समकालीन जनमत
कविता जनमत

अरमान आनंद की कविताएँ भावुक बयान ही नहीं प्रतिबद्धता और बदलाव की छटपटाहट भी हैं

कविता के क्षेत्र में आये हर युवतर और नए कवि का मौलिक स्वर रोमांस होता है।रुमानियत उनकी संवेदना का मूल सेंसर होता है।अपने समय की त्रासदी को लिखने के दौरान भी वह रूमान रच रहा होता है और प्रेम उसका अपना मुहल्ला होता है जहां वह कभी भी बेखटके आवाजाही कर सकता है।

70 के दशक के आवेगमय समय मे भी प्रतिरोध और क्रांति की बात करने वाला युवा कवि भी मूलतः प्रेम और रुमानियत के भरोसे ही क्रांति की बात सोचता था।

लेकिन आज के प्रतिबद्ध युवतर और नये कवियों की पीढ़ी आज के संकट को कविता में कुछ ज्यादा ही सीधे त्रासद और मुठभेड़ की तरह बरत रहा है।

किसी एक या कुछ कवियों के नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन अगर हम ध्यान से देखें तो ये पाते हैं हमारे समय की त्रासदी का सीधा और कलाविहीन प्रतिरोध ही आज के नए कवियों का रोमांस है।

याद नही पड़ता कि इसके पहले कब हिंदी कविता में ऐसा समय आया था जब कविता इस तरह प्रत्यक्ष प्रतिरोध का माध्यम बनी थी।मुक्तिबोध की कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ में कर्फ्यू के दौरान एक पेंटर कहता है–
“फ़िलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे
हम धधकायेंगे ।
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!

यहाँ मार्शल लॉ और सत्ता की तानाशाही के खिलाफ कलाकार अपनी महत्ता हड़ताली पोस्टर चिपकाने में खोजता है।पोस्टर चिपकाना उसके लिए सृजन की तरह है।

आज के युवतर कवियों में अपने आस पास की विडंबनाओं का प्रतिकार कविता में साफ साफ और तत्काल दिखने लगा है।

सोशल मीडिया के फैलाव ने तात्कालिक प्रतिवाद की इस परिपाटी को विस्तार दिया है।लेकिन एक तरह से देखा जाय तो इस तात्कालिक प्रतिवाद की उपयोगिता ने हिंदी कविता को काफी नए पाठकों से रूबरू कराया है।

ऐसे ही एक युवा कवि अरमान आनंद की कविताओं को पढ़ते हुए अहसास होता है अब नए कवि का रोमांस प्रेम कविता के जरिये नहीं बल्कि प्रतिवाद के जरिये सामने आने लगा है।

बीएचयू के हिंदी विभाग से ‘समकालीन कविता और सत्ता विमर्श’ विषय पर शोधरत और बेगूसराय के एक इंटर कॉलेज में अध्यापक के बतौर सेवारत अरमान आनंद की कविताएं हमारे बिल्कुल आज की सामाजिक,राजनैतिक विद्रूपताओं का टटका प्रतिरोध हैं।व्यवस्था के प्रति एक दबा हुआ अक्रोश उनसे कविताएं लिखवाता है।फ़ैसला शीर्षक कविता में आक्रोश का रूप देखिए–
अपने साथियों का नरमुंड ले कर दिल्ली में भटकने के बदले

किसानों
उठो
कपास उगाओ
बनाओ फांसी की सबसे मोटी
और सबसे बड़ी फांद वाली रस्सी
जिसमे अंट सके
अंधेर नगरी वाले राजा का गला

तुम्हारा कवि
तुम्हारी रक्षा के लिए
आज जल्लाद की भी भूमिका अदा करेगा”
यह आक्रोश उसी युवा रूमान से निकला है जो हर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में अपनी भूमिका तलाशता है।अक्रोश का ऐसा ही रूप ‘तानाशाह’ कविता में दिखता है-
“लो
मेरी खोपड़ी से निकाल लो मेरा दिमाग
शहर की जिस भी गली से गुजरता दिखे तानाशाह का टैंक
उस टैंक के नीचे डाल देना
मेरा यकीन है तानाशाह के चीथड़े उड़ जायेंगे”

