समकालीन जनमत
कविता

गणेश की कविताओं की इमेजरी महज़ काव्य उपादान नहीं उनके कवि-व्यक्तित्व की अंतर्धाराएँ हैं

  निरंजन श्रोत्रिय


अनूठे बिम्बों से युक्त काव्य-भाषा किसी कवि के अनुभूत जगत, संज्ञान, प्रश्नाकुलता, प्रतिभा, अभिप्राय, सरोकार और संवेदनों का प्रकट रूप होती है।
भारतीय परम्परा में बिम्ब रचने की सामर्थ्य को ही कवि-प्रतिभा कह दिया गया। पश्चिमी आलोचकों ने कविता को केवल बिम्ब और रूपक के मामले तक ही सीमित कर दिया।
लेकिन फिर ल्यूइस ठीक ही कहते हैं कि बिना अंतर्वेग और भावावेश के कोई भी पद्यात्मक दृश्य काव्य बिम्ब नहीं हो सकता। युवा कवि गणेश गनी ऐसे ही कवि हैं जिनके बिम्बों की तह में दोनों हैं-इमोशन्स भी और पैशन भी।
गणेश न सिर्फ अनूठी इमेजरी से कविता रचते हैं बल्कि अपने अभिप्राय और सरोकार से उस इमेजरी को कविता से बाहर लाकर एक स्वायत्त जीवन्त मानवीय बिम्ब की तरह स्थापित करते हैं।
थोड़े सरल शब्दों में कहूँ तो गणेश की कविताओं में इमेजरी का प्लेसमेंट एक ओर उनकी कवि-प्रतिभा का परिचायक है तो कविता से पृथक वे बिम्ब अपने आप में कविता हैं।
इस युवा कवि की कविता से जुड़ना दो तरह की अनुभूति देता है। एक तो कवि-मन से जुड़ने की और दूसरे उस कवि के लोक से जुड़ने की। मैंने जितना गणेश की कविता और गद्य को पढ़ा है, मुझे लगता है यह सारा कविता का कार्य-व्यापार अंततः उस लोक की चिन्ता में ही किया गया है।
उनकी पहली ही कविता ‘यह समय नारों का नहीं हो सकता’ में शीर्षक ही किसी लाउड या सपाट कविता का संकेत देता है लेकिन जैसे ही आप कविता में प्रवेश करते हैं हमारे अपने समकालीन परिदृश्य के अनेक जलते हुए दृश्य-बंध हमें घेर लेते हैं-‘एक आदमी कुएँ में दरिया भर रहा है/ एक आदमी नदी के किनारे ओस चाट रहा है/ एक आदमी ने काट दी जीभ अपने ही दाँतों से’।
कविता के क्लाईमेक्स में कविता का शीर्षक रखते हुए कवि अपने समय की नब्ज़ को मानो भींच लेता है। दूसरी कविता ‘यह उत्सव मनाने का समय है’ में वे केवल अक्षर की अस्मिता की बात नहीं करते बल्कि उसके लोक में तदाकार होने की प्रक्रिया जो कि एक युगीन प्रक्रिया है, को स्थापित करते हैं-‘अचानक नहीं हुआ यह सब’ और ‘कुछ अक्षर फल बाँट रहे हैं/ तो कुछ औजार युद्ध के दिनों में’। इस कविता की सबसे मार्मिक पंक्ति है-‘ बस केवल ‘ब’ के पास नहीं हैं/ बाँटने को गेहूँ की बालियाँ।’
यह व्यथा पूरी कविता में यहाँ से वहाँ तैरती दिखाई देती है और अंत में लोक से जुड़कर कविता और इस तरह समूची शब्द-सत्ता को दृढ़ता से स्थापित करती है। ‘परछाई’ शृंखला की तीनों कविताएँ सजीव बिम्बों और फैण्टेसी की अद्भुत कविताएँ हैं-कुछ इस तरह कि इसमें या तो आप प्रवेश करेंगे या आपकी परछाई!
यहाँ क्षितिज में ढलते सूरज द्वारा परछाई का अपहरण और उससे उपजा अनिर्वचनीय एकांत है। इतनी छोटी कविता केवल बिम्बों के माध्यम से इतनी ताकतवर कविता हो सकती है, अचम्भा होता है।
शेष दोनों कविताओं में परछाई अपने विभिन्न अर्थों में आती हैं लेकिन एक राजनीतिक चेतना के साथ! ‘एक आदमी जश्न मना रहा है’ एक विशुद्ध राजनीतिक कविता है जो समकालीन राजनीतिक दुरभिसंधियों और जुमलों की असलियत उघाड़ती है।
यहाँ कवि ने बहुत साफ तौर पर एक प्रतिबद्ध भाषा के जरिये अपने समय की विद्रूपताओं को नंगा किया है लेकिन पंचलाइन में कवि उसे फिर बिम्ब-दृश्यों तक लाकर समाप्त करता है-‘बच्चे उम्मीद से टटोलते हैं/ अपनी जेबों में चाँद-तारे/ और पिता तलाशते अच्छे दिन।’ कवि की यह बिम्बात्मक अवधारणा हमें चौंकाती नहीं बल्कि एक बेचैनी से भर देती है।
‘बच्चे की गुल्लक तक!’ कविता में राजनीतिक-आर्थिक विसंगतियों पर कवि का अचूक प्रहार है जहाँ बाजारवाद की पैठ बच्चे की गुल्लक तक पहुँच गई है और निराश निष्ठुर राजा के समक्ष एक फार्मूलेबद्ध प्रजा अपनी सहनशीलता की ‘रेंज’ बढ़ा रही है।
यहाँ कवि ने ‘बोलना’ और ‘सुनना’-दो क्रियापदों द्वारा दो वर्गों की खूबसूरत बाइनरी रची है। जाहिर है जब कवि के भीतर एक सजग-सचेत राजनीतिक संज्ञान मौजूद हो, बहुत-सी चीजें सूत्रों के रूप में कही जा सकती है- कविता यही काम करती है।
‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ एक भिन्न तेवर की कविता है। इसका कुछ हिस्सा अंडरटोन है कुछ मुखर। इस कविता के शुरूआती दो पैरा में गजब की सघनता है-मैं कहूँगा बिम्बात्मक सघनता!
कवि ने अपनी प्रतिभा से मानो एक संहारक सत्ता के वे शब्द नोच लिए हैं जिसके पीछे एक भयावह नंगा सच छुपा है। ‘वे पूछते हैं पिता से’ कविता में दीवाली का दृश्य है लेकिन लछमी के पदचिन्ह कब संसद भवन तक पहुँच जाते हैं, पता ही नहीं चलता। और यह किसी बेध्यानी में नहीं एक उत्सव के उजाले में छुपे भयावह अंधकार को पहचानने की प्रक्रिया के तहत होता है।
‘मैं कहानी सुना रहा हूँ’ माँ और उसके न रहने पर लिखी एक अद्भुत मार्मिक कविता है-हिलाकर रख देने वाली! और तो और खूबसूरती देखिए कि इस कविता में कहीं भी ‘माँ’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।
इसे कहते हैं कवि की असली संवेदना जो लोक और प्रकृति के माध्यम से अपनी माँ की उपस्थिति और अनुपस्थिति दर्ज करती है।
यह कविता नए युवा कवियों के लिए एक सीख की तरह है। ‘अब भगवान क्रोधित होंगे’ समूचे सत्ता तंत्र पर एक कटाक्ष है जो इस देश के मानस में धँसी अंध-श्रद्धा, अंध विश्वास के जरिये शासन कर रहा है।
‘थोड़ी मिट्टी माँगने आया हूँ’ कविता में अपने लोक-संसार की ही नहीं समूचे पर्यावरण की चिंता है लेकिन एक स्लोगन या फैशन की तरह नहीं …एक व्यथा…एक प्रार्थना…एक उम्मीद के तौर पर। यह उसी दूसरी तरह की पाठकीय अनुभूति है जिसका जि़क्र टिप्पणी के आरम्भ में किया।
