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निराला का  साहित्य-संस्कृति सम्बंधी चिंतन

 

निराला प्रायः कवि के रूप में समादृत  हुए हैं।  हिंदी की सार्वजनिक दुनिया  में लेखक,  रचनाकार को विशेष पहचान में स्थिर करने की,  विचार और समग्र चिंतन से अलग कर उसे रचना पर केंद्रित करने की प्रवृत्तियां बनी रही हैं।

यह वस्तुतः समाज और शिक्षा संस्थानों में सामंती वर्णवादी स्तरीकृत सामाजिक संरचना पर आधारित इतिहासबोध के बने रहने से हुआ है। सांस्कृतिक स्तरों में यह बहुत सूक्ष्म ढंग से सक्रिय रहता है,  इसलिए पता नहीं चलता। अर्थात विभाजन और स्तरीकरण का दृष्टि में मौजूद रहना यह सब तय करता है। यह सत्ता की संस्कृति से नत्थी होता है। हिंदी की सार्वजनिक दुनिया इससे गहरे प्रभावित रहती है। खैर,

 

निराला का चिंतन, उनकी रचनाओं से अलग नहीं निर्मित हुआ है, बल्कि रचनाएं उनके चिंतन की ही भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्तियां हैं। विचार से रचना आती है और रचना के सामाजिक हो जाने के बाद, वह विचार को प्रभावित भी करती है। निराला के चिंतन और लेखन में यह प्रक्रिया मौजूद है। इसीलिए उनकी कविता-यात्रा ‘जूही की कली’ से चलकर ‘महगू महगा रहा’ तक पहुंचती है। तथा, कथा-यात्रा ‘पद्मा और लिली’ से चलकर ‘कुल्ली भाट’ तक। बहरहाल,

निराला के साहित्य-संस्कृति सम्बन्धी विचार निबन्धों में, कहानियों में प्रसंगवश मौजूद मिलेंगे। लेकिन साहित्य सम्बन्धी अलग से की गयी टिप्पणियों में वह ज्यादा स्पष्ट रूप से मिलता है। यह टिप्पणियां 1930-35 ई. के बीच की हैं। यह वह समय है, जहाँ निराला की दर्शन सम्बंधी कुछ धारणाएँ, समाज सम्बंधी कुछ मान्यताएं बदलती हैं। हिन्दी समाज की भीतरी संरचनाओं, सांस्थानिक स्थितियों से व्यावहारिक परिचय होता है और सामाजिक बदलाव के विचार उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। सांस्कृतिक द्वन्द्व, बेचैनी बढ़ती है। इसी दौरान वे उपन्यास, कहानी लेखन की तरफ बढ़ते हैं। सामाजिक यथार्थ को वे अनदेखा नहीं कर पाते। और, सामाजिक यथार्थवाद की तरफ खुद ही नहीं जाते, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और पंत को भी उस दिशा में बढ़ाते हैं।    इसका पता उनके निबंध और टिप्पणियां देती हैं।

 

