Wednesday, February 8, 2023
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अरुण आदित्य वक्र उक्ति के सहज कवि हैं

बोधिसत्व


कवि अरुण आदित्य की कविता हिंदी में कहाँ उपस्थित है इस बात का आकलन इन पंद्रह कविताओं से नहीं किया जा सकता। वे स्थापित कवि हैं और उनकी हिंदी कवि समाज और साहित्य जगत में एक मान्यता है। वे हमारे अग्रज हैं और सहज स्नेह से भरे विचारवान वक्ता हैं।

उनकी कविता भी सहज होती है लेकिन यह सहजता वैसी नहीं कि उसकी परतें न हों। ऊपर से लगता है कि कविता एक सरल वाक्य है, किंतु जब उसके अंतर में देखते हैं तो पता चलता है कि सरलता तो स्नेह से पास बैठाने का बुलावा है। कड़ाई से बात कह कर वे अपनी कविता के पास किसी को बुलावा भी नहीं देना चाहते। अगर मैं सीधे सीधे कहूँ तो यह कि अरुण आदित्य वक्र उक्ति के सहज कवि हैं। संस्कृत साहित्य या काव्य शास्त्र वाली वक्रोक्ति यहाँ नए संदर्भ में मार्मिक भंगिमा लेकर सामने आती है। केवल उक्ति नहीं रह जाती फिर कविताएँ।

जब समय और युग बहुत औपचारिक हो चला है, एक कवि कैसे कहे अपनी बात। दूसरी तरफ बहुत कठिन-कठोर भाषा और शब्दावली का एक अलग छोर बन गया है कविता का। ऐसे में अरुण आदित्य ने बहुत सोच समझ कर एक अलग रास्ता पकड़ा है। यह रास्ता उनका अपना बनाया हुआ है। थोड़े से शब्दों में कहें तो बिना विस्तार दिए एक नई बात को कहना और फिर उस कहे को बिना अतिरेकी श्रृंगार के छोड़ देना। वे अपनी कविता पर बौद्धिकता का मुलम्मा भी नहीं चढ़ाते। उनकी कविता उनके साफ कथ्य चयन और उसको कह देने के वक्र तरीके से अपना निर्माण पाती है। कवि के लिए यह एक निर्मम दशा होती है। अपनी कविता को बिना कवच-कुण्डल के कविता के समाज में जाने देना क्योंकि कविता की परतें उसे कविता बनाती हैं। वे ही उसे केवल बयान की कविता होने से बचाती हैं।

एक चीनी कहावत है, यदि कोई कवि एक भी प्रतीक देने में सफल है तो समझो उसने अपने कवि होने को सार्थक कर लिया है। अरुण आदित्य भाई तो अनेक प्रतीक देने वाले सिद्ध कवि हैं। यदि मैं उदाहरण से कहूँ तो यहाँ ‘अन्योन्याश्रित’ कविता में एक बिल्कुल नई प्रतीक योजना वे देते हैं। हवा की लहरों पर फूल की मुहर। यहाँ एक काव्यात्मक ऊँचाई की मुहर भी लगाते चलते हैं अरुण भाई। आप उन कुछ हिंदी कवियों में हैं जो अपने काव्य समय की हवा पर अपनी कविता से मुहर लगा कर उस पर अपना होना लिखते हैं।

अरुण आदित्य साधारण के असाधारण कवि हैं। इसीलिये  शब्द चयन में आवश्यकता पड़ने पर वे साधारण के साथ असाधारण का प्रयोग करने से संकोच नहीं करते। लेकिन उस असाधारण में भी एक सरलता का विन्यास सदैव गुंथा रहता है। वे भंगिमा से नहीं भाव से अपनी कविता को संभव करते हैं। इसीलिए शिल्प का आग्रह उस कंटेंट के प्रकटीकरण तक ही सीमित रखते हैं। उनकी किसी कविता में शिल्प के लिए विकलता कभी नहीं मिलेगी क्योंकि वे अपने कथन के लिए रचते हैं। ध्यान कविता के केंद्र में स्थित भाव पर इतना फोकस रहता है कि कई बार शिल्प अंतर्धान हो जाता है।

