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अनिता भारती की कविताओं में अम्बेडकर

 अनिता भारती


डॉ. अम्बेडकर एकमात्र ऐसे विश्वस्तरीय चिंतक है जिन्होने परिवार और समाज में स्त्री की स्थिति कैसी होइस पर गहन चिंतन-मनन किया।

पुरूषों के साथ स्त्री को भी समानता व स्वतन्त्रता मिलेउसे समाजिक आजादी के साथ आर्थिक आजादी भी प्राप्त होपरिवार में उसका दर्जा पुरूष के समान होइसके लिए उन्होने दलित गैर दलित स्त्रियों को समाज परिवर्तन के आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़ने का आह्वान किया।

दोनो जगत यानि घर और समाज में नारी की हीनतर स्थिति को देखकर उन्होने इस विषय पर खूब सोचा कि भारतीय स्त्री की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन कैसे आये। यह क्रांतिकारी परिवर्तन परिवार तथा समाज में नारी को विशेषाधिकार देकर ही किया जा सकता था।

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि स्त्री तथा समाज की उन्नतिशिक्षा के बिना नही हो सकती। सुन्दर और सुशिक्षित व सभ्य परिवार के लिए आवश्यक है कि पुरूषों के साथ-साथ घर की स्त्रियां भी पढ़ी लिखी हों ताकि वे समाज परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल हो सके। समाज के परिवर्तन द्वारा ही स्त्रियों की मुक्ति सम्भव है।

डॉ. अम्बेडकर का अनुभव जगत देश-विदेश दोनो था। दोनो जगह स्त्रियों ने कितनी प्रगति की इसकी तुलना करने पर वह जमीन आसमान का अन्तर पाते थे। विदेशो में उन्होंने स्त्रियों को स्वस्थ वातावरण में पढ़ते-लिखते व उसकी प्रतिभा को विकसित होते देखा थापरन्तु भारत में हिन्दू स्त्री अनेक प्रकार की रूढ़ियोंअन्धविश्वासों व सामाजिक बन्धनों में जकड़ी थी।

हिन्दू स्त्री में दलित स्त्री की हालत तो और शोचनीय थी। घर और समाज में उनका मानसिकशारीरिकआर्थिक शोषण होता था।

दलित स्त्री के लिए उसका परिवार किसी नरक से कम नही था। दलित परिवारों में स्त्री शिक्षा नाममात्र के लिए भी नही थी। उन्होनें विदेश में शिक्षित व खुशहाल स्त्री को देखा तो उन्हे उनकी खुशहाली का महत्व शिक्षा में निहित नज़र आया।

डॉ. अम्बेडकर को विश्वास था कि शिक्षित होकर ही स्त्री अपने अधिकारों को छीन सकती है। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि परिवार में स्त्री शिक्षा ही वास्तविक प्रगति की धुरी है।

जिस घर में पढ़ी लिखी स्त्री व मां हो उस घर के बच्चों का भविष्य अपने आप उज्जवल हो जाता है। स्त्री शिक्षा को डॉ. अम्बेडकर अत्याधिक महत्व देते हुए कहते है अगर घर में एक पुरूष पढ़ता है तो केवल वही पढ़ता है और यदि घर में स्त्री पढ़ती है तो पूरा परिवार पढ़ता है।

डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय साहित्य में प्राचीन से लेकर आधुनिक साहित्य के साथ-साथ विदेशी साहित्य का भी अच्छी प्रकार से अध्ययन मनन किया था।

साहित्य अध्यययन के दौरान शिक्षित व स्वतन्त्र स्त्रियों उदाहरण के रूप में उनके सामने बुद्ध की थेरियों से लेकर सावित्री बाई फूले व उनकी कई महिला मित्र थीं जिन्होनंे पढ़-लिख कर समाज परिवर्तन के लिए काम किया।

इसलिए वह दलित स्त्री को शिक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध थे। परिवार में औरत की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने शिक्षा के महत्व के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाहबहु-पत्निवाददेवदासी प्रथा आदि के खिलाफ भी अपनी जनसभाओं में बात रखी।

परिवार में लड़की-लड़के का पालन-पोषण समान रूप से होना चाहिए। उन्होनें दलित परिवारों से अनुरोध किया कि वे अपने बच्चों की खासकर लड़कियों की शादी बचपन में ना करें।

 पालक अपनी संतान की शादी कम उम्र में करके उनके जीवन को नरक ना बनाएं।’ डॉ. अम्बेडकर ने विवाह जैसे सवाल पर भी बातचीत की। पत्नी कैसी होनी चाहिए इस बारें में पुरूषों का विचार जाना जाता है। वैसे ही पति कैसा हो इस बारें में पत्नी का मन जान लेना जरूरी है।

स्त्री एक व्यक्ति है और उसे भी व्यक्ति स्वतन्त्रता की सुविधा होनी चाहिए। धनंजय कीर की पुस्तक डॉ. अम्बेडकर – लाईफ एण्ड मिशन सेद्ध डॉ. अम्बेडकर भारतीय परिवारों में लड़कियों की सुदृढ़ स्थिति चाहते थे। परिवार में लड़के-लड़कियों का सही प्रकार से पालन तभी हो सकता था जबकि परिवार में बच्चे कम हो।

भारतवर्ष में खुशहाल परिवार के लिए प्रचलित परिवार नियोजन का नारा आजादी के बाद का है परन्तु बाबा साहब ने स्त्री के संदर्भ में परिवार नियोजन के फायदे बहुत पहले ही देख लिए थे।

वे ये भी जानते थे कि इस सब के लिए देश के युवा वर्ग को समझाने व उसको साथ लेने से ही परिवार को खुशहाल बनाया जा सकता है इसलिए उन्होने 1938 में विधार्थियों की एक सभा में बोलते हुए कहा परिवार नियोजन की जबाबदारी स्त्री पुरूष दोनो की होती है बच्चों का लालन पालन हम अच्छी तरह कर सकते हैं। कम संतान होने पर स्त्रियां अपनी शक्ति बाकी कामों में लगा सकती हैं।’ ;धनंजय कीर की पुस्तक से द्धे स्त्रियों की समानता और स्वतन्त्रता के संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर बाकी चिंतको व समाज सुधारको से काफी आगे की समझ रखते थे।

अन्य समाज सुधारक जहां नारी शिक्षा को परिवार की उन्नति व आदर्श मातृत्व को संभालने या नारी की स्त्रियोंचित गुणों के कारण ही उसकी उपयोगिता पर बल देते थे परन्तु नारी भी मनुष्य है उसके भी अन्य मनुष्यों के समान अधिकार है इस बात को स्वीकार करने में हिचकिचाते थे।

उसकी इस मानवीय गरिमा को सर्वप्रथमतः आधुनिक युग में डॉ. अम्बेडकर ने ही स्थापित किया। वे चाहते थे कि पत्नी की स्थिति घर में दासी जैसी ना होकर उसकी हैसियत बराबरी की हो। उन्होने लड़कों के समान लडकियों को पढ़ाने के साथ-साथ उसका विवाह भी उचित उम्र में होइस पर बार-बार जोर दिया।

इस विषय पर बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर कहते हैं शादी एक महत्पूर्ण जबाबदारी है। शादी करने वाली हर औरत को उसके पक्ष में खड़ा रहना चाहिए लेकिन उसको दासी नहीं बल्कि बराबरी के नाते या मित्र के तौर पर। यदि ऐसा करोगी तो अपने साथ समाज का भी अभ्युदय करोगी और अपना सम्मान बढ़ाओंगी। इस हेतु सभी स्त्रियों को पुरूष के बराबर हिस्सेदारी कर खुद को शासक की जमात बनाने हेतु प्रयास करना चाहिए। 

धनंजय कीर की पुस्तक डॉ. अम्बेडकर – लाईफ एण्ड मिशन सेद्ध डॉ. अम्बेडकर महिलाओं को उसकी समाज द्वारा दी गई भूमिकाएं मांपत्नीबहन एवं उसके स्त्रियोंचित गुणों से इतर उसको पूर्ण स्वतन्त्रस्वस्थ एवं प्रगतिशील कर्मठ मानवी के रूप में देखते थे।

उनके जीवन दर्शन में निहित स्वस्थ प्रफुल्लित शिक्षितसमाजिक सरोकारों में भागीदार दलित और गैर दलित स्त्री अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान पर स्थापित थी।

बाबासाहेब के जन्मदिन पर अपनी लिखी कुछ कविताओं के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि!

