समकालीन जनमत
साहित्य-संस्कृति

कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में ‘ वीरेनियत-08’ 09 अक्टूबर को

नई दिल्ली। हिन्दी के चर्चित कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजित वार्षिक काव्य-पाठ ‘वीरेनियत’ का आठवाँ आयोजन 9 अक्टूबर को शाम 4:30 बजे से जवाहर भवन, नई दिल्ली में होगा। जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में  आठ कवियों के काव्य-पाठ होंगे। इस अवसर पर नवारुण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित वीरेन डंगवाल की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन “उजले दिन जरूर आयेंगे ” का लोकार्पण होगा। साथ ही उनके द्वारा प्रकाशित वीरेन डंगवाल की कविताओं पर आधारित आठ कविता कार्डों के सेट का भी लोकार्पण होगा।

भागीदार कवियों के नाम इस प्रकार हैं—इब्बार रब्बी, अनामिका, सविता सिंह, आर. चेतन क्रांति, सौम्य मालवीय, पार्वती तिर्की, उसामा और अरबाज़ खान। आयोजकों को उम्मीद है कि इस वीरेनियत में वर्तमान युवा प्रतिरोध के शरद की छटा दिखाई देगी।

वीरेन डंगवाल की स्मृति में 2016 में शुरू हुआ ‘वीरेनियत’ पिछले एक दशक में उनकी कविता को याद करने और उसे समकालीन कविता के बीच नए सिरे से सुनने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन गया है। 2016 से 2019 तक इसके चार आयोजन हुए। कुछ अंतराल के बाद 2023 में यह सिलसिला फिर शुरू हुआ। 2024 में आयोजित छठे संस्करण और 2025 में हुए सातवें संस्करण के बाद इस वर्ष इसका आठवाँ आयोजन किया जा रहा है।

28 सितंबर 2015 को वीरेन डंगवाल के निधन के बाद उनकी स्मृति में शुरू हुए इस आयोजन में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की विस्तार से चर्चा नहीं की जाती। कोशिश उनकी कविता के सरोकारों को वर्तमान के सवालों से उपजी नए दौर की कविता में पहचानने की होती है।

वीरेन डंगवाल की कविता अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ अपनी सहज भाषा, विनोद, आत्मीयता और जीवन के प्रति गहरे भरोसे के लिए जानी जाती है। उनके यहाँ साधारण जीवन और रोजमर्रा की दुनिया कविता के महत्वपूर्ण विषय बनते हैं। कठिन और निराशाजनक परिस्थितियों के बीच भी उनकी कविता मनुष्य की जिजीविषा और बेहतर भविष्य की संभावना में विश्वास बनाए रखती है। ‘आएंगे उजले दिन जरूर आएंगे’ उनकी इसी उम्मीद और जीवन-दृष्टि की प्रतिनिधि पंक्ति है।

इस वर्ष ‘वीरेनियत-08’ में आठ कवियों की कविताएँ सुनी जाएँगी।

इब्बार रब्बी जनसाधारण के जीवन का उत्सव मनाने वाले और संघर्षों में उनकी जीत की कामना करने वाले कवि हैं। उनकी कविता सादगी में छुपी हुई मारक व्यंजना की कविता है।

अनामिका ओट में रखे गए स्त्री-अनुभव को स्त्री की अपनी भाषा में व्यक्त कर पितृसत्ता के पाखंड को उजागर करने वाली कवि हैं।

सविता सिंह की कविताओं में स्त्री-स्वप्न, प्रेम, कामना, अकेलापन, स्मृति और आधुनिक जीवन की जटिलताएँ अपनी विशिष्ट काव्यभाषा में सामने आती हैं।

पार्वती तिर्की आदिवासी जीवन की सहजता, उल्लास, सहियापन और संघर्ष को उसकी लय के साथ सहेजने वाली कविताएँ लिखती हैं। तीनों आज की स्त्री कविता की जीवंतता, विविधता और मुक्ति-कामना को व्यक्त करती हैं।

आर. चेतन क्रांति की कविताएँ हमारे आंदोलित समय के अनजाने मर्म को खोजते हुए अनदेखे भविष्य को रूपांकित करती हैं।

सौम्य मालवीय की कविता समकालीन जीवन के अनुभवों, सामाजिक बेचैनियों और बदलती संवेदनाओं के साथ संवाद करती हुई उनका रचनात्मक विस्तार करती है।

उसामा की कविता युवा बगावत की लय से उर्दू कविता की नई भाषा और नए मुहावरे रचते दिखाई दे रहे हैं।

अरबाज़ खान कविता में उन सामाजिक अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं के प्रवक्ता बनते हैं, जो सत्ता के बुलडोज़र के सीधे निशाने पर हैं।

इस वीरेनियत में हिन्दी-उर्दू कविता के प्रेमियों को प्रतिरोध की नई जीवंत संवेदना देखने-सुनने को मिलेगी।

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion