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बिहार के गांव-गांव में शुरू होगा पुस्तकालयों को बचाने के लिए जन आंदोलन : सुदामा प्रसाद

मुजफ्फरपुर। बिहार के गांव-गांव में पुस्तकालयों को बचाने के लिए गांव जवार और अन्य संगठनों की मदद से जन आंदोलन शुरू किया जाएगा। इस आंदोलन में सभी सामाजिक संगठनों को शामिल किया जाएगा। पुस्तकालयों की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है, इसे बचाने की जरूरत है। जनभागीदारी से ही यह काम संभव है।
उक्त बातें बिहार विधान सभा की पुस्तकालय समिति के सभापति एवं विधायक सुदामा प्रसाद ने रविवार को गांव जवार द्वारा आयोजित लोक संवाद में कही।
‘ समाज में लाइब्रेरी जरूरी क्यों ‘ विषयक संवाद में सभापति सुदामा प्रसाद ने कहा कि 100 साल पुरानी विधानसभा में पुस्तकालय समिति का एक भी प्रतिवेदन आज तक सभापति को नहीं सौंपा गया है, यह हैरानी की बात है। अगले सत्र में नई समिति पहली बार प्रतिवेदन सौंपने वाली है। अगर पुस्तकालयों को दुरुस्त कर लेंगे तो बिहार भारत को विश्व गुरु बना सकता है। सिर्फ गौरवशाली इतिहास का ढिंढोरा पीटने से काम नहीं चलेगा। इतिहास को स्थापित करने के लिए पुस्तकालयों को बचाना होगा। बजट का पैसा जनता का पैसा होता है यह पुस्तकालय और विद्यालय पर खर्च होनी चाहिए। अनावश्यक योजनाओं पर खर्च करने के लिए सरकार के पास पैसे हैं, लेकिन लाइब्रेरियन को वेतन देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। गांव जवार की इस पहल को जन आंदोलन का रूप देना है। पूरे बिहार में इस आंदोलन को ले जाना है।
सुदामा प्रसाद ने कहा कि पुस्तकालय अभियान समिति का गठन होना चाहिए। यह समिति जानकारी इकट्ठा करें। लोगों का सुझाव इकट्ठा करें और लाइब्रेरी को सूचीबद्ध करे। इसकी रिपोर्ट विधानसभा की पुस्तकालय समिति को सौंपे। इस आधार पर वह खुद मुख्यमंत्री से मुलाकात करेंगे और रिपोर्ट करेंगे। सुदामा प्रसाद ने पुस्तकालय प्राधिकार गठन के बावजूद कोई कवायद नहीं होने पर हैरानी जताई और सरकार के समक्ष इस सवाल को उठाने की बात कही। सुदामा प्रसाद ने कहा कि पंचायती राज अधिनियम के तहत सभी पंचायतों में लाइब्रेरी का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए बजट में ही प्रावधान करने की जरूरत है।
गांव जवार के अध्यक्ष डॉ कौशल किशोर चौधरी ने कहा कि पुस्तकालय आंदोलन आजादी के बाद सार्वजनिक पुस्तकालयों को समृद्ध बनाया था। बाद में यह कड़ी टूट गई। किताब का महत्व घटेगा तो हमारी संस्कृति भी चौपट होगी। पुस्तकालयों में तकनीकी पद 95 फीसद रिक्त हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय प्राधिकार गठन के वर्षों बाद राज्य सरकार ने कोई पहल नहीं की। इस कारण पुस्तकालयों की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। उन्होंने कहा कि घर-घर दस्तक, घर घर पुस्तक आंदोलन चलाने की जरूरत है। प्रत्येक जिले में इस तरह का संवाद आयोजित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार में पुस्तकालय विज्ञान की पढ़ाई तो होती है लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर का एक भी पद सृजित नहीं है।
हिंदुस्तान समाचार पत्र के संपादक आलोक कुमार मिश्रा ने कहा कि पढ़ाई के बाद किताबें खरीदने की आदत छूट गई है। टू जीबी का डाटा समाज को विकृत कर रहा है। हमें जानबूझकर किताबों की दुनिया से दूर किया गया है। बुद्धि को आर्टिफिशियल बनाने की कोशिश की जा रही है कंपनियां सरकारों के माध्यम से यह खेल खेल रही हैं। इसलिए जनता को सरकार से लड़ना होगा। सामुदायिक पहल करनी होगी। माइक्रो स्तर पर आंदोलन को ले जाना होगा। इससे लाइब्रेरी पुनर्जीवित हो सकती है।
सैयद माजिद ने कहा कि एस आर रंगनाथन के कॉन्सेप्ट से ही लाइब्रेरी का विकास संभव है। यही नहीं पब्लिक लाइब्रेरी को मजबूत करने के लिए बिहार सरकार को सेस कर लगाना चाहिए। साथ ही शिक्षा मंत्री की तर्ज पर लाइब्रेरी मंत्री होना चाहिए।