युवा कवि गणेश गनी समकालीन हिन्दी कविता की एक विलक्षण प्रतिभा है। इस युवा कवि के पास फैंटेसी/ मेटाफर/ इमेजरी/बिम्ब महज काव्य उपादान नहीं हैं- एक कवि-व्यक्तित्व की अंतर्धाराएँ हैं।

अब ऐसे कवि के बारे में और क्या कहना जिसके लिए ‘पृथ्वी का लोकनृत्य ही एक वास्तविक खगोलीय घटना है’ या जिसकी ‘तितलियों को पता है कि उनके पैर केवल स्वाद चखने के काम आते हैं।’ इस युवा कवि मूल प्रतिज्ञा यही है कि वह लाल किले के कालपात्र में भूखे बच्चों की माँ के संतापों और पिता के आक्रोश को किसी तरह दर्ज़ कर सके।

 

गणेश गनी की कविताएँ
 1/ यह समय नारों का नहीं हो सकता
इन दिनों एक आदमी
नींद में बड़बड़ा रहा है
एक आदमी
हल चलाते हुए घनघना रहा है
एक आदमी
यात्रा करते हुए बुदबुदा रहा है
एक आदमी
कुएँ में दरिया भर रहा है
एक आदमी
चिंगारी को हवा दे रहा है
और एक आदमी
नदी के किनारे पर ओस चाट रहा है।
एक लकड़ी अकेले ही जल रही है
धारों पर एक गडरिया
जोर की हांक लगा रहा है
और भेड़ें हैं कि
कर रही अनसुना
जब जीभ का हिलना बेमानी हो गया
और लगने भी लगा कि
बोलने के लिए
जीभ का होना जरूरी नहीं
तब एक आदमी ने
काट दी जीभ अपने ही दांतों से
इन दिनों कुछ मूक बधिर बालक
सड़कों पर घूम रहे हैं
यह समय नारों का नहीं हो सकता।
2/ यह उत्सव मनाने का समय है
अचानक नहीं हुआ यह सब
कि किताबों में रखे फूल
चुपके से खिल रहे हैं बाहर गमलों में
तितलियाँ सब रंग समेटे किताबों से निकल कर
फड़फड़ा रही हैं शाखों पर
एक बादल का टुकड़ा
पेड़ की छाया में बैठकर
प्यासे कौवे को सुनाना चाहता है कथा पानी की।
अचानक नहीं हुआ यह सब
कि कुछ अक्षर फल बाँट रहे हैं
तो कुछ औजार युद्ध के दिनों में
अ बाँट रहा है अनार
और क सफेद कबूतर
द बाँट रहा है दरातियाँ
और ह हल और हथौड़े
बस केवल ब के पास नहीं हैं
बाँटने को गेहूँ की बालियाँ
पर स नया सूरज उगाने की फिराक में है।
अचानक नहीं हुआ यह सब
कि उसकी छड़ी फिसल गई हाथ से
और बाहर मैदान में
पेड़ बनकर लहलहा रही है
वह हैरान है कि
ये बच्चे बदल गए हैं अक्षरों में
या अक्षर बच्चों में ?
उसकी जीभ तालू से चिपक गई
हथेली से खारापन फर्श पर टपक रहा है
बच्चों की हँसी वाली मीठी फुहार
कानों से पेट तक पहुँच रही है
हाँ, यह सिद्ध हो गया अचानक
कि बालक और अक्षर जब
दांत काटी रोटी जैसे लगें
तो समझो कि यह उत्सव मनाने का समय है।
3/ परछाई
1/दो परछाइयाँ
बैठती हैं रोज़ नदी के किनारे
सुख-दुःख बाँटती हैं
लड़का-लड़की बाँटते हैं
केवल खामोशी
सूरज ढलते ही
हो जाती है मुक्त
और फैल जाती हैं-
परछाइयाँ क्षितिज तक
प्रेमी बिना परछाइयों के
लौट जाते हैं
अपने-अपने घरों को
 2/
उसने कभी नहीं देखी
अपनी परछाई
जब वह चलता है
परछाई बैठी रहती है
जब वह बैठता है