अपनी खोपड़ी के विस्फोट से तानाशाह का टैंक उड़ा देने का आत्मविश्वास बिना रुमानियत के नहीं आ सकती।भूमंडलीकरण के दौर में जवान हुई कवियों की पिछली पीढ़ी इस तरह के आक्रोश और निराशा से नही गुजरी थी।लेकिन आज संकट जिस कदर व्यापक और सर्वग्रासी हो गया है वैसी स्थिति में आज के कवि रास्ते की तलाश की बेचैनी में एक गहरे विक्षोभ से गुजर रहे हैं।जब यह ज्वार थमेगा और स्थितियां शायद कुछ ठीक होंगी तो इस विक्षोभ और मोहभंग के कुछ सकारात्मक अवशेष हिंदी कविता में सार्थक तत्व के रूप में बच जाएं।

अरमान की इन शुरुआती कविताओं में अनुभूति और प्रेक्षण की एक द्वंद्वात्मक गति है।जो समय के साथ सधी रहे तो कवि के रूप में अरमान और मूल्यवान हो सकते हैं।’मकबूल’ कविता जो मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन पर लिखी गई है।

हुसैन पर लिखी गई हिंदी की संभवतः यह पहली कविता होगी।इसमें कवि ने मकबूल के रचनात्मक संघर्ष,उनकी शख्शियत और उनके जीवन के आखिरी समय मे भारत से बिछोह और भारतीयों की उपेक्षा को अच्छे से उकेरा है-

“फिल्म के पोस्टर बनाता था
एक लड़का
मुम्बई की सड़कों पर
सीढियाँ लगा कर लोइयों से पोस्टर के चौकोर हिस्से आपस में चिपकाया करता था
जैसे आकाश पर चाँद सितारे चिपका रहा हो
और फिर सबसे आँखें बचा कर
नीले कोरे समंदर पर बादल से उड़ते घोड़ों की हिनहिनाहट लेप देता

गर्द उड़ाते हवा से बातें करते
शानदार अरबी घोड़े
और उनकी पीठ पर हिंदुस्तानी कहानियां चिपकी होतीं

कैनवास पर उभरते बदन के पेचों खम को उसके हाथ यूं तराशते जैसे
गुलाम अली की कोई गजल चल रही हो

रुईयों की तरह सफ़ेद झक्क
अमिताभ कट वाले बाल
गोल चश्मा
कुरतेबाज़ बदन
कूचियों में उलझी लंबी उँगलियाँ
और
ख़ाली खुले पैर
जाने क्या ज़िद थी”

यह कविता कवि के रूप में अरमान आनंद की अनुभूति की तरलता और गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।इस लय को बरकरार रखना और धार को तीखा करना इनकी चुनौती बनी रहेगी।

ऐसी ही एक कविता है ‘बच्चे मारे जा रहे हैं’। मुजफ्फरपुर के अस्पताल में बच्चों की मौत से आहत समय मे यह कविता बच्चों की मौतों को व्यापक त्रासदी के रूप में लेती है।कवि की नजर में सीरिया के जंग में मारे जा रहे बच्चों से लेकर सूडान में भूक से मर रहे बच्चों तक का दुःख है।

अरमान आनंद की कविताओं की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वह त्रासदी का भावुक बयान तो है साथ ही उसके भीतर एक अंतर्निहित प्रतिबद्धता और बदलाव की छटपटाहट भी है।अरमान अपनी कविताओं में उम्मीद पैदा करते हैं।आइए पढें उनकी चन्द कविताएँ!

अरमान आनंद की कविताएँ

1. बच्चे मारे जा रहे हैं

आसमान पर मक्खियां भिन भीना रही हैं
सूरज निर्दोष के खून का धब्बा है
पृथ्वी
मेज पर नचा कर छोड़ा हुआ एक अंडा है
जिसके गिरकर फूटते ही
सारा आदर्श बह कर बेकार हो जाएगा

जिसके होठों से अभी भी नहीं उतरा था
मां के दूध का रंग
वो तीन साल का बच्चा मर गया
सूडान में भुखमरी से मरा
सीरिया से भागता हुआ मेडिटेरियन सी में डूब कर मरा
पेरिस में गोलियों का शिकार हुआ
और
भारत में एक कस्बे में उसके हिस्से की हवा छीन ली गयी
और दूसरे से भात

वह अभी कहाँ जान पाया था
कि
रंगों का भी मजहब है
उसकी भी एक जाति है
भगवा
हरा
और
नीला
सिर्फ रंग नहीं है
एक राजनीति है

