Wednesday, December 7, 2022
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कवि व लेखक सुधीर सक्सेना को केदारनाथ अग्रवाल सम्मान

लम्बी कविताओं के कवि हैं सुधीर सक्सेना – स्वप्निल श्रीवास्तव
कविताओं में मनुष्य और मनुष्यता की पहचान – कौशल किशोर

बाँदा . ‘ मुक्तिचक्र ‘ और जनवादी लेखक मंच द्वारा दिया जाने वाला जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान 2018 का दो दिवसीय आयोजन बाँदा और कालिंजर में 22-23 दिसम्बर को हुआ. यह सम्मान वरिष्ठ कवि व लेखक सुधीर सक्सेना को दिया गया.

डीसीडीएफ स्थित कवि केदारनाथ अग्रवाल सभागार में आयोजित 22 ,दिसम्बर के आयोजन में चर्चा के केन्द्र में सुधीर सक्सेना का बहुआयामी व्यक्तित्व व रचनाकर्म रहा. अध्यक्षता वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने की. मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ कवि, जसम के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष व ‘रेवान्त’ के प्रधान सम्पादक कौशल किशोर। अन्य वक्ताओं में लखनऊ से आये युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी, युवा कवि बृजेश नीरज और फतेहपुर से आये युवा कवि व आलोचक प्रेमनन्दन रहे.

शुरूआत में संचालक युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने सुधीर सक्सेना का परिचय देते हुए उनकी कविताओं और सृजन कर्म पर विस्तार से अपनी बात रखी. बाँदा में केदारबाबू के शिष्य वरिष्ठ गीतकार जवाहर लाल जलज ने सभी आगन्तुकों का स्वागत करते हुये जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान की रूपरेखा और सार्थकता सबके सामने रखी व इस सम्मान को एक आन्दोलन का प्रतिफलन कहते हुये बाँदा में केदार की विरासत को आगे बढाने का संकल्प लिया.

जनवादी लेखक मंच के सचिव प्रद्युम्न कुमार सिंह ने सुधीर सक्सेना पर सम्मान पत्र का वाचन किया और मुक्तिचक्र सम्पादक गोपाल गोयल ने अंग वस्त्र भेंट किया. रामावतार साहू, रामकरण साहू, नारायण दास गुप्त, मुकेश गुप्त, रामप्रताप सिंह परिहार ने अतिथियों को अंग वस्त्र देकर स्वागत किया.

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने प्रतीक चिन्ह देकर सुधीर सक्सेना को जनकवि केदार सम्मान से सम्मानित किया.

लखनऊ से आए मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि कौशल किशोर ने सुधीर सक्सेना, स्वप्निल श्रीवास्तव और अपनी मित्रता के संस्मरण सुनाये तथा आज के खतरों से आगाह करते हुए पत्रकारिता के विचलन पर अपने विचार प्रकट किये. उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता हिन्दू पत्रकारिता हो गयी है. झूठ को सच बनाकर पेश किया जा रहा है. इसके बरक्स सुधीर सक्सेना की पत्रकारिता वैकल्पिक व पक्षधरता की पत्रकारिता है. इस संबंध में उन्होंने रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर आदि को याद किया.

सुधीर सक्सेना की कविताओं पर बोलते हुए कौशल किशोर ने कहा कि सुधीर की कविताओं में मनुष्य और मनुष्यता की पहचान है. यहां हृदय की कोमलता है तो दृष्टि की सूक्ष्मता है. इसका उदाहरण ‘कविता ‘समरकंद में बाबर’ और ‘अयोध्या’ कविता में देखा जा सकता है. प्रेम और प्रकृति जिस तरह आज संकट में है, सुधीर की चिन्ता में है. एक तरफ जहां साझी संस्कृति को कैसे बचाया जाय है, वहीं धरती की दशा और मनुष्य की दिशा पर वे विचार करते हैं. इस मायने में सुधीर सक्सेना की कविताएं बड़े फलक की हैं.

अध्यक्षता कर रहे स्वप्निल श्रीवास्तव ने सुधीर सक्सेना को अपनी पीढी का एकमात्र कवि कहा जिसने सबसे अधिक लम्बी कवितायें लिखी और सुधीर सक्सेना को यह सम्मान मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये कहा कि हम सब इस समारोह में उपस्थित होकर फिर एक बार केदार की धरती की ऊर्जा देखी. उन्होंने सुधीर सक्सेना की कई कविताओं का संदर्भ देते उसके मर्म की व्याख्या की.

लखनऊ से आये युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी ने सुधीर सक्सेना के कविता संग्रह ‘किताबें दीवार नही होती’ का जिक्र करते हुए कहा कि आज हमारे समाज का सबसे बडा संकट है कि मैत्री भाव घटता जा रहा है। सुधीर सक्सेना ने अपने सौ मित्रों पर कविता लिखकर और विभिन्न शहरों पर कविता लिखकर आत्मीयता का रचाव किया है. युवा कवि प्रेमनन्दन ने कहा कि सुधीर सक्सेना ने सबसे अधिक और शानदार कवितायें शहरों पर लिखी हैं. वह जिस भी शहर से जुड़े उस पर लिखा.

सम्मानित कवि सुधीर सक्सेना ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में बाँदा की धरती और बाँदा के साथ अपने लम्बे जुडाव का जिक्र किया और कहा कि बाँदा को केन बाँधती है या फिर कविता. बाँदा की संस्कृति कविता की संस्कृति है. तुलसी से लेकर केदार तक यह संस्कृति अडिग और अविचल भाव से चली आ रही है. केदार की धरती पर केदार सभागार में केदार की विरासत के लिए काम कर रहे मुक्तिचक्र और जनवादी लेखक मंच द्वारा केदार सम्मान पाकर कोई भी गौरवान्ति हो सकता है. यह सम्मान केदार जी की परम्परा का सम्मान है.

