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चोटी की पकड़ः देशी सत्ता-संस्कृति, औपनिवेशिक नीति और स्वदेशी आन्दोलन की अनूठी कथा

चोटी की पकड़ निराला का महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह उपन्यास 1946 ईस्वी में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। हालांकि इसे लिखकर पूरा करने का समय 1943 ईस्वी है।
यह एक बहुत ही रोचक और दिलचस्प उपन्यास है। इसके निवेदन में निराला लिखते हैं-
“चोटी की पकड़ आपके सामने है। स्वदेशी आंदोलन की कथा है। लंबी है, वैसी ही रोचक। युग की चीज बनाई गई है। जितना हिस्सा इसमें है, कथा का हिसाब उसमें समझ में आ जाएगा।”
अर्थात इस कथा के केंद्र में स्वदेशी आंदोलन है। स्वदेशी आंदोलन 1906 में प्रारंभ हुआ था और बाद में इसकी कड़ियां अन्य आंदोलनों से भी जुड़ती चली गई। इसकी पृष्ठभूमि में 1905 ईस्वी के बंगाल विभाजन के बाद की परिस्थिति है। हालांकि, स्वदेशी आंदोलन इस कथा का मुख्य विचार है, लेकिन  मुख्य कथानक में राजतंत्रों के भीतर की वास्तविकता ज्यादा प्रभावी ढंग से आयी है।
स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा एक ही पात्र है, वह है प्रभाकर। बाकी के पात्र या तो राजाओं, जागीरदारों  और उनके भीतरी जीवन से जुड़े हैं या सरकारी कर्मचारी के रूप में। राजाओं में ऐसे राजा का वर्णन है,  जो स्वदेशी आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते हैं। प्रभाकर को ऐसे ही एक राजा राजेंद्र प्रताप के यहां शरण मिली हुई है- “कुछ ही दिनों में राजों,  रईसों और वकील- बेरिस्टरों से मिलने पर राजा राजेंद्र प्रताप की समझ में आ गया, कि देश का साथ देना चाहिए। चिरस्थायी स्वत्व की रक्षा ही देश की रक्षा है, इस पर उन्हें जरा भी संदेह नहीं रहा।” हालांकि निराला यहाँ स्पष्ट कर देते हैं कि ये राजा अपनी पीठ बचाकर साथ थे। मन और कर्म से सिर्फ युवा थे, जिसमें से एक है प्रभाकर।
प्रभाकर छिपकर देशप्रेम और स्वदेशी का प्रचार प्रसार करता है। वह अपने संपर्क में आने वालों के भीतर से निजी हितों की जगह देशहित और परमार्थ की भावना भरता है। वह उनकी चेतना को बदलने का प्रयास करता है।
जागीरदारी और राजाओं की जीवन गतिकी में  इन सब के लिए बहुत कम जगह है।  निराला ने ‘चोटी की पकड़’ में तीन चौथाई कथा को इसी वास्तविकता को दिखाने में लगाया है। अर्थात प्रजा चेतना से कोई स्वदेशी आन्दोलन या आजादी  की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।  इस प्रजा चेतना को स्वतंत्र मनुष्य और नागरिक चेतना में बदलना होगा। प्रभाकर इसी काम में लगा है।
जागीरदारों और राजाओं की जीवन गतिकी और उसकी परिधि में आने वाली प्रजा तथा खुद उन अंग्रेजों के कर्मचारी भी, जो आधुनिकता की मिसाल माने जाते थे, किस पिछड़ी चेतना पर खड़े हैं, निराला ने इसे बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से वर्णित किया है। षड्यंत्र, धोखा, फरेब, छल, झूठ, स्वार्थ ही इनके जीवन का सत्य है।
इन्हीं सबको निराला ने कुल उन्तालीस प्रकरणों में शब्दबद्ध  किया है।
