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क्या नवाज़ शरीफ़ का सियासी सर्कल पूरा हो गया है ?

आर. अखिल

प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने के एक साल बाद पाकिस्तान की एक अदालत ने नवाज़ शरीफ़ को भ्रष्टाचार के मामले में दस साल जेल की सज़ा दी और अब वे अपनी बेटी मरियम नवाज़ और दामाद कैप्टन (रिटायर्ड) सफ़दर के साथ रावलपिडी के अडीयाला जेल में बंद हैं. सोमवार को उनकी तरफ़ से सज़ा के ख़िलाफ़ याचिका दायर की गई, लेकिन उस पर सुनवाई अब चुनाव के बाद होगी. यानी हर हाल में नवाज़ शरीफ़ को जुलाई आख़िर तक जेल में रहना होगा.

25 जुलाई को पाकिस्तान में आम चुनाव के साथ-साथ चारों राज्यों में भी नई सरकार बनाने के लिए मतदान होने है. ऐसे में इस दौरान शरीफ़ का जेल के भीतर होना पहले से ही मुश्किलों से घिरी उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग – नवाज़ (पीएमएल-एन) के लिए और मुश्किल का सबब बन गया है.

शरीफ़ के अयोग्य ठहराए जाने के बाद उनके छोटे भाई शहबाज़ शरीफ़ ने पीएमएल-एन की कमान संभाली है, लेकिन जानकार बताते हैं कि इनके साथ पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों का भावनात्मक जुड़ाव बड़े भाई जैसा नहीं है. ऐसे में कोई मुश्किल नहीं कि (पीएमएल-एन) का गढ़ माने जाने वाले पंजाब में इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) बाज़ी मार ले जाए. अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान में अगली सरकार इमरान ख़ान की बन सकती है, क्योंकि पाकिस्तान की संसद में आधे से ज़्यादा सांसद पंजाब से चुने जाते हैं.

पाकिस्तानी पार्लियामेंट में साधारण बहुमत के लिए 172 सीट चाहिए होता है जबकि पंजाब से इस बार कुल मिलाकर 176 सांसद चुने जायेंगे. कहना न होगा कि चुनाव हार जाने की स्थिति में नवाज़ शरीफ़ और उनके परिवार के लिए मुश्किलें और बढ़ेंगी. ऐसे में कहा जा सकता है कि शरीफ़ का सियासी सर्कल पूरा हो गया लगता है और उनकी नियति भी पूर्ववर्ती पाकिस्तानी नेताओं जैसी होती दिख रही है.

ऐसा नहीं है कि नवाज़ शरीफ़ के सियासी ज़िंदगी का यह सबसे मुश्किल पड़ाव है. तीन बार पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के बतौर मुंतख़िब शरीफ़ इस से पहले भी जेल और निर्वासन झेल चुके है. लेकिन इस बार भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा दो और प्रमुख बातें उनके और उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ काम कर रही हैं. पहला मामला पिछले साल उनकी सरकार द्वारा चुनावी नियमों में फेरबदल का है. शरीफ़ सरकार ने ख़तम-ए-नबुवत या अल्लाह की प्रभुसत्ता वाले एक अनुच्छेद में कुछ बदलाव को लेकर बहुत बवाल हुआ था. पिछले साल के आखिर में कई सारे कट्टरपंथी इस्लामी समूह तहरीक-ए-लबायक पाकिस्तान (टीएलपी) के बैनर तले राजधानी इस्लामाबाद में लगभग एक महीने तक प्रदर्शन करते रहे थे. सरकार ने तथाकथित बदलाव को ‘क्लेरिकल एरर’ यानि छपाई की गलती बताया और प्रदर्शनकारियों के मांग के मुताबिक केंद्रीय कानून मंत्री ज़ाहिद हामिद को पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. लेकिन इन सब के बावजूद प्रदर्शनकारी नहीं माने तो सेना को मध्यस्थता करनी पड़ी थी.

