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घर-घर पहुंचे डॉ आंबेडकर के विचार

‘ डॉ. आम्बेडकर और राष्ट्रवाद के मायने ‘ पर दलित लेखक संघ ने गोष्ठी आयोजित की 

नई दिल्ली। दलित लेखक संघ के तत्वावधान में बाबा साहेब डॉ. भीम राव आम्बेडकर की 130वीं जयंती पर ” डॉ. आंबेडकर और राष्ट्रवाद के मायने ” विषय पर 14 अप्रैल को विमर्श गोष्ठी एवं काव्य पाठ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

विषय प्रवर्तन करते हुए रवि निर्मला सिंह ने कहा कि हम ऐसे समय में जीने को बाध्य हैं जहां राष्ट्रवाद का विचार मनमाने ढंग से रखा जा रहा है। विचार विमर्श और उसे लागू करने का यह एकपक्षीय तरीका बाबा साहेब की सैद्धान्तिकी के विपरीत है। बाबा साहेब ने कहा था कि ‘ हम भारतीय हैं सबसे पहले भी और अंत में भी । यदि हम एकीकृत और आधुनिक भारत बनाने चाहते हैं तो हमें आम्बेडकर के विचारों पर चलते हुए व्यक्तिवादी विचारधाराओं से मज़बूत हो कर लड़ने की ज़रूरत है। जो लोग आरक्षण के जरिए संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं, राष्ट्र निर्माण के लिए उन्हें जनविरोधी ताकतों के विरुद्ध जनता के साथ लामबंद होना चाहिए। तभी संविधान में जो समाजवादी राष्ट्र का वायदा किया गया है उसे पूरा किया जा सकता है। सम्पूर्ण भारतीयता के हितों की रक्षा रामराज्य की सामंती व्यवस्था में नहीं बल्कि संविधान के द्वारा निश्चित समाजवादी लोकतंत्रात्मक आधुनिक व्यवस्था में ही सम्भव है। संसद और विधानसभाएं मूक समर्थन के लिए नहीं बल्कि जनता की बात रखने के लिए बनाई गई हैं । इस पर विचार करना पड़ेगा ।

चन्द्रकान्ता सिवाल ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में बाबा साहेब आम्बेडकर की वैचारिकी को जन जन तक पहुंचाने की ज़रूरत पर बात रखते हुए कहा कि आज सारा विश्व डॉ आंबेडकर के विचारों से लाभ ले रहा है । अंबेडकर के विचारों को आगे बढ़ा रहा है । लेकिन हम क्या कर रहे हैं ? हम उन्हीं रूढ़ियों , अंधविश्वासों , ऊंच नीच और शोषण की परम्पराओं में आज भी जकड़े हुए हैं जिनसे बाबा साहेब ने जीवन भर लड़ाई लड़ी। हम अपने छोटे छोटे स्वार्थों के चलते बड़े बड़े समझौते करते हुए समाज को पीछे धकेलने वालों का साथ दे रहे हैं। हमें मिल जुल कर आगे बढ़ना चाहिए। हमें डॉ आम्बेडकर को पुनः समझने की ज़रूरत है। निजी स्वार्थों की इस व्यवस्था ने हमारी समझ को धुंधला कर दिया है। इस लिए साथियों आगे बढ़ो और आधुनिक राष्ट्र निर्माण का सपना जो बाबा साहेब ने अपने विचारों और आंदोलनों के माध्यम से देखा था उसे साकार करो। यदि हम ऐसा कर पाते हैं या ऐसी राह पर मिल जुल कर आगे बढ़ते हैं तो सही मायनों में यही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

