Tuesday, May 17, 2022
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सिने दुनिया: द ग्रेट इंडियन किचन (मलयालम): किचन में मर्द आर्टिस्ट और स्त्री धावक होती है

 

सेक्स में प्लेजर अमूमन पुरुषों का एकाधिकार रहा है। ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ देखते हुए आप महसूस करेंगे कि पारंपरिक और रूढ़िवादी पुरुष के साथ सेक्स किसी स्त्री के लिए यातना भी बन सकता है।

फिल्म में पुरुषों के खाना खा चुकने के बाद घर की स्त्रियां उसी टेबल पर खाना खाती हैं, जहां पुरुष जूठन छोड़ जाते हैं। फिल्म की नायिका उस जूठन को हाथ से साफ करती है और सकरन(जूठन) से भिड़े बर्तनों को किचन के सिंक में धोती है। सिंक कुछ दिनों से लीक हो रहा है और उसकी गंदगी को साफ करते-करते नायिका को कई बार उबकाई आती है, लेकिन उसका पति हर रोज प्लंबर को लाना भूल जाता है। यह कितना तकलीफदेह होगा कि पति जब सेक्स कर रहा हो और उस वक्त पत्नी अपनी हथेलियों को सूंघ रही हो कि कहीं उसके हाथों से दुर्गंध तो नहीं आ रही। और यह भी कि पत्नी को डरते-डरते कहना पड़े कि यह सब उसके लिए तकलीफदेह होता है।

कितना अच्छा हो अगर सेक्स से पहले फोर प्ले किया जाए। पत्नी की यह बात सुनकर पति दंग रह जाता है। वह पूछता है कि यह सब तुम कैसे जानती हो।

धर्म पुरुष को यह सुविधा देता है कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक स्त्रियों का उपभोग कर सके। इस्लाम में कहा गया है कि औरतें तुम्हारी खेती हैं, तुम जैसे चाहो और जहां से चाहो, उनमें प्रवेश करो। यह बात सेक्स के संबंध में कही गई है।

ज्यादातर धर्मों में स्त्रियों को सेक्स करने की बात देह सुख के लिए नहीं, पतियों को खुश रखने और बच्चे पैदा करने के लिए कही गई है। इस फिल्म की नायिका भी सबकुछ बर्दाश्त करती जा रही थी। अगर वह पीरियड्स को लेकर भारतीय पारंपरिक समाज व्यवस्था का वीभत्स रूप न देखती।

जो पति उसे बहुत प्यार करता है, पीरियड्स के दौरान उसके लिए वह अछूत हो गई। किचन और पीरियड्स के बहाने यह फिल्म भारतीय समाज का महाकाव्य है।

हमारे गांव में एक कहानी चलती थी। एक ठाकुर साब थे। उनका बेटा जब स्कूल गया और होम वर्क न करने पर उसे डांट सुननी पड़ी और मार खानी पड़ी तो अगले रोज ठाकुर साब एक दलित बच्चे को स्कूल लेकर गए और शिक्षक को डांटते हुए कहा कि खबरदार, जो उनके बेटे से ऊंची आवाज में बात भी की।

आइंदा अगर उनका बेटा कोई गलती करे तो डांट-फटकार उस दलित बच्चे को लगाई जाए। यह किस्सा भगवान इंद्र के उस किस्से से याद आ गया, जिसमें वह ब्रह्म ज्ञानी की हत्या कर देते हैं और फिर असुरों से डरकर भागे-भागे फिरते हैं। ब्रह्मा जब उन्हें अपने पाप को किसी और को दान करने की बात कहते हैं, तब इंद्र ब्रह्म ज्ञानी की हत्या औरतों के सिर डाल देते हैं।

औरतों को ब्रह्म ज्ञानी की हत्या का पाप लगता है और इसके नतीजे में उन्हें पीरियड्स होने शुरू हो जाते हैं। …और तभी से पीरियड्स के दौरान स्त्रियां अपवित्र हैं। तभी से वे इस दौरान किचन में नहीं जा सकतीं, चारपाई या बेड पर नहीं सो सकतीं, घर में अंदर नहीं रह सकतीं, किसी को छू नहीं सकतीं और सेक्स करने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन हिंदुओं में ही पीरियड्स का खून अपवित्र हो, ऐसा नहीं है।

मुसलमान औरतें पीरियड्स के दौरान सात दिनों तक अपवित्र रहती हैं। वह उन दिनों में न नमाज पढ़ सकती हैं, न कुरान को हाथ लगा सकती हैं और न हमबिस्तरी कर सकती हैं। ईसाइयों में यह चलन बहुत कम है, लेकिन है। यहूदी समाज ने दुनिया को भले बड़े वैज्ञानिक दिए हों, लेकिन यहूदी औरतें गालिबन अपनी आधी जिंदगी अपवित्र रहती हैं।