चलते चलते एक बात की ओर और संकेत करूँगा। कवि अरुण आदित्य जी प्रतापगढ़ के हैं। अवधी उनकी अपनी बोली बानी है लेकिन अपनी कविता में भाषाई क्षेत्रवाद का नारा कभी बुलंद नहीं करते। वे उन कवियों में नहीं कि अवधी का पुट डाल कर एक कविता का संसदीय क्षेत्र बना कर अपने को सुरक्षित कर लें और ऐसा भी नहीं कि अवध की झंकृति उनकी कविता में अलोप हो। लेकिन उन्होंने अपने कथन को संकीर्ण भाषाई उपकरणों से सुरक्षा कवच देने की जगह उसे एक खुला भाषाई मैदान दिया है। लजाधुर, फरफराना, बिछौना, भात, अदहन के साथ वे अन्योन्याश्रित जैसी शब्दावली में अपना काव्य-संसार सुसम्पन्न करते हैं। यह निश्चय ही उनके जैसे सजग कवि को अवध के अप्रतिम कवि तुलसीदास से जुड़ जाने की एक सहज प्रस्तावना है। लेकिन वे कविता को स्थानीयता के संकीर्ण दायरे में बाँध कर रखने के पक्षपाती नहीं दिखते। अपने पहले संग्रह ‘रोज ही होता था यह सब’ की कविताओं में भी उन्होंने इस बात पर सचेत रूप से अमल किया है।

अभी अरुण भाई को आयाम सम्मान मिला है। इस अवसर पर मैं उनके सृजन के सम्मुख नत होकर अपनी शुभकामनाएँ भी प्रेषित करता हूँ।

 

 

अरुण आद‌ित्य की कविताएँ

1. अन्योन्याश्रित

हवा चूमती है फूल को
और फिर नहीं रह जाती है वही हवा
कि उसके हर झोंके पर फूल ने लगा दी है अपनी मुहर

और फूल भी कहां रह गया है वही फूल
कि उसकी एक-एक पंखुड़ी पर हवा ने लिख दी है सिहरन

फूल के होने से महक उठी है हवा
हवा के होने से दूर-दूर तक फैल रही है फूल की खुशबू
इस तरह एक के स्पर्श ने
किस तरह सार्थक कर दिया है दूसरे का होना।

 

2. कागज का आत्मकथ्य

अपने एकांत की छाया में बैठ
जब कोई लजाधुर लड़की
मेरी पीठ पर लिखती है
अपने प्रिय को प्रेमपत्र
तो गुदगुदी से फरफरा उठता हूं मैं

परदेश में बैठे बेटे की चिट्ठी बांचते हुए
जब कांपता है किसी जुलजुल मां का हाथ
तो रेशा-रेशा कांप जाता हूं मैं
और उसकी आंख से कोई आंसू टपकने से पहले
अपने ही आंसुओं से भीग जाता हूं मैं

महाजन की बही में गुस्से से सुलग उठता हूं तब
जब कोई बेबस
अपने ही दुर्भाग्य के दस्तावेज पर लगाता है अंगूठा

मुगालते भी पाल लेता हूं कभी-कभी
मसलन जब उत्तर पुस्तिका की भूमिका में होता हूं
तो इस खुशफहमी में डूबता उतराता हूं
कि मेरे ही हाथ में है नई पीढ़ी का भविष्य

रुपए की भूमिका में भी हो जाती है खुशफहमी
कि मेरे ही दम पर चल रहा है बाजार और व्यवहार
जबकि मुझे अच्छी तरह पता होता है
कि कीमत मेरी नहीं उस चिडिय़ा की है
जिसे रिजर्व बैंक के गवर्नर ने बिठा दिया है मेरी पीठ पर

अपने जन्म को कोसता हूं
जब लिखी जाती है कोई काली इबारत या घटिया किताब
पर सार्थक लगता है अपना होना
जब बनता हूं किसी अच्छी और सच्ची रचना का बिछौना

बोर हो जाता हूं जब पुस्तकालयों में धूल खाता हूं
पर जैसे ही किसी बच्चे का मिलता है साथ
मैं पतंग हो जाता हूं

मेरे बारे में और भी बहुत सी बातें हैं
पर आप तो जानते हैं
हम जो कुछ कहना चाहते हैं
उसे पूरा-पूरा कहां कह पाते हैं

जो कुछ अनकहा रह जाता है
उसे फिर-फिर कहता हूं
और फिर-फिर कहने के लिए
कोरा बचा रहता हूं।

 

3. इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग

कुछ दिनों पहले मिला मुझे एक विचार
आग का एक सुर्ख गोला
सुबह के सूरज की तरह दहकता हुआ बिलकुल लाल
और तब से इसे दिल में छुपाए घूम रहा हूं
चोरों, बटमारों, झूठे यारों और दुनियादारों से बचाता हुआ

