समकालीन जनमत
नज़रिया

देर आए दुरुस्त आए , फिर भी कुछ सवाल हैं

फ़रज़ाना महदी

ख़ान अहमद फ़ारूक़ साहब की एक फ़ेसबुक पोस्ट से पता चला कि अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू हिंद के जनरल सेक्रेटरी डॉ. अतहर फ़ारूक़ी आजकल राही मासूम रज़ा को उर्दू का अदीब साबित करने की एक ज़ोरदार मुहिम में लगे हुए हैं। इस मुहिम के पीछे उनके पास कई ठोस दलीलें और सुबूत हैं। राही के उपन्यास कई वजहों से उर्दू में प्रकाशित नहीं हो सके और पहले हिंदी में सामने आए। राही की ज़बान, उनकी रचनात्मक दुनिया और उनके साहित्यिक सरोकारों को देखते हुए उन्हें सिर्फ़ हिंदी का लेखक मान लेना यक़ीनन उनके साथ नाइंसाफ़ी होगी। इस सिलसिले में डॉ. अतहर फ़ारूक़ी ने लगातार लिखा है और उर्दू की दुनिया ने भी, कमोबेश, इस बात को मान लिया है। यह ख़ुशी की बात है और इसके लिए अतहर फ़ारूक़ी साहब यक़ीनन याद किए जाएँगे। राही की उर्दू अदबी पहचान को सामने लाने की इस कोशिश को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने राही के सौ साला जश्न का ऐलान किया और अगस्त 2026 से उसके कार्यक्रमों की शुरुआत भी कर दी। 2 अगस्त को उर्दू रोज़नामा ‘इंक़लाब’ में राही पर पूरे सफ़हे का उनका लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में उन्होंने हिंदी कविता के बारे में जो टिप्पणी की, वह गंभीर आपत्ति का विषय है।

उन्होंने लिखा कि हिंदी वालों ने राही को अपना कहा, मगर उनकी शायरी को इसलिए अछूत समझा कि आधुनिक हिंदी की शायरी आज भी उर्दू शायरी का पासंग नहीं है। आगे वे आधुनिक हिंदी अदब के स्तर पर सवाल उठाते हुए लगभग यह नतीजा देते हैं कि हिंदी में जो कुछ लिखा जा रहा है, वह कुछ और हो सकता है, लेकिन उसका शायरी से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक़ नहीं। यही वह जगह है जहाँ राही को उर्दू का अदीब साबित करने की एक अच्छी कोशिश अचानक हिंदी कविता के प्रति एक बेहद संकीर्ण और अभिजनवादी नज़रिए में बदल जाती है। सबसे पहले यह साफ़ कर देना चाहिए कि राही मासूम रज़ा को उर्दू का अदीब साबित करने के लिए हिंदी कविता को कमतर साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है। राही की साहित्यिक पहचान को स्थापित करने का सबसे मज़बूत रास्ता उनकी अपनी रचनात्मकता, उनकी ज़बान, उनकी काव्य-संवेदना और हिंदी-उर्दू की साझा हिंदुस्तानी संस्कृति में उनकी भूमिका को सामने लाना है। किसी लेखक की साहित्यिक पहचान साबित करने के लिए दूसरी भाषा के पूरे साहित्य को कविता मानने से इनकार करना न सिर्फ़ ग़ैर-ज़रूरी है, बल्कि उस लेखक की अपनी रचनात्मक दुनिया के साथ भी इंसाफ़ नहीं करता।

फ़ारूक़ी साहब के बयान की पहली बुनियादी दिक्कत यह है कि हिंदी कविता और उर्दू शायरी को एक ही तराज़ू पर रखकर यह फ़ैसला सुना दिया गया है कि कौन किसका पासंग है। यह साहित्यिक आलोचना की बहुत सीमित कसौटी है। हिंदी और उर्दू की आधुनिक काव्य-परंपराएँ एक-दूसरे से लगातार संवाद करती रही हैं, लेकिन दोनों का विकास एक ही ढंग से नहीं हुआ। किसी भाषा की कविता का मूल्य दूसरी भाषा की कविता से उसकी समानता या असमानता के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। उर्दू शायरी भी कोई एक जैसी और बिना बदली हुई रावयत नहीं रही है। ग़ज़ल, नज़्म, मर्सिया, रुबाई, क़सीदा और दूसरी काव्य-विधाओं की अपनी अलग परंपराएँ रही हैं। आधुनिक दौर में नज़्म ने अपने पुराने ढाँचों से बाहर निकलकर नए विषयों और नई भाषा को अपनाया। मीराजी, फ़ैज़, मख़दूम, मजाज़, जोश, फ़िराक़, साहिर, मजरूह, कैफ़ी और सरदार जाफ़री जैसे शायरों ने उर्दू शायरी को अपने वक्त की सामाजी और सियासी बेचैनियों से जोड़ा।

इसलिए आधुनिक उर्दू शायरी को किसी स्थिर मापदंड के रूप में पेश करना उसकी अपनी तारीख़ को भी नज़रअंदाज़ करना है। इसके बरक्स आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास भी बेहद समृद्ध और विविध है। निराला ने कविता की भाषा और बनावट को नए ढंग से बरता। नागार्जुन ने किसान, मज़दूर, भूख और सत्ता को कविता के केंद्र में लाया। त्रिलोचन ने बोलचाल और लोक-संवेदना को कविता की सम्मानित भाषा बनाया। मुक्तिबोध ने मध्यवर्गीय चेतना, सामाजिक अंतर्विरोध, वर्गीय ढाँचे और सियासी नैतिकता के सवालों को कविता का मौज़ू बनाया। शमशेर बहादुर सिंह की कविता तो खुद हिंदी और उर्दू के बीच खड़ी साझा काव्य-संवेदना का एक असाधारण उदाहरण है। रघुवीर सहाय ने सत्ता, लोकतंत्र और नागरिक जीवन की विडंबनाओं को अभिव्यक्ति दी। धूमिल ने भाषा को सामाजिक और राजनीतिक असंतोष की ज़मीन बनाया। बाद की हिंदी कविता में भी जाति, स्त्री, श्रम, विस्थापन, सांप्रदायिकता और हाशिए के जीवन के कई तजुर्बे कविता का हिस्सा बने। ऐसे में यह कहना कि आधुनिक हिंदी कविता का शायरी से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक़ नहीं है, हिंदी कविता के पूरे आधुनिक इतिहास को नज़रअंदाज़ करना है। कविता सिर्फ़ क़ाफ़िया, रदीफ़, बहर और पारंपरिक छंद की पाबंदियों में ही मुमकिन नहीं होती। मुक्तछंद कविता के ख़त्म हो जाने का प्रमाण नहीं है; वह कविता की नई शक्लो और नई संवेदनाओं की तलाश का नतीजा है। दुनिया की आधुनिक कविता का बड़ा हिस्सा इसी बदलाव से गुज़रा है। अगर कविता के लिए रवायती शायरी का ढाँचा ही ज़रूरी मापदंड बना दिया जाए तो आधुनिक विश्व-कविता का बहुत बड़ा हिस्सा कविता के दायरे से बाहर हो जाएगा।

हिंदी में राही की शायरी को लेकर भी यह दावा सही नहीं है कि उसे अछूत समझा गया। हिंदी साहित्यिक दुनिया ने राही को मुख्यतः कथाकार के रूप में ज़रूर प्रतिष्ठित किया, लेकिन उनकी नज़्मों और ग़ज़लों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया। हिंदी में उनका कविता-संग्रह ‘मैं एक फेरीवाला’ मौजूद है। उनके ‘अठारह सौ सत्तावन’ को हिंदी-उर्दू महाकाव्य की शक्ल में भी दर्ज किया गया है। हिंदी के अदबी मंचों और डिजिटल अदबी स्रोतों पर उनकी नज़्में और ग़ज़लें मौजूद हैं। डॉ. आदित्य प्रचण्डिया ने ‘मैं एक फेरीवाला’ के संदर्भ में एक स्वतंत्र आलोचनात्मक लेख लिखा, जिसमें राही की शायरी को आधुनिक हिंदी कविता के संदर्भ में रखकर पढ़ा गया है। हाँ, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि हिंदी में राही की शायरी पर उतना व्यवस्थित आलोचनात्मक काम नहीं हुआ जितना उनके उपन्यासों पर हुआ। यह एक गंभीर अदबी सवाल है। लेकिन हिंदी आलोचना ने राही की शायरी पर पर्याप्त काम नहीं किया और हिंदी वालों ने राही की शायरी को अछूत मान लिया इन दोनों बातों में बहुत बड़ा फ़र्क़ है। पहली बात पर बहस और शोध की गुंजाइश है, दूसरी बात एक बहुत बड़ा और लगभग निर्णायक आरोप है, जिसके लिए कहीं ज़्यादा ठोस प्रमाण चाहिए।

