समकालीन जनमत
कविता

शिव कुशवाहा की कविताएँ अपने समय के संघर्षों को दर्ज करती हैं

कौशल किशोर


युवा कवियों ने कविता को नया तेवर दिया है। यह कथ्य तथा शिल्प दोनों स्तर पर देखा जा सकता है। कविता के क्षेत्र में दशक बीतते-बीतते एक नई पीढ़ी सामने आ जाती है। वह परम्परा से सीख रही है, ग्रहण कर रही है, तो उसे तोड़ भी रही है। इस तरह नया गढ़ रही है।

इस पीढ़ी के जिन कवियों ने हाल के वर्षों में सर्वाधिक आकर्षित किया है, चर्चित रहे हैं और अपनी छाप छोड़ी हैं, उन्हीं में कवि शिव कुशवाहा हैं। हाल के वर्षों में उनके दो संग्रह आये। 2019 में ‘तो सुनो’ और 2020 में ‘दुनिया लौट आयेगी’।

यह कवि की सृजनात्मक सक्रियता का उदाहरण है। उनकी कविता का केन्द्रीय तत्व संघर्ष और उम्मीद है। इसी से इनकी कविता की दुनिया बनती है। यहां आम आदमी के पक्ष में वर्तमान सत्ता व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष है तो वहीं बदलाव की आशा-आकांक्षा है। इनकी शैली सरल-सहज है, बहुत कुछ अभिधात्मक। इसीलिए पाठकों से सीधे संवाद करती है।

शिव कुशवाहा की कविता में व्यक्त संघर्ष को देखें तो पाते हैं कि यह अंधेरे के खिलाफ’ है। यहां गहन ‘संवेदना की महानदी है’। यह ‘शब्दों की दुनिया’ रचती हैं जहां ‘उम्मीदों का पूरा आसमान’ है। तभी तो उसे भरोसा है कि ‘बचे रहेंगे शब्द’ और ‘बचा रहेगा आदमी’।

अभिमन्यु साहित्य और जीवन में संघर्ष का ऐसा प्रतीक है जो महारथियों से बहादुरी से लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुआ। वह ऐसा नायक है जो कविता में बार-बार जी उठता है। उसका जीना नये रूप और संदर्भ में है। शिव कुशवाहा जिस संघर्ष को कविता में लाते हैं, वह वर्तमान समय का महाभारत है और उनका अभिमन्यु इसी नये महाभारत का योद्धा है। भले ही वह समय के चक्रव्यूह से घिरा हो, वार झेल रहा हो पर वह चक्रव्यूह को तोड़ने और उससे बाहर निकलने की कला जानता है। शब्द, कलम, कविता, विचार आदि सब उसके अस्त्र हैं। इन्हीें अस्त्रों से वह प्रतिपक्ष रचता है।

कविता का रिश्ता अपने समकाल से होता है। कहा भी जाता है कि कविता अपने समय से मुठभेड़ करती है। वह होड़ लेती है। उसे रचती है। किसी रचनाकार का बनना भी इसी प्रक्रिया में होता है।

शमशेर बहादुर सिंह ‘काल से होड़’ की बात करते हैं। वे कहते हैं ‘काल तुझसे होड़ है मेरी/अपराजित तू/तुझ में अपराजित मैं वास करूं’। कहने का आशय है कि समय के साथ कविता द्वंदात्मक स्थिति में होती है। शिव कुशवाहा की ‘कविता की मुक्ति’ सहित अनेक कविताओं में यह बात दिखती है।

‘कविता की मुक्ति’ का संदर्भ लें। कैसा है यह समय? फिसलन भरा और खतरनाक। इतिहास की घटनाएं भी उस दीपक की तरह हैं जो कभी भी बुझ सकता है। उसकी फड़फड़ाहट इस बात का सूचक है कि तेल अर्थात उसकी ऊर्जा बस खत्म होने वाली है।

