समकालीन जनमत
पुस्तक

उमर ख़ालिद: ज़मीर का क़ैदी

[यह शुरुआती वक्तव्य क्लिफ्टन डी’रोज़ारियो ने 28 अप्रैल 2026 को बेंगलुरु में आयोजित ‘उमर खालिद एंड हिज़ वर्ल्ड: एन एंथोलॉजी’ किताब पर हुई परिचर्चा में दिया था. इस कार्यक्रम का आयोजन आइलाज (AILAJ), पीयूसीएल-कर्नाटक (PUCL-K) और बहुत्व कर्नाटक ने संयुक्त रूप से किया था.] 

 

लोकतंत्र की असली कसौटी संसद की शान-ओ-शौकत या चुनावों के दिखावे से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह असहमति रखने वालों के साथ कैसा व्यवहार करता है. यही वजह है कि राजनीतिक क़ैदी को केवल एक कानूनी श्रेणी के रूप में नहीं, बल्कि राज्य के सामने रखे गए एक आईने के रूप में समझना चाहिए. उमर ख़ालिद की ज़िंदगी और उनकी क़ैद की कहानी के ज़रिए यह किताब हमें दिखाती है कि भारतीय राज्य अपने आलोचकों और असहमति की आवाज़ों के साथ कैसा सलूक करता है — चाहे वह कश्मीर के खुर्रम परवेज़ हों, छत्तीसगढ़ की सुनीता पोटम हों, भीमा-कोरेगांव मामले के बीके-16 के सुरेंद्र गाडलिंग हों, या फिर नोएडा मज़दूर आंदोलन के दौरान हाल में गिरफ़्तार किए गए मज़दूर और जनपक्षधर कार्यकर्ता.

जैसा कि रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक में अपने लेख में लिखा है:

“मुझे यह ज़रूर कहना चाहिए कि उमर उन अनेक ईमानदार, सिद्धांतनिष्ठ और नेक लोगों में से एक हैं, जो अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर पुलिस द्वारा जल्दबाज़ी में लगाए गए संदिग्ध आरोपों के तहत जेलों में बंद हैं. इनमें से कुछ विद्वान और शोधकर्ता हैं. दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समाज के एक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने अपने जीवन और काम के ज़रिए हमेशा अहिंसा और भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्यों के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दिखाई है. बहुलतावाद और लोकतंत्र के प्रति यही प्रतिबद्धता, और शायद इसके अलावा कुछ नहीं, उन्हें मौजूदा हुकूमत की तानाशाही और बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों की आँखों की किरकिरी बना देती है.”

खालिद ने खुद कहा था, “वे हमसे डरते हैं,” उन्होंने सरकार का ज़िक्र करते हुए कहा था। “वे हमारे संघर्षों से डरते हैं और वे हमसे इसलिए डरते हैं क्योंकि हम सोचते हैं।”

प्रसिद्ध उपन्यासकार मिलान कुंदेरा ने एक बार कहा था कि सत्ता के ख़िलाफ़ लोगों का संघर्ष दरअसल याददाश्त और भुला दिए जाने के बीच का संघर्ष होता है. राजनीतिक क़ैदियों के मामले में यह बात बेहद गहरी सच्चाई के साथ सामने आती है. जेल केवल लोगों को बंद रखने की संस्था नहीं रह जाती, बल्कि वह समाज की सामूहिक अंतरात्मा को मिटाने का औज़ार बन जाती है. राज्य केवल व्यक्तियों को क़ैद नहीं करना चाहता, बल्कि राजनीतिक संघर्षों की वैधता को भी ख़त्म करना चाहता है. सच बोलने वालों को सलाखों के पीछे डालकर वह असहमति और प्रतिरोध को हमारी सामूहिक याददाश्त से मिटा देना चाहता है. जैसा कि उमर ख़ालिद ने 2016 में जेएनयू में कहा था: “वे हमसे डरते हैं. वे हमारे संघर्षों से डरते हैं, और वे हमसे इसलिए डरते हैं क्योंकि हम सोचते हैं.”