दरअसल, राही की काव्यात्मक पहचान को हिंदी-उर्दू की सीमा में रखकर देखना ही शायद सबसे बड़ी भूल है। राही की ताक़त इसी सीमा को पार करने में थी। उनके यहाँ गाँव है, गंगा-जमुनी तहज़ीब है, हिंदू-मुस्लिम रिश्ते हैं, मुसलमान समाज के भीतर के अंतर्विरोध हैं, जाति और वर्ग हैं, प्रेम और सियासत हैं और आधुनिक भारतीय जीवन की बेचैनियाँ हैं। उन्हें सिर्फ़ उर्दू का अदीब साबित करने के लिए हिंदी को साहित्यिक रूप से हीन ठहराना राही की अपनी रचनात्मकता को छोटा करना है।

डॉ. फ़ारूक़ी आज राही को उर्दू का अदीब साबित करने का जो काम कर रहे हैं, उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। देर आए, दुरुस्त आए। लेकिन इस खुशी के साथ यह आत्मालोचना भी होनी चाहिए कि अगर राही आज उर्दू के अदीब हैं तो इतने लंबे वक़्त तक उन्हें उर्दू की अदबी दुनिया में वह जगह क्यों नहीं मिली जिसके वे हक़दार थे? राही को उर्दू से दूर रखने का नुकसान आखिर किसे हुआ हिंदी को या उर्दू को? मेरे ख्याल से इसका सबसे बड़ा नुकसान उर्दू का ही हुआ। राही हिंदी में लिखते रहे, हिंदी के पाठकों तक पहुँचे, अपने उपन्यासों और दूसरी रचनाओं के ज़रिये भारतीय समाज की जटिलताओं को सामने लाते रहे। इससे राही की अदबी हैसियत कम नहीं हुई। लेकिन उर्दू ने अपनी ही अदबी विरासत के एक महत्वपूर्ण हिस्से को लंबे वक़्त तक अपने से दूर रखा। किसी लेखक को ज़बान की सीमा से बाहर कर देने से लेखक ख़त्म नहीं होता, ज़बान अपनी ही एक संभावना से महरूम हो जाती है। इसलिए आज राही को उर्दू में वापस लाने का जश्न मनाते हुए यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि हमने उन्हें इतने लंबे वक़्त तक अपना मानने से इनकार क्यों किया था ? क्या इसके पीछे सिर्फ़ यह वजह थी कि उनके उपन्यास पहले हिंदी में प्रकाशित हुए? या साहित्यिक संस्थाओं, आलोचना की परंपराओं, भाषाई राजनीति और सामाजी पहचान से जुड़े दूसरे पूर्वाग्रह भी इसमें काम कर रहे थे ? यहाँ राही की सामाजी और नज़रयती पृष्ठभूमि को भी जाँच के सवाल की शक्ल में सामने रखना चाहिए। राही शिया सामाजी पृष्ठभूमि से आते थे और उनके सियासी-नज़रयती सफ़र में कम्युनिस्ट विचारधारा का महत्वपूर्ण स्थान था। इसलिए यह पूछना ग़लत नहीं है कि क्या राही को उर्दू की मुख्यधारा में लंबे वक़्त तक पर्याप्त जगह न मिलने के पीछे सिर्फ़ अदबी कारण थे, या उनकी मज़हबी-सामाजी पहचान और नज़रयाती रुझान का भी कोई असर था? क्या इस पहलू की कभी व्यवस्थित पड़ताल हुई है? याद रखिए, अतिअल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले लोगों को अक्सर दोहरे हाशियाकरण का शिकार होना पड़ता है। यही सच्चाई जाति और लैंगिक पहचान पर भी लागू होती है। पिछड़ा समाज दलित के साथ अक्सर वही व्यवहार करता है जैसा सवर्ण उसके साथ करता है।