सोचता हूं कि सबके सब इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं

उस दोस्त का क्या करूं
जो इसे गुलाब का फूल समझ
अपनी प्रेमिका के जूड़े में खोंस देना चाहता है

एक चटोरी लड़की इसे लाल टमाटर समझ
दोस्ती के एवज में मांग बैठी है
वह इसकी चटनी बना मूंग के भजिए के साथ खाना चाहती है

माननीय नगर सेठ इसे मूंगा समझ अपनी अंगूठी में जडऩा चाहते हैं
ज्योतिषियों के अनुसार मूंगा ही बचा सकता है उनका भविष्य

राजा को भी जरूरत आ पड़ी है इसी चीज की
मचल गया है छोटा राजकुमार इसे लाल गेंद समझ
लिहाजा, राजा के सिपाही मेरी तलाश में हैं

और भी कई लोग अलग-अलग कारणों से
मुझसे छीन लेना चाहते हैं यह आग

हिरन की कस्तूरी सरीखी हो गई है यह चीज
कि इसके लिए कत्ल तक किया जा सकता हूं मैं

फिर इतनी खतरनाक चीज को
आखिर किसलिए दिल में छुपाए घूम रहा हूं मैं

दरअसल मैं इसे उस बुढिय़ा के ठंडे चूल्हे में डालना चाहता हूं
जो सारी दुनिया के लिए भात का अदहन चढ़ाए बैठी है
और सदियों से कर रही है इसी आग का इंतजार।

 

4. कोहरा

कई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घना
कंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता पता नहीं
जहां तक नजर जाए बस धुआं ही धुआं
और धुएं में उलझे हुए जलविंदु अतिसूक्ष्म

जरा सी दूर की चीज भी नजर नहीं आ रही साफ-साफ
टीवी अखबार से ही पता चलता है
कि क्या हो रहा है हमारे आस-पास

45 रेलगाड़ी से कट मरे
54 सड़क दुर्घटनाओं में
140 ठंड से
अलग-अलग कारणों से मरे नजर आते हैं ये 239 लोग
पर वास्तव में तो ये कोहरा ही है इनकी मौत का जिम्मेदार

इनके अलावा और कितने लोग
और कितनी चीजें हुई हैं इस कोहरे की शिकार
इसका हिसाब तो मीडिया भी कैसे दे सकता है
जो स्वयं है इस धुंध की चपेट में

जब इस तरह घना हो तो कोहरे में देखते हुए
सिर्फ कोहरे को ही देखा जा सकता है
और उसे भी बहुत दूर तक कहां देख पाते हैं हम
थोड़ी दूर का कोहरा
दिखने ही नहीं देता बहुत दूर के कोहरे को
और बहुत पास का कोहरा भी कहां देख पाते हैं हम

घने से घने कोहरे में भी
हम साफ-साफ देख लेते हैं अपने हाथ-पांव
इसलिए लगता है
कि एक कोहरा मुक्त वृत्त में है हमारी उपस्थिति
जबकि हकीकत में इस वृत्त में भी
होता है कोहरा उतना ही घना
कि दस गज दूर खड़ा मनुष्य भी नहीं देख सकता हमें
ठीक उसी तरह जैसे उसे नहीं देख पाते हैं हम

इस घने कोहरे में
जब जरा से फासले पर खड़ा मूर्त मनुष्य ही नहीं दिखता मनुष्य को
तो मनुष्यता जैसी अमूर्त चीज के बारे में क्या कहें?

महर्षि पाराशर!
आपने अपने रति-सुख के लिए
रचा था जो कोहरा
देखो, कितना कोहराम मचा है उसके कारण

इस बात से पता नहीं तुम खुश होगे या दुखी
कि धुंध रचने के मामले में
तुम्हारे वंशज भी कुछ कम नहीं
अपने स्वार्थ के लिए
और कभी-कभी तो सिर्फ चुहल के लिए ही
रच देते हैं कोहरा ऐसा खूबसूरत
कि उसमें भटकता हुआ मनुष्य
भूल जाता है धूप-ताप और रोशनी की जरूरत

भूल ही नहीं जाता बल्कि कभी-कभी तो
उसे अखरने भी लगती हैं ये चीजें
जो करती हैं इस मनोरम धुंध का प्रतिरोध।

 

5. चुप रहना बहुत कुछ कहना है

चुप हूं इसका मतलब यह नहीं है
कि बोलने को कुछ है ही नहीं मेरे पास
या कि बोलने से डरता हूं मैं