परछाई चल देती है
बहुत समय से
कर रहा था वह प्रयास
कि परछाई को बाँध सके
आज उसने जब हारकर
फेंक दी लोहे की जंजीर नदी में
परछाई अब उसके
चल रही थी साथ-साथ
3/
एक राजा के दरबार में
पेश किया सिपाहियों ने
जंजीरों में कैद
बिना परछाई के एक आदमी को
हुक्म की तामील हुई-
                     उसे फाँसी दी गई
                     उधर कैदखाने में कैद थी
                      जो लड़की दो-दो परछाइयों वाली
                      उसे अब एक परछाई से
                      मिल गई थी मुक्ति
                      राजा ने भी
                      उसकी रिहाई का
                      कर दिया जारी फरमान।
4/ एक आदमी जश्न मना रहा है
टीवी पर एक आदमी
कई किस्म के ताबीज बेच रहा है
जिनके साथ अंधविश्वास मुफ्त है
एक आदमी
अलग-अलग रंगों का पानी बेच रहा है
जिनके साथ नशे एकदम मुफ्त हैं।
संविधान की कुरसी पर बैठा
एक आदमी ईमान बेच रहा है
एक आदमी धर्म बेच रहा है
एक आदमी पृथ्वी को टुकड़ों में बेच रहा है।
अपने खेत की मेड़ पर बैठा
एक आदमी अपने खेत बेचने की सोच रहा है
एक आदमी कर्ज चुकाने के वास्ते
अपने प्राणों की सौदेबाजी कर रहा है।
उधर इंडिया गेट पर बैठा
एक आदमी बेच कुछ नहीं रहा
पर खरीदने की फिराक में है-
जनता का समय
वह सौदागर पक्का है
बदले में सपने देता है चमकदार
वह जश्न मनाना चाहता है।
इस देश के ‘मालिक’ हैरान हैं
कि उनके बच्चों की जेबों में
नहीं भरे गए चाँद तारे
पटवारी अब भी लेता है चाय-पानी
डीसी का दफ्तर बंद रहता है
आम आदमी के लिए
आज भी विधायक अपने एरिया का थानेदार है
प्रधानमंत्री को लगता है कि
जश्न मनाना जरूरी है।
ऐसे में इंडिया गेट से दूर
बाघ को मालूम है कि
उसकी सुरक्षा पिंजरे में नहीं
बल्कि जंगल में है
घोड़ा जानता है कि
नाल से बनी अंगूठी नहीं बदलती किस्मत
चाबुक का खेल चलता ही रहता है
बच्चे उम्मीद से टटोलते हैं
अपनी जेबों में चाँद-तारे
और पिता तलाशते हैं अच्छे दिन।
5/ गूगल पर खोजबीन
कई दिनों से
बच्चों ने चंदा मामा नहीं कहा
पिता कविता सुनाना भूल गए
और माँ लोरी गाना
कई दिनों से
देवता के प्रवक्ता ने
कोई घोषणा नहीं की
लोग डरना भूल गए
और गूगल पर खोजबीन बढ़ गई
कई दिनों से
बहुरूपिया इधर से नहीं गुजरा
भूल गए दोस्त
मुखौटों की पड़ताल करना।
कई दिनों से
पुजारी परेशान है
मंदिर के चौखटे पर कोई मेमना नहीं रोया
शहद चोरी होने पर भी
मधुमक्खी ने नहीं की आत्महत्या।
कई दिनों से
सपने आते हैं मगर
बाढ़ और भूकम्प की खबरों के साथ
जन्म और मृत्यु का डंका बजाते हुए
जागते रहो की बुलंद बांग के साथ।
कई दिनों से
यह भी हो रहा है कि
बादलों के मशक छलछला रहे हैं
बीज पेड़ बनने का सपना देख रहा है
कोयल से रही है अंडे
अपने ही घोसले में
कई दिनों से
एक कवि जाग रहा है रातों में।
6/ बच्चे की गुल्लक तक!
हिमपात के बाद
बिल्ली आग के पास बैठी है
कुत्ता सूखे फ़ाहों पर सुस्ता रहा है
छत से बर्फ़ हटाने वाला आदमी सोच रहा है
कि क्यों कई रातों से भला
भालू उसके सपने में नहीं आया
जबकि पहाड़ की कन्दरा में
शीतनिद्रा तब टूटेगी
जब बाहर बर्फ़ पिघल जाएगी सारी की सारी
भाग्य खिलेगा बसंत जैसा।
एक हिमनदी पहाड़ से खिसक रही है
ढेर सारा बर्फ़ लादे पीठ पर
एक औरत की पीठ से चिपका बच्चा देख रहा है
आग पर बर्फ़ को पानी बनते
वह औरत सोच रही है
कि कहाँ जाती होगी
जो थोड़ी बर्फ़ उड़ रही है भाप बनकर
वो बच्चा चुपके से फिसलना चाहता है पीठ से
पा माँ जानती है
अभी ज़मीन उबड़-खाबड़ है।
प्रजा की सहनशीलता बढ़ती जा रही है
पर राजा को पता है सोलह आने
उसकी नाक कट गई है
अब वो जीभ से सूँघ लेता है फिर भी
जब भी निकलता है शिकार पर
जंगल सदमे में चला जाता है।
लूट के तरीके बदल चुके
बाज़ार सेंध लगाकर
हो चुका है दाखिल घर में
उसकी नज़र पहुँच चुकी है
बच्चे की गुल्लक तक भी
अलाव तापता एक बूढ़ा
बच्चों को सुना रहा है कथा
राक्षस और देवता की।
मैं सोचता हूँ
कि जितना बोलना था
बोला कहीं उससे अधिक गया
जितना सुनना था
सुना कहीं उससे कम गया
7/ वो जब चुप रहता है
वो जब चुप रहता है
उसके चेहरे पर उस वक्त
चाँद आराम कर रहा होता है।
वो जब हँसता है
उसकी आँख से
तितलियाँ उड़ रही होती हैं।
वो जब रूठता है
ऋतु बदल जाती है तब तब
जब लगता है कि
वो कुछ नहीं कर रहा
दरअसल तब वो इंद्रधनुष पर
प्रत्यंचा चढ़ाने के बारे में सोच रहा होता है।
उसका खेतों में टहलना अजीब है
वो पेड़ों से बातें करता है
पत्तों से हरियाली मांग कर जेबें भरता है
फूलों को मशविरा देता है।
उसके अपने खेल हैं
वो साँप-सीढ़ी नहीं खेलता
और न ही शिकार
जब लगता है कि
वो कागज के जहाज उड़ा रहा है
उस क्षण वो हवा में जाकर
घूमती पृथ्वी को निहार रहा होता है।
 8/ किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर!
उसने आग से मांगे चमकीले रंग
और रात के कैनवास पर उकेरी
एक मशाल जलती हुई
इसे थामने के लिए जिस हाथ की
कल्पना की थी
वो हाथ ज्वालामुखी से निकला
और आकाश में ऊँचा उठता गया
अँधेरे में जहाँ जलती हुई मशाल बनी थी
यह धधकता हुआ लावा ठंडा होने पर ही
हुआ कड़ा और मजबूत
धरती पर उजाले का एक बिन्दु बना
अंधकार बहुत बड़ा था
हत्याएँ करने को
और जहाँ हत्यारे को पकड़े जाने का भय था
वहाँ खोज निकाला हत्या करने का नया तरीका
वह आत्महत्या करने को उकसाता था बस
जिन लोगों को अब तक नहीं हुआ था यकीन
कि अराजकता गणतंत्र की दहलीज़ तक पहुँची है
उनकी आँखें फटी और मुँह खुले रह गए
जब संविधान के पहले पन्ने से न्याय जैसा शब्द
राजधानी में अदालत के बाहर सड़क पर आ गया
वो ऐसे सोता है इन दिनों
लोग सोचते हैं सुषुप्त ज्वालामुखी होगा
वो अभागा कहलाया जब से
उसने अपने सर पे
लालटेन टांगना शुरू किया तबसे
हालांकि बदला कुछ नहीं अब तक
उस पर शक करना ठीक नहीं होगा
वो कविता की लय जानता है
वो जानता है यह भी कि
आग से खेलना उतना खतरनाक नहीं होता
जितना भूख से
वो खाली पेट आग पर चल देता है
वो आठवें सुर के गीत लिखता है
कहते हैं कि वो ताल का भी पक्का है
बर्फ़ के दिनों में किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर
और किस्सागो अखरोट भी तोड़ता है ताल में।
 9/ वे पूछते हैं पिता से
आज द्वार के दोनों ओर दीये जले हैं
दीवाली खड़ी है घर की देहरी पर घूंघट उठाए
औरतों ने धो डाले
आँगन से अपने पैरों के निशान
और बिछा दी उस पर मूंज की महीन परत
सजा दी आँगन में रंगोली
लछमी के पैरों के चिन्ह
छापे गए दरवाजे तक
बच्चों की चमकती आँखों
और दीये की रोशनी में
पेट की आग बुझाने वाले
सरकारी कानून की घोषणा
साफ देखी जा सकती है
जर्जर चेहरों पर
इस उत्सव जैसे नज़ारे में भी
बच्चे हैरान हैं कि
उनकी बीस बीघा जमीन से भी
कितने विशाल खेत होंगे सरकार के पास
वे पूछते हैं पिता से
क्या फाकों में गुजर-बसर करने वालों की
बेसुध सोएंगी रातें भरपेट खाकर
अब वह हलवाहा कैसे समझाए कि
संसद के अहाते में नहीं उगती फसलें….
