स्वाद के बहाने

रानीवाड़ा के टुक्कड़

(‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी अपनी सिनेमा यात्राओं के सिलसिले में देश भर में घूमते रहते हैं । खाने-खिलाने के शौकीन संजय जोशी अपनी ऐसी यात्राओं में स्वाद के ठिकानों की तलाश करते रहते हैं । स्वाद के बहाने वे उन स्थानों की साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक नब्ज़ को भी पकड़ते हैं । समकालीन जनमत की संजय जोशी के इन यात्रा और स्वाद के अनुभवों को ‘स्वाद के बहाने’ नामक नियमित स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित करने की योजना है । प्रस्तुत है इसका पहला भाग -सं ।)


श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ के शिवपालगंज की याद है न ? दक्षिणी राजस्थान के जालोर जिले का क़स्बा रानीवाड़ा कुछ कुछ मामलों में शिवपालगंज की याद दिलाता है. दो रेल फाटकों के बीच लगभग डेढ़ किलोमीटर में फैले इस कसबे में एक सरकारी स्कूल, दो तीन निजी स्कूल, एक सरकारी अस्पताल और एक महाविद्यालय है. मेरे मेजबान इसी सरकारी महाविद्यालय के प्रिंसिपल है और राग दरबारी के लंगड़ की तरह अपने कालेज की जमीन को पाने के लिए कई महीनों से इस ऑफिस से उस ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं.

मालिकान

मैं लेकिन यहाँ जालोर के शिवपालगंज की चर्चा नहीं छेड़ रहा. मैं तो आपको हरि ॐ ढाबा के टुक्कड़ का स्वाद चखाना चाहता हूँ ताकि कभी अगर आप दिल्ली से अमदाबाद जाते हुए इस क़स्बे तक पहुंचे तो ढेरों गड्ढों वाली सड़क की थकान को बा साहब के गरमागरम टुक्कड़ों से उतार सकें. बा साहब वो दो डोकरें हैं जो हरि ॐ ढाबे के स्वादिष्ट टुक्कड़ों को तैयार करते हैं. डोकरे प्यार से बुजुर्गों को यहाँ कहते हैं. पहले डोकरे का नाम है जवारा राम मोपचा जी पुरोहित और दूसरे सेला राम.

असल में टुक्कड़ उस मोटी रोटी को कहते हैं जो हरि ॐ ढाबे में लकड़ी के कोयले में पकाई जाती है. विधि कुछ –कुछ दिल्ली की बेड़मी पूड़ियों की तरह होती है. पहले आधी पका कर अलग रख ली फिर ग्राहक आने तवे पर कपड़े से दबा-दबा कर फुलाई और खूब करारी की. लेकिन सिर्फ इतना करने से ही टुक्कड़ महिमा पूरी नहीं होती. टुक्कड़ तो तभी रानीवाड़ी टुक्कड़ बनेगा जब कोई एक डोकरा आपकी थाली में टुक्कड़ रख उसपर नपने से 50 ग्राम देशी घी डालेगा और फिर उस घी डली चौड़ाई में एक दूसरा टुक्कड़ डालकर घी को अच्छी तरह से हर कोने में लगाया जायेगा.

टुक्कड़ पर घी लगाना

अब थाली के एक कोने में पड़े ताज़ा हरी मिर्च के अचार और दो कटोरियों में रखी सब्जियों के साथ टुक्कड़ को खाने का सिलसिला शुरू होगा.

ढाबे की रसोई

मामूली टीन से घेरे इस ढाबे में जहां एक कोने पर पड़े कोयले के बोरे ही किसी सजावटी वस्तु जैसे दीखते हैं थाली में रखी दो कटोरियों में एक में अनिवार्य रूप से हर रोज खूब खटास वाली कढ़ी मिलेगी दूसरी कटोरी में कभी तुरई तो कभी लौकी या कभी मूंग की साबुत दाल मिल सकती है हालांकि इस दूसरी कटोरी का मिज़ाज हमेशा राजस्थानी ही रहेगा.

टुक्कड़

हमारे दोस्त प्रिंसिपल साहब का यह कहना था कि अगर डोकरे आप पर मेहरबान हैं तो 60 रुपये के बदले ही टुक्कड़ों पर पड़ने वाले घी की मात्र 50 से बढ़कर 75 या 90 ग्राम भी हो सकती है. शायद उनके प्रति बड़े हुए प्रेम का ही नतीजा था कि दो दिन लगातार टुक्कड़ों का लंच करने के कारण वे बार –बार पैखाने की तरफ जाते दिखे.
बहरहाल कभी रानीवाड़ा जायें तो टुक्कड़ों का मजा लेंना न भूलें. जाड़े का मौसम होगा तो गेहूं के अलावे बाजरा और मक्का के टुक्कड़ भी मिल सकता है. घबड़ायें बिलकुल मत डोकरे मेहरबान रहे तो दो के बाद अतिरिक्त टुक्कड़ लेने और कई बार कढ़ी डकारने के बावजूद भी रूपये साठ ही लिए जायेंगे.

घी का नपना और थाली

एक राज की बात और, हरि ॐ ढाबे को गूगल पर खोजने की कोशिश मत करियेगा क्योंकि इस नाम का कोई बोर्ड उनकी दुकान पर है ही नहीं. बस नाक खुली रखियेगा जिस दुकान से सबसे अच्छी खुशबू आ रही हो, जहाँ दुकान के एक कोने में कोयले का बोरा सजावटी सामान की तरह पसरा पड़ा हो और जिस दुकान में दो खूबसूरत अधेड़ प्रेम से टुक्कड़ फुलाने में जुटे समझ जाइए आप सही जगह पहुँच गए.

(संजय जोशी ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक हैं । सभी तस्वीरें संजय जोशी द्वारा ली गयी हैं ।)

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