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कबूतरी देवी को लोगों के बीच ले जाने की शुरुआत

नैनीताल के निचले हिस्से तल्लीताल में बाजार से ऊपर चढ़ते हुए एक रास्ता खूब सारे हरे-भरे पेड़ों वाले कैम्पस तक ख़तम होता है. यह कैम्पस राजकीय कन्या इंटरमीडिएट कालेज का है. इस कैम्पस में पिछले इतवार 16 सितम्बर 2018 को नैनीताल के सक्रिय संस्कृतिकर्मी ज़हूर आलम अपनी टीम के साथ कालेज के सभागार को सिनेमा हाल में बदलने की कसरत में जुटे थे. हाल की खिड़कियों में पल्ले मौजूद थे इसलिए अँधेरा हासिल करने के लिए ज्यादा मशक्कत न करनी पड़ी. दुपहर 3.30 से शो शुरू होना था लेकिन प्रोजक्शन की सैटिंग और साउंड सिस्टम का लेवल वगैरह 2 बजे तक चेक किये जा चुके थे. अभी हम आराम फरमा ही रहे थे कि ज़हूर भाई को जनरेटर की याद आई. फिर जनरेटर के कनेक्शन और तेल की मात्रा भी चेक कर ली गई. अब सबकुछ कंट्रोल में था और कालेज का सभागार नए सिनेमा के हाल के रूप में पूरी तरह रूपांतरित हो चुका था.

दर्शकों का इंतज़ार: फ़ोटो-संजय जोशी

अब हम सब दर्शकों के इंतज़ार में थे. ख़ूबसूरत बैकड्राप वाले हमारे इस नए सिनेमाहाल के बाहर भी हम एक छोटा पोस्टर लगाकर इसे पूरी तरह व्यावसायिक बना चुके थे. मौसम के बेहद ख़ुशगवार होने के बावजूद उमा भट्ट और ज़हूर भाई दर्शकों की भागीदारी को लेकर चिंतित थे क्योंकि आज के ही दिन शहर में संगीत के एक बड़े आयोजन के तहत हमारी फ़िल्म की स्क्रीनिंग के समय ही प्रख्यात संतूर वादक भजन सोपोरी को प्रदर्शन करना था. दुपहर के 3.20 तक छिटपुट दर्शक ही जुटे थे. हमारी चिंतायें वाजिब थीं. क्योंकि बहुत समय लगाकर शुद्ध तौर पर क्राउड फंडिंग से बनी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ की यह पहली स्क्रीनिंग थी. मेरे लिए भजन सोपोरी के प्रोग्राम और इस फिल्म की स्क्रीनिंग का मसला संगीत की शास्त्रीय और लोक धारा के बीच चुनाव का भी था. मजे की बात यह रही कि दोनों ही प्रोग्रामों को भरपूर दर्शक/श्रोता मिले. अगले पांच ही मिनट में जब 30 -40 लोगों का रेला मोड़ से प्रवेश करता दिखा तो जान में जान आई. अगले दस मिनट में सभागार के सामने का मैदान 150 दर्शकों से भर गया था. सिर्फ़ दस मिनट की देरी से जब हमने अपनी स्क्रीनिंग की औपचारिक शुरुआत की तो 150 कुर्सियों की क्षमता वाले हाल में आयोजक लोग बाहर से और कुर्सियां लाते दिख रहे थे.

जब शहर के प्रसिद्ध रंगकर्मी और इस फ़िल्म के निर्माण से जुड़े ज़हूर आलम ने संचालन की शुरुआत की तो नए सिनेमा का नया हाल हाउसफुल होकर तकरीबन सवा दो सौ दर्शकों से ठसाठस भरा था. दर्शकों में नैनीताल के संगीतप्रेमियों के अलावा पड़ोसी शहर पिथौरागढ़, मासी, भीमताल, भुवाली, बिन्दुखत्ता, अल्मोड़ा, हल्द्वानी और रामनगर से भी लोग आये हुए थे. सबसे आगे की कतार में कबूतरी देवी की दोनों बेटियां मंजू और हिमंती भी अपने –अपने परिवारों के साथ बैठी हुईं थीं.
सबसे पहले शहर के जाने –माने इतिहासकार शेखर पाठक ने कबूतरी देवी की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी सांगीतिक यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए फ़िल्म माध्यम की सीमाओं और महत्व के बारे में दर्शकों को समझाने की कोशिश की. शेखर पाठक ने समारोह में बाहर से आयीं कबूतरी देवी की दोनों बेटियों का स्वागत किया और कबूतरी जी की परंपरा में गायकी की प्रैक्टिस करने वाली छोटी बेटी हिमंती को अब से हिमंती कबूतरी कहने की सबसे अपील की ताकि कबूतरी जी की गायकी की निरंतरता बनी रहे. इस बात का समर्थन उपस्थित दर्शक समूह ने तालियाँ बजाकर किया.
फ़िल्म के निर्देशक संजय मट्टू ने कहा कि इस फ़िल्म को बनाने का मकसद यह था कि वे यह समझ सकें कि ख़ुद कबूतरी जी ने अपने जीवन और यथार्थ को कैसे समझा. इसलिए इस फ़िल्म का मिज़ाज मानवजाति खोज का है. उन्होंने यह भी साझा किया कि बहुत से लोग उन्हें सिर्फ एक गायिका के बतौर जानते हैं और उनके जीवन अनुभवों से वंचित हैं इसलिए हमने दर्शकों को यह बताने की भी कोशिश की है. संजय ने फ़िल्म के निर्माण में फ़िल्म की निर्माता और सूत्रधार उमा भट्ट जी के सहयोग और मार्गनिर्देश के लिए जमकर सराहना की.

