आलोक कुमार श्रीवास्तव
पटना, 20 सितंबर 2026। पच्चीस-छब्बीस साल पहले कुछ दिनों अखबार में काम किया था, तब इस तरह खबर लिखने की शुरुआत करता था। आज जो यह तारीख़ लिखकर शुरू कर रहा हूं, यह अपनी जिंदगी के एक ख़ास दिन को याद रखने के लिए है। उस ख़ास जगह और ख़ास तारीख को याद रखने के लिए है जिसने मुझे पहली बार एक ख़ास किस्म के एहसास से रू-ब-रू कराया — प्यार का एहसास। एक पूरे परिवेश में प्यार का एहसास। आजादी मिले प्यार का एहसास। जिस एहसास की एक झलक ‘पटना डायरी’ पढ़ते हुए मिली थी, उस एहसास के बीच होना किसी नामुमकिन के मुमकिन होने जैसा लग रहा था।
रविवार, 20 सितंबर 2026 की शाम तकरीबन पौने छह बजे मैं बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन बिल्डिंग की पहली मंजिल पर स्थित हाॅल में घुसा तो वह पटना के भौगोलिक दायरे में होने के बावजूद बिल्कुल एक अलग ही परिवेश था। जिस शख्स से सबसे पहले नज़र मिली वह थे मित्र योगेश प्रताप शेखर, जो दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में प्राध्यापक हैं। योगेश ने मुझे आलोक कहने के बजाय कुछ और कहा लेकिन वह मुझे अटपटा नहीं लगा क्योंकि उन्हें याद था कि मैं इस समय रिज़र्व बैंक के पटना दफ्तर में हूं। हाथ मिलाते ही उन्होंने कह दिया कि आप तो आरबीआई पटना में आ गए हैं ना। इस अध्यापकीय युक्ति पर मुझे ख़ासा प्यार आया। बंदे को नाम में कुछ संदेह हुआ तो जो भी नाम ज़ेहन में आया, उसी से पुकार लिया और अगले ही पल पक्की पहचान बताकर इस मामूली स्मृति-दोष को दुरुस्त कर लिया।
वहां चाय पी जा रही थी। थोड़ी देर में ‘भूलना मना है’ शीर्षक से 31वां चंद्रशेखर व्याख्यान शुरू होने वाला था। पटना के तमाम पत्रकार, वकील, साहित्यकार, रंगकर्मी, आम महिलाएं, छात्र, मजदूर इस हाॅल में आ चुके थे या आ रहे थे। मैं भी इनमें से एक था। यह एकता भी मुझे बड़ी प्यारी लग रही थी — उद्देश्य की एकता। एक साझा उद्देश्य था यहां आने का, अपने-अपने काम से लोग नहीं आ रहे थे। आमतौर पर पत्रकार ऐसे आयोजनों में अपना काम करने जाते हैं — मतलब न्यूज़ कवर करने, लेकिन यहां सब प्यार के एक रिश्ते से खिंचे हुए आए थे। वकील भी। जो वकील यहां आए थे, उनके लिए फीस देने वाला मुवक्किल नहीं, इंसानियत और बराबरी का प्यार भरा रिश्ता अहम था। हाॅल के गलियारे में चाय और बिस्कुट का इंतज़ाम था। लोग एक हाथ में थामे डिस्पोज़ेबल कप में कुछ घूंट चाय और दूसरे हाथ में एक बिस्कुट लेकर हाॅल के अंदर आ रहे थे। मैं बिस्कुट को बिस्किट नहीं कह पाऊंगा क्योंकि वहां जो था वह बिस्कुट ही था, बिस्किट्स वहां नहीं थे।