खेतों से रोटी तक का रास्ता
गुजरता है संसद भवन से केवल
वहीं पर होता है फैसला
फाकामस्ती और खाऊ चक्कियों के बीच का
वह हलवाहा कैसे समझाए कि
उनके हिस्से की रोटी के झगड़े-टंटे में
हर बार संसद भवन जीतता है
और किसान हार जाता है
वैसे बाजी में हार-जीत पर
अक्सर नहीं उठाए जा सकते सवाल
केवल आत्महत्या की जा सकती है आसानी से
लालकिले के दस्तावेजों में
दर्ज़ नहीं हो सकतीं
भूखे बच्चों के माओं की संताप आहें
और पिता के आक्रोश का लेखा-जोखा
10/ मैं कहानी सुना रहा हूँ
भोर से ठीक पहले
मैं तुमसे अचानक मिला
घर के बाहर बनी पत्थर की सीढ़ी पर
जैसे तुम मेरा ही कर रही थी इंतज़ार
दरअसल मेरे जाने के बाद के क्षण से ही
हो जाता था तुम्हारा इंतजार शुरू।
कितने बरस बीत गए
तुम्हारे पैर छुए और फिर
गले लग अपने दुःख आँखों से बहा आया
आँख खुली तो देखा अभी भोर का तारा
पहरेदारी में जाग रहा है
जबकि तुम्हारा इंतज़ार अब भी बैठा है
ठीक उसी जगह दहलीज़ के बाहर
पत्थरों की पहली सीढ़ी पर।
मैं सच कहूँगा
पर कुछ लोग कहेंगे
मैं कहानी सुना रहा हूँ…
ठीक यहीं से खेत बिछा रहता है
और खेत में बीचोंबीच
सर उठाए अखरोट का पेड़ करता है पहरेदारी
पहली सीढ़ी पर बैठे इंतज़ार की।
तुमने जीवन भर न सोने की चूड़ियाँ पहनी
न तो कोई बटुआ रखा अपने पास
तुमने कभी करवा चौथ के बारे सुना भी नहीं
पर तुम्हारे अधिकतर दिन करवा चौथ जैसे ही बीते
हालांकि तुम्हारा जाना कोई नई घटना नहीं है
पर कुछ जल्दी ही चले जाने के कारण भी तो हैं…
तुमने अपने जीवन के कुछ साल
इस अखरोट के पेड़ को दिए
कुछ साल पूर्णिमा के रोज़ चाँद ले जाता तुमसे
सामने नदी पार वाला मीठे पानी का झरना भी
तुम्हारे ही दिए बरसों को जी रहा है
बाकी तुम्हार ही बचे हुए दिन पिता काट रहे हैं।
11/ अब भगवान क्रोधित होंगे
तुम्हारा खेल चलता रहेगा
तब तक केवल ज्लचम मुनंजपवद ीमतमण्
जब तक अँधेरा
तुम्हारे खिलाफ़ नहीं हो जाता।
यह भी सुन लो-
तुम्हारा मंच
तुम्हारे नाटक
तुम्हारा किरदार
तुम्हारे मुखौटै
बचे रहेंगे तब तक केवल
जब तक अँधेरा नहीं लिखता आत्मकथा।
अभी तो कर दिए स्थगित
सारे शोध
सुर और संगीत साधकों ने
क्योंकि
खानगीर पत्थर पर घन मारते मारते
घन की आवाज में एक नया सुर साध रहा है
चिरानी स्लीपर चीरते चीरते
आरी की आवाज़ में
एक नई हरकत डाल रहा है।
फिर भी दीवार पर चिपकी घड़ी बता रही है
कि समय जैसी कोई चीज नहीं होती
पृथ्वी का लोकनृत्य करना ही
वास्तव में एक खगोलीय घटना है।
एक साजिश रची जा रही है निरंतर
डर के मारे लोग भाग रहे हैं
घर छोड़कर
बच्चे डरे हुए घर लौट रहे हैं
भविष्यवाणी करने वाले