चुप हूं कि किसके सामने गाऊं या चिल्लाऊं
किस तबेले में जाकर बीन बजाऊं

जिन्हें नहीं सुनाई देती
पेड़ से पत्ते के टूटकर गिरने की आवाज
जिनके कानों तक नहीं पहुंच पा रही
नदियों की डूबती लहरों से आती
बचाओ, बचाओ की कातर पुकार
जिन्हें नहीं चकित करती
अभी-अभी जन्मे गौरैया के एक बच्चे की चींची चूंचू

भूख से बिलख रहे किसी बच्चे की आवाज
जिनके दिल को नहीं कर जाती तार-तार
उनके लिए क्या राग भैरव और क्या मेघ मल्हार

जहां सहमति में हो इतना शोर
कि असहमति में चिल्लाना
उन्हें मनोरंजक गाना जैसे लगे
वहां मेरा चुप रहना, बहुत कुछ कहना है ।

 

6. डायरी

पंक्ति-दर-पंक्ति तुम मुझे लिखते हो
पर जिन्हें नहीं लिखते, उन पंक्तियों में
तुम्हें लिखती हूं मैं

रोज-रोज देखती हूं कि लिखते-लिखते
कहां ठिठक गई तुम्हारी कलम
कौन सा वाक्य लिखा और फिर काट दिया
किस शब्द पर फेरी इस तरह स्याही
कि बहुत चाह कर भी कोई पढ़ न सके उसे
और किस वाक्य को काटा इस तरह
कि काट दी गई इबारत ही पढ़ी जाए सबसे पहले

रोज तुम्हें लिखते और काटते देखते हुए
एक दिन चकित हो जाती हूं
कि लिखने और काटने की कला में
किस तरह माहिर होते जा रहे हो तुम

कि अब तुम कागज से पहले
मन में ही लिखते और काट लेते हो
मुझे देते हो सिर्फ संपादित पंक्तियां
सधी हुई और चुस्त

इन सधी हुई और चुस्त पंक्तियों में
तुम्हें ढूंढ़ते हैं लोग
परतुम खुद कहां ढूंढ़ोगे खुद को
कि तुमसे बेहतर जान सकता है कौन
कि जो तस्वीर तुम कागज पर बनाते हो
खुद को उसके कितना करीब पाते हो?

 

7. क़ालीन

गर्व की तरह होता है इसका बिछा होना
छुप जाती है बहुत सारी गंदगी इसके नीचे
आने वाले को दिखती है
सिर्फ आपकी संपन्नता और सुरुचि
इस तरह बहुत कुछ दिखाने
और उससे ज्यादा छिपाने के काम आता है क़ालीन

आम राय है कि कालीन बनता है ऊन से
पर जहीर अंसारी कहते हैं,
ऊन से नहीं जनाब, खून से

ऊन दिखता है
चर्चा होती है, उसके रंग की
बुनाई के ढंग की
पर उपेक्षित रह जाता है ख़ून
बूंद-बूंद टपकता
अपना रंग खोता, काला होता चुपचाप

आपकी सुरुचि और संपन्नता के बीच
इस तरह खून का आ टपकना
आपको अच्छा तो नहीं लगेगा
पर क्या करूँ, सचमुच वह खून ही था
जो कबीर, अबीर, भल्लू और मल्लू की अंगुलियो से
टपका था बार-बार
इस खूबसूरत कालीन को बुनते हुए

पश्चापात के ताप में इस तरह क्यों झुलसने लगे जनाब?
आप अकेले नहीं हैं
सुरुचि संपन्ना के इस खेल में
साक्षरता अभियान के मुखिया के घर में भी
दीवार पर टंगा है एक खूबसूरत कालीन
जिसमें लूम के सामने खड़ा है एक बच्चा
और तस्वीर के ऊपर लिखा है…
मुझे पढऩे दो, मुझे बढऩे दो

वैष्णव कवि और क्रांति-कामी आलोचक के
घरों में भी बिछे हैं खूबसूरत कालीन
जिनसे झलकता है उनका सौंदर्य बोध

कवि को मोहित करते हैं
कालीन में कढ़े हुए फूल पत्ते
जिनमें तलाशता है वह वानस्पतिक गंध
और मानुष गंध की तलाश करता हुआ आलोचक
उतरता है कुछ और गहरे
और उछालता है एक वक्तव्यनुमा सवाल
जिस समय बुना जा रहा था यह कालीन
घायल हाथ, कुछ सपने भी बुन रहे थे साथ-साथ
कालीन तो बन-बुन गया
पर सपने जहां के तहां हैं
ऊन-खून और खंडित सपनों के बीच
हम कहां हैं?