लोग बिस्कुट को खा रहे थे और चाय को पी रहे थे। लोगों को ग़ौर से देखने पर समझ में आ रहा था कि यह कितना ज़रूरी था। जो कवि आए थे उन्हें यहां अपनी कविता नहीं पढ़नी थी। जो शिक्षक और आलोचक थे, यहां उन्हें कोई वक्तव्य नहीं देना था, यहां उनके कोई स्टूडेंट नहीं थे। रंगकर्मियों के लिए यहां कोई रंगमंच नहीं था। हाॅल में सब अपने प्यारे साथी चंदू के जन्मदिन के मौके पर कुछ ख़ास बातचीत के लिए इकट्ठा हुए थे। पहले जिस ‘चंद्रशेखर व्याख्यान’ और उसके शीर्षक ‘भूलना मना है’ का जिक्र मैंने किया है वह पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे और आगे चलकर वाम क्रांतिकारी धारा की राजनीति करते हुए शहीद हुए कॉमरेड चंद्रशेखर प्रसाद की स्मृति में आयोजित किया जाने वाला 31वां व्याख्यान था और व्याख्यान का उपशीर्षक था – लोकतंत्र, सत्ता और पत्रकारिता की याददाश्त। व्याख्यान देने आई थीं – पत्रकार और लेखक नेहा दीक्षित। मैंने उनकी किताब का नाम सुना था, कभी उन्हें आमने-सामने नहीं देखा-सुना था। नेहा दीक्षित पत्रकार और लेखक से ज्यादा एक्टिविस्ट हैं, लेकिन वह एक्टिविज्म उन्होंने बतौर पत्रकार ही किया है, लिहाज़ा हाॅल में पत्रकारों की अच्छी ख़ासी मौज़ूदगी थी।

सबसे पहले मैंने जिस पत्रकार को पहचाना, वह थे आरा के आशुतोष कुमार पाण्डेय। आशुतोष के भी एक हाथ में चाय का कागजी कप और दूसरे हाथ में बिस्कुट था। मैंने अपना एक हाथ उठाकर उनका अभिवादन किया। वह मुझे देखकर बड़े प्रेम से मुस्कुराए। योगेश भाई ने इस बीच मुझे चाय के लिए पूछा था, तब तक आशुतोष भाई से मेरी नज़रें मिल गई थीं, और मैं ‘अभी आता हूं’ कहकर आशुतोष के पास चला गया। हम आमने-सामने पहली बार मिले थे लेकिन कोई अजनबीयत नहीं थी — मैंने बस इतना ही कहा कि आपसे मिलने की बहुत दिनों से इच्छा थी, आप जब पटना के बारे में फेसबुक पर लिखते हैं तो मन होता है कि मिलें। आशुतोष ने कहा कि अब जरूर भेंट हुआ करेगी। हम लोगों ने मोबाइल नंबर का आदान-प्रदान किया ही था और आशुतोष बचे हुए बिस्कुट को चाय में बचा-बचाकर डुबो ही रहे थे कि ऐन बायीं तरफ, बिल्कुल सामने निवेदिता दी दिख गयीं। मैंने आशुतोष से कहा कि ज़रा निवेदिता दी से मिल लूं। उन्होंने कहा – हां-हां, बिल्कुल। निवेदिता दी एक महिला साथी का हाल-चाल ले रही थीं या कहना चाहिए कि उन पर प्यार बरसा रही थीं। शायद उस प्यार की बारिश के आकर्षण से खिंचा हुआ ही मैं बिल्कुल उनके पास जाकर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर निवेदिता दी का नाम लेते हुए अभिवादन करना चाहा। अभिवादन के लिए मैंने नमस्ते या नमस्कार शब्द का इस्तेमाल करने की जगह कहा था – निवेदिता दी! मैं आलोक। और निवेदिता दी ने मुझे गले से लगा लिया। यह कोई क्षणिक प्रेम या औपचारिक अभिवादन भर नहीं था, मुझे लगा कि ‘पटना डायरी’ पढ़ते समय मुझे प्यार की जो खुशबू मिली थी, अब उसी खुशबू से भरे बगीचे में खड़ा हूं। पहले यह ज़िक्र करना रह गया था कि यह पटना इप्टा का आयोजन था। चंदू भी तो इप्टा से ही राजनीति में आए थे। और ‘पटना डायरी’ वह किताब थी जिसके जरिए मुझे यह पता चला था। ‘पटना डायरी’ ने मुझे पटना का जो प्यारा पहलू दिखाया था, पहले मैं उससे अनजान था। (पटना डायरी वाणी प्रकाशन से प्रकाशित निवेदिता दी की संस्मरण पुस्तक है, जिसे मैंने पटना आकर ही पढ़ा।) किताब