विपरीत समय में जब इतिहास का भी साथ न मिल पा रहा हो और खतरे की संभावना हो, इस विपरीतता का कवि को एहसास है तभी तो उसके लिए अपने अंदर के भावावेग को बांधकर रख पाना संभव नहीं। उसके ‘निसृत होते शब्द बह जाते हैं/भाव रूपी महानदी के तेज धार में’ क्योंकिः

‘डूबने की प्रक्रिया में सिद्धांत
अतिक्रमित कर अपनी सीमाएँ
तोड़ रहे हैं सब्र की सभी सीमाएँ
कि अब शिल्प के बदलाव
पहचान के रूप में स्थापित हो
इसलिए कविता की मुक्ति की तरह
मुक्त होना जरूरी है समय को….’.

यहाँ समय अपने स्पेस के साथ उपस्थित है जहां तमाम विपरीतताएं घटित हो रही हैं। विचार, सिद्धांत जिसे मानव ने संघर्ष से अर्जित किया, वह सभी अर्थहीन होने की प्रक्रिया में हैं। सत्य भी गढ़ा हुआ है, बनावटी है। जीवन भी संकटग्रस्त हुआ है। व्यवस्था की हालत यह है कि वह उसी डाल को काट रही है जिस पर जन समुदाय बैठा है। शिव कुशवाहा की कविताएं इसी यथार्थ से रूबरू है। उन स्थितियों का मार्मिक और सहज चित्रण है जिनसे आम आदमी घिरा है।

शिव कुशवाहा की पक्षधरता आम जन के पक्ष में है। उनका आत्मिक लगाव उनके दुख-दर्द से है। इसीलिए उनका मन ‘बादल घिर रहे हैं’ से हर्षित नहीं होता। इसके विपरीत वे चिन्तामग्न हैं। बादलों का घिरना ‘मस्तक की चिंता-रेखाओं को/और अधिक बना रही है गाढ़ा’। बादलों से होने वाली बारिश की वजह से नदियां उफनाती हैं। बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। माल-मवेशी बह जाते हैं। शहरों-महानगरों को बचाने के लिए ‘बांधों से छोड़ा गया पानी/निगल रहा है हजारों जिंदगियां’। कौन है जो बांधों से पानी छोड़ रहा है और हजारों जिन्दगियों को निगल रहा है? कविता न सिर्फ उस मंजर को सजीव करती है बल्कि उनकी भी शिनाख्त करती है जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। कविता इस संघर्ष का साझीदार हैः

‘बादल घिर रहे हैं दिशाओं में
साथ ही साथ घिर रहे हैं
संकट के समय में बेदखल हुए लोग
घर, मवेशी, और अन्न
बह गए तेज धार में
जिजीविषा का संघर्ष
लगातार जारी है उनके लिए……’

शिव कुशवाहा की नजर उस पर भी है जो जीवन के लिए प्राणवायु है। यह है जंगल। निहित स्वार्थो के लिए जंगलों की जो कटाई हो रही है, उससे न सिर्फ पर्यावरण बिगड़ रहा है बल्कि जंगल के जीव-जन्तु भी खत्म हो रहे हैं। यह वैश्विक समस्या बन चुकी है। हम जानते हैं कि जंगलों में आदिम जातियां रहती आई हैं। यह आदिवासियों का घर है। उनकी अपनी संस्कृति है। उन्होंने जगलों को बचाया है और जंगल उनके अस्तित्व का कारण है। आज उन्हें वहां से बेदखल करने का अभियान चल रहा है। विकास के नाम पर जंगलों की कटाई हो रही है। उनकी अस्मिता, संस्कृति, भाषा सब संकट में है। दरअस्ल, यह विनाश पर आधारित विकास है। ‘जंगल खत्म हो रहे हैं’ इसी सच्चाई को सामने लाती है।…’