सुधीर सक्सेना ने अपनी पाँच कविताओं का पाठ किया। काशी में प्रेम, विडम्बना कविता को लोगों ने खूब सराहा.

युवा गजलकार कालीचरण सिंह ने बीच बीच में अपनी गजल कहकर श्रोताओं की तालियाँ बटोरीं और सम्मान समारोह में रसवत्ता बनाये रखी. ‘मुक्तिचक्र’ के सम्पादक गोपाल गोयल ने केदार सम्मान की पीठिका बताते हुए कहा कि सुधीर सक्सेना, कौशल किशोर और स्वप्निल श्रीवास्तव का बाँदा आना हमारे लिए बडी उपलब्धि है. गोष्ठी को वरिष्ठ अधिवक्ता आनन्द सिन्हा, रणवीर सिंह चैहान, रामकरण साहू, रामावतार साहू, चन्द्रपाल कश्यप ने भी सम्बोधित किया. अन्त में डीसीडीएफ अध्यक्ष सीपीआईएम नेता वामपंथी विचारक सुधीर सिंह ने सभी आगन्तुकों का आभार व्यक्त किया.

बुन्देली अवशेषों में कविता की चमक

बाँदा से लगभग साठ कीमी दूर मध्य प्रदेश की सीमा सतना और पन्ना से सटा हुआ चन्देलकालीन दुर्ग कालिंजर जनपद बाँदा की ऐतिहासिक धरोहर है। कालिंजर को बाँदा के लोग भावुकता की हद तक प्यार करते हैं। यह दुुर्ग सरकारी बेरुखी और संसाधनों के अभाव व खण्डित तथा ध्वस्त होने के बावजूद भी अपने भीतर बुन्देलखण्ड के पुरातन वैभव की कथा कहता है । रानी महल, अमान सिंह का महल, विभिन्न शैली में नृत्य आकृतियों से जटित दीवारों से युक्त विशाल रंगमहल, मृगदाव, शिव मन्दिर, बावडी, पोखर, तालाब, सैनिक कक्ष, राजदरबार, जैसे आकर्षक निर्मितियों को देखकर प्रतीत होता है कि बुन्देलखण्ड का स्थापत्य किसी जिन्दा कविता से कमतर नही है। रंगमहल में प्रवेश करते ही शीतलता का आभास होता है। लम्बा चैडा आँगन और आँगन के चारो तरफ बारामदे हैं। चारो तरफ ऊपर जाने की सीढिया हैं जिनसे चढ़कर हम सामने की छत पर बैठ गये। इसी रंगमहल में कविता पाठ का आयोजन हुआ। रंगमहल में कविता पढ़ना एक बार पुनः इतिहास की ओर लौटना है। इस ध्वन्सावशेष मे कभी रात दिन संगीत और शब्द का झंकृत निनाद रहा होगा और उसी जगह पर पुनः शब्दों की गूँज उठी, कविता की सलिला बही। अध्यक्षता स्वप्निल श्रीवास्तव ने की और संचालन सुधीर सक्सेना ने किया।

काव्य पाठ का आरम्भ सुधीर सक्सेना ने की। उन्होंने कविता के द्वारा बाजार के बढ़ते प्रभाव को उकेरा, वहीं जवाहर लाल जलज ने ओजस्वी शब्दों में व्यक्ति की जिजिविषा और जीवन के मध्य अन्तराल पर बात रखी। वरिष्ठ कवि कौशल किशोर ने ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ कविता का पाठ किया जिसमे आज के बुद्धिजीवी वर्ग की नकली क्रान्तिकारिता और खोखलेपन को उजागर किया गया था। प्रेमनन्दन ने जनवादी चेतना की प्रगतिशील कविताओं का पाठ किया। उनकी कविता मेरा गाँव को लोगों ने पसंद किया । युवा कवि पी के सिंह ने अपनी प्रेम कविताओं का पाठ कर सबका मन मोह लिया। बृजेश नीरज ने हिन्दी गजलों को पाठ किया। बृजेश ने परिनिष्ठित भाषा मे गजल के व्याकरण का निर्वाह का अच्छा उदाहरण पेश किया। युवा गजलकार कालीचरण सिंह ने तरन्नुम की गजल कही। उनकी गजल ‘कहीं और चलें चलें’ को सबने सराहा। अजीत प्रियदर्शी ने अपनी निजी पीडाओं के आलोक में समूचे समाज और समाज के ठेकेदारों की नकली संवेदना को अपनी कविताओं में दिखाया।

उमाशंकर सिंह परमार ने ‘लौटना’ और ‘सन्नाटा’ कविता का पाठ किया। दोनो कवितायें ‘रेवान्त’ के ताजा अंक में प्रकाशित हैं। जनवादी लेखक मंच के कोषाध्यक्ष नारायण दास गुप्त ने अपने बुन्देली लोक गीत ‘खागा सकल पट्यौला खा गा’ और ‘साईकिल के पिछले टायर का अगला होना’ कविताओं का पाठ किया। अध्यक्षता कर रहे स्वप्निल श्रीवास्तव ने एक प्रेम कविता और एक बंजारे कविता का पाठ किया। उनकी बंजारे कविता की पंक्ति ‘जितना मै आगे बढता गया उतना ही पीछे छूटता गया’ कालिंजर के इतिहास को भी व्यक्ति कर देती है। अन्त में केदार सम्मान से सम्मानित कवि सुधीर सक्सेना ने घोषणा की कि ‘दुनिया इन दिनों’ कवि केदारनाथ अग्रवाल पर जल्द ही विशेषांक लायेगी।

 

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