Wednesday, December 7, 2022
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जाति की जटिलता में गंधर्व विवाह की परेशानियों को उजागर करती फिल्म ‘जाग उठा इंसान’

1 – जाति व्यवस्था नियंत्रित तथा मर्यादित जीवन भोग का ही दूसरा नाम है। प्रत्येक जाति अपने जीवन में खुशहाल रहने के लिए ही सीमित है, वह जातीयता की सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकती। सह भोज और सह-विवाह पर जातीय नियंत्रण होने का यही अर्थ है। – महात्मा गांधी (नवजीवन-संपादीकय अंश)

2- भारत में जाति के मूल के बारे में कोई उलझन पेश नहीं हुई है, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ कि सजातीय विवाह ही जात-पात का एकमात्र कारण है और जब मैं जाति के मूल की बात करता हूँ तो इसका अर्थ सजातीय विवाह प्रथा की क्रियाविधि के मूल से है। – डॉ भीमराव आंबेडकर (भारत में जाति प्रथा)

हिंदी सिनेमा में ऊँची और नीची जातियों पर आधारित अनगिनत फिल्में बनी हैं। बहुत समय तक तो ट्रेंड ही था – बड़े घर की लड़की और छोटे घर का लड़का परस्पर प्रेम में पड़ जाया करते थे। बड़े घर वाले प्रेम में बाधा बनते थे, जिससे कहानी को गति और खलनायक दोनों की आपूर्ति हो जाया करती थी। इस तरह राजकुमारी से लेकर जमींदार, सौदागर, बिल्डर और उद्योगपति आदि की बेटियों या बहनों से मामूली लड़का प्रेम कर बैठता था। मामूली लड़का प्राय: निचली जाति का ही रहता था (बस जाति का नाम नहीं लिया जाता था)। उसका घर झोपड़ीनुमा या कच्ची दीवारों का हुआ करता था। वह गरीबों के मुहल्ले या गाँव में रहता था। मजदूरी करके अपना और अपने परिवार के लोगों का पेट भरता था और उसका रोम-रोम ईमानदारी से भरा रहता था। इसी ईमानदारी पर बड़े घर (ऊँची जात) की लड़की मुग्ध हो जाया करती थी। दोनों परस्पर प्रेम कर बैठते थे। इस तरह नाच-गाना और मारधाड़ वाला ड्रॉमा तीन घंटे चलता था। प्रत्यक्ष रूप से जाति का नाम न लेने से छूआछूत और सामाजिक न्याय की तमाम चीजों से ऐसी फिल्में बड़ी आसानी से बचकर निकल जाया करती थीं (हैं) और अमीर व गरीब की मामूली खाईं से गुजरते हुए हैप्पी एंडिंग तक पहुंच जाया करती थीं (हैं)। संवेदना, प्रेम, त्याग, समर्पण और तमाम प्रकार की बाधाओं से जूझता नायक तथा नृत्य-संगीत से लैस ऐसी फिल्में कभी सफलता की गारंटी हुआ करती थीं। ऐसी ही कहानियों से लार्जर दैन लाइफ वाला महानायक रूपहले पर्दे पर नुमाया होता था। रोमानियत से भरी बड़े पर्दे की ये फिल्में सफल थीं, मगर जिंदगी की तंग वास्तविकताओं से कटी भी थीं, इसलिए सामाजिक न्याय इत्यादि के लिहाज से बेअसर थीं। पॉपुलर सिनेमा में इन प्रवृत्तियों का अपवाद बहुत कम बार देखने को मिला है।