राजा राजेंद्र प्रताप, रानी और दासी मुन्ना तथा बुआ के माध्यम से महलों के भीतर या कहिए राजतंत्र के भीतर की सच्चाई को निराला ने बहुत प्रामाणिक ढंग से कथा में पिरोया है। राजा के पीछे रानी मुन्ना को लगाए रहती है। ताकि उनकी गतिविधि जान सके। मुन्ना इसके लिए राज्य के कर्मचारियों को लगाए रहती है। खुद मुन्ना इन सब का फायदा भी उठाती है और खजाने पर हाथ साफ करती है। लेकिन, इसी खजाने के चक्कर में वह प्रभाकर के संपर्क में आती है और स्वदेशी आंदोलन से जुड़ जाती है। प्रभाकर से मिलकर मुन्ना को लगता है कि वह जो जीवन जी रही थी, उसका मूल्य नहीं लेकिन प्रभाकर जो जीवन जीता है, उसका मूल्य है।
मुन्ना के माध्यम से निराला भारतीय वर्ण व्यवस्था या जाति-व्यवस्था की हकीकत को भी उभारते हैं, बल्कि इस पर उनका मुख्य जोर है। मुन्ना जाति से कहार है। रानी की खास है। वह जमादार जटाशंकर से कहती है, “जब हमसे बातचीत करो रानी समझकर करो… मेरे साथ रानी जी का मान है, उन्होंने दिया है, इसको अंग्रेजी में ऑनर कहते हैं।”
मुन्ना इस तरह राज्य के भीतर खुद को शक्ति का एक केंद्र बनाए हुए है। लेकिन, भीतर से उसे जाति में छोटे होने का अहसास लगातार बना रहता है।  वह रानी के मान देने से भी हटता नहीं है। इसलिए वह कर्मचारियों में जो ऊंची जाति के हैं, उनसे रानी जैसा व्यवहार रखकर इस जाति के अहसास को परे करना चाहती है।
जाति से ब्राह्मण जमादार जटाशंकर से अपने संबंध में वह यही करती है। लेकिन साथ में वह जटाशंकर को दोषी बनाकर, उसे खजाना लूटने के लिए अपना साथ देने को विवश भी करती है।

अगर आज की राजनीति या सत्ता के संचालन का तरीका देखा जाए तो यही है। पहले किसी को दोषी बना देना, फिर उससे मनचाहे काम लेना। सारे सत्ता संस्थानों का जो पतन हुआ है, उसके पीछे किस तरह की सोच या उसकी प्रणाली काम करती है, यह रानी, मुन्ना के चरित्र से जाना जा सकता है। कमाल का चरित्र गढ़ा  है निराला ने।
“अच्छा अब रानी जी का मान हम रानी जी को देते हैं, अब हम हम हैं। अब  हमको तुम चाहो तो चूम  लो। जटाशंकर फिर चूमने के लिए लपके। पकड़ कर चूमने लगे तो मुन्ना ने उनके होठों के भीतर जीभ चला दी और कहा, तुमने हमारा थूक चाटा। हमारी जाति कहार की है। हम गढ़ भर में कहेंगे, तुम कौन बाभन हो?… जटाशंकर सूख गये, सोचा यह कुल चकमा उनकी जाति मारने के लिए था। मुन्ना टकटकी बांधे हुए पंडित जटाशंकर मिश्र के बदलते हुए मनोभाव देखती रही।”
आठवां प्रकरण इसी कथा को विस्तार से कहता है।
मुन्ना देशी सत्ता के रूप-रंग का परिचय देती है तो अली औपनिवेशिक सत्ता का। राजा राजेंद्र प्रताप के कोचमैन अली के माध्यम से निराला ने औपनिवेशिक  सत्ता द्वारा किए गए सांप्रदायिक विभाजन की भावना की वस्तुनिष्ठ कथा योजना की है। साथ ही बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन को लेकर मध्यवर्गीय मुस्लिम तबके की स्थिति का ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक कथा-वर्णन और चरित्र-अंकन किया है।