हीरालाल राजस्थानी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत विभिन्नताओं का देश है। इस देश में अनेक भाषाएं , अनेक धर्म , अनेक आचार-विचार-व्यवहार, अनेक जीवन पद्धतियां सदियों से साथ- साथ रहती चली आ रही हैं। समय-समय पर अप्रिय घटनाएं भी सुनने और देखने को मिलती हैं , लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम एक दूसरे के प्रति हृदय में नफरत ले कर जियें । यदि हम एक दूसरे के प्रति मन में दुर्भावना रखते हैं तो इस से आगे चलकर राष्ट्र की एकता और व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचने की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। जैसे कि जर्मनी में एक धर्म विशेष के प्रति नफरत के कारण मानवीय मूल्यों के विरुद्ध एक फासिस्ट विचार ने सम्पूर्ण जर्मनी को तबाह कर दिया था। हमें यह सोचना होगा कि हम किस ओर जाएं ? हमारे पथ-प्रदर्शन में बाबा साहेब डॉ. भीम राव आम्बेडकर के मानवतावादी विचार हमारे काम आ सकते हैं । हमें राष्ट्रवाद की एक साझा समझ को पैदा करना होगा । जैसा कि आम्बेडकर ने अपने चिंतन में प्रस्तुत भी किया है । शांतिपूर्ण अहिंसात्मक संवैधानिक राह पर चलते हुए ही आम्बेडकर के राष्ट्रवादी विचारों को समझा जा सकता है । हमें समझौता परस्त नहीं बल्कि संघर्षरत विचारों के साथ आगे बढ़ना होगा । लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहिये कि लोकतंत्र का सबसे मजबूत समझा जाने वाला स्तम्भ मीडिया भी संघर्ष की राह छोड़कर समझौतावादी हो गया है । देश राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है। अतः हम सबको अपनी भूमिकाएं निभानी होंगी ।

प्रेम कुमार तिवारी ने कहा कि हम आज तक राष्ट्रवाद को समझ ही नहीं पाए हैं कि राष्ट्रवाद होता क्या है ? राष्ट्रवाद के नाम पर जिस फासिस्ट सिद्धान्त को आगे बढ़ाया जा रहा है क्या ऐसे राष्ट्रवाद ने व्यवस्था को आज तक जातिवाद, अन्याय और शोषण से मुक्ति दिलाई ? हमें समझना होगा कि ऐसी कौन सी ताकतें हैं जो राष्ट्रवाद के नाम पर मुल्क को बेचने का काम कर रही हैं ? क्या राष्ट्र को बेच कर राष्ट्रवादी हुआ जा सकता है ? क्या राष्ट्र को कमज़ोर करते हुए राष्ट्रवादी हुआ जा सकता है। इस राजनीतिक भूभाग पर शोषित , उत्पीड़ित और उपेक्षित मज़दूर ,किसानों , दलितों , महिलाओं , और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की लड़ाई जिस वैचारिकी में शामिल नहीं क्या उसे राष्ट्रवादी वैचारिकी कहा जा सकता है ? हमें समकालीन सन्दर्भों में समझना होगा कि क्या हम जिस राह पर बढ़ रहे हैं वह बाबा साहेब द्वारा निर्मित संविधान की राह है ? यह एकपक्षीय राष्ट्रवादिता लोगों को उदासीनता की ओर धकेल रही है । यह एक चिंताजनक स्थिति है। सरकार का उत्तरदायित्व है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिसमें सबको संविधान में तय मूल अधिकारों और कर्तव्यों की बिना रुकावट प्राप्ति हो । मनुष्य एक गरिमापूर्ण जीवन जिये । शांतिपूर्ण और भाईचारे का माहौल हो । तभी साम्प्रदायिकता,जातिवाद ,नस्लवाद और तमाम तरह की समस्याओं से मुक्त हुआ जा सकता है । लेकिन जनता के अंदर की उदासीनता सरकार को इस जिम्मेदारी से बच निकलने का अवसर प्रदान करती है । इसी लिए राज्यसत्ता पर काबिज लोग नहीं चाहते कि जनता में वैज्ञानिक चेतना का विकास हो। लोग हर तरह की व्यवस्था जनित असमानताओं से ऊपर उठ कर एकता के सूत्र में बंधे और राष्ट्र की अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध हो कर काम करें । इस लिए ज़रूरी है कि हम आम्बेडकर के गहन विचारों को समझें और एक ऐसे भारत के निर्माण में सह्योग करें जहां आम्बेडकर के सामाजिक न्याय का सपना साकार हो सके क्योंकि आम्बेडकर ने कहा था कि हमें राजनीतिक आज़ादी तो मिल गई लेकिन सामाजिक और आर्थिक आज़ादी मिलना अभी बाकी है।