आधुनिक इतिहास में यह सिलसिला बार-बार दिखाई देता है. उपनिवेशवादी आयरलैंड से लेकर रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका तक, लैटिन अमेरिका की तानाशाहियों से लेकर कब्ज़े में जकड़े फ़िलिस्तीन तक, जेलें हमेशा वह जगह रही हैं जहाँ राज्यसत्ता का सबसे क्रूर चेहरा बेनक़ाब होता है. जेल वह जगह भी है जहाँ लोकतांत्रिक आज़ादियों के राज्य के दावों और ज़मीन पर मौजूद बेआज़ादी की हक़ीक़त के बीच का विरोधाभास साफ़ दिखाई देता है.

रंगभेद-विरोधी संघर्ष के महान नेता नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था:

“कहा जाता है कि किसी देश को सचमुच जानना हो, तो उसकी जेलों के भीतर झाँकना चाहिए.”

आज की हमारी चर्चा के लिए यह बात बेहद मायने रखती है. अगर किसी समाज की नैतिक और लोकतांत्रिक हालत को समझना हो, तो उसकी संवैधानिक वादो से पहले उन लोगों को देखना चाहिए जिन्हें वह व्यवस्था, सुरक्षा और क़ानून के नाम पर जेलों में डालता है, और उन चार दीवारों के भीतर कैसी परिस्थितियाँ कायम हैं.

ख़ुद मंडेला ने अपने जीवन के सत्ताईस साल जेल में बिताए, जिनमें से लंबा समय रॉबेन आइलैंड की जेल में गुज़रा. उनकी क़ैद ने जेल को उपनिवेशवाद और नस्लवाद-विरोधी प्रतिरोध के एक जीवित राजनीतिक अभिलेख में बदल दिया. इस मायने में राजनीतिक क़ैदियों का इतिहास दुनिया भर के मुक्ति आंदोलनों के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता.

आयरलैंड में बॉबी सैंड्स और 1981 के भूख हड़ताली क़ैदियों ने केवल बेहतर जेल सुविधाओं की माँग नहीं की थी. उनकी लड़ाई इस बात के लिए थी कि उन्हें आम अपराधी नहीं, बल्कि राजनीतिक क़ैदी माना जाए. राजनीतिक दर्जे पर उनका यह ज़ोर दरअसल वैधता की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा था: आख़िर प्रतिरोध को अपराध घोषित करने का अधिकार किसके पास है?

दक्षिण अफ्रीका में मंडेला और रंगभेद-विरोधी आंदोलन के अनगिनत कार्यकर्ताओं को इसलिए जेलों में डाला गया क्योंकि उन्होंने रंगभेदी राज्य की नस्लवादी सत्ता को चुनौती दी थी.

और फ़िलिस्तीन में राजनीतिक क़ैदियों का सवाल आज भी कब्ज़े के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष के केंद्र में है. बिना मुक़दमे के लंबी प्रशासनिक हिरासत, बरसों की क़ैद, एकांत कारावास, तथा राजनीतिक नेताओं, छात्रों, पत्रकारों और यहाँ तक कि बच्चों की गिरफ़्तारी जैसी चीज़ों ने जेल को कब्ज़े के दौर में फ़िलिस्तीनी अनुभव का एक अहम हिस्सा बना दिया है.फ़िलिस्तीनी क़ैदियों के आंदोलनों और उनकी भूख हड़तालों ने बार-बार बॉबी सैंड्स और नेल्सन मंडेला की विरासत का हवाला दिया है, और अपने संघर्ष को उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोध की उसी साझी वैश्विक परंपरा का हिस्सा बताया है.

