मोह नहीं था. ‘कुछ तो कर रहे हैं’ ये शब्दावली है मुक्तिबोध की नेहरू के लिए. देखना चाहिए कि कविता और आलोचना से बाहर एक और काम किया है मुक्तिबोध ने वो काम है पत्रकारिता का.

साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनितिक, आर्थिक विषयों पर लेख और टिप्पणियां लिखीं और विदेश नीति पर सबसे ज्यादा लिखा है. उसमें दो लेख उनका पढ़ा जाना चाहिए. वे लेख आज़ाद भारत में विदेशी (ब्रिटिश-अमरीकी) पूंजी की आती बाढ़ को लेकर हैं. वह पूरा विश्लेष्ण पढ़िए, उसमें वे कहते हैं कि नेहरु के समाजवाद कहे जाने वाले पंचवर्षीय योजनाओं के दौर में ये हो रहा है, साम्राज्यवादी पूँजी आ रही है. तो केवल कविता में ही नहीं, वैचारिक, आर्थिक, राजनितिक दुनिया में भी जब वे देखते थे, तो नेहरु के प्रति, उनके विचारों के प्रति कोई मोह मुक्तिबोध में नहीं दीखता. तो जब किसी किस्म का कोई मोह ही नहीं है फिर तो मोहभंग का सवाल ही नहीं उठता.

हमारे यहाँ पूर्वांचल में लोग कहते है कि एक चांदनी ऐसी उगती है कि 12 बजे रात को ही लगता है जैसे सवेरा हो गया हो. उसे मकर चांदनी कहते हैं. तो वो हमारी आज़ादी मकर चांदनी सरीखी थी लेकिन थी आज़ादी ही, गुलामी नहीं. मुक्तिबोध इस नारे के साथ भी नहीं थे कि ये आज़ादी झूठी है. झूठी नहीं थी. ऐसा मानने वालों ने बाद को बदल लिया अपना हिसाब किताब. तो वो कहते थे कि आज़ादी जिस भी रूप में और जितनी भी है, है तो आज़ादी मगर मकर चांदनी सरीखी है-

“धरती की आँखों के सम्मुख अब
असंभव कि आगे आय
सूना वह हिस्सा जो पिछला है चन्दा का
अगला न हुआ हिस्सा वह
चाहे वह पूनो हो, मावस हो
तो अन्यों के नेत्रों से ओझल वह
आत्म-संज्ञ निज-संविद निज-चेतस
सूना वह गोल सिफ़र
बाहर पर, धरती पर फैलाये छिटकाये चाँदनी
तो कृत्रिम-स्मित मुस्काते चन्दा-सा
शब्दों का अर्थ जब;”

तो शब्दों का अर्थ जब ‘कृत्रिम-स्मित मुस्काते चन्दा-सा’ हो जाय तो कविता का काम क्या होता है; यही न कि उसकी असल को, धरती की आँखों से छिपे उसके सच को कैसे सामने लाया जाए. मुक्तिबोध की कविताओं से गुज़रते हुए आपको बारहा ये लगेगा कि उस ‘गोल सिफ़र’ चन्दा का सच सामने लाने-दिखाने के लिए ही वे आधुनिक विज्ञान, गणित और ज्यामितिक की ओर जाते और उसकी भाषा को अपनाते हैं, बल्कि इससे भी कहीं अधिक अर्थ इन पंक्तियों में हैं जो उस भाषा को अपनाए बगैर -स्वतान्त्रोत्यर भारत में विकसित होते नए यथार्थ समेत- समकालीन पूंजीवाद के यथार्थ का उदघाटन शायद संभव ही न हो।

आज अर्थव्यवस्था स्वयं को एक तरह से ‘विज्ञान की नई रानी’ कहलाने में सफल हो रही है। पूंजीवाद ने अपने को ‘आर्थिक-धर्मराज्य’ के रूप में निर्मित किया है और राजनीति और विज्ञान को खुद के अधीन कर लिया है। धर्म के ईश्वर और दर्शन के ईश्वर की मौत हो चुकी, जो शेष है वह अर्थशास्त्रियों का ईश्वर है। आर्थिक-धर्मराज्य की समाप्ति अनिवार्य आवश्यकता बन गई है.

