Wednesday, August 17, 2022
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अमेरिका में अहिंसक प्रतिरोध

2019 में सिटी लाइट्स बुक्स से माइकेल जी लांग के संपादन में ‘वी द रेजिस्टेन्स: डाकुमेंटिंग ए हिस्ट्री आफ़ नानवायलेन्ट प्रोटेस्ट इन द यूनाइटेड स्टेट्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना क्रिस हेजेस ने और पश्चलेख डोलोरेस हुएर्ता ने लिखा है । क्रिस का कहना है कि कारपोरेट शासन की नवउदारवाद, खुला बाजार और वैश्वीकरण जैसी विचारधाराओं की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गयी है । इनकी जगह लेने वाले विचार अभी अपरिपक्व हैं । दक्षिणपंथ ने ईसाई फ़ासीवाद, परदेशी से भय, नस्लभेद, व्यक्तिवाद और हिंसा की राह पकड़ ली है । वामपंथ खुद को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में है । दुनिया भर में कुलीन शासकों के विरोध का माहौल बना हुआ है । ऐसे में सवाल उठता है कि जनता की भावनाओं को कौन विचार और कौन से सपने व्यक्त करेंगे । जब क्रांति होती है तो उसे व्यवस्था के पोषक अप्रत्याशित और अचानक घटित की तरह पेश करते हैं । इसका कारण है कि क्रांतिकारी चेतना के निर्माण का काम समाज की मुख्यधारा से अदृश्य रहता है । जो लोग भी बुनियादी बदलाव लाना चाहते हैं उन्हें शासकों के विचारों की विश्वसनीयता को समाप्त करना होता है और अपने विचारों को समाज में स्थापित करना होता है । इन वैकल्पिक विचारों को शासक समुदाय अक्सर ही कपोल कल्पना कहकर खारिज कर देता है । इन्हीं विचारों को जब बहुसंख्यक आबादी अपना लेती है तो पुराना शासन मृतप्राय हो जाता है । विचारों की इसी ताकत की बदौलत तमाम कुकृत्य के बावजूद सरकार और पूंजीवाद बरकरार रहते हैं । पीड़ित लोग भी इन उत्पीड़क संस्थाओं का समर्थन करते हैं और उनमें यकीन बनाये रखते हैं । इसी तरह जब तक अधिकांश नागरिक विश्व पूंजीवाद के समर्थक विचारों में यकीन करते रहेंगे तब तक उनकी सेवा करने वाली सरकारी और निजी संस्थाओं पर कोई आंच नहीं आयेगी ।

विचारों के मोर्चे पर चलने वाला संघर्ष सतह के नीचे चलता है । क्रिस के मुताबिक इसी संघर्ष में कारपोरेट राज्य की पराजय हो रही है । अधिकाधिक अमेरिकी इसे महसूस करने लगे हैं कि सर्वाधिक बुनियादी नागरिक अधिकार भी क्षीण होते जा रहे हैं । हम सभी अब तक के मानव इतिहास की सबसे अधिक हस्तक्षेपी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र के शिकार हैं । देश के आधे लोग अनुद्योगीकरण या स्वचालन के चलते जीने लायक वेतन नहीं पा रहे हैं और गरीबी में धकेल दिये गये हैं । किसी भी सफल क्रांति के लिए तमाम लोग इस माहौल को सर्वाधिक अनुकूल बताते हैं । लगभग सभी सामाजिक तबकों में व्याप्त विक्षोभ, आकांक्षाओं के पूरा न होने से उपजी गहरी निराशा, मुट्ठी भर शासकों के विरुद्ध एकजुटता, शासकों की कार्यवाहियों को तर्क का जामा पहनाने से बौद्धिक चिंतकों का साफ इनकार, नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सरकार की अक्षमता, शासक समूह की इच्छाशक्ति में गिरावट और उनमें भगदड़, उनके सहयोगियों का कम होते जाना और आखिरकार आर्थिक संकट आदि को ही इसका लक्षण बताया जाता है । इन सबकी मौजूदगी के साथ ही एक अन्य तत्व भी क्रांति के लिए आवश्यक बताया जाता है । ऐसी असम्भव मागें जनता की ओर से उठने लगती हैं जिनके पूरा करने का मतलब स्थापित शक्ति संतुलन का ही खात्मा होगा ।