‘जाग उठा इंसान’ (1984) ऐसी ही फिल्म है, जिसमें खुलकर जाति का नाम लिया गया है और सामाजिक विषमता को दर्शाने वाली परिस्थितियों को सामने लाया गया है। पॉपुलर सिनेमा की तमाम खूबियों (नाच-गाना और मारधाड़) वाली इस फिल्म की कुछ खूबियाँ अलहदा हैं जिनकी जरूरत समाज को है। ‘जाग उठा इंसान’ तेलुगू भाषा की फिल्म ‘सप्तपदी’ का रिमेक थी। ‘सप्तपदी’ और ‘जाग उठा इंसान’ दोनों का निर्देशन के. विश्वनाथ (दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित) ने किया है। यही कारण है कि भाषा और कलाकार बदल जाने के बावजूद दोनों फिल्मों के किरदार और ज़ज्बात नहीं बदले हैं, हालांकि दृश्य और लोकेशन और अभिनय के लिहाज से ‘सप्तपदी’ ‘जाग उठा…’ से कहीं बेहतर फिल्म है। अलु रामा लिंगा और सबिता भामिदीप्ति की बराबरी में मिथुन चक्रवर्ती और श्रीदेवी दोनों थोड़े निस्तेज नज़र आते हैं। साथ ही साथ यह भी देखने में आता है कि ‘सप्तपदी’ दृश्य प्रधान फिल्म होने के साथ – साथ संवाद प्रधान फिल्म भी है। जबकि ‘जाग उठा इंसान’ में संवेदना, कथा और सिने-सामाजिक उद्देश्य का पूरा दारोमदार दृश्यों पर है, यही कारण फिल्म के किरदार देह भाषा का अधिक इस्तेमाल करते हैं।

फिल्म ‘जाग उठा इंसान’ में ब्राह्मण कन्या का एक शूद्र (फिल्म में हरिजन) लड़के से प्रेम दिखाया गया है। फिल्म में दो पीढ़ी की कथाओं को एक साथ समेटा गया है। कुछ जरूरी बातों को समझने के पहले फिल्म की कहानी को संक्षेप में जान लेना जरूरी है। फिल्म की नायिका संध्या (श्रीदेवी) पारंगत नर्तकी है। नृत्य-संगीत से उसका ज़ज्बाती रिश्ता है। फिल्म में बार – बार संकेत किया गया है कि उसकी माँ ने अपने माता-पिता अर्थात संध्या के नाना – नानी की इच्छा विरुद्ध जाकर किसी दूसरे व्यक्ति से प्रेम – विवाह कर लिया था, जिसके कारण संध्या के नाना (जे.वी. सौम्याजुलु)), जो एक तपे-तपाए पुजारी और कर्म-कांडी हैं, से रिश्ता समाप्त हो चुका है। हालांकि संध्या की माँ ने गंधर्व विवाह जरूर किया था, मगर विवाह जाति के बाहर नहीं हुआ था, इसलिए गाँव और उच्च जातीय समाज बीच में नहीं आया। लड़की का जाति के बाहर न जाने से सामाज में कोई उबाल नहीं आता। रंजिश का दायरा पुजारी के परिवार तक ही महदूद रहता है।

संध्या (श्रीदेवी) और हरिमोहन (मिथुन चक्रवर्ती) एक दूसरे की कलाओं का आदर करते – करते कब प्रेम में पड़ जाते हैं, यह उन्हें उस समय पता चलता है, जब संध्या अपने नाना के मंदिर में नृत्य प्रस्तुति के लिए बुलाई गई होती है। नाव पर बैठकर संध्या पहली बार अपने नाना के गाँव आ रही है। नाव से उतरने हरिमोहन उसकी मदद करता है। नाव, मंदिर, पहाड़ और नदी फिल्म के खामोश किरदार हैं। कथानक की दृष्टि से मंदिर में नृत्य एक महत्वपूर्ण परिघटना है, जहाँ पूरा गाँव संध्या के नृत्य-कौशल और सुंदरता पर मुग्ध हो जाता है। यहीं पर दो परिवारों के बीच खड़ी दीवार ढह जाती है और प्रेम व ममता का अंकुर फूटने लगता है। यहीं पर संध्या और हरि एक दूसरे के होने का प्रण लेते हैं। मंदिर प्रांगण में पीपल का एक बहुत पुराना पेड़ है, जिसके विषय में मान्यता है कि, जो जोड़ा इस पेड़ पर झूला बांधता है, पीपल बाबा उस जोड़े की मनोकामना पूरी करते हैं। दोनों पेड़ की डाली पर झूला बांधते हैं और हरि मोहन कहता है – ‘धर्म और जाति में बँटा समाज हमें एक करने से रहा, आओ देखते हैं कि पीपल बाबा हमारे भाग्य का क्या फैसला करते हैं?’ इस दृश्य के माध्यम से फिल्मकार इंसानों से ज्यादा भरोसा खामोश पेड़ पर जताता है।

दूसरे दृश्य में दिखाया जाता है कि नृत्य के बाद संध्या के नाना बहुत खुश हैं और वे फैसला सुनाते हैं – ‘मैं संध्या को बहू के रूप में स्वीकार करके सालों के मनमुटाव को खत्म करना चाहता हूँ।’ दरअसल संध्या के नाना अपने दत्तक पोते नंदू (राकेश रौशन) के लिए संध्या का हाथ माँगते हैं। संध्या छटपटा कर रह जाती है। संध्या को इस निर्णय में शामिल करने का ख्याल तक किसी के विचार में नहीं आता। हरि मोहन दलित होने के कारण बे-हैसियत है। कोई उनके मन की बात जानने की कोशिश नहीं करता। लिहाजा जिस प्रांगण में दो प्रेमी एक दूसरे के होने का प्रण लेते हैं, उसी प्रांगण में संध्या नंदू की पत्नी हो जाती है। छायाकार ने इस कथायोजना को बेजोड़ दृश्य रूपकों में बाँधा है – पत्थर की प्राचीन काली मूर्तियाँ, मंदिर की ऊँची दीवारें, पीपल की झुकी डालियाँ और नदी का खामोश पानी!

नंदू से संध्या का विवाह हो जाता है। यह परिघटना जितना फिल्म को प्रभावित करती है उतना संध्या और हरिमोहन की जिंदगी को भी। यह परिघटना दोनों के लिए एक सा प्रभाव लेकर आती है – दोनों मजबूरी के समान धरातल पर एक साथ खड़े नज़र आते हैं। शूद्र और औरत में कोई भेद नहीं। निर्देशक और पटकथा लेखक का उद्देश्य भी यही है कि स्त्री और दलित दोनों को एक धरातल पर दिखाया जाए। सिनेमा का यह दृश्य-बंध समाज की ही तरह है – समाज अब भी स्त्री और दलित को फैसले लेने के परिसर बाहर रखता आया है।

हम सब जानते हैं कि के. विश्वनाथ आदमी के संसार में अच्छाई की कल्पना करने वाले सिने-निर्देशक हैं। इसके लिए अपनी कई फिल्मों में देवत्व का भाव ले आते हैं (शुभलेखा, स्वाति किरणम, सरगम और संजोग आदि)। उनकी फिल्मों के पात्रों का मन दूसरे किरदारों को देवी-देवता या महापुरुष आदि के रूप में देखने लगते हैं। आज का दर्शक इन बातों पर यकीन नहीं करता, मगर अस्सी – नब्बे के दशक में सेल्युलाइड की पट्टियाँ इस तरह की सिने-टोटकों से युक्त रहा करती थीं। दक्षिण के सिने-निर्देशक इस तरह के भाव का इस्तेमाल कुंठा और भय के विभिन्न आयामों के सिनेमाई-प्रतिरोपण करने में किया करते थे। विदेशी फिल्में भी इस टोटके से अछूती नहीं रही हैं (ब्लैक स्वान और परफ्यूम – द स्टोरी ऑफ एक मर्डरर)। और हिंदी सिनेमा का निर्देशक सीधे-सीधे भूतिया फिल्म बना डालते थे। इस दिशा में दक्षिण के निर्देशकों की युक्ति ज्यादा सफल हुई। दक्षिण भारत के सिने-निर्देशकों की फिल्में यू सर्टिफिकेट वाली हुआ करती थीं और हिंदी सिने-निर्देशक की भूतिया फिल्में ए सर्टिफिकेट वाली। ए सर्टिफिकेट भूतिया फिल्में प्राय: सी ग्रेड की फिल्में होती थीं, जिसका प्रदर्शन उत्तर भारत के सिनेमा हाल में प्राय: मार्निग शो में हुआ करता था। गौरतलब है कि सिने-टोटकों के साथ – साथ सिने-अर्थव्यवस्था के व्याकरण को दक्षिण के निर्देशक ज्यादा समझते थे। के.विश्वनाथ उसी तरह के एक समझदार सिने-निर्देशक थे।

