समकालीन जनमत
कविता

सुमन कुमार सिंह की कविताएँ वंचित तबकों का यथार्थ बयान करती हैं

अवंतिका सिंह


सुमन कुमार सिंह की कविताएँ समकालीन भारतीय समाज का दर्पण हैं। इन कविताओं के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं, आम आदमी की पीड़ा और संघर्ष को लिखा गया है।

इन कविताओं में प्रतिरोध का स्वर मुखर होकर सामने आता है।
कविता ‘झुनझुना देश’ पांच भागों में लिखी गई है जो देश की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषमताओं का चित्रण करते हुए बताती है कि कैसे लापरवाही, उपेक्षा, भूख, गरीबी के कारण यह देश ‘बूड़ेगा’ अर्थात डूब जाने की बात कहती है।

बच्चों की भूख, उनके भविष्य की उपेक्षा, बाजारवाद, सत्ता के छल की पूरी त्रासदी को उजागर करती है।
यह देश को चेतावनी और सुधार की सलाह देते हुए आत्म मंथन से भरी कविता है।

‘क्या कर लोगे’ कविता प्रश्न करती है कि जब तक हम कन्वेंट संस्कृति और अंग्रेज़ी वर्चस्व में उलझे रहेंगे तब तक न साहित्य की गहराई बचेगी और न ही भाषा। यह कविता भाषा का शोकगीत नहीं बल्कि संस्कृति पर मंडराते संकट और उपभोक्तावादी आधुनिकता के खोखलेपन को दर्शाती है।

..क्या कर लोगे ‘भाव’ बता के
क्या कर लोगे ‘मरम’ बता के
कान्वेंट की हुकुम बजाओ
सरजी डेली दिवस मना के !

‘सुनो भारत माता’ कविता उन सत्ता-धारियों की पोल खोलती है जो राष्ट्रवाद और देशभक्ति की दुहाई देकर जनता को धोखा देते हैं। यह कविता बताती है कि देश को सबसे बड़ा ख़तरा बाहर से नहीं, बल्कि देश के अंदर फैली अव्यवस्था से है। इसमें यह संदेश छिपा है कि सही अर्थ में देशभक्ति नारे लगाने में नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और ईमानदारी से काम करने में है। सुमन कुमार कहते हैं –
सुनो भारत माता!
‘मैं देश नहीं झुकने दूँगा
मैं देश नहीं मिटने दूँगा’
भारत माता
सुनो मदारी कहता है
आँख नचाये उँगली ताने
गुर्राता है
मैं देश नहीं बँटने दूँगा।

‘इन दिनों’ शीर्षक से कविता में सुमन कुमार छल, दिखावे और दमन से भरे माहौल को लिखते हैं। जहाँ असत्य को सत्य की तरह पेश किया जाता है और मनुष्य (प्रजा व चिड़िया) धीरे-धीरे अपनी अस्मिता और जीवन शक्ति खोता जाता है। यह कविता सामाजिक चेतना को झकझोरने वाली है और मानवीय मूल्यों के आधार पर सोचने को मजबूर करती है।

..कोई किसी से अंजान न था
सबने खोल रखे थे
दस दरवाजे अपने-अपने
आदमी जितना आदमी को ठग रहा था
उतना हीं जानवरों को
उतना हीं पखेरुओं को
उससे कहीं अधिक खुद को भी।

‘दे धक्का’ कविता सामूहिक प्रयास और जीवन-गति के महत्व को उजागर करती है। यह प्रेरणा देती है कि कठिनाइयों को केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि साझा सहयोग और एकजुटता से पार किया जा सकता है। इस अर्थ में यह कविता आशावादी, और सामूहिक चेतना की वाहक है।

गाड़ी फँस गई
पीड़ा बढ़ गई
आ धसक जाने से पहले
दे धक्का
दे धक्का
कि हिचकोले ले
चल निकले अब
शर्माये गड्ढे का मुँह छोड़ खुला
थोड़ा तुम
मैं थोड़ा
लग-भिड़कर
गति जीवन की पा लें
दे धक्का
अपनी गाड़ी खींच बढ़ा लें !