निराला अपने निबंधों में प्रायः कविता को केंद्र में रखकर साहित्य के मूल लक्ष्य, एकदेशिकता,  व्यापकता आदि पर चिंतन करते हैं। इसमें निराला आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आचार्यत्व  की कलई खोल देते हैं।  खासकर छायावाद को लेकर की गयी रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पर। दिलचस्प है, कि रामचंद्र शुक्ल जहां निराला पर व्यक्तिगत हमले करते हैं, वहीं निराला उसका प्रत्युत्तर देते हुए आधुनिक साहित्य के लक्ष्य, विचार और व्यापकता, खासकर अंग्रेजी की रोमांटिक धारा को स्पष्ट ढंग से रेखांकित करते हैं। इसकी मूल अंतर्वस्तु को उद्घाटित करते हैं।  कहा जाए, तो हिन्दी समालोचना में  रोमांटिक धारा की समझ निराला के यहां जैसी है वह किसी के पास नहीं है। रामचंद्र शुक्ल की सारी विद्वत्ता  यहां चुक  जाती है और वे व्यक्तिगत आक्षेप  जैसे ओछेपन पर उतर आते हैं। निराला की कविता और चिंतन के लिए रामचंद्र शुक्ल के पद-प्रयोग इस प्रकार हैं, ‘लालसा अज्ञात की बताके ढोंग रचते जो’…।  यहां अज्ञात मतलब ‘छायावाद’। उनकी दृष्टि से पूरी छायावादी कविता ढोंग है। उसमें लोक दृष्टि नहीं है। जबकि खुद रामचंद्र शुक्ल की लोक दृष्टि वर्णवाद से संवलित है। लेकिन, निराला कह रहे हैं, कि आधुनिक वणिक शक्ति ने पुरानी वर्णगत श्रेष्ठता को पराजित कर दिया है। वर्णगत श्रेष्ठता ढोंग  है।  गुलाम देश में सभी शूद्र हैं। वस्तुतः आधुनिकता निराला के यहां ‘नये मनुष्य’ की ‘लालसा’ है, जिसे रामचंद्र शुक्ल ‘ढोंग’ कह रहे हैं। यह सामाजिक बंधनों से मुक्ति की लालसा है, जिन सामाजिक बन्धनों को रामचंद्र शुक्ल लोक आदर्श बताते हैं। पुनः  आगे रामचंद्र शुक्ल निराला की स्कूली शिक्षा पर कटाक्ष करते हैं।  क्योंकि निराला एफ.ए फेल थे। तब एफ.ए पास करके ही ग्रेजुएशन में प्रवेश मिलता था। आज के मेल में इंटरमीडिएट की शिक्षा। रामचंद्र शुक्ल इसके लिए लिखते हैं,  ‘शिक्षा की शुभिक्षा भी न पायी कभी एक कन’। आगे निराला के लेखन पर लिखते हैं, “कहीं बंग-भंग-पद चकती  चमक रही/कहीं अंग्रेजी अनुवाद का अनाड़ीपन;/ ऐसे सिद्ध-साइयों  की मांग मतवालों में है/ काव्य में न झूठे स्वाँग खींचते कभी है मन।” यहां रामचंद्र शुक्ल की हिकारत निराला के साथ-साथ बांग्ला नवजागरण के अंतर्वस्तु, रोमांटिक धारा, सिद्ध-साईं मतलब सिद्ध और सूफी धारा के प्रति भी  प्रकट हो जाती है। निराला इसे ‘असभ्यता’ और ‘गँवारपन’ कहते हैं।  लेकिन, साथ ही, निराला अपने प्रति उत्तर में  साहित्य की मानवीय भावना, स्वतंत्रता की लालसा और भेद रहित मनुष्य के अस्तित्व की पुकार  को सामने लाते हैं। यह ऐसी बात थी, जो रामचंद्र शुक्ल के वर्णवादी दम्भ को चुभती थी।

निराला ‘साहित्य की नवीन प्रगति’ निबंध में रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि की कलई तो उतारते ही हैं, साथ ही अंग्रेजी की रोमांटिक धारा की कविता की विशेषताओं को भी खोलते हैं। हिंदी के आलोचकों के लिए अभी यह अबूझ थी। स्वतंत्रता, एक व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्य भी है, यह उनकी आलोचना दृष्टि का हिस्सा नहीं था। तुलसीदास को लेकर भी निराला और रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में अंतर है। निराला तुलसीदास के साहित्य में अद्वैत तत्व, ज्ञान तत्व पर जोर देते हैं और रामचंद्र शुक्ल तुलसीदास के सामाजिक आदर्श, क्षात्र धर्म पर। निराला कई जगह राम कथा की अलौकिकता को वर्तमान संदर्भ, तर्क, विवेक और आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर कसते हैं और उस पर प्रश्न उठाते हैं। जबकि, हिंदी के आलोचक उसी अलौकिकता  की आड़ में सामाजिक वर्णवादी आदर्श को औचित्य प्रदान करते हैं। इसी के मातहत ‘राम की शक्ति पूजा’ को देखना चाहिए। इसमें वे शील, शक्ति तथा क्षात्र धर्म के विपरीत साधारण मनुष्य के रूप में राम को संघर्षरत दिखाते हैं। यही मत बदलना है, जिसे ‘साहित्य तथा जनता’ शीर्षक टिप्पणी में लिखते हैं,

“साहित्यिकों में केवल सुनने का धैर्य है, मत बदलने की शक्ति नहीं। यह अवश्य ही युगों की संचित साहित्यशक्ति का ही दौर्बल्य है। इससे जनता को कुछ हासिल हुआ, तत्व के भीतर से यह साबित नहीं होता। किसी महान भक्त से ही पूछिए, अग्नि से यज्ञ-हवि कैसे पैदा होती है, जानकीजी ऋषियों के खून से भरे घड़े से, जमीन से, कैसे निकलती हैं, महावीरजी लंका से एक ही रात में उत्तराखण्ड जाकर, संजीवन मूरि वाला पहाड़ लेकर, रात ही-भर में लंका कैसे लौट आते हैं, तो आपको युक्तिपूर्ण, सन्तोषप्रद उत्तर कदापि प्राप्त न होगा। भारत में प्रचलित, भारतीय नाम से प्रसिद्ध आर्य-सभ्यता की उज्ज्वल श्री से मण्डित जो कुछ प्राप्त होगा, उसका अधिकांश इसी प्रकार शिरश्चरणहीन, अदृष्ट, काल्पनिक जन्तु-विशेष ज्ञात होगा, जहाँ मानवीय दृष्टि की गति नहीं। पर पता नहीं, प्राचीन कितनी सदियों से इस जातीय उपयोगितावाद का आर्यों में महत्व है! इससे जाति की जितनी भी भलाई हुई हो, आज हमें कहने में कुछ भी संकोच नहीं कि उतनी ही बुराइयाँ हुई हैं।  आज उन्हीं बुराइयों का दूरीकरण देश का, साहित्य का सच्चा उद्धार है।…पहले सत्य को जिस रहस्यमय ढंग से व्यक्त करने की प्रथा थी, आज उसी रहस्य को सत्य शब्दों के भीतर से खोलने की रीति प्रचलित हो रही है।”