विवाह के बाद संध्या अपने पति नंदू अर्थात अपने नाना के घर आती है। नाना, मामा-मामी और गाँव घर के सभी लोग खुशी से सरोबार दिखाई पड़ते हैं। नंदू अब भी मंदिर में है। मंदिर के पुजारी की हैसियत से वह सारी मूर्तियों का श्रृंगार करता है और मंदिर में दीया – बत्ती लगाकर घर लौटता है। जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है कि के. विश्वनाथ भय, जुगुप्सा और संदेह का सिने-अनुवाद कल्पना और स्वप्न में करने वाले निर्देशक रहे हैं। नंदू मंदिर से जब घर आता है और संध्या के कमरे में प्रवेश करता है, तो उसे संध्या में उसकी पत्नी नहीं, बल्कि देवी का दर्शन होता है। ऐसा हर रात को होता है। संध्या देवी के रूप में सपने में भी आने लगती है। वह घर छोड़कर रात मंदिर में बिताते लगता है। गाँव वाले नंदू और संध्या के रिश्ते पर कानाफूसी करने लगते हैं।

नंदू के व्यवहार से तंग आकर एक रात संध्या मंदिर पहुँचती है और उससे पूछती है – “मुझे पत्नी के अधिकार से क्यों दूर रखा जा रहा है? बिना गलती जाने मैं सुधार कैसे कर सकती हूँ?”

नंदू बस इतना कहता है – “तुम्हारी कोई गलती नहीं। अगर कोई बात है भी तो वह मुझे नहीं पता। पता लगने पर बता दूँगा।”

चूंकि वे सात फेरे के बंधन में बँध चुके हैं, इसलिए अनिच्छा से विवाह बंधन में बँधे रहते हैं।

पत्नी में देवी का रूप दिखाई देना एक तरह का पलायनवादी विचार है। हरि मोहन और संध्या के प्रेम की स्वीकार्यता के लिए दैवीय हल जैसा विचार है। इस तरह के हल हवाहवाई होते हैं, मगर यह बात भी सत्य है कि देवी-देवता को मानने और पूजने वाले समाज के लिए इस तरह के हल परिणामदायक भी होते हैं। आज भी देवताओं के अमूर्त फैसलों पर चलते समाज की खबरें सुनाई पड़ती रहती हैं। दूसरी ओर इस तरह के सिने-टोटकों से निर्देशक एक साथ प्रगतिशील, बदलाववादी और परंपरावादी सभी को साध लेता है।

यथार्थ और कल्पना की ऐसी टकराहट को सिग्मंड फ्रायड ने भी दर्ज़ किया है – “स्वप्न वास्तव में एक ऐसा छिपा हुआ अर्थ रखता है, जो उसे (स्वप्न को) इच्छा पूर्ति कराने वाला सिद्ध करता है।” (सपनों का मनोविज्ञान: द्वारा फ्रायड, शिक्षा भारती प्रकाशन, संस्करण – सातवां संस्करण- 2019, पृ.49)।

फिल्म ‘जाग उठा…’ एक उदारवादी, सुधारवादी और गाँधीवादी फिल्म है। इसे जाति के विनाशवादी अर्थात अंबेडकरवादी नज़रिए से नहीं परखा जा सकता है। यह फिल्म हरिजनवादी अर्थात दलितों को तथाकथित ऊँची जातियों में स्थान दिलाने का हिंसात्मक प्रयास है, क्योंकि देवी की इच्छा और मंदिर के महापुजारी की अनुमति के बाद भी दो प्यार करने वाले जिंदा नहीं बच पाते। अवसाद और हिंसात्मक अंत के कारण ही किंचित अर्थ में यह फिल्म वह सवाल भी छोड़ जाती है – क्या भारत की ऊँची जाति का समाज निर्मल मन से हरि मोहन (गांधी के हरिजन का संस्करण) जैसों को अपना सकता है ? उसे वह आदर दे सकता है, जिसके काबिल वह है (गौरतलब है कि हरि मोहन जाति छिपाकर संस्कृत पढ़ना चाहता है, तो कुशाग्र शिष्य होने के बावजूद उसे अपमानित करके भगा दिया जाता है। तालाब में पानी के कारण उसे मारा-पीटा जाता है और प्रेम करने के कारण उसे जान से मार दिया जाता है।)