‘प्रेम करने की शर्त’ कविता में सुमन कुमार प्रेम को केवल रूमानी भाव से नहीं देखते हैं बल्कि उसे सामाजिकता, लोकसंस्कृति और मर्यादित शर्तों के साथ जोड़ते हैं। कविता में ग्रामीण परिवेश की स्मृति और प्रेम का यथार्थ चित्रण है। इसमें मासूमियत और सामाजिक बंधन दोनों साथ-साथ मौजूद हैं।

..जिन दिनों प्यार करना था
एक शर्त हुआ करती थी
जिन दिनों प्यार करना था
गाँव की सड़कें सूखी नहीं होती
कभी कोई पजामें को उठाता-सँभालता
कोई सलवार को
कीचड़ सबकी सामत हुआ करती
जिन दिनों प्यार करना था।

‘ये मैंने क्या समझा’ एक ऐसी कविता है जो विकास, तकनीक, युद्ध और मनुष्य की सुरक्षा के जटिल समीकरणों को सवालों के रूप में प्रस्तुत करती है। जो भ्रम और यथार्थ के टकराव पर आत्मचिंतन के लिए विवश करती है।

मैं गाँव में था और तुमने कहा
पूरी दुनिया एक गाँव हो गई
जब मैं शहर आया तुमने कहा
निठल्ली भीड़ स्वयं में एक खतरा है
उन्हीं दिनों
होड़ थी ज्ञान और तकनीक की
उन्हीं दिनों नाम मिला
पति-पत्नी व बच्चों को परिवार का
उन्हीं दिनों घटाया गया आयतन
हृदय क्षेत्र का
तब छुपता गया गाँव
स्मृतियों की खोह में
तब सीमाओं के पार जाने के क्रम में
बेहिसाब आकांक्षाएँ बनी रही मित्रवत
तब जितना पतझड़ वसंत भी उतना हीं लुभाता रहा
मैंने समझा हासिल ज्ञान , तंत्र का स्रोत बनेगा
तुमने गोले दागे टैंक दौड़ाये
सीमाओं पर कब्जे जमाये
मैंने समझा सुरक्षित हूँ मैं
ये मैंने क्या समझा…
कठिन है उत्तर देना खुद को !

सुमन कुमार ‘नीचे गिरना’ शीर्षक से लिखी कविता में आधुनिक समाज पर तीखा प्रहार करते हैं। यह कविता मानवता के प्रत्येक स्तर पर गिरावट की गवाह है। कवि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज अर्थव्यवस्था, नैतिकता, संबंध, भाई चारे और सुरक्षा जैसे जरूरी मुद्दों का इतना ज्यादा पतन हो चुका है कि उसे केवल नीचता कह देना पर्याप्त नहीं है। यह कविता मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की ओर प्रेरित करती है।

गिरने की अनचाही क्रिया
अपनी सीमाएँ लाँघती
लुढकती जा रही है
गिर रहा बाजार तेज़ी से
रुपये की औकात गिर रही
नैतिकताएँ हर रूप में गिरती जा रहीं
गिरते जा रहा आदमी लगातार
अब मोहल्ले-दर-मोहल्ले
सनसनी फैला रही खबरें
रात अँधेरे दरवाजे खटखटाने की
गोली दाग कर भाग जाने की
चाकू गोदकर भाग जाने की
घर बना लेने की, घर ढूँढने की
और घर बदर कर देने जैसी
सारी खबरों में बसी है दुर्गंध
आदमी गिरते जा रहा इतना
कि अब इसे नीचता कहना
संभव नहीं हो पा रहा मुझसे ।

‘वक्त करे आखेट’ कविता में आम आदमी की वेदना का चित्रण है। कविता किसानों और वंचित तबके के लोगों के संघर्ष की मार्मिक गाथा कहती है। यह उनके जीवन और व्यवस्था के कठोर यथार्थ पर सीधी चोट करती है।

