शिक्षा में ‘बैंकिग व्यवस्था’ के बरक्श ‘उत्पीड़ितों के शिक्षा शास्त्र’ की खोज

पुस्तक

डॉ. दीनानाथ मौर्य


“मेरी माँ ने मुझे सिखाया था की ईश्वर बहुत अच्छा है, इसलिए मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि समाज में जो वर्गभेद है, उसके लिए न ईश्वर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है न नियति को…मुझे इस कथन पर कभी विश्वास नहीं हुआ कि ‘मैंने अपना निर्माण स्वयं किया है’ दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता. शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहीं आस-पास बहुत से अनाम लोग भी छिपे रहते हैं.” –पाओलो फ्रेरे
‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पुस्तक लैटिन अमरीका के ब्राजील वासी पाओलो फ्रेरे ने लिखी है. पाओलो फ्रेरे को हम ऐसे शिक्षाशास्त्री के रूप में जानते हैं जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में न सिर्फ विश्वविद्यालयी शिक्षा ग्रहण की; बल्कि वे लंबे समय तक अपने देश में चलाये जा रहे साक्षरता अभियान से भी जुड़े रहे. उन्होंने रेसिफे विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर के रूप में शिक्षा के दर्शन और इतिहास का अध्यापन भी किया. अपने लंबे अनुभव और अध्ययन से वे इस निष्कर्ष पर पहुचें कि-“शिक्षा भी एक राजनीति है और जिस प्रकार राजनीति वर्गीय होती है,उसी तरह शिक्षा भी वर्गीय होती है.” ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पुस्तक भी उनके इस निष्कर्ष को पुष्ट करती है. शिक्षा पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं-‘कल्चर एक्शन फॉर फ्रीडम’, ‘एजुकेशन फॉर क्रिटिकल कांशसनेस’, ‘एजुकेशन: दी प्रैक्टिस ऑफ़ फ्रीडम’, ‘दी पालिटिक्स ऑफ़ एजुकेशन’, और ‘पेडोगागी ऑफ़ होप’ प्रमुख हैं.
“यह पुस्तक उस परम्परागत अर्थ में शिक्षाशास्त्र का विवेचन नहीं है, जिस अर्थ में बी.एड. और एम.एड. की पाठ्यपुस्तकों में हमें देखने को मिलता है. इसमें विवेचित शिक्षाशास्त्र का आधार काफी व्यापक है. पिछले ढाई दशकों के दौरान ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के चिंतन को प्रभावित करने वाली विश्व की यह एक अनोखी पुस्तक है. शिक्षाशास्त्र और शिक्षाकर्मियों की सोच को प्रभावित करने के साथ ही, समकालीन दर्शन, समाजशास्त्र, विज्ञान, साहित्य, अनुसंधान की विभिन्न भिन्न शाखाओं और आलोचना आदि क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की सोच में भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है. जिस समाज में प्रभुत्वशाली अभिजनों का अल्पतंत्र बहुसंख्यक जनता पर शासन करता है. वह अन्यायपूर्ण और उत्पीड़नकारी समाज होता है. ऐसी समाजव्यवस्था मनुष्यों को वस्तुओं में बदलकर उनको आमानुषिक बनाती है. जबकि मनुष्य का अस्तित्वमूलक और ऐतिहासिक कर्तव्य पूर्णतर मनुष्य बनना है.” (पुस्तक के प्लैप कवर से उद्धृत )

‘ग्रंथ शिल्पी’ प्रकाशन से शिक्षाशास्त्र के नये क्षितिज श्रृखंला के अंतर्गत प्रकाशित इस पुस्तक को अंग्रेजी से हिंदी भाषा में रमेश उपाध्याय ने अनूदित किया है. जिसमें कुछ शब्दों पर टिप्पणी लिखने का कार्य पत्रकार रामशरण जोशी ने किया है. पुस्तक की प्रस्तावना NCERT के पूर्व निदेशक शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने लिखी है. प्रस्तावना में कृष्णकुमार जी ने फ्रेरे के शैक्षिक दर्शन और इस पुस्तक की जिन तीन महत्वपूर्ण बातों की ओर इशारा किया है उनमें से पहली बात है कि फ्रेरे के शैक्षिक दर्शन और उनके द्वारा आजमाई गई शिक्षण विधियों में निहित पूर्व धारणाएं हमारे समय की तीन बड़ी चिंतन धाराओं से जुड़ी हुई हैं जिनका फलक शिक्षण से कहीं अधिक व्यापक है. ये धाराएं हैं मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद और अस्तित्ववाद . इन तीनों से विचार-बिंदु लेकर और अपनी मानववादी नज़र और ठोस अनुभवों से उपजी समझ को जोड़कर फ्रेरे ने आज की दुनिया के संकट और उसके सन्दर्भ में शिक्षा की भूमिका को चित्रित किया है. दूसरी यह बात ध्यातव्य है कि फ्रेरे का शिक्षणशास्त्र हमें यह बताता है कि समस्या को ‘गरीबी’ कहना ही एक गलत प्रस्थान बिंदु है. गरीबी उत्पीड़न का वह सुविधाजनक और भ्रामक नाम है जिसे लेकर संपन्न मनुष्य अपनी भूमिका से मानसिक तौर पर बरी हो रहता है. उत्पीड़ित को गरीब बताकर वह अपनी स्थिति और हैसियत को वैध ठहराने में समर्थ होता है. तीसरी और आखिरी जिस महत्त्वपूर्ण बात की चर्चा कृष्ण कुमार जी करते हैं वह यह है कि अच्छी शिक्षा किसी सामूहिक (वह भी संघर्षशील) कार्यक्रम के प्रसंग में ही पायी या दी जा सकती है, एकांत में बैठकर नहीं. साक्षरता के संदर्भ में फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का एक तकनीकी पक्ष भी है, लेकिन वह तकनीकी पक्ष सामाजिक आंदोलन वाले पक्ष की तुलना में काफी गौण है.

1980 में लिखी गयी इस पुस्तक पर 1996 में कृष्ण कुमार द्वारा किया गया उपर्युक्त मूल्यांकन कई मायनों में महत्वपूर्ण है–विशेषतौर पर जब हम भारतीय समाज और स्कूली शिक्षा व्यवस्था के साथ काम करते हुए उसके अध्ययन और विश्लेषण करने के कार्य में भी लगे हों. कथाकार और समीक्षक रमेश उपाध्याय द्वारा अनूदित यह पुस्तक कुल चार प्रकरणों में विभाजित है. प्रकरणों या पाठों का विभाजन विचार और संवाद के एक निश्चित क्रम में है, जो पाठक को शिक्षा जगत के दार्शनिक प्रश्नों और जिज्ञासाओं के साथ स्कूल के व्यवहारिक पहलुओं से भी परिचित कराता है. पुस्तक में दिए गये सन्दर्भ चूंकि भारतीय सन्दर्भों से अलग है इसलिए सामान्य पाठक को पुस्तक के साथ गुजरते हुए भाषिक और दार्शनिक शब्दावलियों के लिहाज से थोडा कठिनाई होती है. पर अनुवादक ने पुस्तक के आरम्भ में कुछ सामान्य बातों की ओर इशारा करके और अंत में अंग्रेजी शब्द सूची देकर इस समस्या को दूर करने का यथा संभव प्रयास किया है.

पाओलो फ्रेरे

पुस्तक का पहला अध्याय ‘उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र’ (पेडोगागी ऑफ़ द आप्रेस्ड) के औचित्य और मुक्ति की पारस्परिक प्रक्रिया को केंद्र में रखकर लिखा गया है. लेखक यह मानता ही कि मुक्ति एक प्रसव है और यह पीड़ादायक है. इससे जो मनुष्य पैदा होता है, एक नया मनुष्य होता है, जिसका जीवित रहना तभी संभव है, जब उत्पीड़क-उत्पीड़ित के अंतर्विरोध के स्थान पर सभी मनुष्यों का मानुषीकरण हो जाए. मनुष्य के अन्दर स्वयं के प्रति यह चेतना विकसित हो जाये कि वह समझ सके की दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह मानव निर्मित और परिवर्तन शील है. ‘उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र’ (पेडोगागी ऑफ़ द आप्रेस्ड) की शुरुआत और औचित्य का बुनियादी फलसफा दरअसल यही है. शिक्षा का कार्य मानुषीकरण की प्रक्रिया को तेज करना, विकसित करना और फैलाना है. शिक्षा को मुक्तिदायी होना चाहिए, उन तमाम रुढियों से जो मानवता विरोधी और इतिहास विरोधी है. बकौल फ्रेरे–“जनता का अपने आचरण के जरिये यथार्थ में आलोचनात्मक हस्तक्षेप करना जरूरी है. यहीं पर हैं उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र की जड़ें; उस शिक्षाशास्त्र की जड़ें, जो अपनी मुक्ति के संघर्ष में संलग्न मनुष्यों का शिक्षाशास्त्र है.” इस रूप में यह केवल उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र ही नहीं रहता बल्कि मनुष्य की मुक्ति का शिक्षाशास्त्र बन जाता है. मनुष्य की मुक्ति केवल पेटभर खाना खा लेने से नहीं हो सकती, उसकी मुक्ति का सपना तो सही रूप में चेतना से जुड़ता है. जहाँ से वह सोचना और चीजों को समझना शुरू करता है. अतः जिसे हम उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र कह रहे हैं उसे सरल शब्दों में यह कहें तो गलत न होगा कि वह दरअसल समाज को विचारानुषंगी बनाने की प्रकिया है. जिसमें आलोचनात्मक चिंतन और रूढ़ियों से मुक्ति का सपना हो.

पुस्तक का दूसरा अध्याय सीधे स्कूली शिक्षा व्यवस्था को केंद्र में रखता है. जिसमें समाज और स्कूल का सम्बन्ध, समाज निर्माण में विद्यालय की भूमिका, शिक्षक-छात्र सम्बन्ध आदि प्रश्नों को साथ में लेकर परम्परागत शिक्षण पद्धति की आलोचना एवं नवोन्मेष की दिशा के कुछ सूत्र सुझाये गये है. इस अध्याय में फ्रेरे परम्परागत शिक्षण प्रणाली को वर्णनात्मक पद्धति कहते हैं. जिसमें शिक्षक को ज्ञानी माना जाता है और छात्र को कोरा कागज. इस पद्धति में रटन्त प्रणाली विकसित होती है जो विद्यार्थियों को खाली बर्तन (पात्र) बना देती है और शिक्षक को भरा हुआ ज्ञान का पात्र, और फिर इसी के साथ विकसित होती है सिखाने की अवैज्ञानिक विधियाँ. इसी के तहत शिक्षा बैंक में पैसा जमा करने की भांति विद्यार्थियों में ज्ञानराशि जमा करने का काम बन जाती है, जिसमें शिक्षक जमाकर्ता होता है और विद्यार्थी जमादार (डिपोजिटरी) होते हैं. इस शिक्षा व्यवस्था के कुछ लक्षणों को फ्रेरे ने सूत्रबद्ध किया है. जैसे-शिक्षक पढ़ाता है और छात्र पढ़ाए जाते हैं. शिक्षक सब कुछ जानता है और छात्र कुछ भी नहीं जानते. शिक्षक सोचता है और छात्रों के बारे में सोचा जाता है. शिक्षक बोलता है और छात्र सुनते हैं–चुपचाप. शिक्षक अनुशासन लागू करता है और छात्र अनुशासित होते हैं. शिक्षक अपनी मर्जी का मालिक है, वह अपनी मर्जी चलाता है और छात्रों को उसकी मर्जी के मुताबिक चलना पड़ता है. शिक्षक कर्म करता है और छात्र उसके कर्म के जरिये सक्रिय होने के भ्रम में रहते हैं. शिक्षक पाठ्यक्रम बनाता है और छात्रों को (जिनसे पाठ्यक्रम बनाते समय कोई सलाह नहीं ली जाती) वही पढ़ना पड़ता है. शिक्षक अपने पेशेवर अधिकार को ज्ञान का अधिकार समझता है (स्वयं को अपने विषय का अधिकारी विद्वान समझता है) और उस अधिकार को छात्रों की स्वतंत्रता के विरुद्ध इस्तेमाल करता है. शिक्षक अधिगम की प्रक्रिया का कर्ता होता है और छात्र महज अधिगम की वस्तुएं.

समूची पुस्तक में फ्रेरे इस तरह की शिक्षा व्यवस्था को ख़ारिज करते हैं और इसके विकल्प के रूप में एक नई व्यवस्था की वकालत करते हैं जिसे उन्होंने ‘समस्या-उठाऊ’ शिक्षा की पद्धति कहा है. जहाँ बैंकिंग शिक्षा सृजनात्मक-शक्ति को कुंठित और सौन्दर्य चेतना को अवरुद्ध करती है, वहीं समस्या-उठाऊ शिक्षा में निरंतर यथार्थ का अनावरण होता रहता है. जहाँ बैंकिंग शिक्षा चेतना को डूब की दशा में बनाए रखने की कोशिश करती है, वहां समस्या-उठाऊ शिक्षा चेतना को उभरने तथा यथार्थ में आलोचनात्मक हस्तक्षेप करने का प्रयास करती है. यह मनुष्य को सचेत प्राणी मानकर चलती है और उसके अंदर सोचने-समझने की क्षमताओं का विकास करती है. इसमें (समस्या-उठाऊ शिक्षा वयवस्था में) “अब शिक्षक महज वह नहीं रहता है ‘जो पढ़ाता है’ बल्कि छात्रों से संवाद करते समय स्वयं भी उनसे पढ़ता है. दूसरी तरफ छात्र भी वे नहीं रहते ‘जो पढ़ते हैं’, बल्कि शिक्षक से संवाद करते समय पढ़ने के साथ-साथ पढ़ाते भी हैं. शिक्षक और छात्र, दोनों उस प्रक्रिया के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं, जिसमें सभी की वृद्धि होती है. इस प्रक्रिया में ‘अधिकार’ पर आधारित तर्कों की कोई वैधता नहीं रहती, क्योंकि यहाँ आधिकारी को यदि काम करना है तो स्वतंत्रता उसके विरुद्ध नहीं बल्कि उसके पक्ष में होना पड़ेगा. यहाँ न तो कोई दूसरे को शिक्षित करता है, न स्वयं शिक्षित होता है. यहाँ मनुष्य एक-दूसरे को शिक्षित करते हैं और उनके बीच में होता है विश्व, अर्थात संज्ञेय वस्तुएं, जो बैंकिंग शिक्षा में शिक्षक की अपनी वस्तुएं होती है.” निष्कर्ष यह कि बैंकिंग व्यवस्था की शिक्षा जहाँ छात्रों को सहायता की वस्तु मानती है वहीं समस्या-उठाऊ शिक्षा उन्हें आलोचनात्मक ढंग से सोचने वाला बनाती है और अपनी शिक्षाशास्त्रीय पद्धतियों में सृजनात्मकता को आधार बनाकर चलती है. यह विद्यार्थियों को एक सम्पूर्ण मनुष्य मानती है जो ज्ञान का निर्माण करते हैं, न कि कोरा कागज़; जिन पर कुछ भी अंकित किया जा सकता है.

पुस्तक का तीसरा अध्याय इस पर केन्द्रित है कि शिक्षा में विषय तो एक साधन होते हैं जिनके जरिए हम दुनिया को और अपने आप को समझते हैं; असल जरूरत तो समूचे परिप्रेक्ष्य को समझने की है. जिसके लिए फ्रेरे चिंतन और कर्म में आपसी संवाद को जरूरी मानते हैं. इस क्रम में ज्ञान का जो निर्माण होता है उसमें परिणाम का उतना महत्त्व नहीं है जितनी प्रक्रिया का. परिवेश से जुड़ी हुई कुछ बुनियादी अवधारणाओं के निर्माण का कार्य हमारी प्राथमिक कक्षाओं की अनिवार्य शर्त होनी चाहिए बजाय की सूचनाओं के संग्रहण के. अवधारणाओं के जानने के साथ ही बातचीत और ज्ञान के अन्य स्रोतों की ओर बढ़ा जा सकता है जो छात्रों में कल्पना और चिन्तन के विकसित होने के अवसर देते है. जिससे आलोचनात्मक समझ के विकास में सहायता मिलती है.

पुस्तक के चौथे अध्याय में सांस्कृतिक कर्म की संवादात्मक और संवाद विरोधी प्रक्रियाओं में ढलकर विकसित होने वाले सिद्धांतों का विश्लेषण किया गया है. कुछ संवाद विरोधी और संवादात्मक सिद्धांतों की विस्तार से चर्चा करते हए लेखक का निष्कर्ष है कि –“संवाद विरोधी कर्म के सिद्धांत में सांस्कृतिक आक्रमण चालबाजी (तिकड़म) के लक्ष्यों के लिए काम करता है, चालबाजी अभिजिति के लक्ष्यों के लिए काम करती है, और अभिजिति प्रभुत्व के लक्ष्यों के लिए काम करती है. सांस्कृतिक संश्लेषण संगठन के लक्ष्यों के लिए काम करता है और संगठन मुक्ति के लक्ष्यों के लिए काम करता है.

अभिजिति, विभाजन और शासन, चालबाजी, सांस्कृतिक आक्रमण, सहयोग, मुक्ति के लिए एकता, संगठन, सांस्कृतिक संश्लेषण आदि बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा की गयी है. उत्पीड़न से मुक्ति वहीं से शुरू होती है जब “मनुष्य को स्वयं ही अपने श्रम का स्वामी हो, मानव का शरीर समाज का ही एक अंग है, और एक मानवीय प्राणी को न तो खरीदा जा सकता है और न ही वह स्वयं को बेच सकता है, इन तथ्यों की आलोचनात्मक चेतना प्राप्त कर लेता है . ऐसा करना यथार्थ का मानवीकरण करके मनुष्यों को मानवीय बनाने के लिए यथार्थ के प्रामाणिक रूपांतरण में संलग्न होना है. और शिक्षा में हमें कुछ ऐसी युक्तियों का विकास करना होगा जिससे हम इस दिशा में आगे बढ़ सकें.”

यह कहा जा सकता है कि पाओलो फ्रेरे के शिक्षा दर्शन का मूल आधार है, उत्पीड़ितों और दलितों का विवेकीकरण करना. यानी उनमें यथार्थ के प्रति सजगता पैदा करना, उसे अपने पक्ष में बदलने के लिए संघर्ष का मार्ग तलाशना. फ्रेरे यह मानते हैं कि बिना विवेकीकरण के अक्षर ज्ञान (साक्षर होना) अर्थहीन है. व्यक्ति को साक्षर बनाकर परिवेश और उसमें क्रियाशील विभिन्न सामाजिक शक्तिओं के प्रति उसे जागरूक और सक्रिय बनाना भी हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए. एक बच्चे में विवेकीकरण की यह प्रक्रिया, जो की उसके घर से ही शुरू हो चुकी होती है, स्कूल को उसके विकास में सहायक बनना चाहिए बजाय कि उसको अवरोधित करने के. विवेकीकरण से चेतना का विकास होता है और आलोचनात्मक समाज निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू होती है. कई तरह के अनुसंधान बताते हैं कि इस तरह की स्कूली प्रक्रिया से निकले हुए लोगों में अक्षर ज्ञान के साथ सामाजिक वास्तविकता को समझने का एक क्रिटिकल एप्रोच भी होता है जो की सही मायने में शिक्षा का लक्ष्य मायने में शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए.

पुस्तक- उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र

लेखक- पाओलो फ्रेरे

हिंदी अनुवादक- रमेश उपाध्याय

प्रकाशक- ग्रंथशिल्पी(इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड ,दिल्ली.

(लेखक एन.सी.ई.आर.टी.नई दिल्ली में प्रोजेक्ट फ़ेलो रहे हैं. वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं)

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