दुनियां के कई खेल हैं
गुड्डे गुड़ियों
और काठ की गाड़ियों से अलग

कुर्सियां भी सिर्फ कुर्सी खेल
तक सीमित नहीं है

पिता के कंधे पर
उसका मरा हुआ बच्चा
पृथ्वी और पाप से भी अधिक भारी होता है
पसलियों से अधिक आत्मा थकती है
माँ से अधिक नियति रोती है

अरे यम मृत बच्चे की इस लटक रहे हाथ की हथेली को थामो तो जरा
अरे यम एक पल के लिए तो रुको तो जरा
इस हथेली से मुलायम और मजबूत
भला दुनिया की कोई और चीज़ है क्या

जाने से पहले
एक बार अपनी माँ की उँगली को भींच लेते बच्चे
देखो तुम्हारी माँ के स्तनों का नमकीन समंदर
उसकी आंखों में उतर आया है
जिस पर सिर्फ तुम्हारा हक था

बच्चे
अभी जबकि तुम्हारे सवालों से दुनियां को जूझना था
और तुम खामोश हो
अभी जब तुम्हारी खिलखिलाहटों में इस उदास दुनियाँ को हँसना था
और तुम खामोश हो
अभी जबकि तुम्हारे आंसुओं में
बुद्ध अपनी करुणा का पाठ पढ़ते
और तुम खामोश हो

तुम्हारी चुप्पी भारी पड़ रही है
पृथ्वी को
जहाँ से उठा लिए हैं धरती से तुमने अपने पांव
वहीं से धरती का कलेजा फट रहा है।

2. तानाशाह
………………………
लो रे लेखक
उठाओ अपना पोथा-पतरा
चढ़ जाओ उधर जिधर फांसी है
तानाशाह का फरमान है
लोकतंत्र की विचारधारा बासी है

तानाशाह
आदतन अमर होना चाहता है
और ये तब तक चाहता है जब तक वह मर नही जाता
तानाशाह ने जब मारी अपने दिमाग में गोली
या कि जब
विश्व के सबसे बड़े तानाशाह ने छोटे तानाशाह का कर दिया क़त्ल
क्या तुमने देखा
तानाशाह के सर से निकलने वाला खून
बागी के खून से कितना मिलता जुलता है

कभी मिले हो तानाशाह से
एक नियम पसंद तानाशाह
निजी तौर पर बेहद अराजक होता है
वह कुछ भी हो सकता है
एक बड़ा कलाकार
कलाप्रेमी
अभिनेता
मसखरा
नया नया प्रेमी
धोखा खाया हुआ आशिक
कवि
अय्याश
जुबान का पाबंद
हर जुर्म की सज़ा फांसी
और उसके फैसले नहीं बदलते
सिंहासन बदलता है वक्त बदलता है
भूखंड बदलता है
तानाशाह के तौर तरीके नहीं बदलते

एक तानाशाह की सांसों से उठता है सिगार का धुंआ
जैसे उठती है जहरीली गैस
बद्जुबानों से भरे छोटे से कमरे में
करती है उनके स्वप्नों में अनधिकृत प्रवेश
वहां पलती स्त्री शिशु का गला घोंट देने के लिए
जिसका नाम
पिछले दिनों वो आजादी बता रहे थे

तानाशाह को डर हथियारों से नहीं लगता
तानाशाह को सबसे ज्यादा डर
भीड़ में खड़े उस आखिरी आदमी के विचारों से लगता है
जिसके मुंह में इन्कलाब बंद है
वही आखिरी आदमी उसका पहला निशाना है

लो
मेरी खोपड़ी से निकाल लो मेरा दिमाग
शहर की जिस भी गली से गुजरता दिखे तानाशाह का टैंक
उस टैंक के नीचे डाल देना
मेरा यकीन है तानाशाह के चीथड़े उड़ जायेंगे

3. मकबूल
————————–
फिल्म के पोस्टर बनाता था
एक लड़का
मुम्बई की सड़कों पर
सीढियाँ लगा कर लोइयों से पोस्टर के चौकोर हिस्से आपस में  चिपकाया करता था
जैसे आकाश पर चाँद सितारे चिपका रहा हो
और फिर सबसे आँखें बचा कर
नीले कोरे समंदर पर बादल से उड़ते घोड़ों की हिनहिनाहट लेप देता

