समकालीन जनमत
कविता

पवन कुमार वर्मा की कविताएँ समकालीनता का स्वीकार प्रस्तुत करती हैं

आलोक रंजन


 

युवा कवि पवन कुमार वर्मा की कविताएँ सामने हैं और सामने है हमारे समय की असलियतों की अभिव्यक्ति भी। इन कविताओं को गठन की दृष्टि से बहुत सधा हुआ नहीं कहा जा सकता परंतु उन्हें अपने समय के सच से जूझते देखा जा सकता है । कवि की सृजन की समझ बाहरी दुनिया और उसके भीतर की दुनिया के बीच लगातार चल रही कशमकश से बनी है । पवन की कलम अभी बहुत नई है पर वे अपनी कविताओं में दुनिया में मौजूद उजाले की तुलना में क्रमशः बढ़ते अंधेरे को बखूबी सामने रखने में सफल हुए हैं।

समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सच्चाइयाँ एक विषादग्रस्त वातावरण निर्मित कर रही हैं । कवि ऐसी विडंबनापूर्ण समकालीनता में लिपटे जीवन को अपनी कावताओं में रख रहे हैं। इन कविताओं के आधार पर कवि का कविकर्म जनपक्षधर प्रतीत होता है।

भारतीय परिदृश्य में लड़की होना बहुस्तरीय संत्रास से मुसलसल गुज़रते रहना है । ‘जवान होती लड़की’ कविता शीर्षक में बेशक जवानी में प्रवेश करती लड़की का रूपक गढ़ती हो लेकिन संपूर्णता में उस संत्रास को ही अभिव्यक्त करती है जो इतना स्वाभाविक हो चला है कि इसकी सहज स्वीकार्यता भी परेशान नहीं करती ।
“तभी किसी ने जोर से कहा
मरी नहीं है
बेचारी
बच गई
घर वालों की नज़र थी उस पे।“

‘युवा लड़के’ कविता की व्याप्ति कवि की दृष्टि की व्यापकता को प्रदर्शित करती है । इसे देश के भीतर खोखले हो रहे युवा – जीवन के सच के रूप में देखा जाना चाहिए । स्पष्ट और साफ लहज़े की यह कविता युवाओं की उस गुमराह आम प्रक्रिया को दर्शाती है जहाँ से उम्मीद, बदलाव आदि के चिह्न भी नहीं दिखते । एक निराश और असंगत भविष्य के निर्माताओं का यथार्थ यही है ।
“वे युवा लड़के जो न तो पढ़ाई करते हैं
और न मजदूरी करते हैं
वे अय्यासी करते हैं
वे देश की बहन बेटियों का कौमार्य लूटते हैं
उनके गुप्तांगों में राड कर उन्हें मार देते हैं”

पवन की इन कविताओं में शिकायत है, क्षोभ है, अपने सामने की दुनिया में व्याप्त निराशा की अभिव्यक्ति है। युवा कवि के रूप में इतनी सजगता का होना आश्वस्तिदायक है। वर्तमान समय की अभिव्यक्ति से जो असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न हो सकती है उसकी कल्पना कवि की दृष्टि में होगी लेकिन कवि ने उससे मुँह न चुराना चुना है ।
“पर तुम्हें आवाज़ न दूंगा।
ओ जिसके कान रूँधे हों
भुजाओं में बल न हो जिसके
और आँखें देख कर करती हो अनदेखा
मुंह सिर्फ जिसका कि खाते वक्त खुलता हो
और जिसका साथ होना न होना बराबर हो”

इन कविताओं में सादगी, सरलता और कथ्य की स्पष्टता है। शिल्प की चमत्कारिकता से बेपरवाह अभिव्यक्ति है। कविताओं में शिल्प आधारित गहनता की तलाश करने वाले भावकों को निराशा हाथ लगेगी लेकिन आने वाले समय में कवि अपनी पूर्णता की प्रक्रिया में उसे भी शामिल करने का सामर्थ्य रखता है ।