अनिता भारती की कविताएँ

1)कितनी अजीब बात है
जब हम सोचने लगते है
सिद्धांत केवल कहने की बात है
चलने की नही
हम सत्य न्याय समता
लिख देना चाहते है किताबों में
होता है वह हमारे
भाषण का प्रिय विषय
पर उसे नही अपनाना
चाहते जीवन में
हम बार-बार कसम
खाते है अपने आदर्शों की
देते है दुहाई उनकी
भीड देख जोश
उमड़ आता है हमारा
जय भीम के नारों से
आंख भर आती है हमारी
गला अबरुद्ध हो जाता है
फफक कर रो उठते है हम
दुख तकलीफ उसकी याद कर
जो झेली थी भीम ने उस समय
पर हम आंख मींच लेते
उससे
जो अन्याय हमारी आंखों
नीचे घट रहा है

2) सुनो मैने तुमसे कहा
ये भीमराव बाबा है
तुमने कहा हां ये हमारे भीम बाबा है
और झट उतारने लगे उनकी आरती
तुमने खूब पहनाएं उन्हे हार
और खूब चढाई धूप बत्तियां
जबकि तुम्हारे पास खडा था
उम्मीद से घिरा एक बच्चा
और दूर से दिखता एक स्कूल
जिसमें चली जा रही थीं
बच्चों पर बच्चों की कतारें
वह भी उसके पास जाना चाहता था
उसमें बैठना चाहता था
क्या यह तुम्हारे लिए सचमुच ही
नामुमकिन था कि वह जा पाए स्कूल
औरों की तरह
पर छोडो…

तुम ले आए थे बाबा को बाजार में
लगा रहे थे बोली
कह रहे थे देखो- देखो
हमारे बाबा ने झेली थी
दुख तकलीफें
जो तुमने दी थी उन्हें
अब तुम्हें भरना पडेगा उन सबका हर्जाना
उनकी तकलीफों के पहाड़
बदल रहे थे तुम्हारी
देश- विदेश यात्राओं की टिकटों में
कर रहे थे तुम विदेश यात्राएं
बोल रहे थे सभा-सम्मेलनों में
धिक्कार रहे थे उन्हें
जो सदियों से कर रहे थे अत्याचार
पर तुम्हारे पास एक अत्याचार ग्रस्त
औरत खडी थी
लेकिन तुम्हारी आँखे उसकी पीड़ा से दूर
आसमान पर टिकी थी
जो तुम्हे अभी मिलना बाकी था

अब तुम बाबा को
घसीट लाए हो
व्यापार में

लोगों को बाबा के अपनाने के
लाभ-हानि सीखा रहे हो
सीखा रहे हो उनको
सूद की तरह लाभ बटोरना
जबकि तुम्हारे पास तुम्हारे
भाई-बहन भूख से बिलख रहे है

हासिल है तुम्हे बिजनेस यात्राएं
अपने उन्ही भूखे भाई- बहनों के बूते

बाबा के तमाम उपलब्धी भरे चित्र
गले में, हाथ में, लाकेट में
गले पर लटकाएं या फिर
कीमती बक्से में सहेज कर धरे
ठीक एक स्वर्णकार की तरह
जो तुम्हारी ही तरह सिद्धांतहीन लोगों को
चाहिए तुम्हारी ही तरह पहनने के लिए

3) देखो!
मुझमें बसता है एक अम्बेडकर
देखो !
तुममें बसता है एक अम्बेडकर
जो हमारी
नसों में दौडते नीले खून की तरह
ह्रदय तक चलता हुआ
हमारे मस्तिष्क में समा जाता है
अरे साथी
निराश ना हो
हमें पता है
जो यहां घुला है
वही उठेगा
इस मिट्टी से एक दिन
फिर दुबारा
अपनी प्रतिमा गढते हुए
नया भीमराव

4) बाबा तुम रो रहे हो
राजनीति की कुचालों में
तुम्हारी दलित जनता
धक्का खाकर कुचली
भीड सी चीत्कार रही है

तुम सोच में हो
कुचली भीड सी जनता
अपना आकार ले रही है
उसके सोए भाव जाग रहे है
वह संगठित हो रही है

तुम हँस रहे हो
दबी कुचली जनता
मिट्टी से उठना सीख गई है
फूल खिल रहे है चारों ओर
उठो! यह भोर का आगाज है
हाँ तुम हँस रहे हो बाबा

5)

प्रिय मित्र
क्रांतिकारी जयभीम
जब तुम उदास होते हो
तो सारी सृष्टि में उदासी भर जाती है
थके आंदोलन सी आँखे
नारे लगाने की विवशता
जोर-जोर से गीत गाने की रिवायत
नही तोड़ पाती तुम्हारी खामोशी

मुझे याद है
1925 का वह दिन
जब तुम्हारे चेहरे पर
अनोखी रौनक थी
संघर्ष से चमकता तुम्हारा
वो दिव्य रुप
सोने चांदी से मृदभांड
उतर पडे थे तालाब में यकायक
आसमान ताली बजा रहा था
सितारे फूल बरसा रहे थे
यूं तो मटके पकते है आग में
पर उस दिन पके थे चावदार तालाब में
आई थी एक क्रांति
तुम्हारी बहनें उतार रही थी
हाथों पैरों और गले से
गुलामी के निशान
और तुम दहाड रहे थे
जैसे कोई बरसों से सोया शेर
क्रूर शिकारी को देखकर दहाडे
मुझे याद है आज भी वो दिन
जब चारों तरफ जोश था
और उधऱ
एक जानवराना क्रोध था

तुम बढ रहे थे क्रांतिधर्मा
सैकडो क्रांतिधर्माओं के साथ
उस ईश्वर के द्वार
जिसे कहा जाता है सर्वव्यापी
पर था एक मंदिर में छुपा
उन्होने रोका,बरसाये डंडे
पर तुम कब रुके ?
तुम आग उगल रहे थे
उस आग में जल रहे थे
पुरातन पंथी क्रूर ईश्वरीकृत कानून
हम गढेगे अपना इतिहास
की थी उस दिन घोषणा तुमने
दौड गई थी शिराओं में बिजली
उस दिन,
जो अभी तक दौड रही है
हमारी नसों में, हमारे दिमाग में
और हमारे विचार में

6)
भूख प्यास और दु:ख में
सर्दी, गर्मी, बरसात में
जमीन पर, कुर्सी पर
तुमने जी भर ओढ़ा, बिछाया, लपेटा
अम्बेडकरी चादर को
फिर तह कर चादर
रख दी तिलक पर
और तिलक धारियों के साथ सुर मिलाया
हे राम! वाह राम!
तुमने छाती से लगाई तलवार
और तराजू बन गया तुम्हारा ताज
पर जूता !
जूता तो पैरो में ही रहा
समझोते की जमींन पर चलते-चलते
कराह उठा, चरमरा उठा
हो गए है उसकी तली में
अनगिनत छेद
उन छेदों से छाले
पैरो में नहीं
छाती पर जख्म बनाते है
और लहुलुहान पैर नही
जूतों की जमातें है

(राधाकृष्णन शिक्षक पुरस्कार, इंदिरा गांधी शिक्षक सम्मान, दिल्ली राज्य शिक्षक सम्मान, विरसा मुंडा सम्मान, वीरांगना झलकारी बाई सम्मान, ‘बेस्ट सोशलवर्कर सम्मान’ से सम्मानित लेखिका-कवयित्री अनिता भारती दलितों और स्त्रियों के हक़ में बोलने और लिखने के कारण साहित्य की दुनिया का एक चर्चित नाम हैं। इनका कविता-संग्रह “एक क़दम मेरा भी…” प्रकाशित हो चुका है।  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। इसके अतिरिक्त ‘युद्धरत आम आदमी’ के विशेषांक ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’  एवं ‘अपेक्षा’ के संपादक मंडल में चिंतन’ विशेषांक में विशेष सहयोग)

संपर्क: फोन नंबर – 9899700767
ईमेल – anita.bharti@gmail.com

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