समकालीन जनमत
स्मृति

गोरख की एक कहानी : एक सूत्र और

बाबू भोलाराय ने जमाने के रंग ढंग खूब देखे हैं । उनको पता रहता है कि दुनिया अब किधर जा रही है । उनको यह भी पता रहता है कि क्या करने से बेड़ा पार होगा और क्या करने से गर्क हो जायेगा ।

उनका दावा है कि उनके बाल धूप में नहीं सफ़ेद हुए हैं ।

इस बीच उनके सामने एक कठिनाई आई । वह आई और उनके सामने बैठ गई । उन्होने ठोकर लगाई । फिर भी टस से मस न हुई ।

कठिनाई भी अजब चीज है । भोलाबाबू जैसे लोग भी कभी कभी परेशान हो जाते हैं । ‘अरे भाई, अब तो भागो जरा मेरे बालों की सफ़ेदी का तो खयाल करो ।’ लेकिन कठिनाई जाती नहीं थी ।

दिमाग भिड़ाओ तो हर कठिनाई रफ़ा हो जाती है । भोलाबाबू ने दिमाग भिड़ाना शुरू किया ।

लेकिन इसके पहले कि कठिनाई कैसे दूर की जाय यह जानना जरूरी है कि वह है क्या ?

भोलाबाबू ने देखा कि यह कठिनाई अजब है । एक तो यह देश के पैमाने पर है । दूसरे सूतों से बुनी हुई है ।

20 सूत्र, फिर पांच सूत्र फिर जोड़ा गया तो 24 सूत्र निकले । यह नहीं कि हिसाब में कोई गलती हुई थी । नहीं, सारा सांख्यिकी विभाग यही गिनने में लगा हुआ था । और यह विभाग बड़ी से बड़ी संख्याएं गिनने का आदी हो चुका है । भले उनका रिश्ता कागज से अलग की किसी चीज से न हो ।

तो उसमें एक सूत गरीबी को घटा देने और धीरे धीरे दूर कर देने का है । गरीबी कम होगी, फिर और कम होगी और भाग जायेगी । एक जमाना था कि भोलाबाबू गरीबी को मानते ही नहीं थे । वह बताते थे कि यह तो मन की मैल है । मन साफ रखो, गरीबी साफ है । वह सफाईपसन्द आदमी हैं । इसलिए गरीबी को सफ करने की बात करते थे उसे भगाने की नहीं । वह कहते थे- एक करोड़पति को देखो । वह करोड़पति है । लेकिन वह और पैसा इकट्ठा करना चाहता है । वह अपने को गरीब समझता है । उसके मन में मैल है । वह गरीब है । मन को साफ करो । गरीबी साफ हो जायेगी । मन चंगा तो कठौती में गंगा । भोलाबाबू जोश में आ जाते और  उनको जो उनसे तर्क कर रहे होते ऐसी निगाह से देखते मानो भिनभिनाती हुई मक्खियां हों ।

खैर, एक उनकी पार्टी का हुक्म निकला कि गरीबी को भगाना है । यह एक मजबूत सूत है ।

भोलाबाबू को अपना बयान बदलने में देर नहीं लगी । उन्होने कहा- भाई गरीबी तो है ही । कितने लोग भूखों मर रहे हैं ।  कितनों को रोजी नहीं । कितने गरीबी की रेखा के नीचे हैं । गरीबी को कौन नहीं मानता ? मैं तो पहले से ही कह रहा हूं कि वह है । पहले कहता थाकि वह मन में है । लेकिन अब वह बाहर भी है । अगर कोई चीज बाहर नहीं होगी तो मन में आयेगी कहां से ? मन तो एक आईना है । जैसी चीज सामने आयेगी वैसा ही अक्स आईने में उभरेगा ।