लेकिन फिर भी बिना ठोस प्रमाण के यह कहना ठीक नहीं होगा कि राही को सिर्फ़ शिया होने या कम्युनिस्ट होने की वजह से उर्दू ने बाहर रखा। पर इस संभावना की जाँच न करना भी सही नहीं है। यह सवाल सिर्फ़ राही का नहीं है। हमें देखना होगा कि उर्दू के अदबी इदारों ने अलग-अलग वक़्त में किन अदीबों को केंद्र में रखा, किन्हें हाशिए पर छोड़ा और किन लेखकों की पहचान को उनकी रचनात्मकता के बजाय उनकी समाजी या नज़रयाती पहचान के आधार पर पढ़ा। अदब किसी बिरादरी, मस्लक या विचारधारात्मक खेमे की जागीर नहीं होता। अदीब से सहमत होना अदबी मूल्यांकन की शर्त नहीं हो सकता। अगर कोई अदीब हमारे नज़रिये से अलग है तो उससे बहस की जा सकती है, उसकी आलोचना की जा सकती है, लेकिन उसे अदब की दुनिया से बाहर नहीं किया जा सकता। अदब की असली ताक़त इसी में है कि वह अपने से अलग तजुर्बे और नज़रिये को समझने की सलाहियत पैदा करता है। यही बात अतहर फ़ारूक़ी साहब की हिंदी कविता संबंधी टिप्पणी पर भी लागू होती है। यहाँ उनके बयान में एक तरह का अदबी अभिजनवाद दिखाई देता है, एक ऐसा नज़रिया जिसमें अपने अदबी मापदंड को सार्वभौमिक मापदंड मान लिया जाता है और जो उस मापदंड से बाहर है, उसे कमतर समझ लिया जाता है। यह नज़रिया कभी ज़बान के नाम पर, कभी मज़हब के नाम पर, कभी मस्लक के नाम पर और कभी साहित्यिक शैली के नाम पर काम करती है। इसके भीतर ये नज़रिया लगातार छिपा रहता है कि हम श्रेष्ठ हैं, हमारा मापदंड सही है और जो हमारे जैसा नहीं है, वह कमतर है।

इसी संदर्भ में आधुनिक उर्दू शायरी की अपनी स्थिति पर भी बात करना ज़रूरी है। हिंदी कविता को उर्दू शायरी के पासंग से तौलने से पहले यह देखना होगा कि आज की भारतीय उर्दू शायरी ख़ुद अपने समाज से कितनी जुड़ी हुई है। 1947 के आसपास और उसके बाद फ़ैज़, मख़दूम, मजाज़, साहिर, मजरूह, कैफ़ी, सरदार जाफ़री और उनके समकालीनों की शायरी ने जो सामाजी और अवामी ऊर्जा पैदा की थी, उसकी मिसाल आज कितनी दिखाई देती है? उन शायरों की शायरी अदबी हलकों तक सीमित नहीं रही थी। उनके शेर आम लोगों की ज़बान पर थे /हैं । इसकी वजह सिर्फ़ उनकी काव्य-कला नहीं थी, तरक़्क़ीपसंद आंदोलन ने शायरी को आज़ादी, बराबरी, मेहनत, मोहब्बत, शोषण, साम्राजियत, फ़ासीवाद और आम आदमी की ज़िन्दगी के सवालों से जोड़ा था। शायरी ने अपने वक़्त के संघर्षों के भीतर अपनी जगह बनाई थी। इसके बाद जदीदियत का रुझान आया और उनमें भी महत्वपूर्ण काव्य-सृजन हुआ। जदीदियत को पूरी तरह ख़ारिज करना सही नहीं होगा। लेकिन दिक्कत तब पैदा होती है जब जदीदियत सामाजी हक़ीक़त से कटकर सिर्फ़ एक साहित्यिक अभिजन की आत्मगत संवेदना और ज़बान का खेल बन जाती है। जब शायरी अपने वक़्त के इंसान, समाज और सियासी संकटों से संवाद खो देती है, तो उसकी सामाजी ऊर्जा कम हो सकती है।