गर्द उड़ाते हवा से बातें करते
शानदार अरबी घोड़े
और उनकी पीठ पर हिंदुस्तानी कहानियां चिपकी होतीं

कैनवास पर उभरते बदन के पेचों खम को उसके हाथ यूं तराशते जैसे
गुलाम अली की कोई गजल चल रही हो

रुईयों की तरह सफ़ेद झक्क
अमिताभ कट वाले बाल
गोल चश्मा
कुरतेबाज़ बदन
कूचियों में उलझी लंबी उँगलियाँ
और
ख़ाली खुले पैर
जाने क्या ज़िद थी

उसकी अम्मी बचपन में गुजर गईं थीं
वह जब भी आकाश से उतरता
भागती गोल धरती को कैनवास सा बिछा देता
और देर तक
गोल गोल रेखाएं खींचता
और इन सबसे ऊब जाता
तो भीमसेन की आवाज पर रंगों का डब्बा उड़ेल देता

कहते हैं एक दिन किसी ने उसकी कूचियां चुरा लीं
और रंगों का वह रूठा बादशाह अपने ही अरबी घोड़े पर बैठ कर कहीं दूर चला गया

भला कोई किसी से उसकी मां दो बार कैसे छीन सकता है
लेकिन उसके साथ ऐसा ही हुआ

अब वह भी दूर तक बिछे रेत में
गोल गोल आकृतियां बनाता है
उन गोलाइयों के बीच मादरे हिन्द की याद में बिलखता
प्यासे रेगिस्तान के होठ अपने आंसुओं से तर करता है

मकबूल फ़िदा हुसैन
एक वो शख़्स जिसने हिंदुस्तान का नाम पूरी दुनिया में मकबूल किया
हिंदुस्तानी उसे सिवा नफरतों के कुछ नहीं दे पाए

 

4.फैसला
……….
बतौर कवि
और
दुनियां के अदने से चिंतक की हैसियत से
स्वयं को न्यायाधीश मानकर
सबसे पहले ये तय कर दिया मैंने
कि
सरकार ही आरोपी है
उसे फांसी दे दो
लिखा और
तोड़ दी कलम
कि इस आरोपी को
मौत तक
फांसी पर लटकाए रखा जाय

अब सरकार चाहे तो
मुझे
देशद्रोही करार दे
चाहे तो
नक्सली
चाहे तो
वह मुझे
पागल कहे
चाहे तो
मुझे उकसाये
आत्महत्या के लिए
जैसा किसानों को उकसाती है
अभावों के बीच रखकर

अपने साथियों का नरमुंड ले कर दिल्ली में भटकने के बदले

किसानों
उठो
कपास उगाओ
बनाओ फांसी की सबसे मोटी
और सबसे बड़ी फांद वाली रस्सी
जिसमे अंट सके
अंधेर नगरी वाले राजा का गला

तुम्हारा कवि
तुम्हारी रक्षा के लिए
आज जल्लाद की भी भूमिका अदा करेगा

 

5.भीड़ के बारे में कुछ बातें
………………………………

जहां तक मेरी जानकारी है

भीड़ ने सबसे पहले
ईश्वर के बेटे को मारा था

जिसके जन्म से अंग्रेजी सभ्यता की शुरुआत हुई थी

भीड़ हमेशा नामजद के साथ अन्य है

भीड़ और पागल पर सजा मुकर्रर नहीं होती

भीड़ जितना डरी हुई होती है
उतनी ही हिंसक होती है

भीड़
नोताओं, तानाशाहों, आतंकियों का पहला निशाना है

भीड़ सफलता की निशानी है

भीड़ बाज़ार है

भीड़
लोकतंत्र का डुप्लीकेट है

दुनिया के पास तीन तरह के लोग हैं
पहला जो भीड़ ला सकता है
दूसरा जो भीड़ बनता है
तीसरा जो भीड़ का शिकार होता है

भीड़ के अध्ययन से पता चलता है
मनुष्य स्वभाव से अराजक और पशु है
और मनुष्यता की लड़ाई
एक दिनचर्या है

इतना सब लिखने और कहने पर
हो सकता है
भीड़ आए
या तो मुझे मार डाले
या मुझे खुदा घोषित करे

 