क्रिस हेजेस बीस सालों से विद्रोहों और क्रांतियों की पत्रकारिता करते रहे हैं । उनका मत जार्ज आर्वेल से मिलता जुलता है जिनका कहना था कि अन्यायी शासक धोखाधड़ी और बल के जरिये शासन चलाते हैं । जब धोखाधड़ी उजागर हो जाती है तो बलपूर्वक दमन ही उनका एकमात्र सहारा रह जाता है । यह युग ऐसे ही नंगे और निर्लज्ज दमन का युग है । आंतरिक सुरक्षा और निगरानी तंत्र से जुड़े लाखों नौकरशाहों को आतंकवाद रोकने से कोई मतलब नहीं, उन्हें जनता को काबू में रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है । सभी निरंकुश शासनों का अंत भीतरघात से होता है । जब सिपाही प्रदर्शनकारियों की गिरफ़्तारी या उन्हें दंडित करने से इनकार करते हैं तो शासन में दरार पड़ जाती है । शासक वर्ग के भीतर की यह दरार बहुत धीरे धीरे चौड़ी होती है और बहुधा उसका अंदाजा नहीं लगता क्योंकि अक्सर यह काम विस्फोटक तरीके से अंजाम नहीं दिया जाता ।

क्रांतियां ऐसी घटनाओं पर फूट पड़ती हैं जिन्हें अन्यथा सरकारी अन्याय की बेहद छोटी घटना माना जाता । असल में जब विक्षोभ का प्याला भर जाता है तो कोई छोटी सी चिंगारी भी आग भड़काने के लिए काफी होती है । इसके बारे में पहले से बताना असम्भव होता है । कोई नहीं जानता कि इसका स्वरूप क्या होगा लेकिन उसकी आहट सुनायी देने लगती है । नागरिकों की न्यूनतम शिकायत जब सरकार सुनना बंद कर दे, सरकारी हिंसा को रोकने में उसकी दिलचस्पी ही न रह जाये, बेरोजगारी हद को पार कर जाये, जनता कर्ज के बोझ से कराहने लगे तथा उम्मीद की कोई भी रोशनी न नजर आये तो विक्षोभ का विस्फोट होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है ।

मैक्स वेबर का कहना था कि अगर लोग असम्भव की मांग लगातार न करें तो सम्भव भी हासिल नहीं हो सकता । स्वप्नदर्शियों के ही चलते सामाजिक बदलाव आये हैं, व्यावहारिक नेताओं के करने से कुछ भी न हुआ होता । गुलामी का खात्मा न हुआ होता अगर कुछ साहसी लोगों ने उसके खात्मे की बात न की होती । गुलामी को सार्वजनिक बहस की दुनिया से ही राजनीतिक पार्टियों, चर्चों और अन्य संस्थाओं ने खामोशी की साजिश के जरिये बाहर कर रखा था । उसके खात्मे को असम्भव माना जाता था । लिंकन व्यावहारिक नेता थे इसलिए उन्होंने गुलामी को क्रमिक रूप से खत्म करने की योजना बनायी थी जिसके तहत गुलाम मालिकों को हरजाना देना था और स्वतंत्र गुलामों को अमेरिका के बाहर बसाने के लिए उपनिवेश स्थापित करने थे । जिन लोगों ने तत्काल गुलामी के खात्मे की मांग की उन्हें अव्यावहारिक और गैर जिम्मेदार माना गया लेकिन आखिरकार उनकी ही योजना के मुताबिक बिना किसी हरजाने के गुलामी का खात्मा हुआ और अश्वेतों को अमेरिकी नागरिकता हासिल हुई ।