यह हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक क़ैदी का सवाल केवल किसी देश का आंतरिक कानूनी मामला नहीं है. बल्कि यह उन सरकारों में बार-बार देखने को मिलने वाली बात है, जो इंसाफ़, बराबरी और आत्मनिर्णय के लिए उठने वाले आंदोलनों का सामना कर रही होती हैं.

भारत का अनुभव भी इसी व्यापक ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा है. औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई के दौरान भगत सिंह और उनके अनेक साथियों ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि उन्हें राजनीतिक क़ैदी के रूप में मान्यता दी जाए, क्योंकि उनकी क़ैद किसी आपराधिक कृत्य का नतीजा नहीं, बल्कि उनके वैचारिक प्रतिबद्धता, राजनीतिक विश्वासों और सामूहिक संघर्षों का परिणाम थी.

यह फ़र्क़ आज भी उतना ही अहम है.

आज़ादी के बाद भारत ने केवल ब्रिटिश जेल व्यवस्था का ढांचा ही नहीं, बल्कि बल्कि ‘खास हालात’ के नाम पर कानून लागू करने का तरीका भी विरासत में मिला और दमनकारी क़ानूनी सोच भी विरासत में पाई. कम्युनिस्ट और किसान आंदोलनों के दमन से लेकर नक्सलबाड़ी के बाद हुए दमन तक, आपातकाल से लेकर एनएसए, टाडा, राजद्रोह क़ानून और आज के यूएपीए जैसे कठोर क़ानूनों के इस्तेमाल तक, क़ैद को बार-बार राजनीतिक अनुशासन थोपने के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया गया है.

हर दौर और हर युग ने अपना प्रतिरोध पैदा किया है, और उसके साथ अपने राजनीतिक क़ैदी भी. आज के भारत में राजनीतिक क़ैदी की श्रेणी पहले से कहीं अधिक अहम और तात्कालिक हो गई है. शिक्षाविदों, पत्रकारों, छात्रों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, दलित बुद्धिजीवियों, आदिवासी संगठकों और मुस्लिम एक्टिविस्टों की गिरफ़्तारी और क़ैद ऐसे भारत में हो रही है, जिसे इस पुस्तक की भूमिका इक्कीसवीं सदी के भारतीय विशेषताओं वाले फ़ासीवाद के दौर के रूप में चिन्हित करती है. ख़ुद उमर ख़ालिद ने इस स्थिति को बहुत संक्षेप और सटीक शब्दों में “मनुवाद और बाज़ार का कॉकटेल” कहा है.

उमर ख़ालिद का पीएचडी शोध-प्रबंध “द कॉन्टेस्टिंग क्लेम्स एंड कंटीन्जेंसीज़ ऑफ़ रूल: सिंहभूम 1800-2000” इस बात को समझने में बेहद मददगार है कि औपनिवेशिक शासन से लेकर आज के नवउदारवादी वैश्वीकरण तक आदिवासी समुदायों ने किन चुनौतियों का सामना किया है. आज इन आदिवासी समुदायों के प्रतिरोध को एक ख़तरे के रूप में देखा जाता है, और राज्य दमन तथा लोकतांत्रिक विरोध के अपराधीकरण के ज़रिए उनकी आवाज़ को कुचलने और ख़ामोश करने की कोशिश करता है.

आज के माहौल में मुसलमान होना ही हिंदुत्व संगठनों और ख़ुद राज्य की ओर से बढ़ते हमलों का निशाना बनने के लिए काफ़ी है. 2014 के बाद से हमने बार-बार देखा है कि साधारण आपराधिक क़ानूनों का इस्तेमाल सामाजिक और राजनीतिक निशानेबाज़ी के औज़ार के रूप में किया जा रहा है. ऐसी स्थिति में मुक़दमे की पूरी प्रक्रिया ही सज़ा का रूप ले लेती है. अनेक मुसलमानों को ठोस और विश्वसनीय सबूतों के आधार पर नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहों और राजनीतिक सुविधा के आधार पर आरोपी बनाया जाता है, गिरफ़्तार किया जाता है और जेलों में डाल दिया जाता है.