स्टूडियो में बैठे इंटरव्यू दे रहे हैं
जो रोकना चाहता है वो मारा जाता है।
फिर भी कुछ बातें भूली नहीं गई हैं
ठंडे रेगिस्तान में
चन्द्र और भागा के प्रथम मिलन का क्षण
हवा को याद है
जब उसने बधाइयाँ गाईं थीं
तितलियों को पता है
उनके पैर केवल स्वाद चखने के काम आते हैं।
और यह भी हो रहा है इधर
नन्हा बालक मूर्ति को खिलौना समझ रहा है
पुजारी पिता उसे समझा रहा है
कि देवता की इस मूर्ति में विराट शक्ति है
बच्चा परखने के लिए मूर्ति को पटक देता है
पुजारी  टुकड़े समेटते हुए कहता है-
अब भगवान क्रोधित होंगे
और बच्चे को डाँट देता है।
12/ थोड़ी मिट्टी मांगने आया हूँ
एक सुबह बांग से पहले
उसे एक सपना आया
वो भागना चाहता था बचकर
पर उसके पैर मिट्टी ने पकड़े थे पक्के
उसने अपनी साँसों को
सम्भाल रखा था मुश्किल से
नींद खुलने पर भी हांफना जारी रहा।
दिन चढ़ते ही उसे लगा कि
अब अपनी साँसें गिरवी रखे
खेत वापस मिलने तक
उसकी चिंता यह भी है कि
नदी की साँसों को कैसे बचाया जाए
पेड़ों के पास कम-से-कम
जंगल तो है छुपने के लिए।
रात ढलने लगी तो
दीवारों की धड़कन बढ़ गई
आँगन सिसकने लगा
एक कोने में बैठा आसमान को ताकता
कुत्ता सुबकने लगा
दूसरे कोने में खाट पर लेटा
तारों की ओर टकटकी लगाए
वो प्रार्थना करने लगा।
अंतिम प्रहर में
आँगन पीतल जैसी रोशनी में चमकने लगा
उसके सिरहाने चाँद आ बैठा
उसके माथे को अपनी उँगलियों से
सहलाते हुए बोला
केंचुआ अपनी साँसें मिट्टी में रखता है
मछली के गले में नदी बहती है
बैल अपने खुरों में खेत रखता है
तुम क्यों चिंता करते हो मित्र!
देखो…मैं इनसे थोड़ी साँसें
थोड़ा पानी
थोड़ी मिट्टी मांगने आया हूँ।
(गणेश गनी जन्मः 23 फरवरी 1972 को पांगी (चम्बा) हिमाचल प्रदेश में। शिक्षाः पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए., एम.बी.ए., पी.जी.जे.एम.सी. (इग्नू) सृजनः हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित, कविता से पाठकीय संवाद की एक पुस्तक ‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ हाल ही में प्रकाशित
 और चर्चित। सम्प्रतिः कुल्लू और मंडी के ग्रामीण क्षेत्रों में एक निजी पाठशाला ग्लोबल विलेज स्कूल का संचालन।
सम्पर्कः एम.सी. भारद्वाज हाऊस, भुट्टी कॉलोनी, डाकघर शमशी, कुल्लू -175 126 (हिमाचल प्रदेश)
मोबाइलः 09736500069
ई-मेलः [email protected]
टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय  ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य हैं.)

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