दूसरे धर्मों, समाजों, इलाकों में जहां स्त्रियां पीरियड्स के लगभग 7 दिन तक अपवित्र रहती हैं, वहीं यहूदी औरतें 14 दिन तक अपवित्र रहती हैं। इस मामले में मेरी जानकारी में जो सबसे प्रगतिशील समाज है, वह सिख समाज है। वह पीरियड्स के दौरान स्त्री को अपवित्र नहीं मानता। बल्कि, वह स्त्री को इस दौरान अधिक पवित्र मानता है। बेहतर तो यह होता कि स्त्री इस कारण से न अपवित्र मानी जाती और न पवित्र।

सोच रहा हूं कि फिल्म पर बात करूं, उसके किरदारों, उसकी कहानी, उसके रंग-संवाद, कैमरे, समय और भूगोल पर बात करूं या उस विषय पर पहले बात करूं, जिसने मलयालम फिल्मकार और पटकथा लेखक जेओ बेबी को ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ जैसी कहानी को सिनेमा की भाषा में कहने को मजबूर कर दिया।

जेंडर और स्त्रीवाद की तमाम आधुनिक बहस में यह बात बहुत जोर-शोर से कही जाती है कि लैंगिक बराबरी के लिए किचन में पुरुष की हिस्सेदारी जरूरी है। जब पुरुष की हिस्सेदारी एक जिम्मेदारी के साथ किचन में बढ़ती है तो किचन न सिर्फ घर का सुंदर हिस्सा हो जाता है, बल्कि स्त्री के पीरियड्स का खून किसी ख्याल में भी अपवित्र नहीं रह जाता।

दुनिया जितनी कि याद आती है, उसमें पुरुष के हिस्से युद्ध आए और स्त्रियों के हिस्से युद्ध से लौटे पुरुष को खुश करने की जिम्मेदारी। पुरुष ने जमीनों को जीतने या धर्मों को ‘बचाने’ के लिए खून बहाया और इतिहास में उनके खून की पवित्रता की कसमें उठाई गईं।

स्त्रियों ने अपने खून से दुनिया की सर्जना की, लेकिन दुनिया के एक बड़े हिस्से में उनके खून को अपवित्र कहा गया। दुनिया के बड़े हिस्से में औरतें एनीमिक होती हैं। पीरियड्स के जिन दिनों में स्त्रियों को फल, हरी सब्जियों और पोषण से भरपूर खाने के साथ आराम और देखरेख की जरूरत होती है, उन दिनों में दुनिया का बड़ा समाज उसे घर से निकालता रहा है।

अफगानिस्तान के कुछ इलाकों में पीरियड्स के दौरान स्त्रियां रसीली सब्जियां तक नहीं खा सकतीं। खासतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप के धर्मभीरु समाज में पीरियड्स के दौरान स्त्री न सिर्फ बेघर हो जाती है, बल्कि वह इंसान भी नहीं रह जाती। उसे छूने से पाप लगता है। जिसे वह छू लेती है, वह अपवित्र हो जाता है। फिर भारत और नेपाल जैसे देशों में वह गाय का गोबर खाने या उसका पेशाब पीने से ही पवित्र हो सकता है।

यह अलग बात है कि नेपाल के कई इलाकों में अब भी पीरियड्स वाली स्त्रियां घर के बाहर बनी झोपड़ियों में जमीन पर सोकर रात गुजारती हैं और इस दौरान उनके बलात्कार भी होते रहे हैं। रात के अंधेरे में ऐसा करना अपवित्रता की श्रेणी में नहीं आता? भारत में भी लंबे समय तक अमूमन यही स्थिति रही है। पीरियड्स के दौरान स्त्रियों को अलग कमरों में अब भी रखा जाता है।

यह पिछले साल की ही बात है, जब गुजरात के भुज शहर के श्री सहजानंद गर्ल्स इंस्टिट्यूट की 60 लड़कियों ने कहा कि वॉर्डन उनके अंडर गार्मेंट्स उतरवाकर देखती हैं कि वह पीरियड से हैं या नहीं। पीरिडय से होने पर हॉस्टल के तलघर में बने अंधेरे कमरों में लड़कियों को रखा जाता है। वे दर्द और जिल्लत को बर्दाश्त करती हुईं जमीन पर सोती हैं।