जैसा कि उफ़ाक़ पैकर ने इस पुस्तक में अपने लेख में लिखा है:

“उमर की राजनीति और उनकी पहचान, दोनों को यह सरकार अपने लिए ख़तरा मानती है. वे उस तरह के नागरिक, मुसलमान या छात्र नहीं हैं जिनके साथ मौजूदा सत्ता सहज महसूस कर सके. अपनी मुस्लिम पहचान को लेकर वे कभी माफ़ी माँगने वाले नहीं रहे, और बटला हाउस मुठभेड़ के दौर से ही वे एक वामपंथी एक्टिविस्ट के रूप में राजनीतिक सवालों पर सक्रिय रहे हैं.”

चाहे वह भीमा कोरेगांव का मामला हो, सीएए-विरोधी आंदोलन हो या आदिवासी संघर्ष — असहमति की आवाज़ों को जेल में डालने के लिए गैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, यानी यूएपीए, सत्ता का सबसे पसंदीदा हथियार बन चुका है. यूएपीए औपनिवेशिक शासन की सबसे टिकाऊ विरासतों में से एक है. अंग्रेज़ी राज के दौरान इस तरह के क़ानूनों का एक ही मक़सद था — प्रतिरोध को अपराध घोषित करना और उन लोगों को जेल में डालना जो उपनिवेशवादी सत्ता के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत करते थे. यह बेहद शर्म की बात है कि आज़ादी के पचहत्तर साल से भी ज़्यादा समय बाद, ऐसे गणराज्य में जो आज़ादी, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक असहमति के प्रति अपनी निष्ठा का दावा करता है, राज्य अब भी उसी दमनकारी ढाँचे को न केवल बचाए हुए है बल्कि उसे हथियार की तरह इस्तेमाल भी कर रहा है, जिसे कभी हमारे उपनिवेशवादी शासकों ने हमें दबाने के लिए बनाया था.

यूएपीए की सबसे ख़ास पहचान यह है कि इसके तहत मुक़दमा दर्ज करने के लिए अस्पष्ट और मनगढ़ंत आरोप ही काफ़ी होते हैं. ज़मानत हासिल करना लगभग नामुमकिन बना दिया गया है, क्योंकि धारा 43D(5) अदालतों को केवल अभियोजन पक्ष के दावों के आधार पर यह मान लेने की छूट देती है कि आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं. इसके साथ-साथ जाँच की अवधि को लगातार बढ़ाया जाता है और मुक़दमे बेहद धीमी रफ़्तार से चलते हैं. यूएपीए के तहत बंद तीन राजनीतिक क़ैदियों — भीमा कोरेगांव मामले के बीके-16 में शामिल फादर स्टैन स्वामी, जी. एन. साईबाबा के सह-अभियुक्त पांडु नारोटे और छात्र कार्यकर्ता कंचन ननावरे — हिरासत के दौरान चिकित्सा लापरवाही के कारण अपनी जान गंवा बैठे. पुस्तक के संपादक भूमिका में इस बात का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि जेलों की परिस्थितियाँ राजनीतिक क़ैदियों के लिए किस तरह जानलेवा बन जाती हैं.

यहीं पर फ़्रांज़ काफ्का का उपन्यास “द ट्रायल” एक भयावह रूप से प्रासंगिक संदर्भ बन जाता है.

बिना मुक़दमे के वर्षों तक क़ैद, बार-बार ज़मानत से इनकार, और क़ानून की अस्पष्ट तथा बेहद व्यापक धाराओं का इस्तेमाल — ये सब मिलकर न्यायिक प्रक्रिया को ही दमन का हथियार बना देते हैं.

प्रक्रिया ही सज़ा में बदल जाती है.