कविता का काम मात्र स्थितियों का चित्रण आौर वर्णन कर देना नहीं होता। यह यथास्थितिवाद है। शिव कुशवाहा यथास्थितिवादी कवि नहीं है बल्कि बदलाव के लिए संघर्ष करने वाले रचनाकार है। उनमें राजनीतिक सजगता है। जैसा कि मैंने शुरू में कहा कि शिव कुशवाहा का मूल तत्व संघर्ष और उम्मीद है। यह इनकी कविता की चारित्रिक विशेषता है जो विविध रूपों में व्यक्त है। यहां जीवन का वसंत और मनुष्यता की आग को बचाने का संघर्ष है ‘कि टूटते हुए परिवेश में/आस्थाओं की ठंडी बयार बची रहे/जिससे बचा रहे जीवन का वसंत/और बची रहे हमारे अंदर की/बुझती मनुष्यता की आग’। तो वहीं यह बहशी आशावाद भी है कि ‘दम तोड़ती रोशनाई के अंधेरे में/उम्मीद अभी जिन्दा है’। ‘तो सुनो’, ‘दंनिया लौट आयेगी’ और यहां समीक्षित कविताओं में शिव कुशवाहा की काव्य विशेषता सामने आती है। फिर भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कला और विचार के स्तर पर रचनात्मक संघर्ष को और अधिक सघन करने की आवश्यकता बनी हुई है।

 

शिव कुशवाहा की कविताएँ

 

1. कविता की मुक्ति

समय जब पंख लगाकर उड़ रहा हो
कुछ रिक्तता साल रही हो अंदर ही अंदर
जब सब कुछ लग रहा हो फिसलन भरा
तब कुछ चुक जाने का अहसास
सबसे ख़तरनाक दौर की ओर
चुपचाप करता है इशारा

जैसे बुझता हुआ दीपक
अपनी लौ को फड़फड़ाने से
भांप लेता है अपने अंदर
खत्म होती हुई ऊर्जा
उसी तरह इतिहास में
दर्ज होती हैं कुछ घटनाएं
जिसके दम तोड़ते हुए ऐतिहासिक पृष्ठ
अपने जीर्ण-शीर्ण  होने की देते हैं गवाही

देश का भौगोलिक इतिहास
होता जाता है संक्रमित
दिशाओं में खर-पतवार
उग आने की संभावना से
विचारों का उत्सर्जन
तब्दील हो जाता है परावर्तन में

लौह श्रृंखला से बांधकर भावावेग
नहीं रखा जा सकता गिरवीं
निसृत होते शब्द बह जाते हैं
भाव रूपी महानदी के तेज़ धार में

डूबने की प्रक्रिया में सिद्धान्त
अतिक्रमित कर अपनी सीमाएं
तोड़ रहे है सब्र के सभी बांध

कि अब शिल्प के बदलाव
पहचान के रूप में स्थापित हों
इसलिए कविता की मुक्ति की तरह
मुक्त होना जरूरी है समय को…

2. टूटते हुए परिवेश में

घर के वातायनों से झांकती
खामोशी ने ओढ़ ली है
एक निर्वेदमय स्वीकृति
जहां जड़ता का संसार
दे रहा है दस्तक
आवेगों ने रोक लिए हैं
भावों के निसृत मार्ग

आंगन में अब नहीं उतरते चटक रंग
चबूतरों पर पसरा हुआ सन्नाटा
अपने भयावह होने की
कहानी बया कर रहा है
वह बया कर रहा है
एक वीभत्स युग जो
जिया गया है तमाम बेड़ियों को तोड़कर

झींगुरों के गायन की तरह
विलप्त हो रहा है
उल्लसित जीवन का खट-राग
संशय गढ़ रहा है
एक नया प्रतिमान
आस्थाओं पर जम रही धूल
बुहारते हुए
हांफ रहा है समय

परिवेश में घुल रहा भय
और अजनबीपन का स्याह होता संत्रास
स्थायीभाव की तरह
बन रहा है जीवन का अभिन्न हिस्सा

कि टूटते हुए परिवेश में
आस्थाओं की ठंडी बयार बची रहे
जिससे बचा रहे जीवन का वसंत
और बची रहे हमारे अंदर की
बुझती मनुष्यता की आग..