डॉ अली जावेद ने कहा कि घर घर डॉ आंबेडकर की मूर्ति नहीं उनके विचार पहुंचने चाहिए आम्बेडकर के विचारों को कथनी में ही नहीं करनी में भी निर्वहन करना होगा। हमें यह तय करना होगा कि डॉ आंबेडकर ने शोषण मुक्त समाज बनाने के लिए ” ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद ” दोनों मोर्चों पर लड़ने की बात उठाई थी। भारत साम्राज्यवादी ताकतों का गुलाम था और सदियों से चली आ रही गैरबराबरी की ब्राह्मणवादी सैद्धान्तिकी लोगों के आचार विचार और व्यवहार में जड़ो तक बैठी हुई थी । ऐसे समय में डॉ आम्बेडकर का यह कहना कि हमें “ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद ” दोनों से लड़ने की ज़रूरत है । यह बहुत बड़ी बात थी । बड़ी साहसिक बात थी । बड़ा जोखिम उठाने वाली बात थी । लेकिन डॉ आंबेडकर ने यह जोखिम उठाया । हम देख रहें हैं कि महीनों से किसान राज्यसत्ता द्वारा लाये गए काले कानून के विरुद्ध डटे हुए हैं । ऐसा ही प्रतिरोध शाहीन बाग में भी देखने को मिला था । यह शक्ति हमें कहाँ से मिली है ? इतिहास में दर्ज आंदोलनो की परम्परा हमें यह शक्ति प्रदान करती है। इस लिए व्यवस्था परिवर्तन हेतु शांतिपूर्ण लेकिन एक सम्पूर्ण प्रभुत्वशाली भारत बनाने के लिए डॉ आंबेडकर के क्रांतिकारी विचारों से जनमानस को वाकिफ़ कराया जाए ।आगे बढ़ते हुए सिलेबस में डॉ आम्बेडकर के विचारों और शिक्षाओं को रखने की ज़रूरत पर ध्यान दिलाया ।

फरहत रिज़वी ने राष्ट्रवाद पर बात रखते हुए बाबा साहेब आम्बेडकर के चिंतन में मौजूद मानवीय मूल्यों और शोषण मुक्त भारत के चिंतन को समझने की ओर इशारा किया । उन्होंने कहा कि हम सब को यदि सबका भारत बनाना है तो जातिप्रथा से उपर उठ कर सोचना होगा। हमें हर तरह की रूढ़िवादिता और अज्ञानता से ऊपर उठकर जन सामान्य के अधिकारों की संवैधानिक लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा। व्यवस्था पर काबिज परजीवी वर्ग के विरुद्ध जनहित के मुद्दों को उठाना होगा और एक मुसलसल साझा संघर्ष के लिए कृतसंकल्प होना होगा। रोज़ ब रोज़ दलित उत्पीड़न की खबरे आती हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध दुष्प्रचार। हत्याएं । ब्लात्कार ।एक धक्का सा लगता है । हाथरस की घटना हुई ही थी कि उसके बाद ऐसी घटनाएं मुसलसल घट चुकी हैं । हम किस समय में जी रहे हैं ? हमें विचार करना पड़ेगा । फासीवादी ताकतों के विरुद्ध हमें संविधान की प्रस्तावना को आत्मसात करते हुए समाजवादी ,धर्मनिरपेक्ष और सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र बनाने के लिये एकजुट होना होगा । तभी बाबा साहेब आम्बेडकर के विचारों का भारत बनाया जा सकता है ।

धीरज कुमार सिंह ने अपने वक्तव्य में बाबा साहब की वैचारिकी का मूल्यांकन ऐतिहासिक सन्दर्भों में करते हुए राजनैतिक, सामाजिक और संवैधानिक संदर्भों से राष्ट्रवाद को समझने की ज़रूरत की ओर ध्यान दिलाया। साहित्य पर बात रखते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में हमें राष्ट्रवाद की समझ प्राप्त होती है। जहां एक ऐसे राष्ट्र के सपने को साकार करने के सूत्र हमें प्राप्त होते हैं जिस से एक शोषण रहित राष्ट्र बनाया जा सकता है। वक्ता ने रविन्द्र नाथ टैगोर और डॉ आंबेडकर को याद करते हुए भारत में राष्ट्रवादी चिंतन की जनहित वादी परम्परा पर ध्यान देने की ज़रूरत पर विचार अभिव्यक्त किये ।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कविता पाठ का आयोजन किया गया  जिसमें बहुत से चर्चित कवियों के साथ उभरती हुई काव्य प्रतिभाओं ने बाबा साहेब आम्बेडकर की वैचारिकी को प्रस्तुत करने वाली कविताओं का पाठ किया। मनीषा ने ‘ जाति को छिपाना ‘ और ‘कौन जाति हो ‘ कविता का पाठ किया । जावेद आलम खान ने ‘ उस वक्त भी मौजूद था देश ‘ और ‘ विमर्शों के कवि ‘ कविताओं में दलितों , महिलाओं और उपेक्षित वर्गों की पीड़ा को अभिव्यक्त किया । दीपा दमन ने ‘स्त्री’ एवं ‘पहचान’ कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि ‘ आखिर पुरुष बनना ही कब चाहती है स्त्री? , स्त्री तन नहीं मन है ‘। सुनीता वर्मा ने महापुरुषों को पढ़ने व जानने को प्रेरित किया। गीत प्रस्तुति के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत किये। सरिता संधू ने ‘सलाम के हकदार ‘कविता का पाठ किया जिसमें बताया कि किस तरह पुलिस बल ततपरता से अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाता है। यह बाबा साहेब के संविधान की ही देन है । सुनील पंवार ने ‘ सच बोलने का में हूं आदि जो लिखूंगा वो बोलूंगा ‘ के माध्यम से अमन शांति और संघर्षरत रहते हुए लेखक की समाज के प्रति निष्ठा का सन्देश देती कविता पाठ किया। हरपाल सिंह भारती ने ‘तुम्हारे पास हूं मुझे ढूंढों नहीं ‘ के द्वारा बाबा साहिब के आदर्शों को आत्मसात करने की बात कविता में रखी।

कुसुम सबलानिया ने ‘ बाबा साहब तुम्हारा नाम रहेगा’ अपने हित के लिए लड़ेंगे,, कभी किसी का अहित नहीं करेंगे कविता का पाठ किया । अंगद धारिया ने ‘ संविधान शिल्पी ‘ का जन्मदिन विशेष कविता का पाठ किया। नीरज मिश्र ने ‘कैसे मनाए नए साल का जश्न ‘कोरोना से जन्मे दुख और पीड़ा से अवगत कराया ।बलविंदर बलि ने ‘एक नक्सली से मुलाकात ‘ जिसमें उसकी जाति बहुत नीच थी जन्म लेने में उसकी एक न चली तथा ‘ मैं तो पंडित हूं ‘ कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम का संचालन कर रही राजकुमारी ने कहा कि बाबा साहब की जयंती पर हमें देश में दलित, मजदूर, किसान और अल्पसंख्यकों पर हो रहे आये दिन के उत्पीड़न अत्याचारों का जुट होकर सामना करने का प्रण लेना होगा। इस मौके पर कुसुम वियोगी, अशोक कुमार, सुनीता राजस्थानी, विक्रांत, संतोष सामरिया, गुलफ्शा सिद्दकी , विजय खत्री , संजीत चौहान, मुन्ना, अमित खत्री आदि उपस्थित रहे। कुसुम सबलानिया ने कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं-कवियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया।

( रिपोर्ट – रवि निर्मला सिंह )

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