कठोर दमनकारी क़ानूनों और लगातार अधिक आज्ञाकारी होती न्यायपालिका ने राजनीतिक बदले की कार्रवाई को अंजाम देने में सत्ता के सबसे भरोसेमंद साथी की भूमिका निभाई है. जिन मामलों को गढ़ा गया है, उनमें या तो सबूत बेहद कमज़ोर हैं या पूरी तरह झूठे हैं, और उनकी बड़ी संख्या शायद निष्पक्ष कानूनी जाँच की कसौटी पर टिक भी न सके. इसलिए राज्य की रणनीति यह रही है कि मुक़दमे की प्रक्रिया को ही सज़ा बना दिया जाए.

उमर ख़ालिद के मामले में भी यही दिखाई देता है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने की अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी से हाथ खींच लिया. अदालत ने कहा कि लंबी क़ैद अपने-आप में ज़मानत देने का पर्याप्त आधार नहीं है, और साथ ही एक संदिग्ध तर्क गढ़ते हुए उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को कथित “मास्टरमाइंड” तथा अन्य लोगों को “स्थानीय स्तर के सहयोगी” बताकर उनके बीच फ़र्क़ स्थापित करने की कोशिश की.

ऐसे समय में आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.

आंबेडकर बार-बार इस बात पर ज़ोर देते थे कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं के सहारे ज़िंदा नहीं रह सकता. उसे आज़ादी, बराबरी, भाईचारे और उस चीज़ की ज़रूरत होती है जिसे उन्होंने “सार्वजनिक अंतरात्मा” कहा था. वे हमारे सबसे बेहतरीन लोगों को जेल में डालकर हमारी इसी सार्वजनिक अंतरात्मा को मिटा देना चाहते हैं. लेकिन हमें ऐसा नहीं होने देना चाहिए.

जब असहमति को ही अपराध बना दिया जाए, जब आलोचना को साज़िश बताया जाने लगे, और जब विरोध-प्रदर्शन को आतंकवाद का नाम दे दिया जाए, तब यह सवाल उठाना ज़रूरी हो जाता है कि क्या संवैधानिक नैतिकता ख़ुद घेराबंदी के निशाने पर नहीं है?

इसलिए राजनीतिक क़ैदियों का सवाल मूल रूप से एक संवैधानिक सवाल है. अपने आप में आश्वस्त लोकतंत्र असहमति से नहीं डरता. लेकिन जब कोई राज्य आलोचना के जवाब में लगातार जेल का सहारा लेने लगे, तो वह अपनी ताक़त नहीं, बल्कि अपनी वैधता के संकट को उजागर कर रहा होता है.

तो आख़िर उमर ख़ालिद को जेल में क्यों डाला गया?

आयरिश क्रांतिकारी बॉबी सैंड्स ने एक बार कहा था:

“हमारा बदला हमारे बच्चों की हँसी होगी.”

यह ऐसा वाक्य है जिसकी ओर बार-बार लौटने का मन करता है. यह निश्चय ही प्रतिरोध का नारा है, लेकिन इसके साथ-साथ असहमति और संघर्ष की एक गहरी दार्शनिक और राजनीतिक समझ भी है. राजनीतिक क़ैदी केवल एक व्यक्ति के रूप में क़ैद नहीं झेलता. उसका संघर्ष जेल की दीवारों से परे एक ऐसे भविष्य की ओर उन्मुख होता है, जहाँ आज़ादी, सम्मान और इंसाफ़ को अपराध नहीं माना जाता.

उमर ख़ालिद और उनके जैसे अनगिनत लोगों के प्रतिरोध से एक बेहतर और ज़्यादा रोशन भविष्य जन्म लेगा. कोई भी संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता.

5 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएँ ख़ारिज कर दीं, जबकि उसी मामले में गुलफ़िशा फ़ातिमा समेत कुछ अन्य आरोपियों को ज़मानत मिल गई.

