Wednesday, May 18, 2022
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सिने दुनिया : क्रूरतम ग़ैरबराबरी का रूपक है ‘इन टाइम’

पिछले दिनों मित्र और फिल्मकार व पटकथा लेखक अविनाश दास के बाबूजी (पिता) और हमारे बाऊजी नहीं रहे। हम लोग मिले। हमने अविनाश से कहा कि हो सकता है हम लोग नहीं मरेंगे। हो सकता है, हमारे बुढ़ापे से पहले हमेशा जिंदा और जवान रहने वाली कोई वैक्सीन बन जाए। अविनाश ने तपाक से कहा कि तब भी तुम्हें मरना होगा। तुमने दुनिया के कारोबार को समझा ही नहीं शायद। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया में सिर्फ पैसे वाले लोग जिंदा रहेंगे। गरीबों से उनकी उम्र, अमीरों के लिए छीन ली जाएगी।

मुझे नहीं पता कि अविनाश ने 2011 में आई अमेरिकन फिल्म ‘इन टाइम’ देखी है या नहीं। …लेकिन एंड्रियू निकोलस की पटकथा और उन्हीं के द्वारा निर्देशित यह फिल्म यही बात कहती है कि दुनिया को चंद लोग नियंत्रित करते हैं। ये चंद लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बैठकर और कभी एकसाथ मिलकर भी दुनिया के खेल, उसके नियम तय करते हैं और बाकी दुनिया लंबे अरसे तक इस खेल को नहीं समझ पाती। कुछ लोग समझते हैं, उससे जूझते हैं और उसकी गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते हैं, तब तक एक नया खेल रच दिया जाता है। ऐसा ही एक खेल साइंस फिक्शन और फैंटसी की बुनियाद पर खड़ी फिल्म ‘इन टाइम’ है।

साइंस फिक्शन और फैंटसी फिल्में अकसर ही हमें वास्तविक दुनिया से बाहर ले जाती हैं। वे एक ऐसी दुनिया रचती हैं, जहां हमें अंततः अच्छा लगने लगता है और कई बार डर और आशंकाओं से भी हम घिर जाते हैं। जब हम जेम्स केमराॅन की ‘अवतार’ जैसी फिल्में देखते हैं, तब अहसास होता है कि हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है, जो हमने चाही नहीं थी। या कि जब हम स्पेनिश फिल्म ‘द प्लैटफाॅर्म’ देखते हैं तो एक भय से भर जाते हैं कि जीवन इतना क्रूर भी हो सकता है कि सर्वाइवल के लिए मानव विकास की अब तक हासिल की तमाम सभ्यता को तिलांजलि दे देते हैं।

बहरहाल, ‘इन टाइम’ 2011 में आई थी और इसकी उस तरह चर्चा नहीं हुई, जिस तरह इस शृंखला की इसके आसपास आईं कुछ दूसरी फिल्मों की हुई, लेकिन यह एक बहुत जरूरी फिल्म है। यह फिल्म कोई नई बात नहीं कहती, लेकिन अब तक कई बार कही जा चुकी बात को एक नए ढंग से इस तरह कहती है कि बात नई-सी लगती है। यह फिल्म सामाजिक गैरबराबरी और पूंजी के वर्चस्व का विद्रूप चेहरा दिखाती है।

इस फिल्म की कहानी सन् 2169 से शुरू होती है। एक ऐसी दुनिया की कल्पना जहां समय ही करंसी है। अमीर लोगों के पास लाखों साल की उम्र है। उन्होंने अपनी उम्रें बैंकों में जमा कर रखी हैं। वहीं गरीब लोगों के पास अधिकतम एक दिन की उम्र है। वह एक और दिन की जिंदगी कमाने के लिए मिलों में काम करता है, मजदूरी करता है, पुलिस की या कोई दूसरी नौकरी करता है या सेक्स वर्कर होता है। …और जो यह सब नहीं करता, वह उम्र चुराता है।

लोगों की कलाई पर रेडियम-सी चमकने वाली एक हरे रंग की घड़ी चलती रहती है। लोग दूसरों की कलाई पकड़कर उनकी उम्र खुद में ट्रांसफर कर सकते हैं। जिंदा बने रहने की जद्दोजहद हर रोज की है। बल्कि कई बार तो दिन में दो या तीन बार लगता है कि जिन्दगी चंद मिनट की मेहमान है। इस बेबसी को समझा जा सकता है कि उम्र के इस बंटवारे और गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी आपके पास समय नहीं है।