हमारे समय का यह कठोर सच है कि इन पूंजीवादी विशेषताओं से जीवन का कोई इलाका बचा ही कहां है- ‘धन-अविभूत अंतःकरण’ में ‘‘टूट-फूट, टूट-फूट, सब अस्त-व्यस्त।’ लेकिन इसे छुपाने और खुद को बचाये रखने के लिये पूंजीवाद अपने अंतर्विरोधों को ढंकने के लिए फंतासी भी रचता है।

पूंजीवादी जनतंत्र स्वयं को राजनितिक पदवी का एकमात्र उत्तराधिकारी होने का दावा करते हैं। आज कहा जा रहा कि नवउदारवाद ने दुनिया को बहुत नुक्सान पहुंचाया है और कि उसके दिन अब लद गये। साथ ही आज दुनिया में अनुदार कहिये, फासीवादी या अधिनायकवादी कहिये प्रवृत्तियाँ सर उठा रही हैं।

दरअसल, यह पूंजीवाद जो संकट के अन्दर संकट की व्यवस्था है, ये दोनों ही उसके भिन्न लेकिन अभिन्न रूप से जुड़े गतिपथ हैं।

मुक्तिबोध की कविता उस आज़ादी के भीतर समाते जाते इन रोग लक्षणों की शिनाख्त है. उसका रोग देख लिया उन्होंने कि इसका क्या होने वाला है.

मुक्तिबोध ने देखा ‘पृथ्वी पर कहीं उदार चेतानाध्यक्ष की हत्या होते’, देखा लोग अपने नवजात शिशुओं को फेंक रहे हैं. जिसे वो अचेतन के अटाले में डालना कह रहे थे. देखते हैं मुक्तिबोध कि नदी के किनारे, तालाब के किनारे, कुँए की मुंडेर पर, कचरे के ढेर में बच्चे फिंके-छिपाये मिल रहे हैं. आप भी ऐसा देखते-सुनते होंगे आज भी. बात यहीं नहीं रुकती। मुक्तिबोध लाभ-लोभ के फेर में लोगों को अपने भीतर पैदा हुए नए अनुभवों के साथ भी यही सुलूक करते पाते हैं. मुक्तिबोध इस प्रक्रिया को अचेतन के अटाले में फेंक देना कहते हैं। अपनी कविताओं में वे अचेतन में फेंक दिए जा रहे ऐसे ही नये अनुभवों को अनुभाव बालक कहते हैं. खुद से और हमसे-आप से, सबसे पूछते हैं आखिर किससे भय खाकर ये लोग आत्मोत्प्न्न सत्य को फेंक रहे हैं? किस महा कंस से भय खाकर वासुदेव पैदा हुए बच्चे को लेकर यमुना पार कर रहे हैं? कौन सी क्रांति करने वाला था यह बालक? आज स्थिति और कठिन और दृश्य और भयानक हो चले हैं. हमे अपने मन से सवाल करना चाहिए कि कैसा बना दिया गया है हमारा समाज. भय इतना कि एक-दूसरे से बात करते लोग इधर-उधर देखते हुए बात करते हैं कि कहीं ऐसे लोग तो नहीं खड़े हैं आसपास जो भागवादारियों के साथी हैं. हमारे समय को भय से भर दिया गया है. भय को कल से कहीं और और अधिक सत्ता-संरक्षण का हथियार बना दिया गया है. भय, लाभ-लोभ पर आधारित समाज चल नहीं सकता। वह देश और समाज का विनाश तो कर सकता है, उनका विकास नहीं कर सकता.