3. उदास जीवन की परछाइयाँ

बादलों के पीछे की दुनिया में
रहती है बहुत नमी
जिसकी आद्रता में बह जाता है
समूचा परिवेश हमारे अपनेपन का

इंद्रधनुषी कलेवर में डूबी
अतीत की छायाएं
आंखों में समायी हुई
दूर तक खीचती हैं
बुझते जीवन का संगीत-राग

जुगनुओं की लयबद्धता
स्याह रात में
छिटक देती है चटक रंग
रात खो जाती है जिज्ञासा के
अतल गह्वर में

दीपक की अंतिम शिरोरेखा पर
टिका हुआ है प्रकाश
कि हवा का एक हल्का झोंका
भुला देता है दिशाओं का ज्ञान

यहां सब कुछ टिका है पूर्वानुमान पर
भविष्य की राहों में कांटे हैं
और वर्तमान झूल रहा है
संभावनाओं की सलीब के सहारे

इन दिनों कवि निहार रहा है
अजीबोगरीब मटमैले अक्स
आकाश में बनती बिगड़ती आकृतियां
जिनके पीछे छिपी हैं
उदास जीवन की अनेक परछाइयाँ..

4. बादल घिर रहे हैं

बादल घिर रहे हैं दिशाओं में
पछुआ हवा की चाल बढ़ गयी है
भांदों के काले-काले मेघ के साथ
आकाश में कड़कती बिजली का
भयावह गर्जन
मस्तक की चिंता-रेखाओं को
और अधिक बना रही है गाढ़ा

हर साल नदियां उफनती हैं
खतरे के निशान से ऊपर
बाढ़ का खतरा हर साल
मंडराता है सिर पर
बारिश के पानी से
केवल बेहाल नहीं हैं गांव
बल्कि शहर , महानगर
और राजधानियां भी हैं इसकी चपेट में

महानगर से लेकर गाँव की सीमाएँ
डूबी हुई हैं पानी के
अतिक्रमित होते खतरे से
पानी खेत-खलिहान ही नहीं
घर की देहरी के अंदर दे रहा दस्तक
चूल्हे की आग ठंडी हो चुकी है
लेकिन पेट की आग जला रही है अंदर तक

जलमग्न हुई फसलों को
निगल रहा है बाढ़ का तेज़ बहाव
घर ढ़ह रहे हैं बरसात में
बांधों से छोड़ा गया पानी
निगल रहा है हज़ारों जिंदगियां

बादल घिर रहे हैं दिशाओं में
साथ ही साथ घिर रहे हैं
संकट के समय में बेदखल हुए लोग
घर, मवेशी, और अन्न
बह गए तेज़ धार में
जिजीविषा का संघर्ष
लगातार जारी है उनके लिए..

5. जंगल खत्म हो रहे हैं

प्रकृति के सबसे सुरम्य
होते हैं जंगल
उनमें रहने वाले
पशु, पक्षी और आदिवासी
मानते हैं उसे अपना पालनहार.

आज की इस सदी में
सुरक्षित नहीं हैं जंगल की अस्मिता
नदी, पहाड़, हवा, रोशनी
जंगल के साथ ही
धीरे धीरे हो रहे हैं विलुप्त.

जारी किये जा रहे हैं फरमान
कि बेदखल किया जाए
उन्हें उनकी मिट्टी से
उनकी जमीनों से , उनके घरों से
उनके पूरे के पूरे अरमानों पर
फेरा जा रहा है पानी
छीना जा रहा है उनका आसमान
रह रहे हैं जो सदियों से
इन जंगलों की गोद में.

जंगल केवल जानवरों के
आशियाने नहीं होते
उनमें रहती हैं सदियों से
चली आती परंपराएं
अब जंगल खत्म हो रहे हैं,
साथ ही साथ खत्म हो रही हैं
जंगल की सभ्यताएं
और उनमें रहने वालों की
संस्कृति,भाषा और अस्मिता भी..

6. हम बढ़ रहे हैं

तय कर दिया गया है
कि लोकतंत्र अब नहीं रहेगा लोकतंत्र
बल्कि बदल दिया जाएगा वोटतंत्र में
सियासी सरगर्मियां देश का चेहरा बदल देंगी.