आलोचक खुश होता है
कि उत्तर से दक्षिण तक
दक्षिण से वाम तक
वाम से अवाम तक
गूंज रहा है उसका सवाल
अब तो नहीं होना चाहिए
कबीर, अबीर, भल्लू और मल्लू को कोई मलाल।

 

8. नींद

वो दिन भर लिखती है आपकी गोपनीय चरित्रावली
और उसी के आधार पर करती है फैसला
कि रात, कैसा सुलूक करना है आपके साथ

वो रात भर आपके साथ रही
तो इसका मतलब है, दिन में
बिलकुल सही थे आपके खाता बही

अगर वह नहीं आई रातभर
तो झांकिए अपने मन में
जरूर दिखेगा वहां कोई खोट
या कोई गहरी कचोट

यानी आप खुद हैं अपनी नींद के नियामक
पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुगालता है
कि वे ही हैं सबके नींद-नियंता

समय के माथे पर निशाना साधने के लिए
कुछ सिरफिरे एक खंडहर से निकालते हैं चंद ईंटें
और भरभरा कर ढह जाता है एक ढांचा
जिसके मलबे में सदियों तक
छटपटाती है कौम की लहू-लुहान नींद
लाखों की नींद चुराकर एक सिरफिरा सोचता है
कि उसके हुक्म की गुलाम है नींद
और ऐसे नाजुक वक्त में भी
उसके सोच पर हंस पड़ती है वह
कि वही जानती है सबसे बेहतर
कि दूसरों की नींद चुराने वाला
सबसे पहले खोता है अपनी नींद
बेचैनी में रात-रात भर बदलता है करवट
उसके दिमाग पर हथौड़े की तरह बजती है
चौकीदार के डंडे की खट-खट

खट-खट के संगीत पर थिरकती नींद
रात भर गिनती है सिरफिरों के सिर
करती है सुबह का इंतजार

क‌ि थोड़ी देर सो सके रात भर का जागा चौकीदार।

 

9. पसीने का गाना

खेत में बहता हूं
चुपके से धरती के कान में कहता हूं
हरा-भरा कर दो किसान का मन

फैक्ट्री में बहता हूं
मशीन से कहता हूं
पैदा करो थोड़ी सी हंसी-खुशी

पौरुष के माथे पर
गर्व से चमकता हूं
संगिनी समीरा के आंचल से कहता हूं
मेहनत का मोती हूं प्यार से सहेज लो

धूप से करियाये
रूप पर दमकता हूं
कवि की कलम कागज से कहती है
देखो-देखो श्रम और सौंदर्य का अद्भुत बिम्ब

 

10. पसीने का होना

आप जो बचते हो धूप से
कतराते हो काम से
चिढ़ते हो पसीने के नाम से

वातानुकूलित कक्ष में भी
हो गए पसीना-पसीना
किसी ने पकड़ तो नहीं लिया
तुम्हारा सफेद झूठ
या काला सच।

 

11. पसीने का रोना

तरह-तरह के सेंट
तरह-तरह के परफ्यूम
भांति-भांति के
डियो की धूम

अनग‌िनत पत्र‌िकाएं
रेडियो-टीवी-इंटरनेट-अखबार
हर जगह मेरे खिलाफ इश्तहार

अपनी गंध के लिए लड़ता मैं अकेला
मेरे खिलाफ इतना बड़ा रेला ।

 

12. लोटे

देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ
कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता
प्यासे होठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ
कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया
बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब

पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएं
जल चढ़ाने और वजू कराने वाले लोटे
अब अकसर लड़ते झगड़ते हैं
और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं

काफी सुखी हैं ये लोटे
पर सबसे ज्यादा सुखी हैं वे
जो बिना पेंदी के हैं

परेशान और दुखी हैं वे
जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं
आजकल पात्रों की सूची से
गायब होता जा रहा है उनका नाम
जग-मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?

राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में
जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में
लुढ़क रही हैं अंतरात्माएं
कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना
ये जो आसानी है
कितनी बड़ी परेशानी है।

 

13. सफलता की अनेक कहानियों का एक नायक

किसी अबोध शिशु के बोध को भी मात देता है उसका भोलापन
उसकी विनम्रता से लजा जाती है जमीन पर बिछी हुई घास
उसके साहस के बोझ से दबा-दबा सा है इतिहास
वह राजा नहीं फिर भी कभी कोई गलती नहीं करता
और बिना गलती किए भी माफी मांगने पर नहीं होता उदास

उसके पास एक सी-सॉ है
जिसके एक ओर बैठा है वह और दूसरी ओर उसकी अंतरात्मा
एक को ऊपर उठाने के लिए जरूरी है दूसरे का नीचे गिरना
पर अभी तक अंतरात्मा को देखने का कोई नैनोस्कोप नहीं बना
लिहाजा लोगों को दिखता है सिर्फ उसका ऊपर उठना

लगातार ऊपर उठता हुआ वह
चुरा लेता है नीचे वालों की नींद
और उनींदी आंखों को बांटता है सपनों की खैरात

वह शेर को बकरी के सपने दिखाता है
और बकरी को हरी घास के
घास को पानी के और पानी को रवानी के

वह एक दूसरे के सपनों को आपस में उलझाता है
और उलझाते-सुलझाते एक आकर्षक चादर बुन जाता है
इतना बारीक कातता है वह
कि उसमें न दिखती है और न हम देखना चाहते हैं
चालाकी की कोई गांठ

गमकते फूल में कौन ढूंढ़ता है सड़ी हुई खाद की बदबू ?

 

14. दु:स्वप्न

रात का दूसरा या तीसरा प्रहर था
निगाह अचानक दीवार घड़ी पर पड़ी
उल्टी दिशा में चल रही थीं उसकी सुइयां

कोने में रखे गमले में भी उग आया था विस्मय
वहां पत्तियों से हरा रंग गायब था
और फूलों से लाल

बच्चे के खिलौनों से भी हुआ था खिलवाड़
हैंड ग्रेनेड जैसी दिख रही थी क्रिकेट की गेंद
तमंचे की नाल में तब्दील हो गई थी बांसुरी

हिम्मत करके बुकशेल्फ की तरफ देखा
किताबें सिर झुकाए पंक्तिबद्ध
जा रही थीं कबाड़खाने की ओर
अचानक किसी शरारती किताब ने धक्का दिया
जमीन पर गिर गई बच्चे की ड्राइंग बुक
खुल गया वह पन्ना जिसमें उसने बनाया था
जंगल में भटक गए आदमी का चित्र
मगर ताज्जुब कि उस दृश्य से
अदृश्य हो चुका था आदमी
दृश्यमान था सिर्फ और सिर्फ जंगल

कमरे में बहुत अंधेरा था
पर उस बहुत अंधेरे में भी
बहुत साफ साफ दिख रहा था ये सारा उलटफेर

उजाले के लिए बल्ब का स्विच दबाना चाहा
कि लगा 220 वोल्ट का झटका
और इस झटके ने ला पटका मुझे
नींद और स्वप्न से बाहर

घबराहट में टटोलने लगा अपना दिल
वह धड़क रहा था बदस्तूर
सीने में बायीं तरफ
मैंने राहत की सांस ली
कुछ तो है जो अपनी सही जगह पर है।

 

15. पहाड़ झांकता है नदी में

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में –

अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में
झांकने की हिम्मत न करे कोई पहाड़।

 

 

दुष्यन्त पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, बेकल उत्साही सम्मान, आयाम सम्मान से सम्मानित कवि अरुण आदित्य. जन्म – 02 मार्च 1965 (प्रतापगढ़ )

प्रकाशित कृतियाँ: रोज ही होता था यह सब (कविता संग्रह), उत्तर वनवास (उपन्यास) कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

असद जैदी द्वारा संपादित ‘दस बरस’ और कर्मेंदु शिशिर द्वारा संपादित ‘समय की आवाज़’ में कविताएँ संकलित़। कुछ कविताएँ पंजाबी मराठी और अंग्रेज़ी में अनूदित़। सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी़।

सम्प्रति: अमर उजाला गोरखपुर संस्करण के संपादक ।

सम्पर्क: 9873413078
मेल: adityarun@gmail.com

 

 

टिप्पणीकार बोधिसत्व। हिंदी के कवि लेखक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी।

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में 21 साल से सक्रिय हैं। पटकथा लेखन के साथ निर्माता भी हैं।

चार कविता संकलन और शोध ग्रंथ प्रकाशित हैं। अन्य कई किताबें प्रकाशन की दिशा में हैं, जिनमें महाभारत की आलोचना पर एक किताब, एक कविता संकलन और एक नाटक भी शामिल है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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