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पर्यावरण अब एक राजनैतिक एजेण्डा है

आज़मगढ़। जन संस्कृति मंच ने 10 जनवरी 2026 को एक गोष्ठी का आयोजन किया। अरावली संकट के सन्दर्भ में पर्यावरण और संस्कृति विषय पर केन्द्रीय विद्यालय रोड स्थित सावित्री भवन में आयोजित इस गोष्ठी में शामिल प्रबुद्ध जनों ने अपने विचार साझा किये।

गोष्ठी की शुरुआत ‘जलवायु’ पत्रिका के सम्पादक तथा आज़मगढ़ की नदियों को बचाने के अभियान से जुड़े  अजय गौतम ने अपनी बातचीत से की। उन्होंने कहा कि पर्यावरण आस-पास के कारकों का समूह है। इसमें मनुष्य भी है। जीव-जन्तु, पेड़-पानी, हवा सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। 1960 के दशक में पर्यावरण को लेकर लोग सचेत हुए। 1970 में पर्यावरण मंत्रालय बना। जहाँ तक अरावली की बात है, विश्नोई समाज ने वृक्ष बचाने के लिए एक आन्दोलन चलाया। 1992 में कोर्ट के आदेश पर अरावली में अवैध खनन पर रोक लगी। उन्होंने बताया कि अरावली कई नदियों का उद्गम स्थल है। लकड़बग्घा भारत में अरावली में ही पाया जाता है।

उन्होंने कहा, कि अरावली में खनन और अन्य व्यावसायिक  गतिविधियों के शुरू होने से जैव विविधता प्रभावित होगी। साथ ही, रेगिस्तान का विस्तार होगा। कई ऐसे पेड़ हैं, जो और कहीं नहीं हो सकते। उन्हें अगर काटा जायेगा, तो उनकी प्रजाति खत्म हो जायेगी। दूसरे, एक विशिष्ट प्राकृतिक संरचना के भीतर विशिष्ट संस्कृति का निर्माण होता है।

भारत में जो सांस्कृतिक विविधता है, उसका सम्बन्ध पर्यावरण से भी है। भाषा, रहन-सहन, मान्यताओं, विश्वासों का अपने भूगोल से सीधा सम्बन्ध होता है।

उन्होंने आज़मगढ़ के हवाले से बताया, कि सिक्स लेन के लिए यहाँ ढाई से तीन लाख पेड़ काटे गये। यह पेड़ पच्चीस  से तीस साल पुराने थे। नतीजा यह हुआ, कि 2021 में आज़मगढ़ में एक ही दिन में इतनी बारिश हुई कि पूरा शहर डूब गया।

उन्होंने कहा कि अरावली पर अध्ययन करके पर्यावरण बचाने के लिए एक श्रृंखला शुरू की जा सकती है। नागरिक समाज को पर्यावरण के सवाल पर आगे आना होगा और उसे बचाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना होगा।

एडवोकेट अनिल राय ने अपनी बात रखते हुए कहा, कि आज पर्यावरण के आर्थिक और राजनैतिक आयाम हैं। पर्यावरण वर्षों में बनता है। पर्यावरण को नुकसान करने पर प्राकृतिक आपदाएं बढ़ेंगी। पूंजीवादी विकास माॅडल ने पर्यावरण के सामने संकट पैदा किया है। इससे पहले भी मनुष्य ने विकास की मंजिलें पार कीं, लेकिन पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया गया।

अंग्रेज आये तो खनिज सम्पदा की लूट शुरू हुई। आदिवासियों ने इसके खिलाफ पहला संघर्ष शुरू किया। जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए वे अंग्रेजों से लगातार लड़े।

अनिल राय ने कहा, कि पूंजीवादी विकास में पर्यावरण के संरक्षण को जगह नहीं है। उन्होंने आगे अपनी बातचीत में कहा, कि प्रकृति से जुड़ना मनुष्य के स्वभाव में है। वह पेड़-पौधों की पूजा करता। उनके इर्द-गिर्द उत्सव मनाता है। मेले आयोजित करता है। प्रकृति से उसका जीवंत रिश्ता होता है। चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाने के लिए असंख्य पेड़ काटे जा रहे हैं। कई वनस्पतियां खत्म हो जा रही हैं।

