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हम असली मुद्दे और विरासत भूल जाएं, इसके लिए स्मृतियां मैन्युफैक्चर की जा रही हैं- प्रणय कृष्ण

लखनऊ, 15 सितंबर। ” देश में स्मृतियों का गृह युद्ध चल रहा है। सत्ता चाहती है कि उमर खालिद जैसे लोग, जो बरसों से जेल में बंद हैं, हमारी स्मृतियों से बाहर हो जाएं। हम अपनी साझी विरासत भूल जाएं। इसके लिए वह स्मृतियां मैन्युफैक्चर कर रही है। संविधान हत्या दिवस, विभाजन विभीषिका दिवस, कश्मीर फाइल्स, बंगाल फाइल्स वगैरह इसी परियोजना का हिस्सा हैं। हमारी जंग भूलने के विरुद्ध है। “

यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर प्रणय कृष्ण के वक्तव्य का हिस्सा है, जो उन्होंने जन संस्कृति मंच के सालाना जलसे ‘ याद-ए-तश्ना’ में दिया। रविवार को कैसरबाग के बलराज साहनी सभागार में आयोजित इस जलसे में इंकलाबी शायर तश्ना आलमी की शायरी की किताब ‘कलाम-ए-तश्ना’ का विमोचन भी हुआ। यह उनकी पुरानी किताब ‘बतकही’ का नया और संवर्द्धित संस्करण है। कार्यक्रम की अध्यक्षता जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मशहूर रंगकर्मी जहूर आलम ने की।

प्रो. प्रणय ने अपने वक्तव्य ‘ विभाजनकारी संस्कृति और जन प्रतिरोध ’ से पहले रूपम मिश्र की भावनाओं से ओत-प्रोत कविता ‘ उमर मेरे भाई ’ पढ़ी। उन्होंने कहा कि यह उलटवाँसी का दौर है। हर दिन संविधान की हत्या करने वाले ‘ संविधान हत्या दिवस ’मना रहे हैं। विभाजन करने वाले ‘ विभाजन विभीषिका दिवस ’ मना रहे हैं। इन नयी स्मृतियों का उद्देश्य यह है कि हम भूल जाएं कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों ने थैलियां खोल दीं, फिर भी हिंदू-मुस्लिम दंगे नहीं हुए। अजीमुल्ला खान के ‘ पयामे आजादी ’ अखबार और ‘ हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा ’ झंडा गीत को हम भूल जाएं। साझी संस्कृति के प्रतीक अमीर खुसरो और दारा शुकोह को भूल जाएं। भूल जाएं कि झूठे आरोपों में लोगों को जेलों में 10-10, 15-15 साल सड़ाया जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय में हम दुनिया में 125वें स्थान पर हैं। विश्व जीडीपी में भारत का योगदान केवल 3.45% है जो अंग्रेजों के आने से पहले 25% था। भूल जाएं कि हम पड़ोस के पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से भी ज्यादा भूखे हैं, बस अफगानिस्तान से बेहतर स्थिति में हैं। देश के 30% बच्चों का वजन अपने कद के अनुपात में कम है। दुनिया में हर साल लगभग सात लाख आत्महत्याएं होती हैं, जिनमें से एक लाख अकेले भारत में होती हैं। यह सब भूल जाएं और याद रखें ‘ बंगाल फाइल्स ’, ‘ कश्मीर फाइल्स ’। खोजें हर गुंबद और मीनार वाली इमारत के नीचे मंदिर।

मगर हमें याद रखना है। याद रखना है कि मुस्लिम पाकिस्तान बनने के बावजूद हमने हिंदू भारत बनाना नहीं चुना। कल्पना कीजिए क्या दबाव रहा होगा संविधान सभा में, फिर भी हमने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र चुना। संस्कृति-कर्मियों की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन सिकुड़ते-सिकुड़ते आज जमीन का छोटा टुकड़ा भर रह गया है। अब उसे भी छीन लेने की तैयारी है। वहां के बच्चों को भूखा मारा जा रहा है और दुनिया मूकदर्शक है। इसी फिलिस्तीन के कवि महमूद दरवेश ने कहा था कि मेरी मातृभूमि तो खो गयी है, लेकिन मैंने उसे अपनी कविताओं में बचा लिया है। “ सपनों का खत्म होना ही सबसे बड़ी पराजय है ”, यह कहते हुए प्रो. प्रणय कृष्ण ने अपने वक्तव्य का समापन पाश की मशहूर कविता ‘सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना’ से किया।

