Wednesday, December 7, 2022
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काकोरी की विरासत

  • अंकुर गोस्वामी


विरले ही होते हैं  वो लोग जो एक उद्देश्य की  प्राप्ति हेतु अपना  सर्वस्व अर्पित कर देते  हैं। वे उन महान आदर्शों के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटते।  इतिहास हमें भारत के क्रन्तिकारी आंदोलन के उन पहलुओं की ओर ले जाता है, जिनमें सामाजिक परिप्रेक्ष्य को बदलने की ज़बरदस्त क्षमता थी। क्रांतिकारियों ने ही सबसे पहले पूर्ण स्वाधीनता का नारा दिया, उन्होंने ही  मनुष्य द्वारा  मनुष्य के शोषण के अंत के विचार का परचम लहराया।

गदर आंदोलन के इतर भारतीय इतिहास में एक और दौर था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं।  ये  वो वक़्त था जब पूरे उत्तर भारत में  नौजवान गुप्त रूप से ब्रिटिश सरकार रुपी साम्राज्यवादी शोषण को उखाड़ फेंकने हेतु तत्पर थे। यह सिरफिरे दिशाहीन युवकों का आंदोलन नहीं था, न ही ये बेकारी अथवा बदले की भावना से प्रेरित प्रयास था। अपितु, यह परिपक्व  एवं बौद्धिक क्षमता के धनी युवकों का एक संगठित श्रम था।

वर्ष 1919-1922 भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को दिशा देने में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस दौरान रूसी क्रांति का भारत में क्रांतिकारियों के मानस पर गहरा प्रभाव पड़ा, और अध्यात्म एवं भौतिकवाद के साथ-साथ समाजवाद भी उनके बीच एक चर्चित विषय बनने लगा । क्रांतिकारी आंदोलन के शुरुआती दिनों में, ज्यादातर धार्मिक जुड़ाव वाले लोग इसमें शामिल हुए, लेकिन रूसी क्रांति के  विचारों की लौ भारत पहुँच कर क्रांतिकारी आंदोलन को  समाजवाद और साम्यवाद की ओर प्रेरित करने लगी । साथ ही, प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंडमान से दिग्गज सचिनद्रनाथ सान्याल को रिहा कर दिया गया और युवा क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को मैनपुरी षड्यंत्र मामले से माफ़ी मिल गई । इसे सुनहरे अवसर के रूप में पा कर, वे उत्तर भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के आयोजन की दिशा में जमकर मशगूल रहे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, असहयोग आंदोलन के विघात ने चंद्रशेखर आजाद जैसे बेचैन युवाओं को अन्य रास्ते तलाशने एवं स्वतंत्रता संग्राम की ओर खुद को समर्पित करने के लिए धकेल दिया।

शचीन्द्रनाथ सान्याल और जोगेशचंद्र चटर्जी के समर्पित प्रयासों से, सन १९२४ में  हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए) का जन्म हुआ। उन्होंने जोशीले नौजवानों को साथ जोड़ कर उत्तरी भारत के अधिकांश हिस्सों में अपना नेटवर्क फैलाना शुरू किया । एच.आर.ए  ने  ‘ द रिवॉल्यूशनरी ‘ नाम का पर्चा जारी करते हुए घोषणा की कि जब तक ‘ मनुष्य द्वारा मनुष्य के  शोषण ‘ का अंत नहीं हो जाता, तब तक वे अपना संघर्ष जारी रखेंगे ।

कुछ सालों तक  एचआरए ने हथियार खरीदने और पत्रक- पोस्टर आदि  छापने के लिए धन एकत्रित करने हेतु डकैती का सहारा लिया। वे जरूरत के अनुसार समय-समय पर संपन्न ज़मींदारों को लूटते, परन्तु धीरे-धीरे यह समझा गया कि उपरोक्त विधि से उन्हें आर्थिक सहायता तो  मिल जाती है , लेकिन इस से आम जन मानस  में उनकी पकड़ न बराबर ही रहती । साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत, सिर्फ भारत में अंग्रेजों से लड़कर नहीं , बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देकर ही की जा सकती थी ।  इसलिए यह तय किया गया कि पार्टी खुद सरकार के खजाने पर निशाना साधेगी, जिस से यह  संदेश जाए कि भारत के  क्रांतिकारी देश से धन की निकासी के खिलाफ खड़े हैं । 9 अगस्त 1925 को बिस्मिल के नेतृत्व में लखनऊ के पास काकोरी में एक गाड़ी रोक कर सरकारी खजाना लूटा गया। बाद में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का प्रकरण चलाया गया, जिसमें राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में, 19 दिसंबर को बिस्मिल को गोरखपुर, अशफाक उल्लाह खान को फैजाबाद  और रोशन सिंह को इलाहाबाद  में फांसी दी गई। । इस प्रकरण में १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया। उनके नाम हैं:  शचीन्द्रनाथ  सान्याल , शचीन्द्रनाथ  बक्शी , मन्मथनाथ गुप्त  , मुकुन्दी लाल, गोविन्द चरण , राज  कुमार सिन्हा, भूपेंद्रनाथ सान्याल , प्रेम कृष्ण शर्मा  , राम कृष्ण खत्री , सुरेशचंद्र  भट्टाचार्य , विष्णु  शरण दुब्लिश , योगेशचन्द्र चटर्जी , केशव चक्रवर्ती , राम दुलारे , प्रणवेश चटर्जी , रामनाथ पांडेय ।