वस्तुतः निराला की दृष्टि में आधुनिक सामाजिक रूपान्तरण के बाद का जमाना था। स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की अवधारणाएं थीं। रोमांटिक धारा के कवियों और बांग्ला साहित्य के मानवतावादी स्वर का प्रभाव था। निराला इसी के अनुकूल हिन्दी साहित्य का विकास चाहते हैं। लेकिन वे पाते हैं, कि हिन्दी में प्रायः पुरानी रुचि पर साहित्य-सृजन हो रहा था। रूढ़िग्रस्त  सामाजिक मान्यताओं और विभाजनकारी मूल्यों को कहीं से चुनौती नहीं मिल रही थी। निराला साहित्य को इसी लक्ष्य पर केन्द्रित करना चाहते हैं और जनता की बनी हुई रुचि की जगह,  नवीन सामाजिक मूल्यों से संवलित रुचि के निर्माण पर जोर देते हैं। ‘साहित्य और जनता’ शीर्षक टिप्पणी में ही वे लिखते हैं,

“हर साहित्य का पहले सूत्र-रूप में आगम होता है, प्रचार तत्पश्चात्। जो साहित्यिक जनता से तरक्की में सदियों का फासला रखते हैं वे कभी जनता के साथ नहीं बैठते,  जनता स्वयं मन्द-मन्द चलती हुई वर्षों बाद उनके साथ होती है। साहित्य की प्रगति के ऐसे ही प्रमाण इतिहास देते हैं। जिस शूद्रक को एक दिन सामाजिक नियमों के लंघन के कारण अवतार-श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम के हाथों प्राण देने पड़े थे, जिस एकलव्य को गुरु की मिथ्या तृप्ति के लिए अंगूठा काट देना पड़ा था, क्या आर्य-सभ्यता का पक्षपाती कोई भी मनुष्य कह सकता है, कि भारत में आज ऐसा ही वर्ण-धर्म प्रचलित है, अथवा उसी के प्रचलन की जरूरत है? वही शूद्रक शक्ति आज सहस्त्र-सहस्त्र रामचन्द्रों को पराजित कर देने में समर्थ है- अछूत ही आज भारत के प्रथम गण्य मनुष्य, चिन्त्य समस्या हैं।…जनता साहित्य के साथ नहीं रहती, साहित्य के साथ लायी जाती है, और जिसे साहित्यिक उपयोगितावाद का आज एक रूप प्राप्त है, कल दूसरा प्राप्त होगा।”

 

कहने का आशय यह कि निराला के यहां आधुनिकता, स्वाधीन चेतना के निर्माण, न्याय, बंधुत्व जैसे मूल्यों से युक्त होकर आती है। इसी से निराला की विश्व दृष्टि बनती है। और इसी के अंतर्गत वे साहित्य और संस्कृति पर विचार करते हैं तथा अपनी रचनाओं में इसी के लिए सांस्कृतिक स्तरों पर संघर्ष करते हैं।

1930 ई. के ‘माधुरी’ दिसंबर अंक के एक लेख ‘काव्य-साहित्य’ में वे साहित्य और संस्कृति दोनों को विवेचित  करते हैं। इसमें वह व्यापक भाव वाले साहित्य और उदार संस्कृति पर जोर देते हैं। इसमें जयशंकर प्रसाद को केंद्रित कर रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पर वे लिखते हैं,  “पंडित रामचंद्र शुक्ल की ‘काव्य में रहस्यवाद’ पुस्तक उनकी आलोचना से पहले उनके अहंकार, हठ, मिथ्याभिमान, गुरुडम तथा रहस्यवादी या छायावादी कवि कहलाने वालों के प्रति उनकी अपार घृणा सूचित करती है। ऐसे दुर्वासा समालोचक कभी भी किसी कृति- शकुंतला का कुछ बिगाड़ नहीं सके, अपने शाप से उसे और चमका दिया है।”