फ़िल्म के कार्यकारी निर्माता संजय जोशी ने इस फ़िल्म के निर्माण को सिनेमा आन्दोलन की उपलब्धि माना और इसकी निर्माण की प्रक्रिया और फ़िल्म के सरकारी निर्माण की तुलना करते हुए इसे लोकधारा को सहेजने के क्रम में नागरिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया. उन्होंने उमा भट्ट और कबूतरी देवी के रिश्ते को भुलि (छोटी बहन) और दीदी का रिश्ता बताया जिसमे भुलि ने अपनी पूरी जिम्मेवारी का निबाह करते इस महत्वपूर्ण दस्तावेजीकरण को संभव कर दिखाया.

ज़हूर आलम ने खुशी जताई कि उमा दी और तमाम मित्रो के सहयोग की वजह से यह फ़िल्म बन सकी है और यह अफ़सोस भी जताया कि गिरीश तिवाड़ी ‘ गिर्दा’ का ऐसा दस्तावेज़ हम न कर सके. उन्होंने ऐसे प्रयासों की पुनरावृत्ति पर जोर दिया और उपस्थित दर्शकों से इस काम को आगे बढ़ाने की अपील भी की.

रंगकर्मी ज़हूर आलम: फ़ोटो-संजय जोशी

फ़िल्म की डीवीडी के औपचारिक लोकार्पण उमा भट्ट, कबूतरी जी की बेटियों मंजू और हिमंती और निर्देशक संजय मट्टू के हाथों हुआ. लोकार्पण के तुरंत बाद फ़िल्म की स्क्रीनिंग शुरू हुई जिसने थोड़ी ही देर में कबूतरी जी की गमकती आवाज़ से पूरे सभागार को अपने आगोश में ले लिया. फ़िल्म में जब –जब कबूतरी जी अपनी जीवन यात्रा के मार्मिक प्रसंगों को बेहद तीखे तरह से प्रस्तुत कर रही थीं हाल में बैठे सभी दर्शकों की चुप्पी गहरे सिनेमैटिक प्रभाव की निर्मिती कर नए सिनेमा की उज्जवल शुरुआत का आश्वासन देते मालूम दे रहे थे. कबूतरी जी की बेटियों के लिए अपनी मां की जीवन यात्रा को बड़े परदे पर देखना आत्मगौरव के बोध के साथ एक नए तरह का चाक्षुष अनुभव था जिस वजह से बड़ी बेटी मंजू स्क्रीनिंग के बीच –बीच में उत्साहित होकर अपनी छोटी बहन हिमंती से कुछ –कुछ शेयर करती रही.

इतिहासकार शेखर पाठक: फ़ोटो-संजय जोशी

फ़िल्म में कबूतरी जी की जीवन यात्रा को उनकी गायकी की लाइव और अभिलेखीय रिकार्डिंग के जरिये पिरोया गया है. उनसे की गयी पूरी बातचीत पिथौरागढ़ जनपद के क्वीतड़ और सेरी कामदार गावों में सम्पन्न हुई है. दस्तावेज़ी सिनेमा की छायांकन की अपनी अलग शैली ने भी दर्शकों को विषय से नजदीकी बनाने में मदद की. फ़िल्म का निर्माण उत्तरा पत्रिका, नैनीताल फ़िल्म सोसाइटी, युगमंच और फ्लेमिंगो फ़िल्म्स के सम्मिलित प्रयास से संभव हुआ है.  फ़िल्म का छायांकन अपल ने और संपादन शिखा सेन ने किया है.

पांच बजते –बजते जब फ़िल्म के क्रेडिट आने शुरू हुए तो तालियों की क्रमश: तेज होती गड़गड़ाहट ने नए सिनेमा के सुनहरे भविष्य की प्रति आश्वस्त किया.