जब हम क्रांतिकारियों के बारे में सोचते हैं , तो आम तौर पर हमारे मन में उनकी छवि केवल बंदूक पकड़े युवकों के रूप में होती है । परंतु वे किस प्रकार के समाज के लिए संघर्ष कर रहे थे , इस पहलू पर हम विचार करने में अक्षम रहते हैं। बल्कि दुर्भाग्यवश बिस्मिल को तो  दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर भगवाकरण अभियान का शिकार होना पड़ा है । आज कई सस्ती आत्मकथाएं और पॉकेट बुक्स हैं जो उन्हें हिंदुत्व की राजनीति के आइकन के रूप में पेश करती हैं । वास्तविकता से दूर, बिस्मिल का हिंदुत्व विनियोग सफल रहा है क्योंकि उन पर और उनकी विचारधारा पर बहुत कम महत्वपूर्ण अध्ययन है,  बावजूद इसके कि बिस्मिल ने कुछ पुस्तकें और लेख पीछे छोड़े हैं।

बिस्मिल ने अशफाकुल्लाह खान के साथ मिलकर रोहिलखंड क्षेत्र के दंगाग्रस्त इलाकों में सांप्रदायिक सौहार्द के अभियान चलाए । बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में हिंदुओं और मुसलमानों से बार-बार एक-दूसरे पर भरोसा करने की अपील की, और उम्मीद जताई  कि क्रांतिकारियों द्वारा दी गई कुर्बानी  दोनों समुदायों को साथ आने के लिए प्रेरणा देगी । बिस्मिल ‘ स्वतंत्रता ‘ के सही मायनों के बारे में अपनी संक्षिप्त आत्मकथा में विस्तार से चर्चा करते हैं । बिस्मिल एक बहुत ही प्रासंगिक सवाल पूछते है; “एक देश को मुक्त करने का क्या सही  अर्थ है जहाँ लगभग ६०० लोगों  को अछूत माना जाता है” बिस्मिल के विचार में सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता का एक मजबूत घटक  है । वह “अछूत’ माने जाने वाले ६०० लोगों को शिक्षित करने के लिए उचित व्यवस्था करने का आह्वान करते हैं,  और मानते हैं कि उन्हें समान सामाजिक-आर्थिक अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए ।

आज़ादी के विषय पर अशफ़ाक़ुल्लाह खान भी एक समाजवादी विचार रखते हुए लिखते हैं कि : “मैं हिन्दुस्तान के लिए उस तरह की आज़ादी चाहता हूँ ,जहाँ  गरीबों को खुशी से और आसानी से जीने मिले । मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरी मृत्यु के बाद वह दिन जल्द से जल्द आ जाए जब लोको वर्कशॉप के अब्दुल्ला मैकेनिक, धनिया मोची और आम किसान लखनऊ की छतर मंजिल में श्री खालिक-उज-जमान, जगत नारायण मुल्ला और राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सियों पर बैठे नजर आएं । वह आगे कहते हैं कि “… यदि भारत स्वतंत्रता प्राप्त करता है और ब्रिटिश के बजाय, हमारे अपने लोग सरकार बनाते  हैं और अमीर – गरीब के आधार पर, ज़मींदार – किसान के बीच भेदभाव रहता है, तो मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि जब तक समानता स्थापित नहीं हो जाती तब तक हमें स्वतंत्रता प्रदान न करें । इस पर विश्वास करने के लिए मुझे ‘कम्युनिस्ट’ कहा जा सकता है, लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं है क्योंकि मैं दृढ़ता से भगवान में विश्वास करता हूं … वह सभी को बराबर बनाता है.”

राजेंद्र लाहिड़ी के विषय में जोगेशचन्द्र चटर्जी अपनी आत्मकथा ‘इन सर्च ऑफ फ्रीडम’ (१९५८) में  लिखते हैं कि “वह  एकदम  क्रांतिकारी थे और सामाजिक पक्षपात के खिलाफ खुल कर विद्रोह करते और और जन्म से  ब्राह्मण होते हुए जातिगत पहचान के विरुद्ध उन्होंने अपना जनेऊ तक उतार फेंका । लाहिड़ी कम से कम झिझक के बिना पोर्क और बीफ खा  लिया करते थे । उन्होंने दिल से महसूस किया कि सामाजिक पक्षपात प्रगति के मार्ग में बड़ी बाधा है और उसे पूरी तरह से तोड़ा जाना चाहिए । यह एक सच्चे क्रांतिकारी की असली भावना थी ।“

क्रांतिकारियों ने न केवल पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाए, बल्कि उन विचारों को आत्मसात करने और प्रचारित करने की भी कोशिश की जो एक रूढ़िवादी समाज के व्यापक वर्ग के लिए खतरनाक और विघटनकारी लग रहे थे।  एच.आर.ए  के क्रांतिकारियों का जीवन हिंदुस्तान का वो अध्याय हैं, जो एक नए समाज की नींव रखने के लिए समाज और परम्पराओं को चुनौती देता है । एक क्रांतिकारी असफल हो सकता है, लेकिन उनके विचार और संघर्ष जीवित रहते हैं । इतिहास का उद्देश्य क्रांतिकारियों के रक्तसिन्चित चिंतन का मात्र आकलन करना नही, अपितु उसमें दूरगामी भविष्य हेतु संकेत खोजना है।

(अंकुर गोस्वामी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध कर रहे हैं।)

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