यह खबर दो-एक रोज अखबार की सुर्खियों में रही और इंस्टिट्यूट की चार कर्मचारियों को निलंबित करके इस अन्याय को ‘न्याय’ में बदल दिया गया। ऐसे कुछेक इंस्टिट्यूट वैधानिक तौर पर चल रहे हैं, चलते रहते हैं, वहीं घरों में करोड़ों इंस्टिट्यूट चुपचाप सदियों से चल रहे हैं और कहीं कोई फर्क नहीं पड़ता।

पीरियड्स के दौरान निकलने वाले खून को धर्मों और पुरुष समाज ने अपवित्र कहा तो ब्राजील की कुछ महिलाओं ने पिछले साल इसे पवित्र बताते हुए एक नई प्रथा शुरू कर दी- ‘सीडिंग द मून’… इस प्रथा के तहत वे मासिक धर्म से निकलने वाले खून को जमा करती हैं और उसमें पानी मिलाकर उससे पौधे सींचती हैं।

अत्याचार जितना तीव्र होगा, विरोध भी उतना ही घना होगा और गुस्सा भी उसी ताप का होगा। पीरियड्स को लेकर जितनी जिल्लत स्त्रियों ने सही है, उसी का विरोध ‘सीडिंग द मून’ के तहत सिर्फ अपने खून से पौधों को सींचना भर नहीं है, बल्कि उस खून को स्त्रियों ने अपने चेहरे और शरीर पर भी पोता है।

एक ओर भारत में तमाम कंपनियां स्त्रियों को इसलिए नौकरी पर रखने से बचती हैं कि उन्हें मैटरनिटी लीव देनी पड़ेगी, वहीं दूसरी ओर साउथ कोरिया, जापान, इंडोनेशिया और चीन सहित दुनिया के कुछ देशों में औरतों के हक में यह कानून है कि पीरियड्स के दौरान वे काम न करें।

‘द ग्रेट इंडियन किचन’ के बैकग्राउंड में स्त्रियों का वह आंदोलन है, जिसमें वे सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति चाहती हैं। इस आंदोलन के पीछे सदियों की उस अपवित्रता का दाग मिटाना ही था।

गौरतलब है कि भगवान अयप्पा के इस मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल तक की औरतों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी/है। मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी थे और चूंकि 10 से 50 साल तक की स्त्रियों को पीरियड्स होते हैं तो वे अपवित्र होती हैं, इसलिए उनका ब्रह्मचर्य भंग हो सकता है।

किसी ईश्वर के ब्रह्मचर्य को बनाए रखने की सजा किसी स्त्री को देने की बात से हमारे गांव के ठाकुर साब और भगवान इंद्र एक बार फिर याद आ रहे हैं। बहरहाल, करीब ढाई साल पहले सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया कि महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं और पुरुषों के ब्रह्मचर्य का बोझ महिलाओं पर नहीं डाला जा सकता। फिल्म में यह आंदोलन एक या दो सीन में कुछेक सेकंड्स में खत्म हो जाता है, लेकिन कहानी की बुनावट में यह गुंथा हुआ है।

इस फिल्म में किसी पात्र का कोई नाम नहीं है। अगर कोई है तो वह पति है, ससुर है, सास है, मां है, पिता है, भाई है, बहन है, दूर के रिश्ते का देवर है, देवरानी है, फफुआ सास है, प्रिय है, प्रियतमा है, जान है, जानेमन है, फेमनिस्ट है, साली है, कुतिया है, अयप्पा हैं और धर्म के ठेकेदार हैं।

फिल्म में एक सनातनी परिवार है। परिवार में शिक्षक पति है, रिटायर्ड ससुर है, सास है और नई आई पत्नी है। एक बहुत खूबसूरत, बहुत बड़ा घर है। घर के अगले हिस्से में खूबसूरत दालान है, जहां आराम कुर्सियां पड़ी रहती हैं और उससे आगे बड़ा-सा आंगन है। खूबसूरत घर के एक हिस्से में गंदा-सा किचन है।घर देखकर आसानी से यह अहसास हो जाता है कि कौन सा हिस्सा पुरुषों का, उनके अहंकार को तुष्ट करने वाला है और कौन सा हिस्सा स्त्रियों का है।

यह फिल्म भले 2021 में रिलीज हुई है, लेकिन इस फिल्म का हरेक सीन हरेक व्यक्ति अपने बचपन से हजारों बार देख चुका है। मैं अपने बचपन में अपनी मां को देख चुका हूं, जब वह बरसते चौमासे की आधी रात में आए मेहमानों के लिए पिता और चाचा की फरमाइश का खाना पकाती थी। कच्चे घर के आले में रखे दीए की टिमटिमाती बेनूर रोशनी में फुकनी से फूंक कर चूल्हे के धुएं को कम करती मां की कोई एक तरकारी जब पिता और चाचा को पसंद नहीं आती तो दादी के हुकुम पर दूसरी सब्जी बनाने को ही मां अपने जीवन का महत्वपूर्ण काम मानती थी।

