ऑनलाइन शिक्षा समय की ज़रूरत है पर स्थायी समाधान नहीं

शिक्षा

बृजराज सिंह

महामारी और लॉकडाउन के बाद पूरे देश की शैक्षिक गतिविधियाँ पूर्णतः स्थगित हैं। ऐसे में तमाम शिक्षाविद एवं शिक्षा संस्थाएँ आगामी सत्र की चिंताओं से हलकान हैं। कुछ लोगों को जहाँ ऑनलाइन शिक्षा एक बेहतर विकल्प दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ विचारकों एवं अध्यापकों की चिंता यह है कि इसके ज़रिए शिक्षा के बुनियादी लक्ष्य तो प्राप्त नहीं किए जा सकते और न ही दूरगामी परिणाम। शिक्षा के सामाजिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति भी इस माध्यम से संभव नहीं हो सकती। स्कूल और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियाँ एवं वार्षिक परीक्षाएँ अनिश्चित समय के लिए मुल्तवी कर दी गयी हैं। ऐसे में न सिर्फ़ विद्यार्थियों का करियर दांव पर लगा है बल्कि उनका मानसिक स्वास्थ्य भी ख़तरे में पड़ गया है।

वैसे तो मार्च का महीना भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आधार होता है। स्कूलों के बोर्ड की परीक्षाएँ इसी समय होती हैं जिसके परिणाम पर ही अगली कक्षा में प्रवेश का टिकट मिलता है। स्कूलों में नए नामांकन होते हैं। निजी स्कूलों के लिए तो यह व्यापारिक सीजन का सबसे महत्वपूर्ण महीना होता है। विश्वविद्यालयों में भी चाहे वे वार्षिक परीक्षा प्रणाली पर निर्भर हों या सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली को स्वीकारते हों, यह समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों के लिए तो यह समय उनके आगामी भविष्य को निर्धारित करने वाला समय होता है। जिन्हें स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रवेश लेना हो वे बेहतर और उपयुक्त विकल्प की तलाश करने लगते हैं और जिन्हें नौकरी की तलाश होती है वे अपने लिए बेहतर विकल्प खोजने में लग जाते हैं। इंटर्नशिप और प्लेसमेंट की सारी क़वायद अपने पूरे सवाब पर होती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं का समय भी यही होता है। इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने वाले छात्र भी इस समय का इंतज़ार पूरे वर्ष करते हैं। सैंकड़ों वर्षों की भाँति इस वर्ष भी यह सारी प्रक्रियाएँ एवं गतिविधियाँ अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की भाँति संचालित हो ही रही थीं कि अचानक से सब कुछ धरा का धरा रह गया। कोविड-19 की वैश्विक महामारी और फिर लॉकडाउन ने हमारी सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया। जीवित बुजुर्गों की स्मृति में भी किसी ऐसी घटना की याद नहीं थी।

स्कूलों और विद्यार्थियों के सामने यकायक नयी समस्या आ गयी। समस्या दो तरह की थी एक तो यह कि आगे की पढ़ाई कैसे पूरी हो, दूसरी परीक्षाओं को किस तरह सम्पन्न किया जाए। लॉकडाउन के दौरान जब हमारी सारी गतिविधियाँ बंद थीं यहाँ तक कि घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया तब धीरे धीरे हमारी निर्भरता स्वतः तकनीक पर बढ़ती चली गयी। सरकारों (न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारों ने) ने लगभग चार महीने बाद भी इस पर कोई ठोस फ़ैसला या ज़रूरी दिशानिर्देश अब तक जारी नहीं किए। उनके लिए जैसे यह प्राथमिकता हो ही न। वैसे भी कई चुनौतियाँ एक साथ सामने खड़ी हैं। स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने सरकार के भरोसे ही बैठने का निर्णय लिया।

ऑनलाइन शिक्षा की चुनौतियों से हम सब भलीभाँति वाक़िफ़ हैं, फिर भी आज वही एकमात्र रास्ता भी दिखाई दे रहा है। भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट की मामूली सुविधा तक भी सबकी पहुँच नहीं है और जहाँ एक बड़ी संख्या ऐसे नागरिकों की भी है जिनके पास न तो बेहतर स्मार्ट फ़ोन हैं या न ही कम्प्यूटर; वहाँ ऑनलाइन पढ़ाई का स्वप्न प्रथमदृष्टया मुँगेरी लाल के हसीन ख़्वाब की भाँति ही लगते हैं। जहाँ अभी भी हम सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने में असफल रहे हैं, वहाँ अचानक से गाड़ी को किसी दूसरे ट्रैक पर दौड़ाना बुद्धिपूर्ण नहीं कहा जाएगा। लेकिन इन सब मुसीबतों के बीच से ही रास्ता भी निकलता है।

मैं जिस विश्वविद्यालय में अध्यापन करता हूँ उसने इस कार्य को एक चुनौती के रूप में लिया। उसका नाम है-दयालबाग़ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट। आगरा शहर के उत्तर में स्थित यह डीम्ड विश्विद्यालय अपनी ख़ास पहचान रखता है। यहाँ यह उल्लेख भी कर देना ज़रूरी है कि यहाँ लड़के और लड़कियों के दो स्कूल भी सम्बद्ध हैं। अप्रैल की शुरुआत में ही विश्वविद्यालय ने तय किया कि सत्र की सारी गतिविधियाँ उसी भाँति संचालित होंगी जैसी योजना सत्रारंभ में बनी थी। इसके लिए हमारे पास भी एकमात्र रास्ता था, ‘ऑनलाइन एजुकेशन’। हमने यही रास्ता चुना। अब हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी आपने सोलह हज़ार विद्यार्थियों तक किस तरह पहुँचा जाए क्यों कि लॉकडाउन के ठीक पहले समेस्टर ब्रेक होने की वजह से सारे विद्यार्थी अपने घरों को चले गए थे और लौट नहीं पाए थे। यह भी बता देना ज़रूरी है कि इन सोलह हज़ार में से अस्सी प्रतिशत विद्यार्थी ग़रीब घरों से आते हैं। इनमें से कुछ दिहाड़ी मज़दूर तो कुछ ठेला और खोमचे लगाने वालों के बच्चे हैं। इसे छोटे और बड़े विश्वविद्यालय के चलताऊ मुहावरे में भी नहीं रखना चाहिए। इस बीच हमें इसकी दुश्वारियों का अंदाज़ा तो था ही, साथ ही तमाम शिक्षाविदों की इन चिंताओं से भी हम वाक़िफ़ थे कि भारत में ऑनलाइन शिक्षा असंभव है।

हमने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसे चरणबद्ध एवं योजनाबद्ध किया। सबसे पहले विद्यार्थियों को छोटे छोटे समूहों में विभाजित करना फिर उन तक अध्यापकों की पहुँच को सुनिश्चित किया गया। फिर उन विद्यार्थियों और जहाँ तक सम्भव हो सका उनके अभिभावकों से भी बात की गयी। यह सुनिश्चित हो जाने के बाद कि प्रत्येक तक हमारी पहुँच बन गयी है अब हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ गए। विश्वविद्यालय ने शिक्षकों पर भरोसा किया और उन्हें अपने मति अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी। सुविधाजनक प्लेटफ़ॉर्म चुनने की आज़ादी अध्यापकों और विद्यार्थियों दोनो की दी गयी। इसमें विद्यार्थियों की सुविधा को सर्वोपरि रखा गया। फिर हमने बचे हुए पाठ्यक्रम को जल्द से जल्द पूरा करने पर अपने को केंद्रित किया। उसके बाद फिर बारी आयी परीक्षा की। हमने न सिर्फ़ आंतरिक बल्कि वाह्य परीक्षाएं भी सौ फ़ीसदी सफलता के साथ पूरा किया। अपने नियमों में पर्याप्त छूट देने के बावजूद हमने गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया। विद्यार्थियों को पर्याप्त समय और मौलिक होने के लिए प्रेरित किया गया। उदारता के नए मनदंड निर्धारित किए। मेरे ख़ुद के एक छात्र ने मौखिकी के समय अपने खेतों के बीच से सवालों के जवाब दिए। न सिर्फ़ सोलह हज़ार विद्यार्थियों की आंतरिक एवं बाह्य परीक्षा के साथ साथ प्रायोगिक परीक्षाएँ एवं मौखिक परीक्षाएँ आयोजित की गयी बल्कि जून के अंतिम सप्ताह तक अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों के परिणाम भी घोषित कर दिए गए। यह सब तब किया गया जब बाकी के विश्वविद्यालय हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह सब आपात स्थिति में किया गया। अब हम पूरी मेहनत के साथ नए सत्र की सौ फ़ीसदी आ ऑनलाइन करने की तैयारी कर चुके हैं। प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हमारा सत्र एक जुलाई से प्रारम्भ हो जाएगा। हम अगले सत्र के नामांकन हेतु प्रवेश परीक्षाएँ भी ऑनलाइन मोड से प्रारम्भ कर चुके हैं। इस मुहिम से जो सबसे बड़ा फ़ायदा हुआ वह है हमारे विद्यर्थियों की मानसिक सक्रियता। उनकी व्यस्तता सामान्य दिनों की भाँति ही बनी रही जिसने उन्हें लॉकडाउन के दौरान अवसाद और अन्य मानसिक व्याधियों से जुड़ी निष्क्रियताओं से बचाए रखा।

इसे देश के दूसरे संस्थान भी लागू कर सकते है। फिर भी इस सफलता के प्राथमिक परिणामों से उत्साहित होने के बावजूद मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि यह आपद्धर्म है, समस्या का स्थायी उपाय नहीं। मैं जब इसकी वकालत कर रहा हूँ तब मेरे दिमाग़ में शिक्षा के मौलिक अधिकार के लक्ष्यों की विफलता और सरकारों द्वारा लगातार शिक्षा से जुड़े व्यय में कटौती का परिणाम भी कौंध रहा है। इस ख़तरे को भी नहीं भूलना चाहिए कि आगे चलकर ऑनलाइन शिक्षा की यह क़वायद नए शिक्षकों की बहाली में आनाकानी एवं स्कूलों-कॉलेज के वार्षिक अनुदानों की कटौती का स्थायी बहाना साबित हो सकती है। लेकिन हमारे पास बस दो ही विकल्प हैं, या तो हम सबकुछ भाग्य और नियति के भरोसे छोड़ दें या फिर मानव स्वभाव के अनुसार नए पुरुषार्थ की खोज करें। या तो हम इंतज़ार करें या फिर कुछ कार्य करें। कहा ही गया है बेकार से बेगार भला।

 

(डॉ. बृजराज सिंह, युवा कवि-समीक्षक, आगरा के दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में अध्यापन)

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