हिंदी के अनुदार संपादकों और समालोचकों की दृष्टि  पर वे लिखते हैं, “हिंदी में यदि चारों ओर से परकोटा घेर कर अन्य देशों तथा अन्य जातियों की भाव राशि रोक रक्खी गई तो इस व्यापक साहित्य के युग में हिंदी के भाग्य किसी तरह भी नहीं चमक सकते और उसके साहित्य में महाकवि तथा बड़े-बड़े साहित्यिकों के आने की जगह, चिरकाल तक ‘बनी रहे-ठनी रहे’ होता रहेगा।”

निराला ब्रजभाषा की श्रेष्ठता  के विचार को ‘हिंदी की नवीन संस्कृति में बाधक’ बनाने वालों के लिए लिखते हैं, कि “वे सिर्फ मनोरंजन के लिए काव्य साधना करते हैं, किसी उत्तरदायित्व को लेकर नहीं। उनकी आंखों में दूर तक फैली हुई निगाह नहीं है। वे अपने ही घर को संसार की हद समझते हैं।”

इसमें ध्यान देना चाहिए कि निराला साहित्य में ‘अन्य जातियों की भाव राशि’ और ‘उत्तरदायित्व’ को लेकर काव्य साधना की बात करते हैं। इसे कोई समझ जाए तो वह निराला की साहित्य साधना को समझ सकता है। उनकी कविताओं, कहानियों के चरित्र पर नजर दौड़ाने से उनका यह कथन आसानी से समझ में आ जाएगा। आगे वे इसी में लिखते हैं, “साहित्यिक प्रतिस्पर्धा क्या है, अपने व्यक्तित्व को साहित्य के भीतर से एक साहित्यिक किस प्रकार बढ़ा सकता है, अपर साहित्यों  से भावों के आदान-प्रदान के लिए कैसी शिष्टता, कितनी उदारता होनी चाहिए, किस-किस प्रकार के भावों  से अपना प्रकृतिगत स्वभाव बना लेना चाहिए, वह नहीं जानते। कौन से भाव  सार्वजनीन  हैं और कौन से एकदेशीय हैं, उन्हें पता नहीं। चिरकाल से एक ही समाज के चित्र देखते-देखते उनकी रुचि उन्हीं के अनुसार बन गई है, वे उसे बदल नहीं सकते और जब बदली हुई कोई अच्छी भी रुचि उनके सामने रक्खी जाती है, तब अपनी अपार भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर उसके देशनिकाले पर तुल जाते हैं।”

इसी लेख में वह आगे लिखते हैं,  “पर हमारे साहित्य में क्या हो रहा है- यह भारतीय है, यह अभारतीय, असंस्कृत। धन्य है, हे संस्कृति के बच्चों!-  नस-नस में शरारत भरी, हजार वर्ष से सलाम ठोंकते-ठोंकते नाक में दम हो गया, अभी संस्कृति लिए फिरते हैं।”

इसी लेख में वे समाहार करते हुए लिखते हैं, “हमें अपने साहित्य का उद्देश्य सार्वभौमिक करना है, संकीर्ण एकदेशीय नहीं।”

इसी तरह के विचार उनके अन्य निबंधों में भी आए हैं। ‘हमारे साहित्य का ध्येय’ निबंध में लिखते हैं, “जब हर व्यक्ति हर व्यक्ति को अपनी अविभाजित भावना से देखेगा, तब विरोध में खंड-क्रिया होगी ही नहीं। यही आधुनिक साहित्य का ध्येय है।”

इसी तरह ‘साहित्य और जनता’ शीर्षक  टिप्पणी में लिखते हैं,

“निम्न श्रेणी के प्रचारक साहित्यिक जनता की ही प्रिय बातें उन्हें सुनाते रहते हैं। इस प्रकार सत्य के बदले वे अपना ही प्रचार करते हैं। हमारे साहित्य की हीनता का मुख्य कारण यही है कि हम अपनी हीनता को प्रश्रय देकर उत्कर्ष समझ बैठे हैं, अपने अज्ञान को ज्ञानाडम्बर कर रक्खा है। आज जिस युग-साहित्य की दृष्टि में मनुष्य-मात्र के समान अधिकार हैं, वह पुरुष हो या स्त्री,  उसका जनता में प्रचार रोकना, उसकी सूक्ष्मतम व्याख्या न समझकर उसके अस्तित्व को ही न स्वीकार करना हिन्दी की इस हीन दशा का एक अत्यन्त पुष्ट स्थूल प्रमाण है।”

इन टिप्पणियों पर ध्यान देने से छायावाद किन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को लिए हुए आया था, वह भी स्पष्ट हो जायेगा। ‘मनुष्य-मात्र के समान अधिकार’ की बात ‘पुरुष हो या स्त्री’ दोनों के लिए की गयी है। अर्थात सामाजिक विभाजन पर निराला की दृष्टि है। उनके विचारों में उसके बदलाव का लक्ष्य मौजूद है।

 