अली का बेटा युसूफ दरोगा है। वह राजा राजेंद्र प्रताप की जासूसी कर के यह साबित करना चाहता है, कि राजा स्वदेशी आंदोलनकारियों  को शरण देते हैं और इसके बदले में वह अंग्रेज सरकार से इनाम में पदोन्नति चाहता है। अली और यूसुफ का मानना है, कि अंग्रेज सरकार ही मुसलमान हितों का संरक्षण कर सकती है। युसूफ धार्मिक पहचान का सहारा लेता है और तवायफ एजाज के माध्यम से राजा राजेंद्र प्रताप का राज लेना चाहता है। लेकिन एजाज यूसुफ के सामने अपनी कनीज नसीम को खुद के रूप में भेजती है। एजाज धर्म के ऊपर अपने पेशे और पहचान को रखती है और अंत तक यूसुफ को पता नहीं चल पाता कि वह जिससे मिलता है, वह एजाज है कि नसीम।
अर्थात, जो मुख्य चरित्र पुराने राजव्यवस्था, बादशाहत, जागीरदारी के अंतर्गत राज-समाज की थी, उसकी बहुत ही प्रामाणिक कथा निराला ने कही है। यह कथा हिंदी में किसी ने नहीं लिखी है, सिवाय प्रेमचंद के। जहां, पुराने भारत और नए भारत के अंतर्विरोध और उसमें औपनिवेशिक शासन की भूमिका कैसे सामाजिक गति को प्रभावित करती है, इन सब को फिक्शन का रूप दिया गया हो।
आजादी के बाद भारत में शासन-प्रशासन में जो भ्रष्टाचार की संस्कृत बनी, वह कोई नई चीज नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक शासन की विरासत के रूप में आई। इस बात का जो ढिंढोरा प्राच्यवादियो ने या साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने पीटा, कि ब्रिटिश शासन में भ्रष्टाचार नहीं था, वह एकदम से मिथ्या और झूठ को ही स्थापित करना था। एक फिल्म ‘मैसी साहब’ में भी औपनिवेशिक शासन का यही पाखंड दिखता है।
आधुनिकता और लोकतंत्र के भीतर की संस्कृति राजतंत्रात्मक बनी हुई थी, जिसमें पाखंड, षड्यंत्र, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद आदि के चिन्ह बने हुए थे। खासकर आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के उदय के बाद राजनीति  में दक्षिणपंथी  दलों की कार्य संस्कृति तो पूरी तरह से उसी पर खड़ी थी।
निराला ने इसीलिए एक ऐसा कथानक चुना है, जिसमें यह वास्तविकता साफ-साफ दिखती है। नवां प्रकरण इस लिहाज से महत्वपूर्ण है।
“राज्य की क्रिया का ढंग सब स्थानों में एक-सा है। सब जगह एक ही प्रकार के नारकीय नाटक, षड्यंत्र, अत्याचार किए जाते हैं।”
“सारे राज्य में उसके खास आदमियों का जाल फैला रहता है। वह और उसके कर्मचारी प्रायः दुष्ट चरित्र होते हैं, लोभी, निकम्मे, दगाबाज।” “किसी गांव में मुसलमानों की संख्या है। त्यौहार है। गोकुशी वर्जित है; पर बकरा महंगा पड़ा, गोकुशी की ताल हुई। आदमी से खबर मिली। एक रोज पहले रात को पचास  आदमी भेज दिए गये। कुछ मुखियों  को उन्होंने मार गिराया।”
“कोई बड़ा मालगुजार है। किसी कारण पटरी न बैठी, लड़ा गया। ताका जाने लगा। शाम को उसकी लड़की तालाब के लिए निकली। अंधेरे में पकड़ कर खेत में ले जायी गयी।… दूसरे-दूसरे आदमी दाढ़ी लगाकर या मूँछें मुड़वा कर चढ़ा दिये गये। ज्यादातर मुसलमानी चेहरे से। उन्होंने कुकर्म किया। उसके फोटो लिये गये।”