पत्रकार सुहैल वहीद ने अपने वक्तव्य ‘ हमारा वक्त और उर्दू सहाफत ’ में उर्दू पत्रकारिता की बदहाली पर चिंता जताते हुए कहा कि आज उर्दू अखबार मदरसों तक महदूद हो गये हैं। जहां एक तरफ हिंदी अखबारों ने मुसलमानों के मसाइल, उनके पर्व-त्योहारों को काफी जगह दी, वहीं उर्दू अखबार मजहब, अदब और आलमी खबरों तक सिमटे रहे। उनमें बिजनेस का पन्ना तक नहीं होता। देश के अंदरूनी मसलों के विश्लेषण से लैस केवल एक उर्दू अखबार निकला ‘कौमी आवाज’ जो अंग्रेजी पत्रकारिता की तर्ज पर था। उसके पतन के साथ उर्दू पत्रकारिता का भी पतन हो गया। आज उर्दू के विस्तार के लिए पूंजी और निवेश की जरूरत है। दिलचस्प बात यह है कि यह काम मुसलमान नहीं कर रहे; सबसे बड़ा उर्दू अखबार संजय गुप्ता चला रहे हैं, तो सबसे बड़ी उर्दू वेबसाइट संजीव सराफ। जो भी हो, यह उर्दू की ताकत है कि वह हर जगह मौजूद है, चाहे शायरी के जरिये या हमारी बोली-भाषा के जरिये।

लेखक व शायर अनवार अब्बास ने ‘तरक्कीपसंद तहरीक और आज का उर्दू अदब’ पर अपनी बात रखी। उन्होंने साहित्य में तरक्कीपसंद तहरीक के इतिहास पर रोशनी डालते हुए कहा कि उर्दू अदब हमेशा से बेदार रहा है। गालिब और मीर में तरक्कीपसंदी के बीज थे, जो बाद में फैज जैसे इंकलाबी शायरों की शायरी में शजर की शक्ल में दिखायी पड़ता है। उर्दू शायरी ने लोगों को मायूसी से निकाला है और उम्मीद दी है। सज्जाद जहीर से लेकर अली सरदार जाफरी तक, वह हमेशा अपने फर्ज पर डटी रही है, चाहे वह औरतों और मजलूमों के हक में खड़े होने का मामला हो या फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज उठाने का। जांनिसार अख्तर, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी जैसे शायर जब फिल्मों में गये तो वहां भी तरक्कीपसंदी के मूल्यों के साथ ही गये। उन्होंने मौजूदा उर्दू शायरी के अपनी रवायतों से हटने, और बहुत ज्यादा सियासी और अखबारी बनने पर चिंता भी जतायी।

अपने अध्यक्षीय भाषण में, जहूर आलम ने मौजूदा हालात पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि देश में जो जहर बोया जा रहा है, वह अब पहाड़ों तक पहुंच गया है। पिछले दिनों पहली बार नैनीताल में दंगा हुआ जहां इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। उन्होंने कहा कि आज दुश्मन से ज्यादा दोस्त पहचानने की जरूरत है।

कार्यक्रम का आगाज जसम लखनऊ के सचिव और कहानीकार फरजाना महदी ने तश्ना जी के शेर ‘हटो कांधे से आंसू पोंछ डालो वो देखो रेलगाड़ी आ रही है/ मैं तुमको छोड़कर हरगिज न जाता मुझको गरीबी लेकर जा रही है’ से किया। तस्वीर नकवी ने सबीहा खान का वह खुला खत पढ़ा जिसे उन्होंने जेल में अपने बेटे उमर खालिद से हालिया मुलाकात के बाद लिखा था। एक मां के दुख और साहस ने सभी की आंखें नम कर दीं। आइसा से जुड़े छात्रों शांतम निधि और सुचित माथुर द्वारा प्रस्तुत गीत से कार्यक्रम का समापन हुआ।

जसम लखनऊ के अध्यक्ष और शिल्पकार धर्मेंद्र कुमार ने कला विश्वविद्यालय के छात्र अतुल कुमार और हेमंत बुंदेली के सहयोग से सभागार परिसर में इंस्टालेशन आर्ट प्रस्तुत किया। शीर्षक था ‘निशाने पर संविधान’। यह इंस्टालेशन इप्टा परिसर में 16 तक रहेगा जिसका अवलोकन किया जा सकता है। भगवा शक्तियों द्वारा संविधान हत्या को दिखाती इस कलात्मक प्रस्तुति को खूब सराहना मिली। इस मौके पर बड़ी संख्या में लेखक, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे।

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