मुक्तिबोध इस सबको भी देखते-समझते और इसके गहरे निहितार्थ निकालते हैं. मुक्तिबोध अपने अंतर्विरोधों को ढंकने के लिए पूंजीवाद द्वारा रची जा रही फंतासियों का जाल काटने के लिए प्रति-फंतासी, प्रति-स्वप्न की रचना करते हैं- ‘उनके सपनों में घुस कर/ मुझे स्वप्न आते.’
मार्क्स ने इस तथ्य की ओर पहले ही ध्यान आकर्षित किया कि फ्रांसीसी क्रान्ति के राजनीतिक निदेशकों- आज़ादी, समानता और बन्धुत्व- को पूंजी और निजी स्वार्थ द्वारा बदल दिया गया है। ‘इन राजनीतिक-आर्थिक निदेशकों ने बंधुत्व के विचार-भाव को नकार दिया है और आज़ादी और बराबरी के क्रांतिकारी चरित्र को आत्मबद्धता, खुदगर्जी के जरिये परिसीमित कर दिया है।‘ इस नाते सामाजिक सबंध बिखर गये हैं और अस्त-व्यस्त हो गए हैं। मनुष्य की आत्मबद्धता, आत्ममोह- जिसे ही ऊपर उद्धरित ‘आत्म-संज्ञ निज-संविद निज-चेतस’ कविता-पंक्ति संकेतित करती है- को ख़त्म करने की ओर जाना एक बेहतर दुनिया बनाने की ओर बढ़ना मनुष्यता की अनिवार्यता बन गई है। इसका मतलब यह कि व्यक्ति को अहं और राजनीति को निजी स्वार्थ से वियोजित, अलग करने का अनिवार्य और महती काम हमारे सामने पड़ा हुआ है।

पूंजीवाद व्यक्ति को आत्मबद्ध (narcissistic) जानवर के अलावा और किसी रूप में नहीं देखता है, मार्क्सावाद और मनोविश्लेषण इसे उद्घाटित करता है कि क्रांतिकारी राजनीति का विषय एलियानेटेड (अलगाव में पड़ा) प्राणी है, जो अपने घनिष्ठ अभ्यंतर में अपने ‘अन्य’ को समाविष्ट किये हुए है, जो अपना समग्र तौर पर वस्तुकरण किये जाने के खिलाफ विद्रोह करता रहता है। यह समाविष्टि ही एक आत्मबद्धता से मुक्त प्यार, साथ ही उस सामाजिक सम्बन्ध, जो आत्मबद्धता पर आधारित नहीं है, का मुख्य लक्षण या विशेषता है. मार्क्स ने जिसे ही कम्युनिस्ट समाज में स्वतन्त्र व्यक्तियों के सम्बन्ध के रूप में वर्णित किया है. यह तभी संभव है जब आत्म का एक भौतिकवादी सिद्धांत भाववादी सिद्धांत को अपदस्थ कर दे, जिसके जरिये ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था राजनीति और समग्र सामाजिक सम्बन्ध को अपना बंधक बनाए हुए है। केवल तभी राजनीति आधुनिक विज्ञान के समकाल में लगातार बनी रहेगी और दोनों समान संसार के वाशिंदे बने रह सकेंगे।’

“यह जीवन-जगत समाज और वर्ग और परिवार के भीतर पायी जानेवाली मानव-स्थिति और मानव-संबंधों और मानव-प्रयत्नों द्वारा अर्जित परम्परागत ज्ञान या मिथ्या ज्ञान (शब्द पर जोर हमारा) से बना हुआ होता है। मन के तत्व जीवन-जगत के दिये हुए तत्व हैं।“ (मुक्तिबोध रचानावली, खंड पांच, पृष्ठ 108)
आइन्स्टीन का एक कथन है- ‘जिस चेतना, समझ या दृष्टि ने समस्या पैदा की है, आप उसी चेतना के ज़रिये उसका समाधान नहीं कर सकते, आपको दुनिया को एक नई नज़र से देखना सीखना होगा.’
मुक्तिबोध ने अपने लिये यही भूमिका तय की थी, अपने जीवन, रचना-आलोचना और वैचारिक राजनितिक लेखन के लिए। इसी में साझेदारी के लिए उनका समस्त जीवन और रचनात्मक कर्म हमसे-आपसे संवाद करने की आत्मीय-आकुलता से भरा हुआ है-
“हमें था चाहिए कुछ वह
कि जो ब्रह्माण्ड समझे त्रस्त जीवन को
……..
हमें था चाहिए कुछ वह
कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले.
नया दिक्काल-थियोरम बन,
प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण
मन का
कि जो गहरी करे व्याख्या
अनाख्या वास्तविकताओं,
जगत की प्रक्रियाओं की।
…….
यह थी भूमिका हम-तुम मिले थे जब।“
(नक्षत्र-खण्ड, मुक्तिबोध रचानावली, खण्ड 2)

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