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मोदी सरकार की नई एमएसपी किसानों के साथ खुला धोखा

पुरुषोत्तम शर्मा

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल द्वारा चार जुलाई को मंजूर की गयी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा देश के किसानों के साथ खुला धोखा है. मोदी सरकार 2014 के चुनावों में किसानों से किये अपने चुनावी वायदे “लागत में C2+ के बाद उसमें 50 प्रतिशत मुनाफ़ा और फसल खरीद की गारंटी ” से सीधे मुकर रही है.

मोदी मंत्रिमडल ने फसलों के जो रेट घोषित किये हैं वे A2 (फर्टिलाइजर, कैमिकल, मजदूरी, ईधन, सिचाई खर्च आदि जो नकद भुगतान करना होता है) + FL (किसान के पारिवारिक श्रम की कीमत जिसका भुगतान नहीं करना होता है) फार्मूले से तय किए हैं, जो पहले यूपीए सरकार के समय से ही लागू है. देश भर में चल रहे किसान आन्दोलन के दबाव में इस सरकार ने उसे सिर्फ आज के हिसाब से पुनर्निर्धारित किया है.

मूल्य पुनर्निर्धारण का यह काम तो इस सरकार को 2014 में ही करना चाहिए था क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि A2+FL पद्धत्ति के अनुसार भी सन् 2014 में किसान को धान के प्रति क्विंटल पर 200 रुपए का सीधा नुकसान हो रहा था. पर यह सरकार चार साल तक इसे भी टालती रही जिससे घाटे की खेती के लिए मजबूर देश के किसानों को हजारों करोड़ का अतिरिक्त नुकसान हुआ.

2014 के आम चुनाव में मोदी और उनकी पार्टी ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर लागत में पहले से मिल रहे A2 + FL के साथ +C2 (जमीन का किराया और खेती बाड़ी में लगी स्थाई पूंजी का ब्याज ) को शामिल कर कुल लागत में 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़ने का वायदा किया गया था. साथ ही सभी फसलों की “ सरकारी खरीद की गारंटी ” और किसानों की “ सम्पूर्ण कर्ज माफी ” का वायदा किया था. पर अब यह सरकार न सिर्फ लागत में +C2 के साथ 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़ने से मुकर रही है बल्कि फसलों की खरीद की गारंटी और कर्ज माफी के वायदे से भी भाग रही है.

यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि पिछले चार साल के मोदी राज में किसानों की उत्पादित फसलों की मात्र 6 प्रतिशत ही सरकारी खरीद हुई है. किसानों द्वारा उत्पादित 94 प्रतिशत फसलें एमएसपी से लगभग एक तिहाई कम दाम में विचौलियों और आढतियों द्वारा लूट ली जाती हैं. अगली फसल के लिए लागत सामग्री का दबाव और सरकारी केंद्रों के समय पर और हर जगह न खुलने के कारण देश के किसानों की बहुसंख्या इस लूट का शिकार बनने के लिए मजबूर कर दी जाती है. मोदी राज के इन चार सालों में खेती की लागत सामग्री में बेतहाशा वृद्धि हुई है. ऐसे में मोदी सरकार की यह घोषणा घाटे की खेती के कारण आत्महत्या को मजबूर भारत के किसानों के साथ एक बड़ा छलावा है.

नई एमएसपी की घोषणा कर मोदी सरकार किसानों से किए अपने चुनावी वायदे को पूरा कर देने का ढोल जोर–जोर से पीट रही है. पर अगर आप मोदी सरकार द्वारा जारी की गयी नई एमएसपी का गहराई से मूल्यांकन करें तो यह लगभग 15 प्रतिशत की औसत बढोतरी बैठती है. अगर आप मुद्रा स्फीति की बढ़ती दर से इसकी तुलना करें तो हर साल लगभग 4 प्रतिशत की दर से मुद्रास्फीति बढ़ती है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी जी के चार साल के कार्यकाल में ही मुद्रास्फीति की दर जो 16 प्रतिशत बढी उसे ही नई एमएसपी में चालाकी से समायोजित कर दिया गया है. जबकि मोदी सरकार में डालर के मुकाबले रुपए का जो अवमूल्यन तेजी से हुआ है उससे किसान की मुद्रास्फीति की दर बढ़ने की भरपाई भी इस वर्तमान एमएसपी से नहीं हो पाई है.