खत्म करके किताब की लेखक को ई-मेल किया। अपना अनुभव बताया और यह भी लिखा कि आपसे मिलने का मन होता है। जवाबी मेल में निवेदिता दी ने अपना मोबाइल नंबर देते हुए लिखा कि जब मन हो जरूर मिलें। मेरे मेल में किताब के प्रारूप को लेकर कुछ प्रतिकूल बातें भी थीं, लेकिन मैंने पाया कि उन बातों का निवेदिता दी ने कतई बुरा नहीं माना था, बल्कि उस बाबत ईमानदारी से भरा दो लाइन का एक स्पष्टीकरण दिया था।
“मेरे चंदू! कोई दिन ऐसा नहीं होता जब तुम याद नहीं आते। कल तुम्हारा जन्मदिन है। हमेशा की तरह हम दोस्त कल जमा होंगे। मैंने ज़िन्दगी से इतनी मुहब्बत करते हुए बहुत कम लोगों को देखा।… सोचती हूं आज तुम होते तो इस दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसके खिलाफ हम और ताक़त के साथ लड़ पाते, हम भेद पाते नफ़रत की दीवारों को।” पटना डायरी में दर्ज़ निवेदिता दी की इन पंक्तियों को पढ़कर मैंने चंदू के होने की कुछ कल्पना की थी, आज बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के हाॅल में कामरेड चंद्रशेखर की स्मृति में आयोजित इस प्रोग्राम में आकर उस दुनिया से भी भेंट हुई है जिसमें चंदू रहे थे। ये प्यार करने वालों की दुनिया है जिसे मैं पहले पटना में मुमकिन नहीं मान पाता था, लेकिन अब मानता हूं।

चंदू की स्मृति में हो रहे इस व्याख्यान में बोलने आई हैं नेहा दीक्षित। नीचे बिल्डिंग के मुख्य द्वार पर आयोजन की सूचना देता जो लाल रंग का बैनर टँगा है, उसकी इबारतों को पढ़ते कई युवा ठिठक जाते हैं। चलकर पास आते हैं। वे जानना चाहते हैं कि यह कौन नेहा हैं। उन्हें नेहा बोरा की तलाश है या फिर नेहा सिंह राठौर की। व्याख्यान के दौरान नेहा दीक्षित ने कहा भी कि हिंदी क्षेत्र में आधी लड़कियों का नाम नेहा मिल जाएगा। बहुत काॅमन नाम है। क्या संयोग है कि यह नाम की कॉमननेस आज देश भर की लड़कियों के स्वभाव में भी देखी जा रही है। नेहा दीक्षित, नेहा बोरा, नेहा सिंह राठौर- सब वही बात तो कह रही हैं — और हमारे आसपास की हर लड़की उनसे सहमत है। यह भारतीय समाज का नेहा युग है, नेह का युग भी आएगा।
जब मैं नेहा बोरा को देखता हूं तो समझ पाता हूं कि चंदू कैसे रहे होंगे। मैंने चंदू को नहीं देखा लेकिन नेहा को देखा है, रोज़ देखता हूं। वह नेहा जो दुश्मन को चुनौती भी देती है तो उसका अंदाज़ प्यार से भरा होता है। पुलिस के बर्बर उत्पीड़न-दमन को झेलते समय भी वह उम्मीद, प्रेम और भरोसे से भरी रहती है — घसीटी जाती है, बार-बार गिरफ्तार होती है — हिरासत में पुलिस के वाहनों के भीतर भी अपनी बात उसी इत्मीनान से कहती है जैसे गिरफ्तारी कोई मसला ही ना हो और हिरासत ही उसका घर हो।
