समकालीन जनमत
कविता शख्सियत

यथार्थ के अन्तर्विरोधों को उदघाटित करते कवि राजेन्द्र कुमार

( जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष, कवि और आलोचक राजेन्द्र कुमार (24/7/1943) आज  76 साल के हो गए. एक शिक्षक, कवि, आलोचक और एक  सजग व्यक्ति के रूप  में उनका प्रतिबद्ध, सर्जनात्मक, सक्रिय और संघर्षपूर्ण जीवन आगे भी हम सब को प्रेरित करता रहेगा )

‘ऋण गुणा ऋण’ वरिष्ठ कवि व आलोचक राजेन्द्र कुमार की कविताओं का पहला संग्रह है। यह 1978 में प्रकाशित हुआ था।

तीन साल पहले इसका परिवर्धित दूसरा संस्करण आया है। इसमें ‘कुछ अन्य कविताएं’ से एक खण्ड है जो पहले संस्करण में शामिल नहीं रहा हैं।

इस खण्ड की कविताओं का रचना काल भी वही है। साथ ही, पहले संस्करण में कुछ कविताएं आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति पर लगाये गये सेंसरशिप की वजह से अपने मूल रूप में नहीं आ पाई थीं, इस दूसरे परिवर्धित संस्करण में वे अपने मूल रूप में प्रकाशित हैं। यदि कविताएं अपने मूल रूप में नहीं छापी जा सकी तो इसका कारण वो आसन्न स्थितियां थीं जिनसे ये रू ब रू रही हैं।

बहरहाल, राजेन्द्र कुमार के इस संग्रह की कविताओं से कवि के अन्तर्मन, उसके अन्तर्द्वन्द्व और विकास यात्रा को समझा जा सकता है, साथ ही उस दौर को भी।

संग्रह की पहली कविता है ‘मिट्टी के ढेले’। पन्द्रह पंक्तियों की इस छोटी कविता से ही राजेन्द्र कुमार के काव्य की भाव-भूमि सामने आती है।

यहां मिट्टी के ढेले की नियति के माध्यम से पर पीड़ा की सहज अनुभूति है। ‘पता नहीं क्यों/मन क्यों उदास हो गया है’ यह आत्मकथन इसी की अभिव्यक्ति है। राजेन्द्र कुमार की कविताओं में यह पर पीड़ा का अहसास लगातार सघन होता गया है। कविता की यह दुनिया अनुभूतियों से बनती है। अपनी कविता ‘शीशा’ में राजेन्द्र कुमार कहते हैं: ‘मुझे मिला है/जीवन का जो चौड़ा शीशा/उसमें होकर/मुझे देखने दो वे सारे अक्स/कि जिनमें ढल आयी हैं/मेरी अनुभूतियां‘!’ इन्हीं से बनती है उनकी जीवन दृष्टि। इसी से वे अपने समय, समाज और यथार्थ को देखते हैं, अपने अन्तर की पड़ताल करते हैं। जीवन, प्रकृति और परिवेश में जो सृजन हो रहा है जो घटित हो रहा है, वही राजेन्द्र कुमार की कविताओं में अभिव्यक्ति पाती हैं। जैसे कविता ‘गुलाब’ को देखें ‘मैं चुप था/पंखुरियां भोली/शरारत से बोलीं-‘अरे, तुम तो कवि हो न ? – देख क्या रहे हो ? – मेरे/सौन्दर्य को वाणी दो /भावों के तुम तो/ बड़े मुखरदानी हो!’ यहां कोई कृत्रिमता नहीं, वस्तुनिष्ठता है। यही राजेन्द्र कुमार की काव्य विशेषता है।

राजेन्द्र कुमार के कवि की निर्मिति में उसके भीतर और बाहर की भूमिका है। संग्रह में इस अर्न्तद्वन्द्व को सामने लाती एक कविता है ‘बाहर-भीतर’। यह कैसा विरोधाभास है कि ‘सभ्य दिखने के चक्कर में/हम जिन नाखूनों को कुतर डालते हैं/उन्हीं से वह अपनी भयानक अंगुलियों के कवच/तैयार करता है’।

राजेन्द्र कुमार जिस मध्यवर्ग या बौद्धिक समुदाय से आते हैं, उसके जीवन में बहुत दिखावापन है। वह बाहर जैसा दिखता है, अन्तर में वह वैसा ही नहीं है। इस द्विचितापन को राजेन्द्र कुमार अपनी कई कविताओं में उभारते हैं।

मनुष्य इस कदर ‘सभ्यताक्रान्त’ है कि ‘हम धारते हैं शक्ल/शक्लें उतारते हैं’। एक कविता ‘अति रिक्त चेहरे’ में कहते हैं ‘और भी हो सकते हैं/लेकिन, जहां तक मैं जानता हूं/मेरे दो चेहरे हैं’। अर्थात धोखा, धूर्तता, पाखण्ड, छद्म इस कदर सभ्यता का पर्याय बन गया है कि आदमी विवश हो गया है कि वह कई कई चेहरों के साथ जिये।

लेकिन राजेन्द्र कुमार ‘सभ्यता’ के नाम पर इस द्विचितापन को जरूरी नहीं मानते बल्कि इससे संघर्ष करते हैं। इस दिखावेपन का क्रिटिक रचते हैं। वे ‘दीवार’ कविता में कहते हैं ‘दर्प की दीवार/जिसे मैंने खुद ही खड़ा किया था/अपने को/औरों से अलग करने के लिए/आज, जाने क्यों मुझे ही/बेहद कुरूप लगने लगी है।’ मानव दर्प तभी पैदा होता है जब अन्तर में कुण्ठा का भाव रहता है और इस कुण्ठा को तोपने छिपाने के लिए ही आवरण के बतौर दर्प का भाव पैदा होता है।

यह दर्प देखने में जितना सुन्दर लगता है, वह अन्तर में उतना ही कुरूप है। इसीलिए इस सच्चाई का संज्ञान होते ही मोहभंग होता है और विद्रोही स्वर उभरता है ‘और तब मैं बेचैन हो उठता हूं/सोचता हूं/क्या पाऊँ/कि ऊपर से नीचे तक/इस दीवार को छील डालूँ/नंगा कर दूँ/या ढहा दूँ!’

संग्रह की कविताओं का रचना काल आपातकाल और उससे पहले का है। उस आपातकाल के आज चालीस साल पूरे हो गये। उस वक्त से काफी कुछ समय गुजर चुका है लेकिन आज भी उसकी छाया बनी हुई है।

यह ऐसा दौर था जब लिखने व बोलने की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई थी। संवैधानिक अधिकारों का अपहरण कर दिया गया था। इसी दौर की कविता है ‘पावस की शाम’।

यथार्थ किस तरह हमारे मन-मस्तिष्क पर अपना असर डालता है, कविता में देखा जा सकता है। हमारे अन्तर्मन में जो भाव उपजता है, वह यथार्थ का ही अक्स होता है। इसीलिए कहा जाता है कि हमारे अन्तर्मन में जो चल रहा होता है तथा जो भाव उभरते रहते हैं, बाहर प्राकृतिक क्रियाओं व दृश्यों की अनुभूति भी वैसी ही होती है।

स्वतंत्रता मनुष्य की प्रकृति ही नहीं उसकी संस्कृति भी है। यदि इसका अपहरण हो जाय तो मन का उदासी व विषाद से भर जाना स्वाभाविक है। ऐसे में ‘पावस की शाम’ भी अन्तर्मन को सुहानी नहीं कर सकती। कविता का आरम्भ ही होता है ‘वर्षा के झरने से/ये शाम/अभी अभी धुल के निकली है/कुछ उजली हो गयी है/लेकिन कैसी है यह उदासी/जो फिर भी नहीं धुली/नहीं मिटी, नहीं घुली!’

समय ने मन को इतना आक्रान्त कर रखा है कि ‘पावस की शाम’ सुहानी नहीं बेरौनक लगती है। वह मन को प्रफुल्लित नहीं कर पाती। यहां ‘सफेदी’ भ्रम है, आडम्बर है। वास्तविकता तो यह है कि ‘सफेदी की आड़ ले/पीलापन-कुछ और उभर आया है।’

जब सीधे व सहज तरीके से अपनी बात कहने की गुंजाइश खत्म कर दी गई हो, ऐसे में राजेन्द्र कुमार प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से अपनेे विचारों को अभिव्यक्ति करते हैं। कैसा है यह समय ? यह कवि के बिम्बों में द्रष्टव्य है ‘अलगनी पर लटकी/मोती-सी बूंदें/कांप-कांप उठती हैं…../उनमें से कब कौन/पवन के झोंकों से/नीचे आ गिर पड़े-/कुछ ठीक नहीं !’ यह ऐसा ही समय है, भय, संशय और दुविधा से भरा कि कब कौन गिर पड़े, कब कौन समर्पण कर दे, कह पाना कठिन है।