आज भारतीय उर्दू शायरी के सामने यह सवाल गंभीरता से मौजूद है कि वह अपने तरक्कीपसंद अतीत से क्या हासिल करेगी और अपने मौजूदा सवालों से कैसे जुड़ेगी। कितने समकालीन शायर हैं (भारत के ) जिनकी शायरी उर्दू के अदबी दायरों से बाहर निकलकर दूसरी भारतीय ज़बानों के पाठकों तक पहुँचती है? कितने शायर आज जाति, वर्ग, सांप्रदायिकता, स्त्री-अनुभव, बेरोज़गारी, विस्थापन, श्रम, लोकतंत्र, नई तकनीक और बदलती हुए सामाजी ज़िन्दगी को अपनी केंद्रीय चिंता बनाते हैं? ऐसा नहीं है कि उर्दू में इन सब सवालों पर लिखा नहीं जा रहा है, पर सवाल ये है कि कितने शायर लिख रहे हैं और उन्हें उर्दू शायरी की मुख्यधारा में कितनी जगह दी जा रही है। ये भी देखना चाहिए कि शायरी अपने वक़्त के इंसान और समाज को किस गहराई से व्यक्त कर रही है। अगर वह अपनी रवायत को सिर्फ़ शैलीगत दोहराव में बदल देती है और ग़ज़ल की वही पुरानी शब्दावली गुल, बुलबुल, रुख़्सार, ज़ुल्फ़ और पुराने इश्क़िया मुहावरों को लगातार दोहराती रहती है, तो यह रवायत की रक्षा नहीं, रवायत की जड़ता है। फ़ैज़ ने ग़ज़ल और नज़्म की रवायत को अपने वक़्त के सामाजी संघर्षों से जोड़ा। कैफ़ी ने मोहब्बत और सामाजी न्याय को एक साथ रखा। मजरूह और साहिर ने लोकप्रिय संस्कृति तक पहुँचकर शायरी की सामाजी पहुँच का विस्तार किया। यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लोगों की ज़बान पर है। इसीलिए हिंदी कविता की आलोचना करने से पहले उर्दू शायरी को भी अपने भीतर झाँकना होगा। किसी दूसरी ज़बान को नीचा दिखाकर अपनी ज़बान का गौरव स्थापित नहीं किया जा सकता। अगर हिंदी कविता में कमज़ोर कविताएँ हैं तो उर्दू शायरी में भी हैं; अगर हिंदी में महान कवि हैं तो उर्दू में भी हैं। साहित्य का मूल्यांकन ज़बान की श्रेष्ठता के आधार पर नहीं, रचना की कलात्मकता, नज़रयाती गहराई और सामाजी ऊर्जा के आधार पर होना चाहिए।

राही मासूम रज़ा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है। वे हिंदी और उर्दू के बीच खड़ी उस साझा दुनिया के अदीब हैं जिसे दोनों ज़बानों की संकीर्ण सीमाएँ पूरी तरह अपने भीतर समेट नहीं सकतीं। इसलिए राही को उर्दू में वापस लाना स्वागत योग्य है, लेकिन उनकी वापसी को हिंदी के ख़िलाफ़ एक सांस्कृतिक विजय की तरह पेश करना राही के साथ इंसाफ़ नहीं होगा। बल्कि राही के सौ साला जश्न की सबसे कामयाब शक्ल यह होगी कि उर्दू अदब अपनी इस देर से हुई पहचान के साथ आत्मालोचना भी करे। वह पूछे कि राही को इतने लंबे वक़्त तक दूर रखने वाली मानसिकताएँ क्या थीं? क्या ज़बान, मस्लक, वर्ग, नज़रिया और अदबी अभिजनवाद के तत्व उसमें काम कर रहे थे ? और अगर ऐसा था तो क्या राही के बहाने उर्दू अपनी अदबी तहज़ीब को ज़्यादा लोकतांत्रिक और ज़्यादा बहुलतावादी बनाने की कोशिश कर सकती है? राही की उर्दू में वापसी देर से हुई है, लेकिन हुई है और इसका स्वागत होना चाहिए। क्योंकि राही को देर से पहचानने में शायद हिंदी का थोड़ा नुकसान हुआ हो, लेकिन राही को दूर रखने में उर्दू ने अपने अदब का एक हिस्सा खोया है। और किसी भी ज़बान के लिए इससे बड़ा नुकसान और क्या हो सकता है कि वह अपने ही अदीब को पहचानने में इतनी देर कर दे।

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