तो गरीबी है । सूत के अनुसार उसे भगाना भी है । हालांकि भोलाबाबू जैसे गांधीवादी के लिए भगाना श्ब्द शोभा नहीं देता । उन्होने कहा कि भगाने में डण्डा लेना पड़ता है । वह चीज नहीं भागती तो डण्डा उठाना पड़ता है । फिर उसके पीछे दौड़ना पड़ता है । गांधी जी होते तो कहते हम गरीबी में सुखी हैं । उसको भगाने से हिंसा होगी । हिंसा भारी अपराध है । गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कभी हिंसा का नारा नहीं दिया था । क्यों ? इसलिए कि इससे वे भागेंगे और हम लोगों को हिंसक कहेंगे । वे भागें नहीं हमें हिंसक नहीं कहें इसीलिए तो गांधी जी हमें बन्दूक के सामने लेट जाने की सलाह देते थे । हमारी छतियां छलनी हो जाएं । हमारे ऊपर घोड़े सरपट दौड़ते चले जाएं । गांधी जी कहते थे हमें चूं भी नहीं करना चाहिए । बड़ा पाप होगा । गांधी जी कहते थे पापी होने से गुलाम होना अच्छा है । आखिर हम भगवान के गुलाम ही तो हैं ।

भोलाबाबू जोश में आते तो चौराहे पर पान चबाते हुए बोलते ही चले जाते । वह अक्सर कहते कि गांधी जी होते तो ऐसा नहीं होता वैसा नहीं होता । वह जुलूस देखते और कह पड़ते गांधी जी होते तो आजाद देश में जुलूस कौन निकाल पाता ?

लेकिन भोलाबाबू के सामने कठिनाई क्या थी ? क्या गरीबों को भगाना था ? इसके लिए तो वह पुलिस और फ़ौज को काफ़ी मानते थे । गरीब लोग दंगा फ़साद पर उतर आते हैं । मजदूर मिल में काम बन्द कर देते हैं । किसान भी उनके सुर में सुर मिलाते रहते हैं । सबके लिए सरकार उपाय कर रही है । हमारे चौराहे के पास पुलिस की नयी चौकी खुली है । डण्डा पड़ेगा तो गरीबी वैसे ही भाग जायेगी ।

उन्होने कहा कि नसें बन्द कराना बेहद जरूरी है । गरीब लोग इस मामले में सबसे गड़बड़ी पैदा करते हैं । अरे भाई, रोटी से खाने के लिए नमक नहीं और बच्चे पैदा किये जा रहे हो ? तो नसें बन्द कराओ । यह भी एक सूत है और देश भर में फैला हुआ है । बच्चे, बूढ़े, जवान- सभी का पवित्र कर्तव्य है कि नसबन्दी कराएं और देश की सेवा करें ।

तो, भोलाबाबू की कठिनाई कोई ऐसी वैसी चीज न थी । वह भारी थी । उनके नाक के नीचे बैठी थी और टस से मस न होती थी ।

भोलाबाबू ने कई बार कोशिश की थी उनका शानदार बंगला हो, मोटरकार हो और दरवाजे पर बजाने के किए एक घण्टी लगी हो । उन्होने सपना देखा था कि एक दिन घण्टी बजी थी और उन्होने नौकर से कहलवा भेजा था कह दो वह जनता के काम से बाहर गये हैं । वह नींद में खलल पसन्द न करते थे ।

तमाम कोशिशों के बावजूद भोलाबाबू एक दवाखाने में मुंशी का काम करते रह गये थे । वह रोज हजारों का हिसाब करते मगर उनकी मासिक तनख्वाह 150 से 200 पर जाकर रुक गयी थी । यह जरूर था कि तीज त्यौहार पर वह मालिक के घर निमन्त्रित होते रहते थे । कभी कभी उनकी सब्जी भी खरीदने जाते और उनका पान का ब्यौरा बन जाता ।

जब बीस सूत बने उसके बाद बाद 4 सूत और बने तो उनका दिमाग ठनका । सूतों ने एक कमाल का काम किया था । वे देश भर में फैले हुए थे और गरीबी जैसी कई चीजें भागती चली जा रही थीं । लोग जेलों में बन्द किये गये थे और कोई चूं तक नहीं कसता था । डण्डे पड़ते थे और जुलूस गायब थे । उन्होने सोचा था कि ये सूत तो जादुओं में जादू हैं । एक सूत्र लागू होता है और समस्या काफ़ूर हो जाती है ।

कठिनाई यह थी कि ये सूत्र कैसे गढ़े जाते हैं ? गढ़े तो जाते ही होंगे । गांधी जी होते तो ऐसे सूत गढ़ने के चर्खे भी बनाते । एक चर्खा मेरे पास भी होता । और दुनिया का रंग कुछ और होता ।

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