पहले सड़क बनाते समय इसका ध्यान रखा जाता था। सड़क के किनारे जल संरक्षण को ध्यान में रखा जाता था। आज जो सड़क बन रही है, वह आम जनता के लिए नहीं है, वह कारपोरेट लूट को सुगम बनाने के लिए है। इससे लाभ तो कारपोरेट पूंजी को होगा लेकिन नुकसान मानव समाज उठायेगा। आज की सत्ता तो और नंगी हो गयी है। सब अडानी के लिए सुलभ हो गया है, धर्म-संस्कृति से इन्हें कोई वास्ता नहीं  है।

संस्कृतिकर्मी और जन गायक बैजनाथ यादव ने कहा, कि पर्यावरण को लेकर लोगों को सचेत करने की जरूरत है। पर्यावरण के सवाल पर जनता के बीच जाना चाहिए। पेड़ों का सम्बन्ध तो धर्म से भी है। ढेर सारे धार्मिक विश्वास पेड़ों से जुड़े हैं। अभी कोई पीपल, नीम, आम का पेड़ गाँव में काट दे तो लोग नाराज हो जाते हैं। अभी की सरकार धर्म वाली सरकार है, धर्म पर ही पूरी राजनीति करती है, हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति का जाप करती है लेकिन यहीं आज़मगढ़ में सिक्स लेन में कितने पेड़ काटे गये, कोई बोलने वाला नहीं कि विकास हो रहा है। नदियां सूख जा रही हैं और पानी है, भी तो इतना गंदा कि उसमें कोई नहा ले तो बीमार हो जाय।

आज़मगढ़ में जितने धार्मिक स्थल हैं सभी नदियों के संगम पर हैं, लेकिन वहां की नदी गंदगी से भरी रहती है। जनता भी इसको लेकर जागरूक नहीं है। नदी, पेड़, पहाड़ नहीं बचेगा, तो तीज-त्यौहार भी नहीं बचेगा। पर्यावरण का संस्कृति से सीधा सम्बन्ध है। उन्होंने कहा, कि हवा, पानी सब खराब कर दिया और जो बचा है, वह कारपोरेट के लिए है।

पहले की सरकारें कारपोरेट के लिए काम करती थीं, लेकिन आज तो कारपोरेट ही सरकार चला रही है। चुनाव आयोग, न्यायालय, सरकारें सब उनके नियंत्रण में है। अभी आम आदमी कोई पेड़ काटे तो पुलिस आ जाती है, लेकिन आरे, अरावली, हसदेव को कारपोरेट के लिए उजाड़ा जा रहा, तो वहाँ वही कानून मौन है। वहाँ हरे पेड़ काटने से नुकसान नहीं होगा। उन्होंने कहा, कि जन प्रतिरोध से ही यह रुक सकता है।

स्पीक पब्लिकेशन से जुड़े सत्यम प्रजापति ने कहा, कि लोकगीतों में, गीतों-गजलों में नदी, पहाड़, जंगल को लेकर संवेदनाएं हैं। लेकिन आज कारपोरेट लूट के लिए सब कुछ उपलब्ध कराया जा रहै। सोनम वांगचुक जैसे विद्वान और पर्यावरणविद जेल में हैं। आज आदिवासी अपने घर, संसाधन बचाने के लिए जूझ रहे हैं। उनके घर, जंगल उजाड़ कर कहा जा रहा है, कि यह विकास है। यह विकास नहीं विनाश है।

पेशे से शिक्षक हरिश्चंद्र यादव ने कहा कि अरावली के पहाड़ पानी को सोखते हैं, अवशोषित करते हैं। पानी का सम्बन्ध जंगल से है, जंगल का सम्बन्ध पहाड़ से है। जंगल, पहाड़ खत्म किये जा रहे हैं, तो जानवर वहाँ से बेदखल होकर मैदानों में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस पर गाँव में परिचर्चा हो और जागरुकता बढ़ाई जाय।

जयराम प्रजापति ने कहा, कि कारपोरेट लाभ के लिए अरावली को संकट में डाला जा रहा है, इससे रेगिस्तान का विस्तार होगा। जंगली जानवर मैदानों की तरफ आयेंगे। आज़मगढ़ में तेन्दुए अब अक्सर आ जाते हैं। जंगली सूअर हर गांव में दिखने लगे हैं। इससे मानव समाज और प्रकृति के बीच सन्तुलन प्रभावित होगा।