उस समय वह मामला तो रफ़ा-दफ़ा हो गया लेकिन कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने पीएमएल-एन से किनारा करना शुरू कर दिया. अब चुनाव के समय उसका असली असर दिख रहा है जब नई नवेली टीएलपी उम्मीदवार के मामले में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. पाकिस्तान की तीन प्रमुख पार्टियों – पीएमएल-एन, पीपीपी और पीटीआई – के अलावा टीएलपी ही एक ऐसी पार्टी है जो पंजाब में सौ से ज़्यादा उम्मीदवार खड़ी की है. ख़तम-ए-नबुवत के मुद्दे पर पीएमएल-एन विरोध भाव लिए पांच दूसरी इस्लामी पार्टियां इसबार एक सांझा मंच मुत्तहिदा मजलिस-ए-अवाम के बैनर तले चुनाव लड़ रही है. मुत्तहिदा मजलिस-ए-अवाम में दो प्रमुख दल जमात-इ-इस्लामी और जमीयत-ए -उलेमा-ए-इस्लाम भी शामिल हैं. इसके अलावा मुंबई हमलों का आरोपी हाफ़िज़ सईद की पार्टी ‘अल्लाहो अकबर तहरीक’ के साथ दो और इस्लामी कट्टरपंथी पार्टियां पहली बार चुनावी मैदान में है जिसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः पंजाब ही है.

पीएमएल-एन के कमज़ोर पड़ते जाने की दूसरी बड़ी वजह है नवाज़ शरीफ का लगातार पाकिस्तान सेना के खिलाफ विवादस्पद बयान. 28 जुलाई 2017 को भ्रष्टाचार के आरोप में पद से हटाए जाने के बाद से ही वे लगातार न्यायपालिका और सेना के खिलाफ बोलते रहे हैं. लेकिन इस साल 12 मई को प्रतिष्ठित पाकिस्तानी अख़बार डॉन को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने मुंबई हमलों में पाकिस्तान आतंकी समूहों के शामिल होने की बात कहते हुए हुए सवाल उठाया, “क्या हमें उन्हें (आतंकी समूह) को यह इजाज़त देनी चाहिए कि वो सीमा पार जाएं और मुंबई में डेढ़ सौ लोगों को मार दें ?” शरीफ़ के इस बयान को पाकिस्तानी सेना पर सीधा हमला माना गया और इसपर हफ्ते भर खासा बवाल मचा रहा.

शरीफ़ के क़रीबी माने जाने लोग भी उनके इस बयान का समर्थन करने से कतराने लगे. दक्षिण पाकिस्तान के कई सारे पीएमएल-एन नेताओं ने इस बयान के बाद पार्टी छोड़ दी और अब स्वतंत्र उम्मीद्वार के बतौर चुनाव लड़ रहे हैं. दक्षिण पंजाब में अलग राज्य की मांग भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना हुआ है जो वहां पिछले 20 सालों से सत्ता में रही पीएमएल-एन के ख़िलाफ़ ही जाता दिख रहा है.

ऐसे में नवाज़ शरीफ़ का बेटी और दामाद के साथ जेल में होने और कैंसर से जूझ रही उनकी पत्नी का लन्दन हॉस्पिटल में भर्ती की वजह से उपजा ‘सिम्पथी फैक्टर’ ही एक वजह बचता है जो पंजाब में पीएमएल-एन की नैया पार लगा सकता है. लेकिन, जैसा कि पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक हुसैन हक़्क़ानी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है, पाकिस्तान में आप एक साथ भ्रष्ट और एंटी-मिलिट्री नहीं हो सकते. मतलब आप भ्रष्ट हैं लेकिन फौज़ को उपर मानते हैं तो आसिफ़ अली ज़रदारी की तरह राजनीती कर सकते हैं. लेकिन भ्रष्टाचार और सेना की खिलाफ़वर्ज़ी एक साथ हुआ तो आपका ‘ शरीफ़ ‘ होना लाज़मी है.

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