 

पवन कुमार वर्मा की कविताएँ

1. जवान होती लड़की

कल शाम लगभग छः के करीब
एक शोर उठा
मेरे गाँव में
कि फ़लाने की लड़की ने फाँसी लगाली

तभी किसी ने जोर से कहा
मरी नहीं है
बेचारी
बच गई
घर वालों की नज़र थी उस पे।

कई दिन गुज़र जाने के बाद
एक रोज मैं उससे मिला
वो अपने घर की चौखट पर बैठी
भतीजा खिला रही थी

मैंने पूछा
तुमने फाँसी क्यों लगाई थी ?
वो मेरी ओर देखती हुई चुप रही

मैंने फ़िर पूछा
उसने छलछलाती हुई आँखों से देखते हुए कहा
उस पे नज़र है
घर वालों की ।

2. सेनाएँ कभी नहीं जीततीं

युद्ध करती हैं सेनाएँ
मरती और मारती हैं सेनाएँ
एक तरफ़ की सेना हरा देती है दूसरी को,
पर अफ़सोस,
सेनाएँ कभी नहीं जीततीं ।

जीत सेना की नहीं होती
महाराजाओं की होती है
उनके नाम का विजयघोष
गूँजता है आसमान तक।
और युद्ध में मारे गये सैनिकों की माँओं ,बहनों
पत्नियों,और बच्चों का शोक,
मनता है महाराजाओं की जीत का जश्न
जो शाम मदिरा पान से शुरू होकर
रात महारानियों के जिस्म पर चढ़ते
महाराजाओं के पस्त होने तक जारी रहता है।

3. युवा लड़के

वे युवा लड़के जो पढ़ाई करते हैं
वे घर नहीं रहते
वे दिल्ली,हैदराबाद,कोटा,बंगलौर,इलाहाबाद,बनारस आदि
जगहों पर होस्टलों,और कमरों में रहते हैं
वो बहुत मेहनत करते हैं
क्योंकि उन्हें बनना है जज,वकील,कलेक्टर,
इंजीनियर, प्रोफ़ेसर,डाक्टर,और कलाकार आदि,

वे युवा लड़के जो पढ़ाई नहीं करते हैं
वे भी घर नहीं रहते
वे कोसते हैं बाप को
और नाराज़ होकर शहर की राह लेते हैं
वे शहरों में कमाने आते हैं
कारख़ानों में काम करते हैं
सड़कें बनाते हैं वे,
और फ़ुटपाथ पर सो जाते हैं
अपने मरे हुए सपनों की यादों के साथ सिसकियाँ भरते हुए
अब वे कुछ नहीं बन सकते
क्योंकि वे मज़दूर बन गये हैं
वे बनाने लगे हैं
वे निर्माता बन गये हैं

वे युवा लड़के जो न तो पढ़ाई करते हैं
और न मजदूरी करते हैं
वे अय्याशी करते हैं
वे देश की बहन बेटियों का कौमार्य लूटते हैं
उनके गुप्तांगों में राड कर उन्हें मार देते हैं
जो बच जती हैं
वे फ़ासी लगा कर,ज़हर खा कर या नदी में कूदकर
जान दे देती हैं

पर उन युवा लड़कों को कुछ नहीं होता
वे अधिकांश नेतापुत्र होते हैं
और कुछ उनके कृपा पात्र,
उन्हें बचा लिया जाता है
फ़िर, वे लड़के
धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए निकल पड़ते हैं
ओढ़ कर नारंगी दुपट्टा
और शांति के माहौल को,
सांप्रदायिक होने में देर नहीं लगती
और उठता है शोर
गिरने लगती हैं मस्जिदें
जलने लगते हैं घर
मरने लगती है मानवता।