“किसी प्रजा ने खिलाफ गवाही दी। उसका घर सीर के नक्शे में आ जाता है।”
इस तरह के ढेरों विवरण अन्य प्रकरणों में भी हैं, जिसमें राजा, जागीरदार और औपनिवेशिक शासन के अधिकारी सभी शामिल हैं। अब इन उदाहरणों से अगर आज के भारत में चल रही शासक राजनीति या हिंदूवादी सरकार के क्रियाकलाप से अत्यधिक समानता मिलती है, तो इसकी वजह और बीज औपनिवेशिक शासन में ही निहित थे।
निराला ने ‘चोटी की पकड़’ में सत्ता-संस्कृत की वास्तविकता को उघाड़ कर रख दिया है। बेपर्द कर दिया है। और, यह दिखाया है कि ऐसी संस्कृति के बीच प्रभाकर जैसे युवकों का आंदोलन क्यों और कैसा नयापन लिये है।
“इसी समय देखा, जीने का दरवाजा खुला। एक युवक निकला, जीना बंद किया और घाट की तरफ चला। उसकी शांति में घबराहट नहीं, बड़ी दृढ़ता है। एक ऐसा संकल्प है, जो आप पूरा हो चुका है। जवानी कि वह चपलता नहीं, जो औरत को डिगा देती है, बल्कि वह जो साथ लेकर ऊपर चढ़ जाती है और जहां तक औरत की ताकत है, वहां तक चढ़ाकर अपने पैरों खड़ा करके, और चढ़ जाती है। चरित्र के पतन से बचकर और भले कामों की तरफ रुख फेरती है। मुन्ना को जान पड़ा, उसका हृदय खुल गया।… जैसे-जैसे प्रभाकर पास आता गया, मुन्ना के बुरे कृत्य भी, जो नीची तह के किये हुए थे- उसके ऊंचा उठने के कारण छूटे हुए काई की तरह सिमटकर पास आते गये। प्रभाकर की चाल के धक्के से निकलते गये। मुन्ना जैसे बदल गई प्रभाकर से मिलने के लिए। जो मुन्ना होगी उसके बुरे संस्कार छूटने लगे।”
मुन्ना प्रभाकर से उसका रास्ता पूछती है जिसका जवाब प्रभाकर यूं देता है-
“पहले तुम ही लोगों का काम है। यों फायदा नहीं, कि जमीदारी जमीदार की रहे: मगर यों है कि तुम अपने आदमियों के साथ रहो। अपना फायदा अपने हाथों उठाओ। इसमें दूसरे तुमको बहका सकते हैं। बहकाते होंगे। बाजी हाथ आने पर, हम खुद जीने की सूरत निकाल लेंगे।”
राह है गुलामी से मुक्ति। अंग्रेजी शासन से और जाति के दंश से भी या देसी अंग्रेजों से भी, वर्ण व्यवस्था से भी। प्रभाकर की राह नये मनुष्य के निर्माण की राह है, जो हर तरह की गुलामी के खिलाफ लड़ने से जुड़ी है।
कथा 1906 की है, लेकिन निराला लिख रहे हैं 1946 में। तब तक भगत सिंह और उनके साथियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन में बहुत कुछ जोड़ दिया था। प्रभाकर के चरित्र में उसी की ताब दी है निराला ने।
“आमों की राह से होते हुए गुलाब जामुन के बाग के भीतर से मुन्ना पालकी ले चली। कई दफे आते-जाते थक चुकी थी। उमंग थी। एक नई दुनिया पर पैर रखना है। लोगों को देखने और पहचानने की नई आंख मिल रही है।”

औपनिवेशिक शासन और सांप्रदायिक नीति

निराला ने ‘चोटी की पकड़’ में स्वदेशी आंदोलन के भीतर की सामाजिक भागीदारी को भी कथा में पर्याप्त स्थान दिया है। स्वदेशी आंदोलन से मुसलमान और दलित बाहर थे। निराला ने इसका विस्तार से वर्णन किया है। प्रसंगों के माध्यम से ही उन्होंने इस तथ्य को उभारा है, कि कैसे इसमें अंग्रेजों की सांप्रदायिक नीति और जमीदारों की वर्णवादी  नीति दोनों मुख्य वजह हैं।  अली और यूसुफ के माध्यम से निराला ने अशराफ वर्ग के मुसलमानों के भीतर की सोच को सामने रखा है।