पुस्तक में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एक टिप्पणी उद्धृत की गई है, जिसमें उन्होंने कहा:

“एक नागरिक के रूप में, और बहुत-से अन्य लोगों की तरह, मैं भी उम्मीद कर रहा था कि उन्हें ज़मानत मिल जाएगी… मुझे उन लोगों में, जिन्हें ज़मानत मिली और जिन्हें नहीं मिली, कोई ख़ास फ़र्क़ नज़र नहीं आया.”

5 जनवरी 2026 को ज़मानत ख़ारिज किए जाने के बाद उमर ख़ालिद ने लिखा:

“लेकिन मैं सबसे ज़्यादा यह चाहता हूँ कि जो लोग मेरे साथ एकजुटता जताते हैं, वे यह समझें कि मैं उस पीड़ित की छवि को स्वीकार नहीं करता जिसके साथ अक्सर मुझे जोड़ा जाता है. इस अंतहीन प्रतीक्षा में दर्द है, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन इस दर्द में एक ख़ूबसूरती भी है. मेरे साथ जो कुछ किया जा रहा है, उसके बावजूद मैं अपने हालात से समझौता कर चुका हूँ, क्योंकि यह जानने में एक गहरी ख़ूबसूरती है कि यह मामला केवल मेरा नहीं है.

मेरी क़ैद का मक़सद केवल मुझे एक व्यक्ति के रूप में निशाना बनाना नहीं है. इसका मक़सद मेरे साथियों को यह सबक़ सिखाना है कि जो भी सत्ता से असुविधाजनक सवाल पूछने की हिम्मत करेगा, उसे बेरहमी से और लगातार ख़ामोश किया जा सकता है और किया जाएगा.

इसलिए जो लड़ाई मैं लड़ रहा हूँ, वह भी मुझ एक व्यक्ति से कहीं बड़ी है. यही वजह है कि जो लोग मेरी बातों और मेरे विचारों पर यक़ीन रखते हैं, उन्हें मेरे और इस मामले के दूसरे लोगों के बारे में बात करने की अपनी भाषा बदलनी होगी.

हमारी लड़ाई उस समाज की कल्पना के लिए है जहाँ कुछ लोग दूसरों से ज़्यादा बराबर न हों. यही यक़ीन इस दर्द को सहने लायक बनाता है. इसमें कुछ वैसी ही भावना है जैसी ईसा मसीह या भगत सिंह के जीवन में दिखाई देती है. दोनों ने उत्पीड़ित लोगों के मक़सद के लिए अपनी ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी थी. और यह जानना अपने आप में एक ख़ूबसूरत एहसास है कि मैं भी उसी परंपरा का हिस्सा हूँ, उस इतिहास की एक कड़ी हूँ जिसे आने वाली पीढ़ियाँ लिखेंगी.”

“इसीलिए मैं हर सुबह अपनी जेल की दीवार पर लिखी भगत सिंह की इन पंक्तियों के साथ जागता हूँ:

‘राख का हर एक ज़र्रा मेरी गर्मी से गतिमान है. मैं एक ऐसा पागल हूँ कि जेल में भी आज़ाद हूँ.'”

उमर ख़ालिद की ये पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि राजनीतिक क़ैद का इतिहास केवल दमन का इतिहास नहीं है. यह उम्मीद, प्रतिरोध और इंसाफ़ के लिए जारी उस अडिग संघर्ष का इतिहास भी है, जिसे जेल की सलाख़ें कभी पराजित नहीं कर सकीं. सत्ता लोगों को क़ैद कर सकती है, लेकिन आज़ादी, बराबरी और इंसाफ़ के ख़्वाब को क़ैद नहीं कर सकती. यही वह विरासत है जो भगत सिंह से लेकर मंडेला, बॉबी सैंड्स और आज के राजनीतिक क़ैदियों तक एक साझा धागे की तरह जुड़ी हुई है — और यही वह विरासत है जो भविष्य को रोशन करती है.

(साभार: लिबरेशन, जून 2026)

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