4. आवाज़

मैं भूख से तड़प कर मर रहा होऊँगा
पर तुम्हें आवाज़ न दूंगा

मैं बाढ़ के पानी के बहाव में बह रहा होऊँगा
मैं मज़हबी दंगों की लपटों में जल रहा होऊँगा
मैं अपने ही घर से बेदखल कर दिया जाऊँगा
बाजार में परिवार की खातिर बिक रहा होऊँगा
मैं चौराहे पर लटका के फाँसी लगा दिया जाऊँगा
मैं युधिष्ठिर सा द्रौपदी की लाज बचा न पाऊँगा
पर तुम्हें आवाज़ न दूंगा।
ओ जिसके कान रूँधे हों
भुजाओं में बल न हो जिसके
और आँखें देख कर करती हो अनदेखा
मुंह सिर्फ जिसका कि खाते वक्त खुलता हो
और जिसका साथ होना न होना बराबर हो
तो फ़िर आवाज़ देना क्यों ?

5. देवताओं की खेती

देवता बोए जाते हैं
उगायी जाती है फ़सल
सोंके हुए मानवों के शारीरिक रक्त से
सींचे जाते हैं देवता
और जब होती है फ़सल तैयार
तो सिर्फ ठूंसता है परजीवी।

6. कुत्ता

आदिमानवों की वैज्ञानिक विकास यात्रा के
प्रमाणों से यह सिद्ध है कि,
कुत्ता मनुष्य का प्रथम पालतू पशु था।
जो आदिम मनुष्य का शिकार करने में सहायक हुआ
और अपनी निजता का विसर्जन टांग उठाकर करता रहा।
और इस तरह कालांतर में कुत्ता,
गंदे मुँह की गंदी बत्तीसी के बीच फँसी गंदी ज़बान की
गंदी उलट-पलट बना गया।
आज मैं सोंचता हूँ जब कुत्ता वन्य रहा होगा
तो उसे नहीं आता होगा पूछ दबाना
उसे नहीं आता होगा खाते हुए को बेबस देखना
और शायद तब उसे नहीं आया होगा बेवजह किसी को काटना
और वह नहीं जानता होगा मालिक की चापलूसी करना।
जब कुत्ता मनुष्य की संगति में रहा
तब उसने सीखा पूछ दबाना
उसने सीखा खाते हुए को बेबस देखना
उसने सीखा बेवजह किसी को काटना
और उसने सीखा मालिक की चापलूसी करना।
यानी जब कुत्ता वन्य था
तो वह जानवर था,केवल एक जानवर
साहब सच तो यह है कि,
कुत्ता मनुष्य की संगति में आकर ‘कुत्ता’ बन गया।

7. रोना मुझे मज़ाक लगता है

जब मैं छोटा था।
आयु से,दिमाग से और दिल से
तब मैं रोता था
हर एक छोटी बात पर
खिलौनों के खो जाने पर
या किसी के द्वारा छीन लेने पर
कभी पिता के साथ बाज़ार जाने की ज़िद पर
और कभी नामुराद बड़ों के टुनकिया देने पर
मैं खूब रोता था।
इतना रोता था कि आंखें सूज जाती थीं
अब मैं बड़ा हो गया हूँ
आयु से,दिमाग से,दिल से
और इतना बड़ा हो गया हूँ
कि अब मैं कभी रोता नहीं हूँ
और इसलिए नहीं रोता कि रोना नहीं आता
बल्कि इसलिए कि हाशिए पर खड़े लोगों को रोते देख कर
अपना रोना मुझे मज़ाक लगता है।।

8. लोकगीत

मान गोरी मान तू मान मेरा कहना।
तुझको पहना दूंगा ढ़ेर सारा गहना।

अमुवां के नीचे उस ठंडी छाँव में।
कभी नदी में तिरते हुए नाँव में।।
लहरों के संग-संग रूप तेरा बहना।
मान गोरी मान तू मान मेरा कहना।। (1)