इसी का विस्तार ‘बारिश से पहले का अंधेरा’ में हम देखते हैं। यह कविता आपातकाल के दिनों में ‘धर्मयुग’ में छपी और जब छपी तो तीन जगहों पर स्याही पुती थी। इस संग्रह में कविता मूल रूप में आयी है।

राजेन्द्र कुमार का यह काव्य कौशल है कि कवि कविता में प्राकृतिक क्रियाओं, घटनाओं से उन समय संदर्भों को तार्किक तरीके से उदघाटित करता हैं और इसके लिए बिम्बों व प्रतीकों का सहारा लेता हैं।

लेकिन आजादी बाद के भारतीय जनतंत्र की यह विडम्बना है कि बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कही बातों पर भी बंदिशें हैं। जगह जगह कविता पर स्याही का पोत दिया जाना, इससे समझा जा सकता है कि अभिव्यक्ति पर कैसा और कतना गहरा पहरा है।

कवि के लिए यह रचनात्मक बेचैनी है। लेकिन राजेन्द्र कुमार का यह आशावाद है जो विपरीतताओं में भी साथ नहीं छोड़ता। उस अदृश्य को वे दृश्य बनाते हुए कहते हैं ‘टांगता है/हर आंगन की अलगनी पर/मेघमन्द्र-नन्हीं-नन्हीं/अदृश्य-आश्वस्तियां। पहचान में आता हुआ/धीरे-धीरे यह अंधेरा ही तो है/जो जमीन पर/आसमान से झुकता हुआ उजलाता है’। और भी – ‘सब कुएं तालाब सूखे के हुए माना, मगर/अपने बादल भी न हों, यह तो कोई मानी नहीं।

राजेन्द्र कुमार की कविताएं जो औसत से लम्बी हैं, उनकी शैली बहुत कुछ कथात्मक है जैसे ‘वे तीन और चौथा मैं’, ‘बीवी से गरीबी तक’, ‘यूरेका-यूरेका’, ‘पुतली घर का भोंपू’ आदि। यह 70 के दशक का वह दौर है जब ‘गरीबी हटाओ, समाजवाद लाओ’ बतौर नारे खूब उछाले गये थे जिसकी परणिति देश में इमरजेन्सी के रूप में हुई।

कविता में उस दौर का जो चित्र उभरता है, वह कुछ इस तरह है – ‘वह अपनी बीवी के पास जाने से कतराता है/बीवी के बगल में लेटते ही/उसे लगता है-महाजन की बही के दिल में/उसका अंगूठा-निशान/फैलकर कुछ जगह पा गया है’ और ‘जो हाथ/उसका सीना/उसकी पीठ सहला रहे होते हैं, वे/बीवी के नहीं, बही के मालूम होते हैं-महाजन की बही के!’ यह है सम्मोहित करने वाले नारे का राजनीतिक यथार्थ जिसमें ‘गरीबी हटाओ’ गरीब को ही खत्म कर देने तथा ‘समाजवाद लाओ’ और कुछ नहीं महज महाजनी लूट का पर्याय है।

इन कविताओं से गुजरते हुए बरबस गोरख पाण्डेय की मशहूर कविता ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई……’ की याद आती है। वहीं, राजेन्द्र कुमार ‘यूरेका-यूरेका’ में कहते हैं – ‘समाजवाद आने वाला है…..’। यह कविता में टेक की तरह गहरे व्यंग्य के साथ बार बार आता है, और छल व छद्म के रहस्य से परदा उठाता हैं ‘रहस्य की बात है/सुनो, समाजवाद ने/मेरे देश के नक्शों को स्टोर कर रखा है/यह ऐसा समाजवाद है जो ‘मेरे हिस्से में से खाता है/मेरे हिस्से में से पहनता है/सांस लेता है मेरे हिस्से में की/खून और मांस लेता है मेरे हिस्से में से’, अर्थात गरीब मेहनतकश की लूट पर ही वह जिन्दा है। इनसे कोई लगाव नहीं।

इनके प्रति वह अपार घृणा-भाव से भरा है। देश भी उसके लिए निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल की वस्तु, लूट का ही पर्याय है। वह उसके लिए नक्शा है जिसे तोड़ता, मरोड़ता है। ऐसा ‘जादुई सपना’ जगाता है जिसमें ‘मैं देखता हूं/जो कुछ उछाला था उसने/वह नक्शा नहीं, नारा बन गया है/गरीबी मिट गयी है/अमेरिका, रूस, जापान में वक्तव्य देकर/लौटने वाला/एकदम अनजाना अनचीन्हा/अजनबी-अपना ‘हमारा’ बन गया है!’

कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। ‘अच्छे दिनों’ के जुमले में क्या वही यथार्थ हमारे सामने एक भिन्न संदर्भ में प्रस्तुत नहीं है ? छल व छद्म से भरी पूंजी की सत्ता आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे भ्रम को रचती, जो अपने मूल में असहिष्णुता व बर्बरता की मनुष्य विरोधी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पोषक है, कॉरपोरेट-फासीवादी राज के रूप में क्या उपस्थित नहीं है ?

राजेन्द्र कुमार का कविता संसार इन्हीं सवालों से रू ब रू हैं। वे भारतीय जीवन के क्रूर यथार्थ और उसके अन्तर्विरोधों को उदघाटित करने वाले ऐसे कवि हैं जो ‘धुंधलाते हुए धन-चिन्ह की परवाह से/आहत न दीख/अर्थ सीखा/नया, ऋण को कर गुणित ऋण से/लिया पा- स्वयं को पुनर्परिभाषित होने का/तरीका!’

इस प्रक्रिया में कविता वहां पहुंचती है जहां ‘अब नहीं,-अब और नहीं/उबरना है मुझको/उन तीनों के बीच से गुजरना है मुझको/न पीक हूं कि उगलते रहो मुझको/न मैं लीक हूं कि चलते रहो मुझ पर/कुचलते रहो मुझको।’ यह सब्र का टूटना है। इसी से बदलाव के बीज का अंकुरण होता है जो अनुभव और विचार का खाद-पानी लेकर बढ़ता है और समय के साथ परिपक्व होता जाता है।

इसे राजेन्द्र कुमार की आगे की कविताओं में बखूबी देखा जा सकता है, खास तौर से उनके काव्य संगह ‘हर कोशिश है एक बगावत’ और हाल की कविताओं में। आइए आज राजेंद्र कुमार जी के जन्मदिन के अवसर पर उनकी कुछ कविताएँ  पढ़ें।

राजेन्द्र कुमार की कविताएँ

मिट्टी के ढेले
सहकर सूरज का प्रखर ताप
मिट्टी के छोटे-छोटे
कुछ ढेले –
पत्थर बन निस्पंद पड़े थे

सहसा सुनाई दी
किसी की पद चाप…….
बड़ी-बड़ी बून्दें आईं
घुल गये पिघल गये-
मिट्टी के ढेले-
आप ही आप !
और फिर, तरल बबन
बह गये
चुपचाप !

पता नहीं क्यों
मन और उदास हो गया है !

शीशा

मुझे मिला है
जीवन का जो चौड़ा शीशा
डसमें होकर
मुझे देखने दो वे सारे अक्स
जिनमें ढल आयी हैं
मेरी अनुभूतियां !

कृपा कर  इसे किसी
छोटे-संकरे चौखट में
जड़ने का प्रयास
मत करो !

भले ही अपनी
पथरीली धरती का कोई कंकड़
ऐसा फेंकों,
टूट जाय यह शीशा
चूर-चूर होकर
बिखरें
इसकी किरचें
दूर-दूर होकर

जीवन का जो चौड़ा शीशा
मुझे मिला है
इसे कृपाकर
छोटे-संकरे चौखट में
जड़ने का
कसने का
मत करो
काई भी प्रयास मत करो !

बाहर-भीतर

वह हमारे बाहर है
वह पाँवों के नीचे बारूद के फूल बिछाता हुआ
वह हमारे भीतर भी है/जासूस-सा
हमारी शिराओं को टटोलता हुआ
अनुच्चारित-सा कुछ बोलता हुआ
हमारी हर धड़कन के जवाब में

सभ्य दिखने के चक्कर में
हम जिन नाखूनों को कुतर डालते हैं
उन्हीं से वह अपनी भयानक उँगलियों के कवच
तैयार करता है

और वह
हमारे भीतर-बाहर के बीच भी कहीं है
हमारे त्वग्संवेदन को
कुंठित करता हुआ ध् यानी उस पर
सुखाभासी बाम का लेप करता हुआ

वह एक स्तर पर मरकर भी
दूसरे पर
तुरन्त जी सकता है
पसारकर अपनी ध् खुरदुरी रसना
हमारी आँखों का संकल्प-रस–
सारा का सारा– पी सकता है !