वक्त करे आखेट है भाई ,
दुश्मन अपना पेट है भाई।
तेरे मन की लिखा करूँ
कोरी मेरी स्लेट है भाई ।
बनने से पहले बिखरे ये
घर मेरा या प्रेत है भाई ।
तूफां से बच पाये कैसे
मुट्ठी-मुट्ठी रेत है भाई ।
हाँ किसान हूँ सपने मेरे
कट्ठा-कुट्ठी खेत हैं भाई ।
मूल नहीं ‘वो’ सूद चढ़ाए
ऐसा धन्ना सेठ है भाई ।

कविता ‘शुभ अवसर’ में सुमन कुमार कहते हैं कि जब हम औपचारिकताओं में उलझ जाते हैं तो रिश्ते केवल दिखावे और तीज त्योहारों तक सीमित रह जाते हैं। उनमें घुली मिठास और प्रेम का भाव खत्म हो जाता है।

मेरे यहाँ मैं
तुम्हारे यहाँ तुम रह जाओगे
अक्सर हम अवसर तलाशते फिरेंगे
और एक दिन सारे रिश्ते
सारे त्योहार सारे उत्सव रह जाएँगे
अवसर विशेष भर..

सुमन कुमार की कविता ‘उत्सवधर्मी देश’ आधुनिक भारतीय समाज और उसकी बदलती प्रवृत्तियों पर एक गंभीर कटाक्ष प्रस्तुत करती है। कवि ने व्यंग्य और यथार्थ का सहारा लेते हुए यह दर्शाया है कि कैसे हमारे देश में हर अवसर एक उत्सव बनकर रह गया है। कविता में तीखा व्यंग्य तब दिखता है जब सुमन कुमार लिखते हैं कि – “सरकारी इश्तेहार से पहले केस हो गया।” यह वर्तमान राजनीति और सामाजिक व्यवस्था की खामियों पर सीधा प्रहार करती है, जहाँ नीतियों और घोषणाओं से ज़्यादा विवाद का माहौल दिखता है।
हर अवसर विशेष हो गया ,
उत्सव धर्मी देश हो गया ।
चाट चाउमिन गोलगप्पे से ,
भरा पूरा परिवेश हो गया।।

 

 

सुमन कुमार सिंह की कविताएँ

1. झुनझुना देश

(एक )

डोंगियाँ बचाएँगी कुछ देर
कुछ देर बेड़ें बचा लेंगे
पहरुए भी कुछ बचा हीं लेंगे
गोताखोर मुस्तैद रहेंगे
फिर भी बुड़ेगा देश
अपने पाँव के नीचे की गहराई को
नकारता यह देश
बुड़ेगा जरूर

(दो)

झिझकता
मुँह बिचकाता बच्चा
सूखे निचुड़े प्राण-पयोधर
झटक रहा बार-बार
माँ कहाँ से जुटाए रक्त
कैसे पिलाये दूध
भविष्य को भूख के सहारे छोड़
उड़ते रहोगे तुम सब
जरूर बुड़ेगा देश

(तीन)

उस नवहे से आँख चुराना
महँगा पड़ेगा
जिसने पढ़ा प्रेम रटी रोटी
खेत से घर तक
बोयी उम्मीदें
ईश रसपगी गोलियाँ
सुला देंगी अटूट नींद
तुम तंद्रा में तड़पोगे
बुड़ेगा देश

(चार)

हालहीं में बुजुर्गों ने पाया
कि नौनिहाल यंत्रों में बदल रहे
कि किलकारियाँ सिर्फ
कुहराम-सी रह गईं
कि झुनझुनेवाले खप गये
शहरी मेगा मार्केटों में
खेलो, खूब खेलो
झुनझुना बने इस देश से
तुम्हारा जी भर जाएगा
टूटेगा देश चूरचूर
बुड़ेगा देश एक दिन

(पाँच)

किताबें न होंगी
स्लेट तो कबकी टूट गई
छुरियाँ रहेंगी
धड़क न रुके इसलिए
हृदय टटोला जाएगा
देवता रहेंगे
देने को जन्म लेने को प्राण
यह देश कभी इस हाथ
कभी उस हाथ बजता रहेगा
झुनझुन झुनझुन झनर झनर झन
तुम ले बुड़ोगे
बुड़ेगा देश जरूर ।।

 

2. क्या कर लोगे

संस्कृरत औ’ हिंदी वाले
अरबी वाले सिंधी वाले
अंगरेजी की उतरन ओढ़े
पाई वाले बिंदी वाले

क्या कर लोगे पाठ पढ़ा के
क्या कर लोगे सिर सहला के
आदम को रचने के साँचे
ले भागे वे सब बहला के

ना पैदल दोपहिया वाले
शिष्य हुए चौपहिया वाले
इंग्लिश-विंग्लिश पढ़ा करो
तुम नये मसौदे गढ़ने वाले

हिंदी-विंदी के चक्कर में
रोटी भी लुढकी गट्टर में
ये हिज्जे-हुज्जत की भाषा
रही आस बस यूएनओ में

ना ‘केदार’ ‘तिरलोचन’ बोले
आँख न ‘बाबा नागा’ खोले
ना ‘महबीरी’ ना ‘रघुवीरी’
हिंगलिशिया सिर चढ़के बोले

निचुड़ा खूँ का कतरा-कतरा
देह का सूखा कोना-अँतरा
हो निढाल पड़ जाता ये मन
नहीं फिकर न कोई खतरा

क्या कर लोगे ‘भाव’ बता के
क्या कर लोगे ‘मरम’ बता के
कान्वेंट की हुकुम बजाओ
सरजी डेली दिवस मना के !।

 

3. सुनो भारत माता

‘मैं देश नहीं झुकने दूँगा
मैं देश नहीं मिटने दूँगा’
भारत माता
सुनो मदारी कहता है

आँख नचाये उँगली ताने
गुर्राता है
मैं देश नहीं बँटने दूँगा
धरती माता
जंगी बेड़ों का सौदागर कहता है

जन मन को बहला-फुसला कर
जाग चुराये
टेर लगाये
मैं देश नहीं लूटने दूँगा
माँ
सुनो लूटेरा कहता है

बारुदी करुणा की जद में
देश धर्म की गाय दूहते
द्रोह सबों पर थोप रहा
मैं देश नहीं बँटने दूँगा
माँ सुनो
कापालीक कहता है !

 

4. इन दिनों

कोई किसी से अंजान न था
सबने खोल रखे थे
दस दरवाजे अपने-अपने

आदमी जितना आदमी को ठग रहा था
उतना हीं जानवरों को
उतना हीं पखेरुओं को
उससे कहीं अधिक खुद को भी

आये दिन
स्वांग रचाने लगता कोई न कोई
राजा का
प्रजा को ऐसा नहीं करना पड़ता

खून से लतफथ तीर पर
टाँगे चिड़िया ,राजा
प्रश्नोत्तर की मुद्रा में
लगाता हाँक
‘मितरों…,
ये चिड़िया सुनहरी हो रही है कि नहीं ?
गौर से देखिए इसके पंख
क्या कभी इतने चमकिले
दिखते थे ..?’

जिनकी तालियों में ज़ुबान थी
उनके गले पर
कसते जा रहे थे
असंख्य हाथ
संघिताओं वाले
चिड़िया व प्रजा दोनो
दम तोड़ रहे थे धीरे-धीरे ।

 

5. दे धक्का

गाड़ी फँस गई
पीड़ा बढ़ गई
आ धसक जाने से पहले
दे धक्का

दे धक्का
कि हिचकोले ले
चल निकले अब
शर्माये गड्ढे का मुँह छोड़ खुला

थोड़ा तुम
मैं थोड़ा
लग-भिड़कर
गति जीवन की पा लें

दे धक्का
अपनी गाड़ी खींच बढ़ा लें !