6. होम वर्क

प्रत्येक वाक्य को पांच पांच बार लिखें

मेरे देश में बेटी का बाप लुटता है
मेरे देश में बेटी का बाप पिटता है
मेरे देश में हर बेटी के बाप की आंत फटी है
मेरे देश में हर बेटी के बाप की लाश हवालात में पड़ी है

मेरे देश के बाबा बलात्कार करते हैं
मेरे देश के बाबा मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनते हैं
मेरे देश के बाबा बलात्कारियों को संरक्षण देते हैं

मेरे देश में बेटे के जन्म पर मिठाई का डब्बा आता है
मेरे देश में बेटी के जन्म पर नमक का पैकेट आता है

मेरे देश में माँ देश है और बेटी देह है

 

7. जुर्माना
_______
तुम मुझे
जब गौर से देखोगे
मेरे होठों पर मिलेंगे
मेरे माशूका के दांत
मेरी पीठ पर मेरी बीवी के नाख़ून
झुके हुए कन्धों पर टंगा हुआ दफ़्तर
मेरी ऊंगली के काले धब्बों पर
चुनी हुई सरकार
और नीचे से
ठोंक दिया गया है मेरा संस्कार

मैं
हर रोज़
आदमी होने का
जुर्माना भरता हूँ

8. गौरैया

गौरैया
तुम गायब हो गयी हो
क्या सचमुच गायब हो गयी हो तुम गौरैया ?
कितनी जरुरी थी तुम आँखों के लिए
तुम्हारा न दिखना डर, भय ,आशंका और आकुलता से भर देता है
कहीं तुम काली रात में घूमती सफेद बस में तो सवार नहीं हो गयीं
कहीं सिगरेट के दागों के साथ तो नहीं पायी गयी
पुलिस की किसी रेड में
हॉस्पिटल के पीछे
गर्भ से निकाल फेंकी गयी नवजात
तुम्हीं तो नहीं थी
जिसके लिए सड़क के कुत्ते छीना झपटी कर रहे थे.

गौरैया
बताओ न
तुम्हारी किडनी बिकी कि देह
मेरे घर की प्यारी लक्ष्मी
तुम अभी न उतरी थी आँगन की नीम से
कहाँ छुप्पा हो गयी
मैं तुम्हे ढूंढ के धप्पा बोलूंगा देखना

प्यारी गौरैया तुम्हे पता है
अनुपस्थिति अपने आप में एक राजनीति है
और गायब कर देना
सत्ता का
जादूगरों से भी पुराना खेल
प्यारी गौरैया
ये दुनियां कोई संसद् तो नहीं
जिससे तुम वाक आउट कर गयी हो
गौरैया तुमने एक बार सलीम अली के बारे में बताया था
उनसे पूछूँ क्या तुम्हारा पता
गौरैया बताओ न तुम गुजरात गयी कि पाकिस्तान
तुम्हारा कौन सा देश था गौरैया
तुम किस सरहद पर मारी गयी
तुम किसका लिखा गीत गाती थी
इकबाल का या इकबाल का
हम तुम्हेँ ही बचाने के नारे लिख रहे थे
और तुम गायब हो गयी गौरैया
मेरी प्यारी गौरैया
कुछ बताओ न बताओ
ये तो बता दो
तुम्हें इश्क में शहादत मिली कि जंग में

9. दीवार में चुनवा दी गयी है इक खिड़की

दीवार में चुनवा दी गयी है इक खिड़की

खिड़की
जिस पर
हंस पर बैठ
उड़ आता था राजकुमार
और बढ़ जाता था फूलकुमारी का वजन

दीवार में चुनवा दी गयी वो खिड़की
जहाँ से पद्मिनी झांकती और हंस देती थी
अलाउद्दीन गश खा कर गिर जाता था

खिड़की जिसमें चिड़िया ही नहीं पत्थर भी लाते थे खत और फोन नम्बर

खिड़की के बाहर चकोरों की तादाद बताती है
खिड़की में एक चाँद जवां है

दहलीज
जब पाँव में बेड़ियाँ बनती है
खिड़की रास्ता देती है
इश्क की बाँहों तक का पता बताती है

इसी चुनवा दी गयी खिड़की ने नीचे की मिटटी में ढूंढो
इक आशिक का खत दफन हैं
इक लैला की टूटी चप्पल मिलेगी
गाँव के बीचोबीच
बरगद के नीचे जो साफा बांधे चौधरी बैठा है न
उसकी नाक भी यहीं कहीं घास में खोई मिलेगी