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ
बिक जाएगा सत्ता की दलाली में
वे केवल प्रचारतंत्र के बिकाऊ साधन बनेंगे
वे रख देंगे गिरवी अपनी कलम.

साहित्यकार बढ़ रहे होंगे नवचारणवाद की तरफ
जहां सत्ता की अतिशयोक्ति प्रशंसा
बन चुका होगा उनका धर्म
राज्याश्रित कवि नहीं उठाएंगे सवाल
राजा की निष्ठा पर
वे डूबे होंगे आकंठ सत्ता की चाटुकारी में.

आने वाली पीढियां नहीं पढ़ेंगी इतिहास
भूगोल तो कतई नहीं
और विज्ञान विलुप्त हो जाएगा इस सदी से.

हम बढ़ रहे हैं एक छद्म दुनियां की तरफ
जहां झूठ बोलने की कला ही
समय का सबसे कारगर अस्त्र होगा…

7. सत्ता और कुकुरमुत्ते

राजनीति का क ख ग नहीं जानती प्रजा
प्रजा केवल बदल सकती है सत्ता
और सत्ता पर काबिज हो जाते हैं कुकुरमुत्ते
कुकुरमुत्ते उग आते हैं
नकाब पहनकर हर बार नए रंग रूप में

सत्ता बन जाती है खूंखार लकड़बग्घा
जो राह चलते झपट लेते हैं
भूखों का निवाला
दिन पर दिन बढ़ जाती है घोटालों की फेहरिस्त
कुकुरमुत्तों की परिधि रात दिन बढ़ती है
और बढ़ जाती है उनकी उदरपिपासा
सोख लेते हैं समाज की ऑक्सीजन

सच को सच कहने वाले टांग दिए जाते हैं
ईसा की तरह सलीब पर
और झूठ को सच साबित करने वाले
सत्ता के करीब होकर हो जाते हैं पुरस्कृत
सत्ता का झूठा चरित्र बेनकाब करने वाले
घोषित हो जाते हैं दिवालिया

समय सत्ता के चारित्रिक हनन के साथ
बढ़ रहा आगे
दलित, सवर्ण, पिछड़े, और मुस्लिम
बन जाते हैं मोहरा
सत्ता के असली हकदार रह जाते हैं पीछे
आगे आगे चलते हैं कुकुरमुत्ते
हर जगह बिना खादपानी के उग आते हैं …

8. समय के सच के साथ

विचारधाराओं की
टकराहट से उपज रहे
खतरनाक माहौल के बीच
दरक रही हमारी एकता
और निरन्तर
चल रहे द्वंद्व में पिस रही
दो पीढ़ियाें की
अपार सम्भावनाएं.

सिमट रहे
मानवीय संवेदना के दायरे
बदल रहे परिदृश्य में
असंगत जाति और संप्रदाय
रंगों में डूबकर
बन गये हैं ,ईहमारी पहचान.

अंदर ही अंदर
हो रहे उथल- पुथल को
समझना होगा सिरे से
राजनीतिक षडयंत्रों के
यथार्थ को समझते हुए
अब समय के सच के साथ
बढ़ना होगा आगे.

पहचानने होंगे
नीति-नियंताओं के कुचक्र
जो सुलगाना चाहते हैं
समाज के बीच का
आपसी सौहार्द
दहशत की भयंकर लौ में
झोंक देना चाहते हैं
देश की सांस्कृतिक विरासत…

9. दम तोड़ती रोशनाई

महादेश के प्रांगण में
अब नहीं है हाशिए के लोगों का सरोकार
मंहगाई सुरसा के मुंह-सी
डकार जाती है
खून- पसीने की कमाई
महादेश में बहस छिड गयी है
अनर्गल आलाप- प्रत्यालाप की
बनिस्बत रोजमर्रा की
जीवन की सुगमता के.