“बंगालियों की बढ़ती से अली इस नतीजे पर आए कि बिना अंग्रेजी के चूल न बैठेगी। दूर तक पहुंच न थी। पुलिस के मुसलमान दारोगा को राज देने और उनके इशारे पर काम करने-कराने लगे। उन्हें एके की कुंजी मिली। जमीदारी हिंदुओं की, कारोबार हिंदुओं का, बड़ी-बड़ी नौकरियों पर हिंदू, वकील, बैरिस्टर, डॉक्टर, प्रोफेसर भी हिंदू। यही हिंदू अंग्रेजों से मिले और मुसलमानों से दगा की। सरकार ने बंगाल के दो हिस्से किये हैं। यह मुसलमानों के फायदे के लिये।… स्वदेशी का आंदोलन चल चुका था। बातें मुसलमान और इतर वर्ग के नेता फैला रहे थे  अंग्रेजी शासन के प्रारंभ से ऐसी तोड़ वाली बातों का महत्व है”
यह निराला हैं, जिन्हें औपनिवेशिक तोड़ वाली नीति को लेकर कोई संशय नहीं है। यह महज संयोग नहीं था, कि बंगाल-विभाजन के बाद के आंदोलन के समय ही मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक संगठन बने। निराला उस तरफ इशारा करते हैं।
निराला ने यह भी दिखाया है, कि बंगाली हिंदुओं की बढ़त उनके भीतर के समाज सुधार आंदोलनों और आधुनिक शिक्षा के प्रति उनकी ललक के चलते आयी थी। जिसे नकारात्मक ढंग से मुस्लिम और इतर वर्ग के नेता आम मुसलमानों को भावनात्मक रूप से भड़काने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। अली और युसूफ ऐसी ही सांप्रदायिक राजनीति के शिकार चरित्र हैं।
लेकिन, निराला ने बंगाल के समाज सुधार आंदोलनों की सामाजिक स्थिति की भी खबर ली है। तीसरे प्रकरण में वे लिखते हैं-
“स्वदेशी आंदोलन स्थाई स्वत्व के आधार पर चला था। उससे, बिना घर बार के, जमीदारों के आश्रम में रहने वाले, दलित, अधिकांश किसानों को फायदा न था। बंगाल के अब तक के निर्मित साहित्य में इनका कोई स्थान न था, उल्टे मुसलमानी प्रभुत्व से बदला चुकाने की नियत से लिखे गये बंकिम के साहित्य में इनकी मुखालिफत ही हुई थी। शूद्र कही जाने वाली अन्य दलित जातियों का आध्यात्मिक उन्नयन वैष्णव धर्म के द्वारा जैसा श्रीरामकृष्ण और विवेकानंद के द्वारा हुआ था, पर उनकी सामाजिक स्थिति में कोई प्रतिष्ठा न  हुई थी। न साहित्य में वे मर्यादित हो सके थे।”

यह निराला हैं, बेहद स्पष्ट। सत्ता, समय और समाज को लेकर।
कुल मिलाकर ‘चोटी की पकड़’ उपन्यास कई आयाम लिये है। जिसमें मुख्य है औपनिवेशिक नीति, देसी सत्ता-संस्कृति और नये मनुष्य का निर्माण वाया स्वदेशी आंदोलन। यह उपन्यास हिंदी अध्येताओं के लिए पुनर्पाठ  की मांग तो करता ही है,  साथ ही यह राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए भी मुख्य संदर्भ-स्रोत है। इसे निराला ने युग की कथा कहा है, और सचमुच में यह उपन्यास ऐसा ही है। और, आज की सत्ता-संस्कृति का चेहरा उसमें हर जगह दिखेगा। यह उपन्यास जरूर पढ़ा जाना चाहिए। कथावस्तु, कथानक, विचार-तत्व, वर्णन, चरित्र-योजना, भाषा हर लिहाज से यह हिन्दी के उत्तम कोटि के उपन्यासों में से एक है!

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