दरअसल इस चुनावी वर्ष में देश भर में किसान संगठनों की गोलबंदी और बढ़ते किसान आन्दोलन का दवाब सरकार पर है. मगर सरकार खेती और किसानों के लिए कुछ ऐसा करने से बचना चाहती है जिससे इस संकट का कोई स्थाई समाधान निकल सके. इसके कारण साफ़ हैं. मोदी सरकार निर्लज्ज रूप से कारपोरेट परस्त है. देश के संशाधनों को कारपोरेट की झोली में डालना और इसके लिए कृषि क्षेत्र में भी कारपोरेट खेती को बढ़ावा देना उसके एजेंडे में प्रमुखता लिए है.

अगर मोदी सरकार किसान आन्दोलन की मांग को मानती है तो उससे इस देश के करोड़ों गरीब, मध्यम तबके के छोटी जोत के किसानों का भला होगा और मोदी व भाजपा की कारपोरेट भक्ति पर सवाल उठ जाएगा. छोटी जोतों का खात्मा और कारपोरेट फार्मिंग के लिए माहौल तैयार करना ही मोदी सरकार का छुपा एजेंडा है.

सत्ता में आने के बाद आज दस अरब का पार्टी फंड और अनुमानित साढे तीन सौ करोड़ से बना पांच सितारा पार्टी मुख्यालय भाजपा – संघ की कारपोरेट परस्ती के खुले सबूत हैं. नीतियों के सवाल पर यह एजेंडा यूपीए सरकार का भी था. अगर आप स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में फसलों के मूल्य निर्धारण की सिफारिश को हटा दें तो आयोग की यह रिपोर्ट भी घुमा – फिरा कर कारपोरेट खेती का ही रास्ता सुझाती दिखती है. इसलिए किसान आन्दोलन की ताकतों को स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के सिर्फ इस एक हिस्से को ही अपनी मांग में शामिल करना चाहिए न कि पूरी रिपोर्ट को. यह इसलिए कि भारत में पहली बार किसान के उत्पादन की लागत और उसके मुनाफे को जोड़ने की एक सही पद्धति इसमें अपनाई गयी है.

देश की खेती किसानों को तबाह करने वाले अन्य ज्वलंत सवालों पर भी मोदी सरकार चुप्पी साधे है. देश में बड़े कारपोरेट के हित में और ईस्टर्न व वैस्टर्न फ्रंट कारीडोर के साथ ही बुलेट ट्रेन व विद्युत परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे भूमि अधिग्रहण के कारण लाखों किसान और आदिवासी अपनी जमीन और परम्परागत आजीविका से बेदखल किए जा रहे हैं. इनके साथ ही इन पर निर्भर ग्रामीण मजदूर और दस्तकार भी अपनी आजीविका खो रहे हैं.

गौ-रक्षा कानून के कारण पालतू जानवरों की खरीद फरोख्त पर रोक लगी है इससे किसानों की आय का यह दूसरा महत्वपूर्ण साधन लगातार छिन रहा है. यही नहीं जिन -जिन राज्यों में गो रक्षा कानून लागू हुआ है वहाँ गौ वंश में दो तिहाई तक की कमी आ गयी है. घाटे की खेती के कारण देश की लगभग आधे से ज्यादा खेती आज बटाई पर हो रही है. पर बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने को केंद्र व राज्य दोनों सरकार अब भी तैयार नहीं हैं. उल्टे ग्रामीण समाज में स्थापित हमारे सदियों पुराने सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने की साजिशें समय – समय पर रची जा रही हैं जो हमारी खेती किसानी की सेहत को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं.

इन सवालों का सही समाधान अगर मोदी सरकार नहीं निकालती है तो आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाओं में देश का किसान सरकार से बदला लेने के लिए कमर कस रहा है.

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