लोहा-लक्कड़

सोना उछले या गिरे
हमें क्या

सोना गले पड़ा हो
हार बन
या नाक चढ़ा हा
कील बन हमें क्या

मोती-मूंगों से जड़ा हो
हीरक-पन्नों से
हमें क्या

हमें मालूम है उसकी औकात
किसी भी हाथ की उगंलियों के बीच
जब भी होगा
हद से हद होगा अंगूठी भर !

हथौड़ा- जब भी होंगे
हम ही होंगे
लोहा-लक्कड़ तो हम ही हैं न !

आग और पानी

आटे में व्यापता है पानी
तब उसमें रोटी का आकार
आ पाता है

फिर उसमें व्यापती है आग
तब आ पता है उसमें रोटी का स्वाद

हां,
आकार के लिए पानी
स्वाद के लिए आग !

ओसामा बिन लादेन

ओसामा बिन लादेन
तुम्हारे नाम का तुम्हारी भाषा में क्या
अर्थ होता है, मुझे नहीं मालूम,
लेकिन मेरी भाषा में
एक बहुत बड़ा हादसा यह हो रहा है
कि तुम्हारा नाम सिर्फ
एक ही अर्थ दे रहा है
और, वह अर्थ है- ‘मुसलमान’ !

मुझे पूरा भरोसा है
तुम्हारी भाषा में तुम्हारे नाम का
जरूर कोई न कोई प्रीतिकर अर्थ होता होगा

कोई माँ-बाप
अपने बेटे का कोई अप्रीतिकर नाम
रख ही नहीं सकते

ओसामा बिन लादेन,
तुम बहुत ताकतवर हो
तुम्हारी ताकत देखकर तुम्हारे वालिदेन को
कैसा लगता होगा, क्या तुम बता सकते हो?
पूरे यकीन से!

या, यकीन करने का जिम्मा
सौंपकर अपने अनुयाइयों को
तुम्हें कुछ भी यकीन नहीं करना है?

तुम कितने ताकतवर हो
ओसामा,
लेकिन कितने कमजोर!
कि तुम अपनी ताकत का कोई ऐसा
इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, जिससे
मेरी भाषा में तुम्हारे नाम का अर्थ
सिर्फ ‘मुसलमान’ न निकाला जाए
न मुसलमान होने का अर्थ
सिर्फ दहशतगर्द!

आतंकवादी

वे सब भी
हमारी ही तरह थे,
अलग से कुछ भी नहीं
कुदरती तौर पर

पर, रात अँधेरी थी
और, अँधेरे में पूछी गईं उनकी पहचानें
जो उन्हें बतानी थीं
और, बताना उन्हें वही था जो उन्होंने सुना था
क्योंकि देखा और दिखाया तो जा नहीं सकता था कुछ भी
अँधेरे में
और, अगर कहीं कुछ दिखाया जाने को था भी
तो उसके लिए भी लाजिम था कि
बत्तियाँ गुल कर दी जाएँ

तो, आवाजें ही पहचान बनीं-
आवाजें ही उनके अपने-अपने धर्म,
अँधेरे में और काली आकारों वाली आवाजें
हवा भी उनके लिए आवाज थी, कोई छुअन नहीं
कि रोओं में सिहरन व्यापे ।
वो सिर्फ कान में सरसराती रही
और उन्हें लगा कि उन्हें ही तय करना है-
दुनिया में क्या पाक है, क्या नापाक

गोकि उन्हें पता था, किसी धर्म वगैरह की
कोई जरूरत नहीं है उन्हें अपने लिए
पर धर्म थे, कि हरेक को उनमें से
किसी न किसी की जरूरत थी
और यों, धर्म तो खैर उनके काम क्या आता,
वे धर्म के काम आ गए ।

धर्म जो भी मिला उन्हें एक किताब की तरह मिला-
किताब एक कमरे की तरह,
जिसमें टहलते रहे वे आस्था और ऊब के बीच
कमरा– खिड़कियाँ जिसमें थीं ही नहीं
कि कोई रोशनी आ सके या हवा
कहीं बाहर से
बस, एक दरवाजा था,
वह भी जो कुछ हथियारखानों की तरफ खुलता था
कुछ खजानों की तरफ

और इस तरह
जो भी कुछ उनके हाथ आता- चाहे मौत भी
उसे वे सबाब कहते
और वह जंग- जिसमें सबकी हार ही हार है
जीत किसी की भी नहीं,
उसे वे जेहाद कहते ।

(कवि, आलोचक व वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर जन संस्कृति मंच की उत्तर प्रदेश इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष हैं ।) 

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