जब-जब है चलती बयार बसंती।
अलकों की तेरी फ़िर खुशबू मचलती।।
मुश्किल हो जाता है काम वार सहना।
मान गोरी मान तू मान मेरा कहना।। (2)

दुनियां से दूर एक घर हम बनायेंगे।
उसको सितारों से चांद से सजायेंगे।।
तुम्हीं हो संगी साथ जीवन भर रहना।

9. मेरा बाप मज़दूर है

मेरे बाप मज़दूर है

पहले वह किसान था

मगर अब मज़दूर है

सत्यनामी पंथ का साधु है

दादू दयाल की शिष्य परंपरा का चेला

मेरे बाप साधु है

साधु मज़दूर है

मैं कह सकता हूँ

मज़दूर साधु हैं

10. जिन्होनें

वे लालकिला से प्रधानमंत्री का भाषण सुनते
और उदास हो जाते
उन्हें स्वयं के पैदा होने पर गर्व नहीं ग्लानि होती

वे बनना चाहते थे इसरो के महान वैज्ञानिक
सुप्रीम कोर्ट के जज
विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर
पर जिस दिन उन्होंने सुना कि
पकौड़े बेच कर दो सौ रुपए कमाना रोज़गार है
उनका मनोबल टूट गया
वे पस्त हो गये

अँधेरी रातों में देखे गये उनकी आँखों के सपने
सब झर गये गये
आँसू बनकर केले के पत्ते पर गिरी ओस की बूंद की तरह

वे हस्तमैथुन के शिकार हुए
सिगरेट ने ख़तम कर दी उनकी यौनइच्छा
ज़िंदगी उनके हाथों से रेत की तरह सरकती जा रही थी
वे अभी भी कुँवारें थे
आने लगा था उनके परिवारों में एक पीढ़ी का अंतर।

बी.ए. से लेकर एम.ए.,एम.फ़िल, पी.एच.डी. तक की कोई डिग्री कभी उनके काम नहीं आई।

जिनके अपनी पुस्तैनी ज़मीनें थीं
वे गाँवों को लौटे
जिनके पिताओं ने सिर्फ पैदा किया और
नहीं निभा सके बाप होने का फर्ज
किन्हीं मजबूरियों से
वे लेबर चौराहों पर हज़ार आँखों में चुभते हुए एक उम्मीद से खड़े मिले
कि कोई आये और
उनके खून का नमक बनाए और
दे जाए कुछ गाँधी छाप कागज़
जिससे वे अगले दिन के लिए बना सकें खून

खून का नमक, नमक का कागज़ और कागज़ का फ़िर खून बनने का क्रम चलता रहा और
एक दिन महँगाई ने सारा कागज़ लेकर भी उतना खून नहीं दिया
कि जिससे अगले दिन बन सके नमक और मिल सके कागज़

और ऐसे ही नमक बनते-बनते कागज़ बनने से पहले
एक दिन सारा खून खत्म हो गया और
मर गये इसरो के महान वैज्ञानिक
सुप्रीम कोर्ट के जज
और विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर —


 

कवि पवन कुमार वर्मा, जन्मतिथि – 24/07/2003, सीतापुर जिले के  र’वांसी गाँव  के रहने वाले हैं। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत और हिन्दी में बी. ए. किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी विषय में एम. ए. किया है और 2024 में नेट परीक्षा उत्तीर्ण की है और अभी शोध की तैयारी कर रहे हैं

इनकी कुछ कविताएँ कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं I ईमेल- kumarvermap859@gmail.com

 

टिप्पणीकार आलोक रंजन, चर्चित यात्रा लेखक हैं, हिमाचल प्रदेश में अध्यापन, यात्रा की किताब ‘सियाहत’ के लिए भरतीय ज्ञानपीठ का 2017 का नवलेखन पुरस्कार ।

सम्पर्क: alokranjan7@gmail.com

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