संजय मट्टू

इसके तुरंत बाद ही निर्देशक संजय मट्टू के साथ दर्शकों के सवाल जवाब का सिलसिला शुरू हुआ. शुरुआती हर सवाल, सवाल न होकर फ़िल्म टीम और निर्देशक को मिलने वाली बधाई और मुबारकबाद थी. फिर एक आध सवाल आने शुरू हुए. हल्द्वानी में मॉस कम्युनिकेशन के प्रोफ़ेसर भूपेन सिंह ने फ़िल्म में बातचीत की भाषा पर सवाल किया और निर्देशक से यह जानना चाहा कि अगर बातचीत उनकी कुमाउनी बोली में होती तब शायद और अच्छे से बातें निकल कर आतीं. जिसपर संजय मट्टू ने कहा कि आपका पॉइंट महत्वपूर्ण है लेकिन ऐसा मेरा अनुभव न था और मुझे लगता है कि यह एकदम सच बात है कि लोग अपनी भाषा में ज्यादा सहज और खुलकर बात कर पाते हैं लेकिन कभी –कभी यह जानना भी दिलचस्प होता है लोग दूसरी भाषा में अपने आपको कैसे व्यक्त करते हैं. कुछ दर्शकों ने निर्देशक से फ़िल्म में कबूतरी जी के गाये गानों की कमी की ओर इशारा किया जिसपर संजय ने अपनी निर्देशकीय प्राथमिकता को बताते हुए कहा कि मैं सिर्फ़ कबूतरी जी की गायकी पर फ़िल्म नहीं बनाना चाहता था बल्कि उनके जीवन को जानना भी मेरे लिए ख़ास था. जब एक के बाद एक कई दर्शकों ने फ़िल्म की सीमाओं का जिक्र किया तो शहर नैनीताल के दीवाने छायाकार और बैंकर प्रदीप पांडे ने कड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा कि सबसे पहले हमें इस टीम का आभारी होना चाहिए जिन्होंने बिना कुछ चाहे इस दस्तावेज़ को संभव बनाया.

फ़िल्म व आयोजन टीम: फ़ोटो-प्रदीप पांडेय

बातचीत के सेशन का सबसे अहम सवाल कुमाऊं विश्विद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर संजय घिल्डियाल ने उठाया. संजय घिल्डियाल ने पूछा कि फ़िल्म में हम देखते हैं कबूतरी जी जो कुछ बताना चाह रहीं है वो सामने दिख रहा है लेकिन क्या कुछ ऐसा भी था जो वह व्यक्त न कर सकीं मतलब कोई असुविधाजनक बात या अनुभव. इसपर संजय मट्टू ने संजय घिल्डियाल से इत्तेफ़ाक जताते हुए कहा कि वो इस बातचीत में जाति के प्रश्न को लाना चाहते थे लेकिन उन्हें कभी कोई ऐसा बिंदु न मिला जहाँ से वो यह सवाल शुरू कर सकते थे. इसलिए मुझे यह लगा कि कबूतरी जी अपनी जाति की पहचान से चुपचाप अपने को दूर रख रही हैं.

स्क्रीनिंग की अच्छी बात यह रही कि बातचीत के सेशन की समाप्ति की औपचारिक घोषणा होने के बावजूद फ़िल्म टीम से संवाद का सिलसिला बना रहा और लोगों ने फ़िल्म में रूचि लेते हुए 4400 रुपयों की डीवीडी भी खरीदी. फ़िल्म की एक डीवीडी का न्यूनतम मूल्य 200 रुपये रखा गया था.

स्क्रीनिंग की आयोजन टीम द्वारा बातचीत के दौरान खुशगवार मौसम में परोसे गए गर्म समोसे और गर्म चाय भी नए सिनेमा के मजे का इजाफ़ा कर रहे थे.

फ़ेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर हुए प्रचार की वजह से इस फ़िल्म की स्क्रीनिंग का सिलसिला उत्तराखंड के दूसरे शहरों में भी शुरू हो चुका है . 23 सितम्बर को अल्मोड़ा, 2 अक्टूबर को रुद्रपुर, 7 अक्टूबर को पिथौरागढ़ और 9 अक्टूबर को गांव क्वीतड़ में तय हुई स्क्रीनिगें नए सिनेमा के सुनहरे भविष्य की और ठोस इशारा करती हैं.

फ़िल्म को हासिल करने या इसकी स्क्रीनिंग करवाने के लिए इसके कार्यकारी निर्माता संजय जोशी से [email protected] या 9811577426 पर संपर्क किया जा सकता है.
संजय जोशी
18 सितम्बर 2018

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