 

6. प्रेम करने की शर्त

जिन दिनों प्यार करना था
एक शर्त हुआ करती थी
जिन दिनों प्यार करना था
गाँव की सड़कें सूखी नहीं होती कभी
कोई पजामें को उठाता-सँभालता
कोई सलवार को
कीचड़ सबकी सामत हुआ करती
जिन दिनों प्यार करना था
लैला-मजनू किस्सों में हुआ करते
और हम फिल्मों की पहुँच से परे होते
जिन दिनों प्यार करना था
एक पगड़ी हुआ करती थी
और बातों-बातों में उसके
उछल जाने का
खतरा हुआ करता था
जिन दिनों प्यार करना था
एक शर्त हुआ करती थी
एक शर्त कि पकड़ना होगा
हाथ-बाँह उसका
सुनानी होगी खनक जेबों की
और कमीज़ की इकलौती जेब
तो बस भरी हुआ करती
एक अदद दिल से
जिन दिनों प्यार करना था
एक शर्त हुआ करती थी
नाक बचाने की

 

7. ये मैंने क्या समझा

मैं गाँव में था और
तुमने कहा
पूरी दुनिया एक गाँव हो गई
जब मैं शहर आया
तुमने कहा
निठल्ली भीड़ स्वयं में एक खतरा है
उन्हीं दिनों
होड़ थी ज्ञान और तकनीक की
उन्हीं दिनों नाम मिला
पति-पत्नी व बच्चों को परिवार का
उन्हीं दिनों घटाया गया आयतन
हृदय क्षेत्र का
तब छुपता गया गाँव
स्मृतियों की खोह में
तब सीमाओं के पार जाने के क्रम में
बेहिसाब आकांक्षाएँ बनी रही मित्रवत
तब जितना पतझड़ वसंत भी उतना हीं
लुभाता रहा
मैंने समझा
हासिल ज्ञान , तंत्र का स्रोत बनेगा
तुमने गोले दागे टैंक दौड़ाये
सीमाओं पर कब्जे जमाये
मैंने समझा सुरक्षित हूँ मैं
ये मैंने क्या समझा…
कठिन है उत्तर देना खुद को !

 

8. नीचे गिरना

गिरने की अनचाही क्रिया
अपनी सीमाएँ लाँघती
लुढकती जा रही है

गिर रहा बाजार तेज़ी से
रुपये की औकात गिर रही
नैतिकताएँ हर रूप में गिरती जा रहीं
गिरते जा रहा आदमी लगातार

अब मोहल्ले-दर-मोहल्ले
सनसनी फैला रही खबरें

रात अँधेरे दरवाजे खटखटाने की
गोली दाग कर भाग जाने की
चाकू गोदकर भाग जाने की
घर बना लेने की
घर ढूँढने की
और घर बदर कर देने जैसी
सारी खबरों में बसी है दुर्गंध

आदमी गिरते जा रहा इतना
कि अब इसे नीचता कहना
संभव नहीं हो पा रहा मुझसे ।

 

9. वक्त करे आखेट

वक्त करे आखेट है भाई ,
दुश्मन अपना पेट है भाई।
तेरे मन की लिखा करूँ
कोरी मेरी स्लेट है भाई ।
बनने से पहले बिखरे ये
घर मेरा या प्रेत है भाई ।
तूफां से बच पाये कैसे
मुट्ठी-मुट्ठी रेत है भाई ।
हाँ किसान हूँ सपने मेरे
कट्ठा-कुट्ठी खेत हैं भाई ।
मूल नहीं ‘वो’ सूद चढ़ाए
ऐसा धन्ना सेठ है भाई ।

 

10. शुभ अवसर

मेरे यहाँ मैं
तुम्हारे यहाँ तुम रह जाओगे

अक्सर हम अवसर तलाशते फिरेंगे
और एक दिन सारे रिश्ते
सारे त्योहार सारे उत्सव
रह जाएँगे अवसर विशेष भर

निजता आह्वान करती फिरेगी
थाल भर गुलाल राह देखता रहेगा
बच्चे नृत्य करेंगे
पिता तस्वीरें उतारेंगे
माँ नृत्य करेगी
फिर बच्चे तस्वीरें उतारेंगे