साहित्य और संस्कृति संबंधी ऐसे ही विचारों को उन्होंने अपनी  तत्संबंधी टिप्पणियों में भी व्यक्त किया है। इन टिप्पणियों में ‘नवीन साहित्य और प्राचीन विचार’, ‘साहित्य की वर्तमान स्थिति’, ‘व्यापक साहित्य’,  ‘हिंदी साहित्य में उपन्यास’, ‘नवीन काव्य’, ‘साहित्य का आदर्श’, ‘साहित्य का विकास’, ‘हमारा वर्तमान काव्य’, ‘साहित्य और जनता’, ‘हिंदी में तर्कवाद’ आदि प्रमुख हैं। ‘नवीन साहित्य और प्राचीन विचार’ में वे लिखते हैं, “इस समय हिंदी साहित्य की धारा जिस तरह देश काल तथा समय के अनुसार संसार की अन्य साहित्यिक धाराओं की गति से अपनी गति मिलाकर बह रही है, उसे देखते हुए हिंदी साहित्य की प्रगति तथा उन्नति के संबंध में किसी विचारशील निरीक्षक को किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता। परंतु प्राचीन साहित्य के प्रेमी इसे साहित्य का विपथगामी होना ही कहते हैं।… बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो साहित्य के असंस्कृत होने के विचार रखते हैं।… यदि किसी दृष्टि को प्रगतिशील रखना है, तो उसकी शक्ति बढ़ाने के लिए विजातीय भावों का उसमें समावेश करना अत्यंत आवश्यक है।”

इसी टिप्पणी में वे आगे लिखते हैं, “अब यह युग सार्वभौम साहित्य का, सब साहित्यों के संकलन-संगठन का है। अब किसी साहित्य की किसी जाति के आचरणों को, अपने प्रतिकूल होने पर भी, हमें किसी को निंदनीय कहने का अधिकार नहीं।”

स्पष्ट है, कि निराला साहित्य और संस्कृति संबंधी अपने विचार में नवीनता के पक्ष में अपने तर्क रखते हैं।  इसे ही वे युग के अनुकूल साहित्य के मनुष्य केंद्रित मूल भाव के ध्येय को लेकर चलने की बात करते हैं।

‘साहित्य की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक टिप्पणी में वे लिखते हैं,

“हिन्दी की साहित्यिक सीमा बहुत छोटी है, और काॅलेजों के अधिकांश अध्यापक साहित्य के मुक्त आकाश में उड़ने की शिक्षा विद्यार्थियों को नहीं देते, वे घोंसले में ही उन्हें बैठे हुए देखना चाहते हैं, जिस तरह कि स्वयं बैठे हैं। जिस साहित्य का सम्बन्ध सार्वभौमिक नहीं, एक दायरे में बँधा हुआ जो अपनी ही पुरानी तान छेड़ता रहता है, अपने ही वाद्य के स्वर में मुग्ध रहता है, और दूसरे देशों से पैदा हुए स्वरों और वाद्यों से सहयोग नहीं करता, उससे कुछ लेने के लायक और उसे भी कुछ देने के लायक अपने साहित्य में कुछ है या नहीं, इसकी छान-बीन नहीं करता, वह संसार की साहित्यिक मण्डली में बैठने का अधिकारी  नहीं। हिन्दी में अभी यह बात बहुत थोड़ी है। प्राचीन रूढ़ियाँ जिस तरह भारत के अन्यान्य देशों के साथ सम्मिश्रण की बाधक है, उसी तरह हमारा साहित्यिक ज्ञान भी है।…जो विद्यार्थी निकलते हैं, उनके मस्तिष्क में प्राचीन शिक्षा की संकीर्णता बनी रहती है। वे हिन्दी के मैदान में बहुत बड़ा साहित्यिक उद्देश्य, बहुत बड़ी नवीन मौलिक प्रतिभा लेकर नहीं आते।”

प्राचीन रूढ़ि, संकीर्णता, भेदभाव , भारतीय-अभारतीय, जाति-विजाति की दृष्टि की वे कई जगह आलोचना करते हैं। यह ऐसी बात है, जिससे वे अपने साहित्य में भी संघर्ष करते हैं।

इसी में वे आगे लिखते हैं, “जिन नायिकाओं के भेद सदियों पहले निर्मित हुए थे, अब संसार की प्रगति में पड़कर उनसे दूसरी-ही-दूसरी तरह की नायिकाएँ दृष्टिगोचर होने लगी हैं। पर हमारे साहित्य में अब भी उन्हीं पहली नायिकाओं की छान-बीन हो रही है।”