इस फिल्म की मलयालम बोलने वाली पढ़ी-लिखी व कुलीन नायिका और ब्रज व भदावरी की खिचड़ी बोली बोलने वाली मेरी अनपढ़ मां में कोई फर्क नहीं है। इस फिल्म की नायिका जैसे हिंदुस्तान के हर घर की किचन में मौजूद है। वह पति को, ससुर को और मेहमानों को खाना परोसती है, तो वे तुरंत जान जाते हैं कि रोटियां गैस चूल्हे पर सेंकी हुई हैं, चटनी मिक्सर में बनाई है और चावल कुकर में पकाए हैं। वे देवताओं की सी मीठी आवाज में कहते हैं कि कोई बात नहीं, कल से लकड़ी के चूल्हे पर रोटी बनाना, चावल पतीले में और चटनी हाथ की पिसी हुई ही स्वादिष्ट होती है। इस फिल्म के एक हिस्से में नायिका के पति का चचेरा भाई और उसकी पत्नी घर आ जाते हैं।

यहां एक की पसंद दूध वाली चाय होती है और दूसरे की पसंद ब्लैक टी। जब नायिका दोनों चाय बनाकर लाती है, तब उसका चचेरा देवर उसे अच्छी चाय बनाने के नुस्खे बताने लगता है। फिल्म यह बात कहने में कामयाब रहती है कि पुरुष जब किचन में काम करता है, तब वह एक आर्टिस्ट होता है या एक शेफ होता है और जब स्त्री किचन में होती है तब वह किचन और डायनिंग टेबल के बीच मैराथन दौड़ रही होती है।

यह फिल्म बताती है कि धर्म पुरुषों का प्रिविलेज और स्त्रियों की दासता का कारण है। और यह भी बताती है कि पारंपरिक परिवारों की स्त्रियों का घर किचन और बेडरूम तक महदूद होता है। …और यह भी हमेशा नहीं रहता।

हर महीने पीरियड्स के दिनों में उससे वह किचन और उसका बेडरूम भी छिन जाता है। यह फिल्म पुरुषों को बहुत आसानी से बचा ले जाती है। पुरुषों की सारी साजिशों को महिलाएं इस तरह अंजाम देती हैं, कि पुरुषों पर कोई लांक्षन नहीं आता। पुरुष सास और बुआओं की सूरत में घर की महिलाओं को ही महिलाओं के खिलाफ तैयार करता है और यह पूरा सिस्टम इस तरह चलता रहता है कि पुरुष की सौम्यता, उसका शिष्टाचार बना रहता है।

यह आश्चर्यजनक ही है कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर पांच जजों में से जिस एक जज इंदू मल्होत्रा ने प्रवेश के खिलाफ फैसला सुनाया, वह एक स्त्री हैं। इस फैसले में इंदू मल्होत्रा ने कहा था कि देश में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाए रखने के लिए धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विश्वासों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।

फिल्म की नायिका शादी से पहले डांस टीचर थी, शादी के बाद उसे कहा जाता है कि ‘अच्छे घरों’ की स्त्रियों को यह काम शोभा नहीं देता। ‘अच्छी स्त्रियां’ घर के भीतर रहती हैं और धर्म के बताए रास्ते पर चलती हैं। वे अगर नौकरी करती भी हैं तो पति और ससुर की मर्जी से शिक्षक या इसी तरह की कोई नौकरी करती हैं। नायिका को इसे स्वीकार करने में कोई खास गुरेज भी नहीं होता है। अगर थोड़ा-बहुत होता भी है तो उसकी ‘अनुभवी’ मां उसे फोन पर बता देती है कि पति और ससुर की मर्जी का सम्मान करना ही पत्नी का कर्तव्य है। वह इस कर्तव्य को निभा रही थी, जैसे लाखों-लाख स्त्रियां निभा रही हैं। लाखों-लाख स्त्रियों ने यह स्वीकार कर लिया है कि वे ब्रह्म ज्ञानी की हत्या का पाप भोग रही हैं। उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि पीरियड्स के दौरान वे अपवित्र होती हैं। हमारी नायिका यह स्वीकार नहीं कर पाती। उसका अस्वीकार लैंगिक बराबरी की तरफ जाने वाली एक पगडंडी खींचता है।

फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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