समकालीन जनमत
जनमत

जहाँ केवल मूर्ति पूजी जाएगी वहाँ जनता भूख से मरेगी

 नित्यानंद गायेन


बीते 11 अक्टूबर को जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) के रिपोर्ट के अनुसार भाजपा शासित झारखंड राज्य की आधी से अधिक आबादी भुखमरी के कगार पर है. यह सर्वे बीते 15 से 30 सितम्बर के बीच कराये गये थे.

यह सर्वे राज्य के 15 जिलों में करीब 1057 घरों पर किया गया था.  राज्य की 59.3 प्रतिशत जनता को ही एक दिन में तीन वक्त का खाना मिल पाता है. 26 प्रतिशत जनता को सिर्फ 2 वक्त का खाना मिलता है, जबकि 4 प्रतिशत को एक वक्त का ही खाना मिलता है. दिन में 4-5 बार खाना खाने वाली जनता सिर्फ 10 प्रतिशत ही है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर पहुंच गया है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018 में भारत का स्थान अन्य दक्षिण एशियाई देशों जैसे श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश से भी नीचे है. यह वही झारखंड जहाँ भूख से तड़पती एक साल पहले 11वर्षीय मासूम संतोष कुमारी की माँ को आधार नम्बर न होने के कारण 8 महीने तक राशन नहीं मिला था और दो मुठ्ठी भात के लिए चीखते हुए संतोष ने दम तोड़ दिया था.

भूख से मरने वाली अकेली संतोष नहीं थी. गिरीडीह की 58 वर्षीय सावित्री देवी  भी इसी राज्य में भूख से मर गई थी. कारण वही प्रशासन की लापरवाही की वजह से महिला का राशन कार्ड नहीं बन पाया था. इसकी वजह से वह राशन नहीं मिला था. ऐसी कई मौतें राज्य भर में भूख के कारण हुई हैं.  पिछले एक वर्ष में झारखंड में कम-से-कम 15 लोगों की भूख से मौत हो गयी है. इनमें से 6 आदिवासी, 4 दलित और 5 पिछड़े समुदाय के थे. ये सभी मौतें पेंशन या जन वितरण प्रणाली से राशन न मिलने के कारण हुई हैं.

झारखंड की बड़ी प्रतिशत जनसँख्या को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता. 40 प्रतिशत से भी अधिक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चें कुपोषित हैं. झारखंड सरकार ने लगातार भूख से हों रही मौतों को रोकने के लिए किसी प्रकार की कार्यवाई नहीं की है. न रद्द किए गए राशन कार्ड पुनः बनाए गए हैं.

ऐसे में सूचना है कि झारखंड सरकार ने पिछले चार साल में विज्ञापनों पर तीन अरब से भी ज़्यादा रुपए खर्च किए हैं. राज्य में विज्ञापन जारी करने वाली संस्था सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (पीआरडी) ने सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत यह जानकारी दी है. राज्य सरकार ने साल 2014 से 12 दिसंबर 2018 तक विज्ञापन मद में ख़र्च के लिए 323 करोड़, 76 लाख, 81 हजार रुपये का आवंटन किया है.

वैसे तो भुखमरी से देशभर में हर साल लाखों लोग मरते हैं किन्तु सवाल यह है कि अच्छे दिनों के नारों के साथ जो सरकार आई थी उसे इन मौतों पर कोई दुःख या अफ़सोस नहीं है, शर्म की बात तो दूर. जबकि इनके मंत्री और सांसद-विधायक से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक के बेटे की आमदनी कई गुना बढ़ चुकी है .

याद हों कि ठीक इसी तरह पिछले साल मुंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकारते हुए कहा था कि वो कुपोषण पर गंभीर नहीं है. अदालत ने यह टिप्पणी डॉ अभय बंग द्वारा पेश एक रिपोर्ट पर की थी जिसमें यह कहा गया था कि राज्य में कुपोषण से हर साल 11,000 लोगों की मौत हो जाती है.

बात केवल भुखमरी और कुपोषण से मौतों तक सीमित नहीं है. भाजपा शासित उत्तर प्रदेश के योगी राज में गोरखपुर के अस्पताल में बिना ऑक्सीजन के 32 बच्चों की मौत हुई थी. क्योंकि सरकार के पास 70 लाख रुपए नहीं थे ऑक्सीजन का बकाया चुकाने के लिए. जबकि मूर्तियों के निर्माण के लिए भाजपा के पास लाखों –करोड़ों हैं. ऐसे में यह तो स्वाभाविक है –जहाँ केवल मूर्ति पूजे जायेंगे वहां जनता भूख से मरेगी.

(लेखक नित्यानंद गायेन दिल्ली में रहते हैं, स्वतंत्र पत्रकार और कवि हैं।)

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