Wednesday, February 8, 2023
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शीतयुद्ध की वापसी

हाल में ही खबर आयी कि इंडोनेशिया में मार्क्सवाद को गैरकानूनी बना दिया गया है। सरकार के इस कदम के विरोध में वाम प्रकाशकों ने मुहिम चलायी। इसके बावजूद आशंका बनी कि ऐसे ही कदम अन्य तमाम मुल्कों में भी उठाये जा सकते हैं। इस खबर से दोनों विश्वयुद्धों के बीच के माहौल की याद हो आयी जब समाजवाद के विरुद्ध असली हथियारबंद लड़ाई की जगह पर वैचारिक लड़ाई दुनिया भर में लड़ी गयी थी। अमेरिका के नेतृत्व में संचालित इस अभियान में लगभग सभी पूंजीवादी शासन वाले देशों में वामपंथी बौद्धिकों को हाशिये पर डाला गया।

असली युद्ध न होने के बावजूद अमेरिका और रूस, दोनों देशों में युद्ध की तैयारी हमेशा जारी रहती थी। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कामकाज इनकी तनातनी के चलते गतिरोध का शिकार हो जाता था। माना जाता था कि इस वैश्विक खेमेबंदी के चलते बहुत नुकसान हो रहा है। जब नब्बे के दशक में सोवियत संघ का पराभव हुआ तो इसे शीतयुद्ध की समाप्ति मानकर खुशी जाहिर की गयी। ऐसी उम्मीद थी कि हथियारों का जखीरा एकत्र करने में जो संसाधन लगाये जा रहे हैं उनका निवेश अब जनकल्याण के लिए होगा। जिस आशा के साथ यह खुशी जाहिर की गयी थी वह कपूर की तरह जल्दी ही बिला गयी। अचरज की तरह शीतयुद्ध की जगह गर्मयुद्ध ने ले ली और एकाधिक शक्ति केंद्रों के रहने से कायम शक्ति संतुलन तिनके के महल की तरह बिखर गया। एक ही शक्ति केंद्र के बतौर अमेरिका रह गया जिसकी साम्राज्यी महत्वाकांक्षा खुलकर प्रत्यक्ष होने लगी। एकाधिक देशों के साथ धौंस धमकी का निर्लज्ज अमेरिकी बरताव रोज रोज की बात हो गया ।

लैटिन अमेरिका के देश तो हमेशा ही अमेरिकी हस्तक्षेप का शिकार होते रहे थे। अब हस्तक्षेप का विस्तार मध्य पूर्व तक हुआ। इस प्रसंग में इराक की लड़ाई तो पूरी तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुजाहिरा थी जब किसी देश के भीतर घुसकर उसके शासक को फांसी दे दी गयी। उस अपराध में अमेरिका ने इंग्लैंड समेत तमाम देशों को भागीदार बनाया । युद्ध की बात हो तो सबसे हालिया युद्ध के जिक्र से बचना मुश्किल है। विगत कुछ महीनों से यूक्रेन में युद्ध जारी है। रूस का तर्क है कि यूक्रेन को नाटो में शामिल करके पश्चिमी देश उसके दरवाजे तक पहुंच जाना चाहते हैं और इससे उसकी सीमा की रक्षा को खतरा पैदा हो गया है। रूस के विरोधियों का तर्क है कि पुतिन ने ज़ारशाही के जमाने के रूसी साम्राज्य की स्थापना की खातिर यह युद्ध छेड़ा है।

इन परस्पर विरोधी तर्कों से अलग किस्म की एक परिघटना देखने में आयी है जिसके बारे में अभी कम ध्यान दिया गया है। हाल में रटलेज से कास्पर रेकावेक की किताब ‘फ़ारेन फ़ाइटर्स इन यूक्रेन: द ब्राउन-रेड काकटेल’ का प्रकाशन हुआ । किताब ऐसे योद्धाओं से साक्षात्कार पर आधारित है जो विदेशों से यूक्रेन में रूस से लड़ने के लिए गये हैं। ये विदेशी योद्धा किसी दक्षिणपंथी अंतर्राष्ट्रीय संजाल के अंग हैं। इस प्रवृत्ति से पश्चिमी देशों के राजनेताओं को भी चिंता हो रही है। इस तरह के तमाम दक्षिणपंथी आतंकी समूह तमाम देशों में राजनीतिक अस्थिरता के स्रोत बनते जा रहे हैं। इस सिलसिले में याद दिलाने की जरूरत नहीं कि अफ़गानिस्तान में रूसी दखल से लड़ने के लिए जिस पुनरुत्थानवादी प्रवृत्ति को हवा दी गयी उसने बाद में भस्मासुर की भूमिका निभायी ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हिटलर की पराजय में सोवियत संघ की निर्णायक भूमिका के कारण उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी लेकिन क्रांति के समय से ही उसके विरोध में जो वैचारिक और व्यावहारिक अभियान पश्चिमी देशों ने चलाया हुआ था उसे उन्होंने तनिक भी मद्धिम नहीं पड़ने दिया । एक हद तक इस अभियान ने भी सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के शासन के बिखरने में मदद की। सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने युद्धोत्तर दुनिया में अपनी बरतरी का दावा पेश किया था । इसी तरह ब्रेटन वुड्स की संस्थाओं की मार्फत उसने विश्व अर्थतंत्र को भी अपने लाभ के हिसाब से नियंत्रित करने की योजना बनायी। सोवियत संघ का पतन उसके लिए इतनी भारी सफलता थी कि फ़ुकुयामा ने इतिहास के ही अंत की घोषणा कर डाली थी। इतिहास का अंत तो क्या होता नये जमाने की लड़ाइयों को जायज ठहराने के लिए सभ्यताओं के बीच टकराव का बहाना बनाया गया।