खिड़की होती है दीवार में
जैसे काँटों बीच खिल ही जाता है गुलाब
खिड़की में उठती हैं जब दीवारें
गुसलखानों की छतों से रस्सियाँ झूलने लगती हैं

……………………………………

खाली खिड़कियाँ नाकाम आशिकों को बहुत मुंह चिढाती हैं
इतना भी बुरा नहीं दीवार का उठ जाना

10. नींद जिसे रात भर नहीं आती

नींद जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह दुनिया बदलने के सपने देख रहा हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह प्रतिघात की योजनाएं बना रहा हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसके कानों में गूँज रही हो
बच्चों के रोने की आवाजें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसकी बाहों में पड़ी हो एक सभ्यता की लाश
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है वह अभी अभी जान गया हो
सत्ता की सारी साजिशें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे प्रेम हुआ हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे चाँद की लुका-छिपी पसंद हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसे भागना है आज की रात
धता बताते हुए
किसी बूढ़ी खाप-पंचायत को
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह निगलने वाला हो पूरा का पूरा देश
बदलने वाला हो
मानवों को संसाधनों में
पीने वाला हो
हजारों हजार लीटर कच्चा तेल
सता रही हो उसे
अपने गोदाम को बाज़ार में खाली करने की फ़िक्र
रौंदने वाला हो
एक पूरी की पूरी कौम को आतंकवादी बताकर
चबा जाने वाला हो
एक
पूरी की पूरी भाषा
काट खाने वाला हो
किसी मजदूर के हाथ पैर
रात भर चोरी चोरी बदल रहा हो शब्दावलियाँ
तानाशाही को जनवाद में
लूट को शांति बता रहा हो
रच रहा हो
पूरी की पूरी विष की विचारधारा
फिराक में हो
दिमागों के शिकार के
इन्हें नींद आनी चाहिए
सुला दो इन्हें
वही गीत गाकर
जो तुमने गाया है
धान रोपते हुए
महुआ चुनते हुए
पेड़ों से लकड़ियाँ काटते हुए
चरखा कातते हुए
फाँसी पर चढ़ते हुए
अल्फ्रेड पार्क में गोलियां खाते हुए
किसी तानाशाह का सर कुचलते हुए
सुला दो इन्हें
इन्हें नींद आनी चाहिए
और यह नामुमकिन नहीं है…

11. तीस की उम्र में ब्रेकअप (कविता ) 
……………………………………….

कविता जानती है
कि उसकी जवानी मुट्ठी में बंद रेत है

पिछले पांच ब्रेकअप में तीन तो नादानी में हो गए
चौथा उससे कम उम्र का था
इसलिए शादी के मूड में नहीं था
और पांचवां
बेहतरी के तलाश में
कुछ और कम उम्र की
और कुछ कम फ्रस्टेटेड लड़की की तलाश में निकल गया

कविता को शुरुआत में जींस बिलकुल भी पसंद नहीं थी
लेकिन उम्र की ढलान आने लगी है
तो उसने जींस पहनना शुरू कर दिया है
उसे ऐसा महसूस होता है
कि
इसमें उसकी उम्र कुछ कम लगती है
नितम्बों का उभार कुछ और खिलता है
लड़कों के दिल में
उसके लिए प्यार कुछ और खिलता है

बालों की स्ट्रेटनिंग और मेकअप ने तीस से छब्बीस तो बना ही दिया है
लेकिन सोच पर उम्र का असर तो आ ही जाता है

अबकी बार जो भी मिलेगा
मजा लेकर निकल जाने नहीं देगी कविता
पहले पूछेगी
शादी तो करोगे न

सुनो
मैं उस टाइप की लड़की नहीं हूँ
एक जिस्म भर नहीं हूँ मैं
सिर्फ फ़िल्में देखने और साथ घूमने वाली भी नहीं हूँ

मैं सब समझती हूँ
सब जानती हूँ

कविता ने एक लिस्ट बनाई है
वह वो सब पूछेगी
जिसके बिना पर उसे पिछले सारे लड़कों ने उसे ब्रेकअप दे दिया था