चेतना के इन्हीं पीछे के स्तरों से ‘यू.पी.-पन’ की संस्कृति बनी। जिस पर निराला लिखते हैं, “किसी-किसी पत्रिका में तो चार सौ वर्ष के अज्ञात कवि के छन्द को मुख-पृष्ठ पर छापकर “यू.पी.-पन” की रक्षा की जाती है, और उसके सम्पादक इस “यू.पी.-पन” के प्रचार करने में संकोच भी नहीं करते, जैसे उस चार सौ वर्ष पुरानी यू.पी को भविष्य के और चार सौ वर्ष  तक कायम रखकर हिन्दी का कोई बड़ा उपकार करना चाहते हों।”

निराला मानते हैं, कि इससे ‘साहित्य नवीन प्रकाश की ओर नहीं अग्रसर हो पाता, और जनता को साहित्य का नवीन, मार्जित, परिष्कृत और उज्ज्वल चित्र नहीं मिलता’

इसके अतिरिक्त निराला का जोर यथार्थवाद पर भी है। वह साहित्य में आदर्शवाद की आलोचना करते हैं। वे मानते हैं, कि साहित्य में आदर्शवाद से हम समाज में कोई सुधार नहीं कर सकते। बल्कि, समाज की जो वास्तविक स्थिति है, जिसमें सामाजिक मान्यताएं हैं, तो उसका विरोध भी है। चली आती हुई सामाजिक परम्परा है, तो उससे विलगाव भी है। पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति के असर से तथा नये उद्योग धन्धों के आने से जो सामाजिक परिवर्तन हो रहे थे, और इन परिवर्तनों के चलते समाज के नये जमाने के हिसाब से निर्माण के संघर्ष भी हो रहे थे और यह सब उस समय का बनता यथार्थ था। वह साहित्य में भी आना चाहिए। ‘हिंदी साहित्य में उपन्यास’ शीर्षक टिप्पणी में लिखते हैं,

“हिन्दी में युग-प्रवर्तन को अपनी तमाम शक्तियों से इष्ट मंत्र की तरह जपकर बुलाने वाले, उसकी प्रतिष्ठा करने वाले उपन्यासकार हैं ही नहीं।… समाज जिस धारा में पहले से बहता आ रहा था, उपन्यासकार अपने को उसी धारा में बहाकर समाज की अवस्था का चित्रण करते हैं। …जब किसी बहती हुई धारा के प्रतिकूल किसी सत्य की बुनियाद पर ठहरकर कोई उपन्यासकार कोई नवीन रचना-प्रयत्न करता है, तब वहाँ उसकी प्रकृति में ही उसकी रचना विशिष्ट शक्ति को लेकर प्रकट होती है…हिन्दी में एक तो नवीन परिवर्तन कोई ऐसा हुआ नहीं, दूसरे शिक्षा के अभाव के कारण खेत भी ऊषर ही पड़ा रहा…।” आदर्शवाद से आशय यहाँ प्राचीन मूल्यों का आदर्शवाद है। जैसे उस दौर के प्रायः लेखक स्त्री की पारम्परिक भूमिका में ही आदर्श देखते थे। वर्णगत मूल्य संवलित व्यवहार को ही भारतीय आदर्श बना कर पेश कर रहे थे। निराला इसी आदर्शवाद की आलोचना करते हैं।

“हिंदी के जो सबसे बड़े औपन्यासिक हैं, उन्होंने भी पूर्व-कथन के अनुसार युग-प्रवर्तन करने वाली रचनाएं नहीं दी, युग के अनुकूल  रचनाएँ की हैं-  प्रायः आदर्श का पल्ला नहीं छोड़ा।”

यहाँ युग के अनुकूल से आशय है, हिन्दी समाज अपनी नैतिकता और सामाजिकता में जहाँ पड़ा हुआ है, अर्थात स्थिर और जड़।

“इस रुचि से हिन्दी की रुचि का भी पता चल जाता है। समाज की पूर्वोक्त रुचि के भीतर पलने के कारण अच्छे उपन्यास को भी एक ही जगह सफलता मिली है- ग्राम्य चित्रों के अंकण में, ग्रामीणों के साधारण चित्रों को असाधारण स्वाभाविकता के साथ खोलने में और मनुष्यमन की छानबीन में। समाज की अनुकूल धारा में रहकर जो कुछ रत्न हिन्दी के उपन्यास-साहित्य में आये, वे यही हैं।” फिर आगे लिखते हैं,

“इसीलिए हिन्दी के उपन्यासों में और प्रायः सब जगह, अधिकांश चित्र, नवीन सभ्यता, नवीन प्रकाश के प्रदर्शन में असफल ही रहे हैं। अँगरेजी के अनेक भारतीय लेखक जिन्हें विलायत में ही शिक्षा मिली है, अँगरेजी कविता तथा उपन्यासों के लिखने में प्रायः असफल ही रहे हैं, इसका कारण यही है। उनके हृदय के स्वर से अँगरेजी सभ्यता का स्वर नहीं मिला। कृत्रिमता जाति के प्राणों को नहीं हिला सकती।”