फिल्म कई जगह जाति के घेरे से बाहर जाने का प्रयास करती नज़र आती है। फिल्म में दिखाया गया है कि हर ब्राह्मण  परिवार दुराग्रही नही होता है (कुछ अपवाद भी होते हैं – सवाल तो यह भी है कि क्या अपवादों के आधार पर कोई बुनियादी बदलाव मुमकिन है?)। ईश्वर के भय से संध्या के ससुराल के परिवार का एक सदस्य (नंदू) जब जान जाता है कि उसकी पत्नी विवाह के पहले के पूर्व से हरि मोहन (हरिजन) से प्रेम करती है, तो वह उदार होते हुए अपनी पत्नी को हरि मोहन को सौंपने की तैयारी करने लगता है। यहाँ तक कि गाँव और समाज को धर्म का पाठ पढ़ाने वाले महापुजारी (संध्या के नाना) भी नंदू के निर्णय के साथ खड़े हो जाते हैं मगर धर्म के पंरपरागत लीक पर चलने वाला कूपमंडूक समाज विरोध में आ जाता है। गाँव के लोग लाठी लेकर मंदिर में आ जाते हैं। धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र बन जाता है। यह दृश्य यह संदेश दे जाता है – धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय हो सकता है, मगर व्यक्तिगत निर्णय का विषय कदापि नहीं हो सकता। अर्थात धर्म अवहेलना होने पर पूरा कूपमंडूक समाज विरोध में खड़ा हो सकता है। क्योंकि यह सामूहिक चेतना का विषय है। यही कारण है धर्म जादू है। धर्म दोधारी तलवार है। धर्म की परंपरा को छोड़ने वाले त्याज्य हैं। इसीलिए महापुजारी की बात गाँव वाले नहीं मानते। संध्या और हरि मोहन की मृत्यु के बाद नफ़रत की आँधी थम जाती है। फिल्म यहीं समाप्त हो जाती है।

फिल्म के दृश्य मोहक और अर्थपूर्ण हैं। आंध्र प्रदेश के पहाड़ों और कंकड़ों से टकराती और उन्हें बहाती, आगे बढ़ती साफ नदी और उसकी लहरें संध्या की विवशता तथा पवित्रता को दर्शाती है। फिल्म में निर्जन लाल जमीन और पहाड़ समाज की कठोरता को अभिव्यक्त करते हैं। पहाड़ पर खंडहरनुमा मंदिर में हरि मोहन का पनाह पाना अर्थपूर्ण है कि दलित आज भी बेघर और बेसहारा हैं। पूरी फिल्म में सभी के घर दिखाए गए हैं, मगर हरि मोहन बेघर–बार है। यह सिने –दृश्य भारतीय सामाजिक संरचना को दर्शाने वाला रूपक है। यही कारण है कि सिने-दृश्य की दृष्टि से यह एक बेजोड़ फिल्म है। इसीलिए इसे सन 1985 में फिल्म फेयर का सर्वोत्तम छायाचित्र पुरस्कार हासिल हुआ। ‘जाग उठा…’ के मूल तेलुगु संस्करण ‘सप्तपदी’ को अधिक पसंद किया गया। इसे सिने – दर्शकों के साथ सिने-आलोचकों का भी प्यार मिला। ‘सप्तपदी’ को नरगिस दत्त राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (भारत सरकार) हासिल हुआ।

अपने सीमित अर्थ में ही सही फिल्म धर्म की आलोचना और गंधर्व विवाह को जाति तोड़क व्यवस्था के रूप में देखती है। फिल्म स्पष्ट करती है समतामूलक और जाति विहीन समाज का अंत गंधर्व विवाह से ही संभव है। यही कारण है कि तथाकथित मुख्यधारा की फिल्म होने के बावजूद सिने – इतिहास में इसे एक सामाजिक और बदलाव लाने वाली फिल्म का दर्ज़ा दिया गया। इसी वजह से इसे देखा भी जाना चाहिए।

 

जनार्दन
जनार्दन इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं .
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