अखबारों के पन्नों पर तड़फड़ाता अवसर
गले मिलती तस्वीरों में फँसा रहेगा
रेत, शराब, गाँजे व हेरोइन के सौदागर
बाँटते मिलेंगे लख-लख बधाइयाँ
ऐसे किसी अवसर को भला कैसे जाने देंगे वे

वे मरणोपरांत के भी सारे अवसर हथियाये
राजनीति की चौखट पर बैठे
मिलन समारोहों की तैयारियाँ करेंगे
हम उन्हीं की चौपालों में मिलेंगे
उन्हीं की अगवानी करते हुए
गले लगेंगे एक दूसरे से

खुले दरवाजे बंद हो जाएँगे
शाम ढ़ल जाएगी यूँही
अपनी हीं खिंची हुई तस्वीरों में
हादसे के शिकार हम
लड़ेंगे अपने मुआवजे के लिए
यहीं तो शुभ अवसर होगा !

 

11. उत्सवधर्मी देश

हर अवसर विशेष हो गया ,
उत्सव धर्मी देश हो गया ।

चाट चाउमिन गोलगप्पे से ,
भरा पूरा परिवेश हो गया ।

कहाँ अमीरी कहाँ गरीबी ,
गाँव शहर सब ‘रेस’ हो गया ।

इश्तेहार निकले सरकारी ,
उससे पहले केस हो गया ।

सजे धजे निकले घर बाहर,
मूड सबों का फ्रेश हो गया ।

जन की कहते सुनते रह गये,
मन का अध्यादेश हो गया।।

 

 


कवि सुमन कुमार सिंह,  जन्म : 23जनवरी,1972 में बक्सर जिला के भटौली गाँव में । शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), बी.एड.,
पी-एच.डी.(रामवृक्ष बेनीपुरी की गद्य शैली का स्वरूप व विन्यास ), हिंदी और भोजपुरी के युवा साहित्यकार। पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी तथा भोजपुरी में समय-समय पर कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ तथा आलेख प्रकाशित। ‘महज़ बिंब भर मैं’ पहला हिंदी काव्य संकलन, बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ।

संप्रति: बी.एस.डीएवी.प.स्कूल, मील रोड,आरा- 802301 बिहार। मो.नं.-8051513170

 

 

टिप्पणीकार डॉ अवंतिका सिंह कवि और लेखिका हैं। इनका जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ है। पिता सरकारी नौकरी में थे जिसके कारण शिक्षा दीक्षा उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में हुई है।
हाई स्कूल- प्रथम श्रेणी, जीजीआईसी बांदा, इंटरमीडिएट- प्रथम श्रेणी जीजीआईसी इटावा, स्नातक (विज्ञान वर्ग -बायोलॉजी)- प्रथम श्रेणी इटावा, परास्नातक (हिंदी)- प्रथम श्रेणी में लखीमपुर से किया है।
इटावा डिग्री कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष श्री जगदीश्वरूप सक्सेना जी के निर्देशन में हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा पर 2008 में कानपुर विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है।
समय समय पर विभिन्न परा स्नातक कॉलेजों में अध्यापन।
प्रयाग संगीत समिति से तबले में विशारद की डिग्री प्राप्त की।
आकाशवाणी- लखनऊ, रामपुर, बरेली और दूरदर्शन से अनके लेख, कहानी और कविताओं का प्रसारण।
लंबे अरसे से प्रतिष्ठित समाचार पत्र और पत्रिकाओं में कहानी,कविता, लेख और समीक्षाओं का प्रकाशन। मंच संचालन।
पुरस्कार – अंतरराष्ट्रीय तथागत विशिष्ट साहित्य सम्मान- 2022।
DGP, उ प्र – महिला सम्मान
Up police Family welfare association का शक्ति सम्मान।
बागवानी, संगीत, सामाजिक कार्य, कला और साहित्य में रुचि।

सम्पर्क: पता – शाद्वल, 54, दयाल फोर्ट, विष्णुपुरी 3
अलीगंज, लखनऊ। मोबाइल नंबर: 7985117919
ईमेल: singhavafemale9@gmail.com

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion