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उर्दू की क्लास : नाज़नीन, नाज़मीन और नाज़रीन

( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम  की श्रृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की आठवीं  क़िस्त में नाज़नीन, नाज़मीन और नाज़रीन के फ़र्क़ के मायने के बहाने उर्दू भाषा के पेच-ओ-ख़म को जानने की कोशिश . यह श्रृंखला  हर रविवार प्रकाशित हो रही है . सं.)

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ये तीन ऐसे अल्फ़ाज़ हैं जिनके बारे में हम अकसर कन्फ़्यूज़ हो जाते हैं। तीनों शब्दों का अर्थ और इस्तेमाल पता हो तो कन्फ़्यूज़न का इमकान (chance) कम रहता है।

“नाज़नीन” मतलब “सुंदरी”, “प्रिय” या “sweetheart”, “lovely” .

जैसे आपने ये गाना सुना होगा :

“ऐ नाज़नीं सुनो ना

हमें तुमपे हक़ तो दो ना

चाहे तो जान लो न

के देखा तुम्हें तो होश उड़ गए

होंठ जैसे खुद ही सिल गए

ऐ नाज़नीं सुनो ना…”

यहाँ “सुंदरी” और “प्रिय” के सेंस में ही इस्तेमाल हुआ है। “नाज़नीन” को “नाज़नीं” भी पढ़ते/बोलते हैं।

दूसरा शब्द है , “नाज़मीन”। ये शब्द “नाज़िम” का बहुवचन है, जिसके मतलब होता है “इंतेज़ाम करने वाला”।

ये शब्द “संचालक”, “मैनेजर”, “प्रबंधक”, “हाकिम” के सेंस में भी इस्तेमाल होता है। जैसे : मुशायरे का संचालन करने वाले को “नाज़िम ए मुशायरा” कहते हैं।

अनवर जलालपुरी नाम के एक मशहूर “नाज़िम ए मुशायरा” हुए हैं, जिन्होंने “उर्दू शायरी में गीता” और “उर्दू शायरी में गीतांजलि” जैसी किताबें भी लिखीं।

और “#नाज़रीन” कहते हैं देखने वालों को। इसका इस्तेमाल “दर्शकों/viewers” के सेंस में होता है । इसी तरह सुनने वालों/श्रोतागण को “सामईन” (listeners) और पढ़ने वालों/पाठकों को “क़ारईन” (readers) कहते हैं।

 

“आब-ए-ज़मज़म का पानी” और “शबे बरात की रात”

आपको पता होगा कि मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं और वहां से लौटते समय कुछ लायें या न लायें “आब-ए-ज़मज़म” ज़रूर लाते हैं और लोगों में बाँटते हैं।

“आब-ए-ज़मज़म” का मतलब होता है “ज़मज़म का पानी”। “आब” का मतलब होता है “पानी”। ये फ़ारसी से उर्दू में आया है और ज़मज़म एक कुआँ का नाम है जो कि मक्का में है।

“आब” से ही “आबपाशी” और “आबयारी” जैसे अल्फ़ाज़ (लफ़्ज़ का बहुवचन) बने हैं। दोनों शब्दों का इस्तेमाल “सिंचाई/irrigation” के सेंस में होता है। इसीलिए “सिंचाई विभाग/ irrigation department” को उर्दू में “महकमा-ए-आबपाशी” बोलते हैं।

इसीलिए “आब-ए-ज़मज़म” के साथ पानी लगाने की ज़रुरत नहीं है जैसा कि लोग जाने-अनजाने में कर बैठते हैं. जैसे इस वाक्य में किया गया है, “चमत्कारिक है आब-ए-जमजम का पानी”। ऐसा कहना/बोलना या लिखना “ग़लती से mistake हो गया” कहने/बोलने या “पवित्र गंगाजल का पानी” कहने/बोलने/लिखने जैसा है ! इसी तरह से “शबे बरात की रात” लिखना/बोलना भी मुनासिब नहीं है क्योंकि “शब” का मतलब “रात” होता है।

जैसे “विनोद कुमार त्रिपाठी बशर” का शेर देखें :

“हो न आमद तिरी जिस शब तो वो शब शब ही नहीं

नींद उस रात बग़ावत पे उतर आती है”

 

(महताब आलम एक बहुभाषी पत्रकार और लेखक हैं। हाल तक वो ‘द वायर’ (उर्दू) के संपादक थे और इन दिनों ‘द वायर’ (अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी) के अलावा ‘बीबीसी उर्दू’, ‘डाउन टू अर्थ’, ‘इंकलाब उर्दू’ दैनिक के लिए राजनीति, साहित्य, मानवाधिकार, पर्यावरण, मीडिया और क़ानून से जुड़े मुद्दों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं। ट्विटर पर इनसे @MahtabNama पर जुड़ा जा सकता है ।)

( फ़ीचर्ड इमेज  क्रेडिट : यू ट्यूब   )

इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों के लिंक यहाँ देखे जा सकते हैं :

उर्दू की क्लास : नुक़्ते के हेर फेर से ख़ुदा जुदा हो जाता है

उर्दू की क्लास : क़मर और कमर में फ़र्क़

उर्दू की क्लास : जामिया यूनिवर्सिटी कहना कितना मुनासिब ?

उर्दू की क्लास : आज होगा बड़ा ख़ुलासा!

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उर्दू की क्लास : ख़िलाफ़त और मुख़ालिफ़त का फ़र्क़

 

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