अर्थात जिस सांस्कृतिक स्तर पर समाज है, उससे आगे ले जाने की शक्ति ऐसे साहित्य में नहीं है।

“राजनीति के मैदान में, जिस तरह बड़ी बड़ी लड़ाइयों के लिए सिर उठाना आवश्यक है, उसी तरह साहित्य के मैदान में भी है, और चूँकि अभी इस लड़ाई का हमारे साहित्य में कहीं भी नज्जारा नहीं देख पड़ता, इसलिए साहित्य के मुख्य चित्रण-अंग उपन्यासों की भी दुर्दशा है। ‘वह रोटी पकाती थी, बर्तन मलती थी, धुएं में परेशान हो रही थी’ आदि चित्र समाज के ऊँचे अंग के चित्र नहीं और इन देवियों में अपार भारतीयता का प्रदर्शन कर आदर्श की पराकाष्ठा पर काष्ठ की तरह निश्चल बैठे हुए हिन्दू-समाज को हिला देना भी हमारा उद्देश्य नहीं। कारण, हम किसी का घोंसला नहीं छीनते। हाँ, कहेंगे, घोंसलेवाले हमें घोंसलेवाले ही दीखते हैं, और उनके चित्र वर्तमान उन्नत समाज के मुकाबले वैसे ही अधम।” घोंसला अर्थात संवृत्तीय, घेरेदार मूल्य, जिसमें समाज को नवीन प्रगति के पथ पर अग्रसर करने की क्षमता नहीं है।

इस तरह निराला के साहित्य संबंधी विचारों में भी एक तरफ जहां नवीनता और साहित्य के व्यापक ध्येय पर जोर है, वहीं वे साहित्य में ऐसी शक्ति के सृजन पर केंद्रित करते हैं, जो नये समय के अनुसार समाज को बदलने के लिए प्रेरक बने।

‘साहित्य का आदर्श’ टिप्पणी में वे लिखते हैं, “मनुष्य जब अपने देश या साहित्य के आकाश में इतना ऊंचा होगा कि उसे उसकी पृथ्वी के अतिरिक्त दूसरे देशों और साहित्यों की पृथ्वी भी उसी की सृष्टि से देख पड़े, तब वह मानवीय सीमा में  पहुँचा हुआ साहित्यिक होगा।…ऐसा आदर्श प्राप्त होने पर देश और काल का भाव नहीं रहता। हमारे यहाँ ऐसी बात नहीं। देश और काल का ही हमारे साहित्य में प्रधान शासन है…। देश और काल दोनों में सीमा है, अतः बन्धन। …दूसरी पराधीनता की तरह यह भी एक तरह की पराधीनता है। धर्म और समाज का शासन इसी पराधीनता की पुष्टि करता है। धार्मिक अनुशासनों में जैसे भी मनोहर मनुष्यों के मनोविकास के कारण हों, मुक्ति का आदर्श धार्मिक बन्धनों से परे है। समाज धर्म का कितना भी अनुसरण करे, परिवर्तन उसके लिए अनिवार्य है…। इस प्रकार उठते-गिरते हुए धार्मिक कानूनों की दोहाई देकर आत्मा को उन्हीं से घेर रखना मुक्ति नहीं।” आगे वे लिखते हैं,

“भारत के साहित्यिक ऐसे आदर्शवादी नहीं थे। सीता, सती, राम, शिव आदि उच्च से उच्च चरित्रों में इसीलिए उन्होंने दाग दिखलाये हैं।…सनातनी और आर्यसमाजी दोनों पुराणों और वेदों के यथार्थ साहित्य से दूर हैं। क्योंकि दोनों के शब्द अपने-अपने साहित्य के विज्ञापन के शब्द हैं,  जिनमें प्रतिकूल कुछ भी नहीं रहता, केवल अनुकूल, केवल फायदे की बातें। फायदा चाहने वाले व्यक्ति स्वभावतः मुग्ध हो जाते हैं। पर फायदे के साथ ही नुकसान लगा हुआ है, यह खबर जिनको है, वे अपने यथार्थ साहित्य में हैं, और उसी की, वैसी ही सृष्टि करते हैं।” आगे लिखते हैं,

“साधना, संयम, तप आदि नपे-तुले शब्द रख देने से साधारण जनता की आँखों में क्षणिक एक अच्छा अंजन अवश्य लग जाता है, पर हम जनता को निरंजन होकर विवेचन करने को कहते हैं।…मनुष्य का आदर्श वही है, जो निरंजन है। साहित्य सत् और असत् के भीतर से सदाचार और दुराचार के फन्दे से छूटकर उसी लक्ष्य पर पहुंचता है। हमारे यहाँ सदाचार के साथ असदाचार को जगह नहीं मिली, इसलिए लोग जबान पर सदाचार रखकर पेट में असदाचार ही भर रखते हैं।…परिणाम यह हो रहा कि पर्दे में पाप बढ़ता ही जा रहा है। जब यह पर्दा उठेगा तो पाप भी उतना न रहेगा। सत्साहित्य की सृष्टि के लिए जीवन की सभी दिशाएं आवश्यक हैं, क्योंकि कोई गिर जाता है, तो उसके गिरने के कारण हैं, वे साहित्य के लिए उतने ही जरूरी हैं, जितने उठनेवाले कारण।”

‘साहित्य का विकास’ शीर्षक  टिप्पणी में लिखते हैं,  “बंगालियों ने ज्ञान को ही अपने साहित्यिक उत्थान का मूल माना।”  वे सत्य को ‘द्वेषपूर्ण विजातीय दृष्टि’ से नहीं देखते। “इसी तरह ‘अँगरेजी साहित्य में सौ वर्ष से साहित्यिकों का संसार के प्रति प्रेम फैला हुआ है, और भी पहले अंकुरित हो चुका था। अँगरेजी के बड़े-बड़े कवि वर्ड्सवर्थ, शेली, टेनिसन आदि विदेशी सभ्यता के जानकार हैं। शेली तो भारत को बहुत ही प्यार करता था। अँगरेजी राजधर्म के खिलाफ उसने कितनी ही पंक्तियाँ लिखी हैं। अपने विचारों के कारण घर और बाहर सर्वत्र लांक्षित रहा।…बात यह है कि साहित्यिक विशालता,  उदारता, स्वातन्त्र्य जाति के भीतर पैठकर लोगों को तेजस्वी करते हैं। रूस की स्वतंत्रता से पहले उसका साहित्य है।”

ध्यान देने की बात है, कि निराला जब मध्यकालीन हिन्दी कविता, तुलसीदास के अद्वैत और कबीर के ज्ञानाश्रय को विवेचित करते हैं, तो उसमें मनुष्य की एकता ही मुख्य लक्ष्य है, जिसे वे अपने समय में भी महत्वपूर्ण मानते हैं। वे लिखते हैं,

“हमारी हिन्दी को ऐसी ही भावना से युक्त साहित्यिकों की आवश्यकता है। सत्य की रक्षा के लिए साहित्यिक अपने प्राणों का बलिदान कर दे! सत्य वही है, जो मनुष्य-मात्र में है। ज्ञान में हिन्दू-मुसलमान नहीं। विस्तार ही जीवन है।…हिन्दी में बहुत करना है, बहुत पड़ा है, बहुत पीछे हैं हम।”

फिर वे लिखते हैं,

“आज भारत अनेक वर्णों तथा समस्त पृथ्वी की जातियों का सम्मेलन स्थल हो रहा है। ऐसी दशा में हमारा फ़र्ज है, कि हम अधिक से अधिक उदार हों, और क्रियाओं में विस्तार करें। हमारे अंदर प्रायः ऐसी संकीर्णताएं घर किये हुए हैं, कि हम अपने आचरणों से दूसरे को किंचिन्मात्र भी पृथक देखकर चौंक उठते हैं, उसकी ओर से हमें घृणा हो जाती है। यह हमारी ही कमजोरी है। हमारे साहित्य तथा काव्य में भी ऐसी कमज़ोरियों की कमी नहीं।”

‘हिन्दी में आलोचना’ नामक टिप्पणी में वे लिखते हैं,

“प्लेटो की उदारता विश्व-विश्रुत है। सुकरात, अरस्तू संसार के मनुष्य हैं। ढाई हज़ार वर्ष पहले जो कुछ विश्व-मानवता के सम्बन्ध में प्लेटो ने कहा है, आज रवीन्द्रनाथ उससे अधिक कुछ नहीं कह पाये, बल्कि यहाँ का वेदान्त और वहाँ की विश्व-नागरिकता,  ये ही रवीन्द्रनाथ के मानव-धर्म-प्रचार के मुख्य अस्त्र हैं। योरप के अनेकानेक विवर्तनों को यदि आलोचनात्मक विवर्तन कहें, तो ठीक ही होता है।…पर हिन्दी का आलोचनात्मक वर्तमान साहित्य देखकर किताब फाड़कर फेंक देने की तबियत होती है, वह मानवीय मन से इतनी दूर है, इतना स्थूल, इतना जड़ है। अभी उसमें बड़ी उन्नति की आवश्यकता है।”

इन सभी बातों को ध्यान से देखा जाय, तो निराला उदार, आधुनिक, नवीन, व्यापक मानवीय भावों को हिन्दी साहित्य की अंतर्वस्तु बनाना चाहते हैं। इसमें सामाजिक परिवर्तन का स्वर भी मिला हुआ था।

 

 

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