महादेश जल रहा
जातीय और साम्प्रदायिक
दावाग्नि की मानिंद भीषण लपटों में
संकट में घिरा हाशिए का जीवन
घर के चूल्हे बुझ चुके ,
किन्तु राख की चिंगारी के ढेर पर
सुलग रही है कहीं
दमित इरादों के उत्तुंग शिखर.

अब उतर आई है खामोशी
हाशिए पर खडे
आदमीनुमा प्राणी के जेहन में ,
कल्पनाओं का अम्बार
और
दम तोडती रोशनाई के अंधेरे में
उम्मीदें अभी भी जिन्दा हैं..

10. बदरंग चेहरे

सांझ के गहरे होने के साथ
गहरा जाती है बदरंग चेहरे की निराशा
एक पग जब बढ़ना मुश्किल हो जाता है
तब गहरे दिन की बढ़ती कालिमा
कह देती है चुपचाप
धीरे धीरे आगे बढ़ने के लिए.

अस्त होते हुए सूरज की शिथिल किरणें
दूर तक ले जाती है हमारा अस्तित्व
लंबी छाया में हम देख लेते हैं मुरझाता अक्स

कभी-कभी समझ आने की तह तक
हम समझ ही नहीं पाते
कि दिन ढलने के साथ ही ढल जाती है
जिंदगी की रंगीन दुनिया
बदरंग पृष्ठों की भूमिका की तरह
साफ साफ नहीं दिखते शब्द
कविता की संवेदना हो जाती है अस्पष्ट.

गोल घूमती हुई पृथ्वी अपनी धुरी पर
छोड़ देती है बदरंग चेहरे
जो देखते रहते हैं
लगातार दुनियां की तेज़ रफ्तार

बदरंग चेहरों की दुनियां बढ़ रही है
साथ ही साथ बढ़ रही है
धीरे-धीरे दिनमान की कालिमा…

 

(कवि शिव कुशवाहा, जन्मतिथि-  5 जुलाई , 1981, जन्मस्थान- कन्नौज ( उ प्र)
शिक्षा – एम ए (हिन्दी), एम. फिल.,नेट, पीएच.डी.
‘तो सुनो’ काव्य-संग्रह प्रकाशित ,2019।
‘दुनिया लौट आएगी’ काव्य संग्रह प्रकाशित, 2020।

कई पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर कविताएँ व समीक्षाएँ प्रकाशित । सम्प्रति- अध्यापन
संपर्क : C/O श्रीमती राममूर्ति कुशवाहा, शिव कालोनी, टापा कला, जलेसर रोड,
फिरोजाबाद, (उ प्र), फ़ोन– 07500219405
E mail-  [email protected]

 

टिप्पणीकार कौशल किशोर
कवि, समीक्षक, संस्कृतिकर्मी व पत्रकार, जन्म: सुरेमनपुर (बलिया, उत्तर प्रदेश), 01 जनवरी 1954, स्कूल के प्रमाण पत्र में।
संपर्क: एफ – 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ – 226017, मो – 8400208031

‘युवालेखन’ (1972 से 74) ‘परिपत्र’ (1975 से 78) तथा ‘जन संस्कृति’ (1983 से 90) का संपादन। दैनिक जनसंदेश टाइम्स के साहित्यिक पृष्ठ ‘सृजन’ में संपादन सहयोग (2014 से 2017)।
संप्रति : लखनऊ से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘रेवान्त’ के प्रधान संपादक।
जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में प्रमुख तथा मंच के पहले राष्ट्रीय संगठन सचिव। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।

प्रकाशित कृतियाँ: दो कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ तथा ‘नयी शुरुआत’। कोरोना काल की कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफिले’ का संपादन। वैचारिक व सांस्कृतिक लेखों का संग्रह ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ तथा ‘शहीद भगत सिंह और पाश – अंधियारे का उजाला’ प्रकाशित। कुछ कविताएं काव्य पुस्तकों में संकलित। 2015 के बाद की कविताओं का संकलन ‘उम्मीद चिन्गारी की तरह’ तथा समकालीन कविता पर आलोचना पुस्तक की पाण्डुलिपियां प्रकाशन के लिए तैयार। कुछ कविताओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।)

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