फिलहाल शीतयुद्ध की वापसी के जो संकेत सुने जा रहे हैं उनका विश्वव्यापी वैचारिक पहलू तो है ही, ठोस रूप से चीन के साथ जारी टकराव की निरंतरता भी है । इस संघर्ष में युद्ध के नये नये रूप अपनाये जा रहे हैं । क्यूबा के साथ लड़ाई के लिए व्यापार प्रतिबंध का जो तरीका आजमाया जाता रहा है उसकी अमानवीयता को इराक में पूरी दुनिया ने देखा जब दवाओं के अभाव में बच्चों तक को जान से हाथ धोना पड़ा था । चीन के साथ टकराव में भी इसी तरह के तमाम उपाय किये जा रहे हैं जिससे उसे आर्थिक रूप से अशक्त बनाकर झुकाया जा सके । लगातार जारी इस टकराव की बानगी हाल में छपी कुछ किताबों से मिल सकती है। बताते चलें कि नवउदारवाद के साथ आये वैश्वीकरण को अब पश्चिमी देश ही धता बता रहे हैं और उन देशों में संकीर्ण तथा नफ़रती राष्ट्रवाद का बड़े पैमाने पर उभार हुआ है । इसके मुकाबले चीन ने आर्थिक मोर्चे पर वैश्वीकरण का खूब लाभ लिया हालांकि इसके कारण उसके अर्थतंत्र और समाज में समस्याओं की बाढ़ आ गयी । फिलहाल यह होड़ अत्यंत नाजुक दौर में पहुंच गयी है। हाल में सिमोन & शूस्टर से प्रकाशित क्रिस्टोफर मिलर की किताब ‘चिप वार: द फ़ाइट फ़ार द वर्ल्ड’स मोस्ट क्रिटिकल टेकनोलाजी’ से इस संघर्ष के नये मोर्चों की एक झलक मिल सकती है ।

इसी तरह से व्यापार युद्ध भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । इस मसले पर राहुल नाथ चौधरी के संपादन में ‘द चाइना-यू एस ट्रेड वार ऐंड साउथ एशियन इकोनामीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना और उपसंहार के अतिरिक्त किताब के बारह लेख चार हिस्सों में संयोजित हैं। पहले हिस्से के लेखों में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध के वैश्विक आर्थिक असर, दूसरे में क्षेत्रीय अर्थतंत्र की सम्भावना, तीसरे में हिस्से में वरीयता प्राप्त सहभागियों के लाभ और आखिरी चौथे हिस्से में तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़े लेख शामिल किये गये हैं।

इसी प्रसंग में ट्राइकान्टिनेन्टल से विजय प्रसाद की प्रस्तावना के साथ ‘द यूनाइटेड स्टेट्स इज वेजिंग ए न्यू कोल्ड वार: ए सोशलिस्ट पर्सपेक्टिव’ का प्रकाशन हुआ । इसमें जान बेलामी फ़ास्टर, जान रास और डेबोरा वेनेज़ियाले के लेख शामिल हैं। विजय प्रसाद का कहना है कि विश्व आर्थिक मंच की हालिया बैठक में हेनरी किसिंजर ने कहा कि यूक्रेन में रूस के लिए संतोषजनक संधि का प्रयास करना होगा । उनके अनुसार अब लड़ाई यूक्रेन की आजादी की नहीं बल्कि रूस के विरुद्ध हो गयी है। अधिकतर राजनयिकों के विरोध के बावजूद किसिंजर ने नये शीतयुद्ध की सम्भावना पर आपत्ति प्रकट की।

विजय प्रसाद का मत है कि अमेरिका में दूरगामी लाभ के लिए तात्कालिक नुकसान का बुरा नहीं माना जाता। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही अमेरिकी शासनतंत्र अपने मुल्क की बरतरी की वकालत करता रहा है और इसके लिए तमाम खतरों को उठाने में परहेज नहीं बरतता। साफ है कि लाभ मुट्ठी भर लोगों को होता है और नुकसान साधारण लोगों को उठाना पड़ता है । इराक के तेल पर धन्नासेठों के एकाधिकार के लिए निम्न वर्ग से भरती सैनिकों के बलिदान को ही उनकी देशसेवा माना जाता है । इसी सोच के चलते मनुष्यता के सम्मान और प्रकृति के दीर्घजीवन की परवाह नहीं की जाती । फिलहाल रूस और चीन के विरुद्ध युद्धोन्माद के पीछे यही सोच काम कर रही है ।

माइकेल हडसन की किताब ‘द डेस्टिनी आफ़ सिविलाइजेशन: फ़ाइनैन्स कैपिटलिज्म, इंडस्ट्रियल कैपिटलिज्म आर सोशलिज्म’ इस मामले में और भी नये पहलुओं को उभारती है। उनका कहना है कि विश्व अर्थतंत्र के सबसे बड़े तनाव का कारण फिलहाल का अमेरिकी वर्चस्व है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सभी वैश्विक आर्थिक निकायों की नीतियों को अमेरिकी राजनय ही आकार देता रहा है। शीतयुद्ध में सोवियत संघ की पराजय के बाद तो उसकी ताकत आसमान चूमने लगी है । सोवियत संघ के खात्मे के बाद के बीस सालों में आक्रामक सैन्य पहलों द्वारा उसने अपनी ताकत को सुदृढ़ किया है । 2008 के बाद इसकी आक्रामकता आत्मघाती होती जा रही है। तमाम देश उसके घेरे से बाहर निकलने लगे हैं। इसके कारण अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद दूसरे देशों की आय और संपत्ति हथियाकर अपनी ताकत को बुलंद रखने की उसकी क्षमता घटती जा रही है। दुनिया के स्तर पर उसका टकराव अब चीन के साथ हो रहा है। लेखक ने इस टकराव को अर्थव्यस्था के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया है। इस टकराव को केवल दो आर्थिक महाशक्तियों की होड़ के बतौर समझना वे सही नहीं मानते। यह दो राजनीतिक आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच का टकराव है। ये दोनों समाजवादी और पूंजीवादी नहीं हैं बल्कि यह टकराव औद्योगिक अर्थतंत्र और किरायाजीवी वित्तीय तंत्र के बीच का टकराव बन गया है। हडसन के अनुसार अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता और अपने अर्थतंत्र के हित में दूसरे देशों के शोषण पर निर्भर रह गयी है।

हमारा यह समय इतिहास की नजर से नयी सहस्राब्दी में प्रवेश का समय है । इसमें न केवल राजनीतिक बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी पुराने टकराव नयी शक्ल में सामने आ रहे हैं। फ़्रांसिसी क्रांति ने दुनिया के पैमाने पर बादशाहत के खात्मे के जिस युग का आगाज किया था उस पर अब तक का सबसे बड़ा संकट आया है। पूरी दुनिया में तानाशाहों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है और लोकतंत्र को बचाने तथा नये सिरे से गढ़ने की लड़ाई नये दौर में पहुंच गयी है। वैश्विक पूंजी ने सत्ता के साथ मिलकर जनता के जीवन और अधिकारों पर हमला बोल दिया है। हालिया महामारी इसका केवल एक रूप थी। प्रकृति और पर्यावरण के दोहन से मानव प्रजाति के जीने लायक हालात मुश्किल होते जा रहे हैं । शोषण और दमन के नवीन हथियारों को आजमाने का यह समय वैचारिक मोर्चे पर भी गहन युद्ध के संकेत लेकर आ रहा है। शिक्षा की प्रबल भूख के समय ही सामान्य लोगों को उससे वंचित किया जा रहा है। इस अंधेरे दौर में खुशी की बात यह है कि लोगों ने पूरी तरह समर्पण नहीं किया है। इस दौर में मुक्ति की आकांक्षा नये रूपों में प्रकट हो रही है और पूंजी की विराट ताकत को समझने और उससे जूझने की तैयारी ही इस समय के टकराव की प्रमुख वजह है।

गोपाल प्रधान
प्रो. गोपाल  प्रधान अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्राध्यापक हैं. उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद , समसामयिक मुद्दों पर लेखन और उनका संपादन किया है
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