एकदम बढ़ा दी गई मंहगाई और टैक्स से कुछ ही देर में जाने कितने लोगों की मौत हो जाती है और लोग उसके खिलाफ कुछ नहीं कह पाते। इसकी वजह यह है कि जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उनके सुंदर-सुंदर शहर अलग बसे हुए हैं। उन शहरों में पहुंचने के लिए टोल टैक्स के रूप में ही महीनों की उम्र खर्च हो जाती है। मिलों में काम करने वाले मजदूरों को उनके मेहनताने के रूप में कुछ घंटों या एक दिन की उम्र मिलती है।

ये लोग चाहकर भी विद्रोह नहीं कर सकते। अमीर लोगों ने अपनी उम्रें बैंकों में जमा कर रखी हैं। कुछ अमीर लोगों ने बैंक खोल रखे हैं, जहां मजदूरों या जरूरतमंदों को मोटे ब्याज पर समय लोन पर दिया जाता है। ये लोन इतने भी नहीं होते कि विद्रोह करने में मददगार साबित हों।

इस फिल्म का हीरो विल सालस (जस्टिन टिम्बरलेक) एक मिल मजदूर है और एकदम बढ़ा दी गई मंहगाई के चलते अपनी 50 साल की मां को खो देता है। मां के पास डेढ़ घंटे का समय बचा था। बस का किराया अचानक एक घंटे से बढ़ाकर दो घंटे कर दिया जाता है। मां को दौड़कर अपने बेटे की तरफ जाना पड़ा और इससे पहले कि बेटा अपनी उम्र में से कुछ उम्र उसे ट्रांसफर करता, मां का टाइम खत्म हो चुका होता है। वह मर जाती है। इससे पहले उसका विद्रोही पिता भी मर गया था। पहले तो विल सालस को लगता है कि यही सिस्टम है, ऐसा ही होता है। लेकिन बाद में उसे एक इंसान मिलता, जो अमीर है और जिसके पास सैकड़ों साल की उम्र है। वह सालस को बताता है कि यह कोई कुदरती नियम नहीं है, बल्कि कुछ लोग इसे नियंत्रित कर रहे हैं। चंद लोग अमर हो सकें, इसके लिए ज्यादातर का मरना जरूरी है। यह बात और उसकी मां की मौत विल सालस को इस सिस्टम के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार करती है।

इस फिल्म की एक खास बात और है कि इसमें सभी की उम्र 25 साल पर आकर थम जाती है। मतलब यह कि फिल्म में कोई बूढ़ा नहीं है। 50 साल, 100 साल या इससे अधिक उम्र के लोग भी 25 साल के ही दिखते हैं। इस फिल्म की डिटेलिंग के लिए एंड्रियू निकोलस की तारीफ की जानी चाहिए। फिल्म में आठ क्लास हैं। हर क्लास के अलग शहर-ठिकाने हैं। विल सालस का क्लास आखिरी है। वह झोपड़पट्टी में रहता है। यहां रहने वाले सभी लोग समय-समय पर अपनी उम्र वाली घड़ी देखते रहते हैं, वे तेज-तेेज चलते हैं, बल्कि दौड़ते हुए चलते हैं, वे चुटकियों में खाना खा लेते हैं, हर काम जल्दी करते हैं। वहीं, जो अमीर हैं, उन्हें किसी काम की जल्दबाजी नहीं है। वे कभी अपनी घड़ी नहीं देखते।

इस फिल्म को देखने के बाद एक डर भी पैदा होता है, कि जब दुनिया की तमाम पूंजी चंद लोगों की जेब में सिमट गई है, तब उम्र!, हवा और धूप जैसी प्राकृतिक रूप से सभी को मिलने वाली चीजों पर भी कुछ लोगों का नियत्रण हो गया, तो क्या होगा। मां-बाप और बच्चों, प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रेम को ग्लोरीफाई करने वाले इस समाज में अगर परीक्षा की ऐसी घड़ी आ गई कि उम्र बांटनी पड़े हर रोज, तब क्या होगा। फिलहाल जीवन की खूबसूरती इस बात में है कि जीवन सभी के लिए अनिश्चित है।

फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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