क्योंकि अब उसके पास गलतियाँ करने भर की उम्र नहीं बची है

अब प्यार भी उसी से करेगी जो शादी करेगा

हो तो यह भी सकता है कि वह पहले शादी करले
फिर उसे उसी से प्यार हो जाये
जैसा मम्मी और पापा को हुआ
बुआ और फूफा को हुआ

लेकिन वो सारी बगावती बातें
जो हॉस्टल में उसने अपनी सहेलियों को आलोकधन्वा की कविता पढ़कर सुनाते हुए समझाई थीं
ओह
कैसे मुंह दिखाएगी सहेलियों को

वैसे कहाँ लिखा है कि शादी की ही जाए

लेकिन कविता को दुल्हन बनने का बड़ा शौक है
वो अपनी शादी में बिलकुल वैसा ही लहंगा बनवाएगी जैसा कटरीना ने फिल्म में पहना था
कविता ने दिलवाले दुल्हनियां कई कई बार देखी है
बचपन में राज राज चिल्लाती सरसों के खेत में बावली सी दौड़ा करती थी

प्यार तो बेहद जरुरी चीज़ है
बिना प्यार के कैसे जी पायेगी वो
और सच भी तो है
कोई कैसे किसी से बिना देखे, मिले या जाने शादी कर ले
प्यार होना जरूरी होता है

क्या एक बार और प्यार किया जा सकता है
क्या एक बार और कहा जा सकता है
कि मैं बस तुम्हारे लिए बनी हूँ
मैं बस तुम्हारे लिए जीना चाहती हूँ
मैं बस तुम्हारे लिए मरना चाहती हूँ
और वो बस ये कह दे
हाँ मैं तुमसे शादी करूँगा

कविता ने इसके अलावे दुनिया का हर लफ्ज सुना है
सिवाय इसके

तीस की उम्र में ब्रेकअप
आपको रोने भी नहीं देता ठीक से

हॉस्टल का पंखा कितना धीमे धीमे चलता है
उसे अब ख्याल आया है
जून के महीने में ब्रेकअप नही करना चाहिये था उसे
गर्मी से वैसे ही सर फट रहा है
दिल टूटने से या गर्मी से
किस से परेशान होऊं समझ नहीं आता

पिछले तीन साल से उसने कहाँ ध्यान दिया था
उसके कमरे की खिड़की से एक लड़कों वाला हॉस्टल दीखता है
दो मैना और एक कबूतर रोज उसकी खिड़की पर आते हैं

आजकल वह जब भी हॉस्टल लौटती है
एक बात गौर करती है
जिन लड़कियों के प्रेमी हैं
उनकी खिडकियों पर शीशे रखे होते हैं खाली उदास से
और जिनका ब्रेकअप हो चुका होता है
उनकी खिडकियों पे वो खुद होती हैं
शीशों की तरह

कविता कहीं भाग जाना चाहती है
लेकिन कहाँ
किसके साथ
उसके कानों में आलोक की थरथराती हुयी आवाज गूंजती है
लड़की भागती है
तो क्या जरुरी है उसके साथ
कोई लड़का भी भागा हो
लड़की भागती है दर्शकों से भरे जगर मगर स्टेडियम में
कविता बार बार सोचती है
अब इस उम्र में
क्या वह स्टेडियम में भाग भी सकती है
उसके भागने का इंतजार कर रहे उसके अपने लोग
क्या वाकई छुपायेंगे उसका शीशा उसका आबनूस उसकी सात पलों वाली नाव
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में जिसे वह आलमारी में कहीं छोड़ आई है
क्या उसके पास कोई उम्र बची है

तीस की हो गयी कविता
सोचती है
कहाँ होगा वह लडका जो उसे कहीं भगा ले जाए

जिसका इंतज़ार हर समंदर के दरवाजे पर खड़ी वह कर रही है

 

 

 

(कवि अरमान आनंद, सहायक शिक्षक
कॉलेजिएट इंटर कॉलेज बेगुसराय. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी शोध विषय समकालीन हिन्दी कविता में सत्ता विमर्श
मेल: [email protected]
फ़ोन: 8299026101

टिप्पणीकार रामायन राम युवा आलोचक हैं  और उत्तर प्रदेश के शामली में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। रामायन  ‘जन संस्कृति मंच’ उत्तर प्रदेश इकाई के राज्य सचिव हैं.)

 

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