दिल्ली जैसी जगह में क्या घर और क्या कार्यस्थल! नेहा दीक्षित दिल्ली और देश भर में लगभग गुमशुदा कामकाजी महिलाओं की और उनके कामकाज की ही चर्चा कर रही हैं। यकीन करना मुश्किल है कि दिल्ली में एक महिला को एक बोरी बादाम फोड़कर छीलने की मजदूरी सिर्फ ₹50 मिल रही थी और आंदोलन के बाद भी वह मजदूरी सिर्फ ₹10 बढ़वाई जा सकी। कितने तरह के काम ये प्रवासी मजदूर महिलाएं करती हैं, उसकी कोई गिनती नहीं है। इन महिला श्रमिकों को प्रवासी मजदूरों में गिना भी नहीं जाता। खतरनाक किस्म के काम करते हुए उनकी सेहत का भट्ठा बैठ जाता है मगर गृहस्थी की भट्टी कायदे से गरम नहीं हो पाती।

नेहा दीक्षित ने अपनी किताब ‘कोई एक सईदा’ के हवाले से कई रोचक प्रसंग बताए हैं। जैसे महिला श्रमिकों के चम्मच से खाना खाने की बात। गिग वर्कर्स में महिलाओं को ना गिने जाने की बात। दुनिया भर में बादामों के दाम बढ़ने की वजह। किसी युवती द्वारा किसी युवक को प्रेम करने की घटना को काला जादू बताने की बात। मजदूर स्त्री के उत्पीड़न की कितनी ही परतें हैं — बादाम फोड़ते, माला गूँथते, बटन टाँकते, भीगी हुई या केमिकल युक्त चीजों की पैकिंग करते उंगलियों और उंगलियों की त्वचा के क्षतिग्रस्त हो जाने पर कोई हाथ से खाना कैसे खाए? सो चम्मच से खाना मजबूरी है। अमेजॉन, ब्लिंकइट, फ्लिपकार्ट के डिलीवरी पर्सन तो गिग वर्कर हैं लेकिन जो सामान बिकता है, उसे बनाने, पैक करने वाली महिला गिग वर्कर नहीं है। उसकी कहीं गिनती नहीं है। बहुत कुछ नया पता चला है — चिंताएं बढ़ी हैं। लेकिन यह देखना आश्वस्तिकारक है कि यहां बैठी मेहनतकश महिलाएं ये बातें समझ रही हैं। हाॅल में बैठे तमाम लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है, कीपैड वाला फीचर फोन है। मेरा यह ऑब्जरवेशन इस व्याख्यान की बातों के सही जगह तक पहुंचाने की तस्दीक करता है।
व्याख्यान के बाद सवाल-जवाब का सेशन है। कार्यक्रम की शुरुआत विनोद कुमार ने की थी, संचालन अपूर्वानंद कर रहे हैं। प्रश्नोत्तर सत्र का पहला प्रश्न एक संघी-भाजपाई श्रोता ने पूछा। उनका कहना था कि आपने अपने व्याख्यान में ‘महामानव’ शब्द का प्रयोग क्यों किया। नाम लेने से परहेज क्यों है? इस सीधे और तीखे सवाल का जवाब भी नेहा दीक्षित ने इतने प्यार से दिया कि सब मुस्कुरा उठे। इसी मुस्कुराहट के बीच मैं भी धीरे से उठकर पीछे आ गया। एक बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक विषय पर व्याख्यान सुनकर निकलते हुए भी मन प्रफुल्लित है। मेरे साथ ऐसा कभी नहीं होता था। आज हुआ है। ये उस प्यार का कमाल है जो यहां की हवा में घुला है। इप्टा के किसी और आयोजन में फिर आऊंगा। मुझे शौकत कैफ़ी की किताब ‘यादों की रहगुज़र’ में वर्णित मुंबई के कम्यून के प्यार भरे किस्सों की याद आ रही है। पटना में यह अनुभव होगा, कभी सोचा न था। नीचे नेहा बोरा को जब कई लोगों ने पूछा तो मैंने मन ही मन सोचा – यह नेहा का युग है, इसी से नेह का युग भी आएगा। आमीन!
अनुवादक, कवि, समीक्षक आलोक कुमार श्रीवास्तव ने 31वें चंद्रशेखर व्याख्यान से लौटकर यह डायरीनुमा संस्मरणात्मक रपट लिखी है। वह भारतीय रिज़र्व बैंक में प्रबंधक हैं और पटना में रहते हैं। उनसे trans.alok@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