प्रणव राय ने कहा, कि विकास और पर्यावरण के बीच सन्तुलन बनाना होगा। अरावली, नीलगिरी आदि को नुकसान पहुंचाया जायेगा तो ज्वालामुखी, भूकंप जैसी आपदाएं बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि अंग्रेज यहाँ नील, शोरे के लिए आये और खेती को नुकसान पहुंचाया अब रेयर अर्थ मिनरल के लिए पहाड़ों को नुकसान पहुंचाएंगे।

प्रणव राय ने कहा कि अरावली, नीलगिरी, पश्चिमी घाट मानसून के आगमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनको क्षति पहुंचाई गयी, तो मानसून की गति अस्त-व्यस्त होगी। मानसून का, वर्षा का महत्व  भारत जैसे देश में बहुत है। संस्कृति से भी इसका गहरा सम्बन्ध है। मानसून आने के बाद हिन्दू धर्म में त्यौहारों की एक श्रृंखला शुरू होती है। इन सब पर असर पड़ेगा।

जसम सचिव यमुना प्रजापति ने कहा कि सरकारें कारपोरेट हित में अपनी नीतियां बदल देते हैं। उन्होंने कहा, कि आज़मगढ़ के कप्तानगंज में फोरलेन, सिक्सलेन बनाने में  1857 के संघर्ष के गवाह और लोक में पूजे जाने वाले कई पेड़ काट दिये गये। उन्होंने कहा, कि अरावली पर्वत श्रृंखला मानसून में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रेत को रोकती है। अरावली को नुकसान होगा, तो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचायेगा।

किसान नेता जयप्रकाश नारायण ने कहा कि मनुष्य और जीव कैसा होगा, यह उसके पर्यावरण से तय होता है। प्रकृति और पर्यावरण से मनुष्य का रिश्ता व्यवस्थित था, जिसे मुनाफे की उत्पादन व्यवस्था ने बिगाड़ दिया। उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक जेल में हैं क्योंकि लद्दाख में खनिज और जल कारपोरेट लूट के निशाने पर है। उत्तर-पूर्व भारत में मणिपुर की अशांति के पीछे कारपोरेट हित है। वहाँ की संस्कृति पर पर्यावरण का बहुत असर है। उनकी जीवन प्रणाली, परिधान, संवेदना, गीत, नृत्य सभी पर पर्यावरण से सम्पर्क की प्रक्रिया का प्रभाव है।

इसी तरह ग्रेट निकोबार में 92000 करोड़ की परियोजना को ला रहे हैं, जिसमें बन्दरगाह और स्टे प्वाइंट बनाएंगे। इसमें लाखों पेड़, वनस्पतियों को काटा जायेगा। जीव-जन्तुओं की कई दुर्लभ प्रजाति खत्म होगी। उन्होंने कहा कि अरावली में बसने वाली विश्नोई और मेयो जातियों की संस्कृति उसमें मिली-जुली है। उससे उनकी संवेदना जुड़ी है।

अबूझमाड़, वीरपैंती, सिंगरोली की पट्टी में रहने वाला मानव समाज पर्यावरण से जुड़ा है। उन्होंने कहा, कि मुनाफाखोरों के लिए अब जो सभ्यता बन रही है, वह खतरनाक है। यह सामूहिक जीवन प्रणाली को खत्म करता है। परिवार और समाज का विखण्डन बढ़ रहा है। यह एक नयी संस्कृति बन रही है, जो ऊपर से आ रही है। यह संस्कृति होटल और रिसार्ट में बन रही है। यह संस्कृति  टेलीविजन और स्टूडियो में तैयार होकर आ रही है।

उन्होंने कहा, कि पर्यावरण अब एक राजनीतिक एजेण्डा है। जैसे संविधान और लोकतंत्र की लड़ाई है, वैसे ही पर्यावरण की लड़ाई है। इस गोष्ठी में विषय प्रवर्तन और संचालन दुर्गा सिंह ने किया। इस गोष्ठी में श्रद्धानंद राय, मटरू,  कविता राजभर, अजय कुमार, मानसी, हर्षित ने भी शिरकत किया।

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