पूर्णिया से आए शशि रंजन ने कहा कि उनका संगठन गांव जवार के साथ मिलकर तिरहुत प्रमंडल के 5 जिलों में इस आंदोलन को गति देगा।
शिक्षाविद राजेश शाही ने कहा कि लाइब्रेरी को चलाने के लिए समाज आगे आए। लाइब्रेरी समाज का मुद्दा है। गांव स्तर पर पुस्तकालय बचाने के लिए अभियान चलाने की जरूरत है।
पत्रकार आफाक आजम ने कहा कि जिस घर में पुस्तक नहीं वहां संस्कार कहां मिलेगा। पुस्तकालय ही धर्म जाति के बंधन से समाज को मुक्त कर सकती है। इसके लिए व्यापक जन आंदोलन की जरूरत है। किताबें विरासत हैं इसे बचाने की जरूरत है।
बिहार लाइब्रेरी साइंस नेट व पीएचडी होल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ अमित किशोर ने कहा कि सार्वजनिक पुस्तकालय प्राधिकार का गठन हुआ लेकिन आज तक उसने कोई काम नहीं किया। यहां तक कि उस प्राधिकार में लाइब्रेरी साइंस के जानकार लोग भी शामिल नहीं हैं। उन्होंने सामुदायिक भवनों में लाइब्रेरी अनिवार्य करने का सुझाव दिया।
अधिवक्ता ललितेश्वर मिश्र ने कहा कि सोची समझी साजिश के तहत लाइब्रेरी के अस्तित्व को खत्म किया जा रहा है। सरकार को यह डर है कि लोग पढ़ेंगे तो सवाल करेंगे। इसलिए पुस्तकों से उन्हें दूर रखा जा रहा है। उन्होंने पंचायती पंचायती भवनों में लाइब्रेरी अनिवार्य करने के लिए बजट में प्रावधान करने की मांग की।
गीतकार कुमार विरल ने जन आंदोलन को परवान देने के लिए गांव जवार के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि  इसे जन आंदोलन का रूप देना जरूरी है। पहली बार लाइब्रेरी के अस्तित्व को लेकर शानदार संवाद का आयोजन किया गया। इसे गांव स्तर पर विस्तार देने की जरूरत है। कुमार विरल ने अपने गीत के माध्यम से कहा कि बिना लड़े कुछ नहीं मिलने वाला है। इसलिए हम लोगों को गोलबंद होकर पुस्तकालय बचाने की लड़ाई लड़नी होगी।
शिक्षाविद प्रोफेसर अरविंद डे ने कहा कि पुस्तकालय की स्थिति पर पहली बार सुदामा प्रसाद ने जिस तरीके से सदन में सवाल उठाया और गांव जवार ने जिस तरीके से लोक संवाद का आयोजन कर इसे आंदोलन का रूप दिया यह एक सराहनीय पहल है। अब इस आंदोलन को तमाम सामाजिक संगठनों की मदद से बिहार स्तर पर ले जाने की जरूरत है।
संस्कृति कर्मी मनोज वर्मा ने कहा कि गांव जवार की यह पहल एक सार्थक कदम है। जनभागीदारी से ही पुस्तकालयों को बचाने के लिए आंदोलन चलाया जाना चाहिए।
समाजिक कार्यकर्ता मुक्तेश्वर पाठक और श्याम कल्याण ने कहा कि पहली बार किसी विधायक ने सदन में पुस्तकालयों के अस्तित्व और स्थिति पर सवाल उठाया है यही वजह है कि आज हम सब संवाद के लिए यहां एकत्र हुए हैं। यह आंदोलन बिहार स्तर पर जाना चाहिए।
इस मौके पर विधायक सुदामा प्रसाद ने बिहार लाइब्रेरी साइंस नेट फॉर पीएचडी होल्डर्स एसोसिएशन के मासिक बुलेटिन का लोकार्पण किया। गांव जवार की ओर से सुदामा प्रसाद को पुस्तक और शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अंत में गांव जवार के सचिव एम अखलाक ने पुस्तकालय अभियान समिति का प्रस्ताव रखा। इसमें डा. कौशल किशोर चौधरी, वीरेंद्र नंदा, अरविंद डे, मुक्तेश्वर मुकेश, मनोज वर्मा, कुमार विरल, फूल देव पटेल, संत रामेश्वर महतो, चंदन कुमार, स्वाधीन दास, मानिक चंद सहनी, संजीत किशोर, डॉ अमित किशोर और शशि रंजन के नेतृत्व में एक संयोजन समिति बनाई गई। यह समिति आगामी दिनों में बैठक कर आंदोलन की रूपरेखा तैयार करेगी। बिहार में पुस्तकालय प्रेमियों को इस आंदोलन से जोड़ने का काम करेगी। इस आंदोलन का नेतृत्व सुदामा प्रसाद करेंगे।
कार्यक्रम के अंत में सुदामा प्रसाद ने ट्री मैन फूलदेव पटेल के साथ बिहार विश्वविद्यालय के पुस्तकालय परिसर में पौधरोपण किया।

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