शासकों के आदेशों के खुले उल्लंघन से पहले ही उनके विचारों से लोगों का भरोसा उठ जाता है । हेजेस के अनुसार खुले बाजार वाले पूंजीवाद और वैश्वीकरण के साथ यही हो रहा है । इसके बाद धीमी गति से जारी बदलाव को क्रांतिकारी विस्फोट बनते ज्यादा देर नहीं लगेगी । विचारों और सपनों से रहित आंदोलन से शासकों को कभी डर नहीं लगता । दिशाविहीन सामाजिक आलोड़न जल्दी ही हिंसा और अराजकता में पतित हो जाते हैं । उनमें आत्महंता वृत्ति होती है । लेखक दीर्घकालीन रणनीति में विश्वास करते हैं । उनका मानना है कि इसी तरह बुनियादी सामाजिक और राजनीतिक बदलाव आते हैं और कायम रहते हैं ।

सामान्य तौर पर हेजेस ने कारगर लोकतांत्रिक माहौल में सुधारों का पक्ष लिया है और माना है कि सामाजिक संस्थाओं को इस बात की अनुमति देनी चाहिए कि सत्ता पर काबिज ताकतों को नागरिक खारिज कर सकें । इन संस्थाओं को कारपोरेट शाक्ति के अधीन होने की जगह आजाद होना चाहिए । ऐसी व्यवस्था के अभाव में विद्रोह ही एकमात्र रास्ता बच जाता है । जब शासक समूहों की वैधता के तर्क समाप्त हो जाते हैं तो वे बलपूर्वक दमन करने लगते हैं । सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने का यही अंतिम तरीका उन्हें आता है । जब कोई लोकप्रिय आंदोलन नौकरशाहों और पुलिस के अधिकारियों को वैचारिक रूप से निरस्त्र कर देता है तो बदलाव सम्भव हो जाता है लेकिन अगर शासक विक्षोभ का दमन करने के लिए हिंसक दमन का तरीका लम्बे समय तक अपनाती है तो फिर क्रांतिकारी हिंसा शुरू हो जाती है जिसे सरकारें आतंकवाद का नाम देती हैं । ऐसी क्रांतियों के नेता शासकों की तरह ही हिंसक क्रूरता का आचरण करने लगते हैं । यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है । कोई भी आंदोलनकारी कार्यकर्ता देश की जनता को सरकारी हिंसा के साथ विपक्षी हिंसा से भी बचाना चाहता है । कारपोरेट सरकारी समूह के पास विकराल आंतरिक सुरक्षा तंत्र और सैन्यीकृत पुलिस बल होने से इसकी गारंटी मुश्किल तो है लेकिन इसकी कोशिश जरूर करनी चाहिए । कारण कि अगर प्रतिरोधी ताकतें भी हिंसा की भाषा बोलने लगें तो सत्ता की निर्दयता का मुकाबला करना असम्भव हो जाता है । सत्ता द्वारा विपक्ष की हिंसा का इस्तेमाल उसे समाज से अलगाव में डालकर कुचल देने के लिए किया जाता है ।

वर्तमान माहौल का जिक्र करते हुए हेजेस बताते हैं कि कारपोरेट सत्ता को टिकाये रखने वाले विचार समाप्त हो चुके हैं । इससे पैदा हुए शून्य को समाजवाद के सपने से भरना होगा । साथ ही अधिकाधिक जन समुदाय को अपने पक्ष में भी खड़ा करना होगा । इस काम में विफल होने पर धार्मिक फ़ासीवाद के उभार को रोकना कठिन साबित होगा ।

 

गोपाल प्रधान
प्रो. गोपाल  प्रधान अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्राध्यापक हैं. उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद , समसामयिक मुद्दों पर लेखन और उनका संपादन किया है
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