देसवा

(पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा ‘ की  तीसरी क़िस्त )

नौ वर्ष पहले नवम्बर 2011 में कुशीनगर के नाहर छपरा गांव जाना हुआ. धान की कटिया चल रही थी. यह गांव जिला मुख्यालय पडरौना से दस किलोमीटर दूर था. मुसहर बहुल इस गांव के सेमरहना टोले के मुसहर मांग कर रहे थे कि गांव की खाली जमीन पर स्कूल बनाया जाय जबकि प्रधान वहां सामुदायिक भवन बनवाना चाहते थे.

इस मुद्दे पर मुसहरों से बातचीत शुरू हुई. बातचीत स्कूल की जरूरत से शुरू होकर मुसहरों की जिंदगी, भूख-कुपोषण से होती हुई खेती-बारी पर जा टिकी. मुसहरों ने बताया कि उनके पास खेती की जमीन नहीं है. वे मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते हैं. बात-बात में पता चला कि एक दशक पहले इस गांव के 100 मुसहरों को खेती की जमीन का पट्टा दिया गया था लेकन उस पर वे आज तक काबिज नहीं हो पाए. उनके पट्टों की जमीन पर दंबग काबिज हैं.

जमीन के मुद्दे पर बात चली तो वहां अब तक चुपचाप बैठी एक अधेड़ महिला मुखर हो उठीं. करीब 65 वर्ष की इस महिला का नाम पतिया था. यहीं पर मेरी उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई. इसके बाद उनसे दो और मुलाकत हुई.

पतिया के पति विरछा का निधन हो चुका था. उनका एक ही बेटा था जो मजदूरी करने मुम्बई चला गया था. घर पर उनकी बहू और दो पौत्र थे.

पतिया ने बताया कि एक दशक पहले उसे भी डेढ़ एकड़ जमीन का पट्टा मिला था. बाकायदा एक समारोह में एसडीएम ने उसे और 100 अन्य मुसहरों को जमीन का पट्टा दिया था. उनके खेत की तीन-चार बार नापी हुई. आखिरकार एक प्लाट को चिन्हित कर बताया गया कि यह उसका खेत हैं. इस खेत के पास शीशम का एक पेड़ है. वह अपने खेत में जब जुताई और बुआई के लिए गयीं तो वहां कुछ लोग आए और बोले कि यह जमीन उनकी है. उन्हें अदालत से स्टे मिला है. पतिया चाहे तो बुआई कर ले लेकिन फसल वही काटेंगे.

पतिया निराश होकर खेत से वापस आ गयी. खेत पर कब्जा पाने के लिए वह वर्षों तक तहसील, जिला तक दौड़ती रही लेकिन उसे अपनी जमीन पर कब्जा नहीं मिल सका.

पतिया में अपनी इस जमीन को पाने की जबर्दस्त ललक थी. वह घर से निकलकर विजवा थान के पास स्थित अपने खेत के पास जाती. शीशम के पेड़ के पास जाकर रूक जाती हैं. वहीं से अपनी जमीन को बड़ी हसरत से निहारती और फिर उदास मन से लौट आती. यह उसका रोज का काम था. बिना नागा वह रोज किसी न किसी टाइम अपने खेत के पास शीशम के पेड़ तक जरूर जाती.

जिंदगी चलाने के लिए पतिया को मजदूरी भी करनी पड़ती. गांव के अन्य मुसहरों के साथ वह भी खेतों में कटिया, रोपनी, सोहनी का काम करती. विडम्बना यह थी कि मुसहर जिन खेतों के कागज में मालिक थे, उन्हीं खेतों में उन्हें मजदूरी करनी पड़ती.

पतिया भी खेतों में मजदूरी करने जाती लेकिन अपने खेत में उन्होंने कभी मजदूरी नहीं की. उनके ही खेत पर कब्जा किए व्यक्ति ने उन्हें कई बार मजदूरी के लिए कहा लेकिन उन्होंने साफ इंकार कर दिया.

कारण बताते हुए मुझसे बोलीं-मर जाइब लेकिन इ खेत में कबौ काम नाहीं करब. जौने खेत के हम मालिक हईं, वोही में मजदूरी करब ?

पतिया की उम्र गुजरती जा रही थी. बड़ी मुश्किल से जिंदगी कट रही थी. उनकी एक ही हसरत थी -‘बाबू एके सपना बा. जीते जी आपन जमीन मिल जा और हम ऊमे  धान क बीज डालीं. जब फसल तैयार हो जाय तो काट कर घर ले आईं.’

पतिया जैसी ही हसरत नाहर छपरा के शंकर, नकछेद, गिरिजा, घुन्नी, जोलई, लालमन, दूधनाथ, रघुनाथ मन्नी आदि की भी थी.

शंकर तो अपनी जमीन से एक बार धान की फसल भी ले चुके थे लेकिन दुबारा जब खेती करने गए तो दबंग कब्जेदार सामने आ गए. यह पूछने पर कि सरकार उनकी सुनवाई नहीं की तो शंकर बोले -हम गरीबन के केहू साथ ना देत बा. जमीन ना रहले से हमन के हालत में तनको बदलाव नाहीं बा. पहिलवों मड़ई में रहत रहनी, आजो मड़इए में बानीं.  ’

भूमिहीनता के कारण इस गांव के मुसहर पलायन कर रहे थे. इस गांव के 40-50 मुसहर मजदूरी के लिए पंजाब और नैनीताल चले गए थे.

शंकर ने कहा-हमन के मजदूरी करे दूर देस में जाए के पड़त बा. हमार जमीन बडकवा लोग जोत-बोवत बा.

विशुनपुरा ब्लाक के एक दूसरे गांव अकबरपुर केे मुसहर टोले का भी यही हाल था।

यहां से 20-22 मुसहर महराजगंज जिले में धान की कटाई करने गए थे. चालीस महिलाओं का एक दल भी कटाई करने निकला था. इस गांव में भी दो दर्जन मुसहरों को दो दशक पहले जमीन के पट्टे दिए गए थे. इसमें से कुछ को कब्जा मिला है तो कई मुसहरों की पट्टे की जमीन का ही पता नहीं चल पा रहा है कि वह कहां है.

60 वर्षीय महेश को अपनी जमीन पर कब्जा मिल गया है लेकिन कैलाश के भाई की 15 कट्ठा जमीन का पता ही नहीं चल पा रहा है कि वह कहां है ? बहारन, चौथी, प्रहलाद, कैलाश, सुकई को आधी जमीन पर कब्जा मिला है तो आधी पर नहीं. अब इस बारे में कोई सुनवाई भी नहीं हो रही है.

गांव से चलते हुए पतिया देवी से हमने पूछा कि -जमीन पर कैसे कब्जा मिलेगा ?

उनका जवाब था- कमी हमनी में बा. हमन के संगठित होके लड़ नइखी पावत. हमरे नइहरे दुदही में मुसहर लड़ केे जमीन पर कब्जा ले लिहलन. अइसने काम इहां भी करे के पड़ी.

एक वर्ष बाद इसी गांव में फिर जाना हुआ. पता चला कि डीएम के प्रयास से मुसहरों को जमीन का पट्टा दिया जाएगा. जब मैं गांव पहुंचा तो ठीक उसी तरह का दृश्य था जैसा कि पतिया ने एक दशक पहले का चित्र मेरे सामने खींचा था.

शुक्रवार का दिन था. गांव के चमकी टोला के स्कूल परिसर में एसडीएम की अगुवाई में गांव के 165 मुसहरों के बीच जमीन के पट्टे बांटे जा रहे थे. एक-एक कर नाम पुकारा जाता और मुसहर पांडाल के एक छोर पर कुुर्सियों पर बैठे अधिकारियों केे पास जाते और पट्टे का कागज लेकर एक रजिस्टर पर अंगूठा लगा पांडाल में बैठ जाते.

यही पर एक कोने पर बैठी पतिया देवी दिख गयीं. मैं उनके पास गया. इस बार पतिया देवी को नहीं उनके बेटे राजेश को जमीन का पट्टा मिला है. क्या इस बार आपको जमीन मिल जाएगी ? इस सवाल पर पतिया देवी का जवाब था -उम्मीद त बा. देखल जाईं का होत बा. ’

वहीं बैठे युवा मुसहर शंभू ने मेरे सवाल को सुन कर जवाब दिया-मरे के पड़े चाहे मारे के पड़े, ऐ बारी जमीन ले के रहल जाई.

शंभू की बात सुनकर लगा कि पतिया देवी ने पिछली मुलाकात में जिस संगठन और जज्बे की तरफ इशारा किया था, वह फलीभूत हो रहा है.

लगभग दो घंटे में सभी पट्टे बांट दिए गए. इसके बाद एसडीएम ने एलान किया कि सभी पट्टाधारक अभी पट्टे की जमीन पर चलें और अपनी जमीन पर खूंटा गाड़ दें. मुसहर हाथ में कुदाल और खूंटा लेकर चल पड़ेे.

खेतों की नपाई में खासा देर हो रही थी क्योंकि लेखपाल, अमीन  नापी करने में रूचि नहीं दिखा रहे थे लेकिन डीएम अपने आफिस में बैठे पल-पल की रिपोर्ट ले रहे थे. उनका सख्त आदेश था कि शाम होते-होते मुसहरों को उनके पट्टे की जमीन पर कब्जा दिला दिया जाय. आखिरकार मुसहरों को उनके पट्टे की जमीन पर कब्जा दिला दिया गया.

देखते-देखते मुसहरों ने फसल लगे खेतों में अपने खूंटे गाड़ दिए. पतिया देवी और उनके बेटे राजेश ने भी अपने पट्टे के खेत में खूंटा गाड़ दिया. यह वह जमीन नहीं थी जो एक दशक पहले पतिया देवी को मिली थी. यह पट्टा दूसरी जगह मिला था. पतिया ज्यादा खुश नहीं थी. उनका सपना पहले वाले पट्टे की जमीन पर ही कब्जा पाने का थी.

कुशीनगर जिले में दशकों बाद गरीब-वंचित लोगों को जमीन का पट्टा देने और उस पर कब्जा दिलाने की कार्यवाही हो रही थी. इसको देखने के लिए कई दलों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता जमा थे. ये सभी जानना और देखना चाहते थे कि क्या इस बार भी मुसहरों के हाथ सिर्फ जमीन का कागज ही हाथ आएगा या वह अपनी जमीन पर काबिज भी हो सकेंगे ?

यह आशंका बेबुनियाद भी नहीं थी. इस गांव सहित पूरे जिले में मुसहरों और दूसरे समुदाय के गरीब लोगों को आजादी के बाद कई बार इसी तरह के समारोहों में जमीन के पट्टे दिए गए लेकिन अधिकतर आज भी अपनी जमीन पर काबिज नहीं हो पाए हैं.
मुसहर अक्सर जमीन के पट्टे के कागज को दिखाते और इसे सियारपट्टा बोलते. यानि ऐसा कागज जिसका कोई मतलब नहीं था.

प्रशासन के इस कदम से मुसहरों में एक बार फिर उम्मीद जगी थी. जानकी, दूधनाथ, शंकर, अकलू, मुन्नी, बनारसी, शंकर के हाथों में 40 डिस्मिल (0.40एकड़) जमीन के पट्टे का कागज था और आंखों में उम्मीद थी लेकिन साथ ही चेहरे पर आशंका के भाव भी थे. दबंगों के दाव-पेंच और ताकत से वे बखूबी परिचित थे.

इस मौके पर वे लोग भी थे जो मुसहरों को दिए गए पट्टे की जमीन पर काबिज थे. यह जमीन जिले के राज परिवार की थी जिसको उन्होंने सीलिंग से बचाने के लिए पैसे लेकर दूसरों को दे दिया था. जमीन पर काबिज लोग निश्चिन्त दिख रहे थे. वे दबी जुबान से कह रहे थे कि हमारे पास भी कागज है. प्रशासन भले यह सब कर ले लेकिन आखिर में जमीन उनके ही हाथ आएगी.

मुसहर अपने पट्टे की जमीन पर जब खूंटा गाड़ चुके तो मैं भी लौट आया. दो दिन बाद खबर आयी कि पडरौना कोतवाली में पतिया सहित कई मुसहरों पर जबरन फसल को क्षतिग्रस्त करने का मुकदमा दर्ज हो गया. इसके बाद दूसरी खबर यह आयी कि प्रशासन द्वारा जमीन का पट्टा बांटने और उस पर कब्जा दिलाने की कार्यवाही पर अदालत ने रोक लगा दी है.

डीएम को जब पता चला कि मुसहरों पर कोतवाली में एफआईआर हुई है तो वे नाराज हुए और पुलिस से इस एफआईआर पर कार्यवाही न करने को कहा.

पतिया के हाथ में जमीन एक बार फिर आते-आते दूर चली गयी. इसके बाद करीब तीन वर्ष तक उनसे कोई मुलाकात नहीं हुई. तीन वर्ष बाद यानि आठ जनवरी 2016 को एक बार फिर कुशीनगर के उसी इलाके में जाना हुआ. नाहर छपरा गांव के पास से गुजर रहा था कि  पतिया देवी की याद आयी. गांव थोड-थोड़ा बदला सा लगा. सबसे पहले हमारा सामना गांव के स्कूल से हुआ. स्कूल बंद था और बरामदे में एक लड़का डग्गा दौड़ा रहा था.

पहली बार पतिया देवी से यहीं मुलाकात हुई थी. तब यहां खाली जमीन थी और यहां पर स्कूल बनाने के लिए मुसहर लड़ाई लड़ रहे थे. अब स्कूल बन गया था. मैं गांव में पतिया देवी को ढूंढने लगा. जब मैं उनके घर पहुंचा तो देखा कि वहां कुछ लोग भोजन बनाने में जुटे हुए हैं. लग रहा था कि भोज की तैयारी हो रही है. पतिया का नाम पुकारने पर झोपडी से सिर मुंडवाए एक युवक निकला. वह राजेश था. पतिया देवी का बेटा. उसने बताया कि मां का आज ब्रह्मभोज है.

सिर मुंड़ाने की वजह से मैं राजेश को ठीक-ठीक पहचान नहीं पा रहा था. उससे सिर्फ एक ही बार की मुलाकात थी. मुझे संदेह हुआ कि किसी दूसरे के घर तो नहीं आ गया. मैंने राजेश से पूछा कि पतिया आप की ही मां का नाम था. उसने सहमति में सिर हिलाया. पता नहीं क्यों मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि पतिया देवी अब नहीं रहीं. मैने राजेश से कहा कि वह अपनी मां की कोई फोटो दिखाए ताकि मैं पहचान सकूं कि पतिया देवी के घर ही आया हूं. राजेश ने कहा कि उसके पास मां की कोई फोटो नहीं है. एक पासबुक है जिस पर मां की फोटो लगी है. वह घर के अंदर गया और पासबुक लेकर लौटा. साथ में उसकी पत्नी और दोनों बच्चे भी आए. पासबुक में पतिया की ही फोटो लगी थी. पासबुक वापस करते हुए अचानक उस पर बैंक द्वारा की गई आखिरी एंट्री दिखी- 600 रुपए. पतिया यही जमा-पूँजी छोड़ गयीं थीं.

अब मेरे पास कोई सवाल नहीं था. लौटने लगा तो राजेश की आवाज सुनाई दी-अब गांव ही रहूंगा. मजदूरी करने मुम्बई नहीं जाऊंगा.

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