संजू: इसे बायोपिक की तरह न देख कर देखिए

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राजकुमार हिरानी की फ़िल्म संजू आशातीत सफलता की ओर बढ़ रही है। हिरानी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। मुन्नाभाई सीरीज़ की फिल्में हों, थ्री इडियट्स हो या पीके, इनकी फिल्में धारा के विपरीत चलकर भी अत्यधिक लोकप्रिय होती रही हैं। प्रचलित विश्वासों को चुनौती देकर भी सफल होती रही हैं।

उनका तरीका है, एक सार्थक कहानी चुनना और उसमें निहित मार्मिकता की हर सम्भावना को निचोड़ लेना। साथ ही, हास्य की भरपूर छौंक के साथ उसे अतिशय भावुकता में ग़र्क होने से बचा लेना।

यह जरूर है कि सहज स्वस्थ उन्मुक्त हास्य उनसे सध नहीं पाया है। जनता को हंसा तो लेते हैं, लेकिन उसके लिए करतब करनी पड़ती है। जैसे इसी फिल्म में संजय दत्त के बेस्ट फ्रेंड बने विकी कौशल का स्नैक्स को स्नेक्स या हॉल को होल कहना। या शूटिंग के समय संजय दत्त को दिखाई जा रही हिरोइन की तस्वीर की जगह गब्बर सिंह की तस्वीर का आ जाना। ख़ैर।

बुराइयों और अच्छाइयों का शिकार संजू

इस फ़िल्म से कुछ समीक्षकों को शिकायत यह है कि इसमें संजय दत्त की जीवन-कथा को काट-छांट कर इस तरह पेश किया गया है कि उन्हें जनता की भरपूर सहानुभूति मिल सके।

यह सहानुभूति मिलती भी है। लेकिन क्यों मिलती है ?

क्या ऐसा व्यक्ति सहानुभूति का पात्र हो सकता है, जो कैंसर से मर रही मां को हस्पताल में छोड़कर दोस्त के साथ किसी टॉपलेस बार में नंगी लड़कियां देखने, शराब पीने और नशीली दवाएं लेने चला जाता है?

या ऐसा जो बेस्ट फ्रेंड के सो जाने के बाद उसकी गर्लफ्रेंड के साथ ‘घपाघप’ करने से गुरेज़ नहीं करता?

जो नरगिस और सुनील दत्त जैसे समर्थ और स्नेहिल मातापिता के भरपूर साज-संभार के बाद भी बर्बादी के रास्ते पर ही बढ़ता चला जाता है?

भारत में अमूमन यह सम्भव नहीं, लेकिन हिरानी इसे सम्भव कर दिखाते हैं।
पहले तो वे खुद संजय दत्त को एक जीवनीलेखक द्वारा अपने महिमामंडन की धज्जियां उड़ाते और उस पर नाराज़ होते दिखाते हैं। फिर वे दर्शकों को संजय दत्त को एक ‘सामान्य व्यक्ति’ के रूप में स्वीकार करना सिखाते हैं, जो तमाम इंसानी कमजोरियों, बुराइयों, अच्छाइयों और महानताओं का ‘शिकार’ हो सकता है।

फिर धीरे-धीरे वे उन परिस्थितियों को उद्घाटित करते हैं, जो एक सामान्य व्यक्ति को क़ानून और जनता की निगाह में टेररिस्ट बना देती हैं, जिसकी भारी क़ीमत उस निर्दोष व्यक्ति को चुकानी पड़ती है।

हिरानी की सबसे बड़ी कामयाबी इस उद्घाटन को इस हद तक तर्कसंगत और विश्वसनीय बना देने में है कि हर दर्शक को लगे कि ऐसा तो उसके साथ भी हो सकता है।

एक ‘टेररिस्ट’ की खोज

संजय की टेररिस्ट छवि बनने के पीछे कोई संयोग, रहस्यमय मोड़ या आकस्मिक घटना नहीं है। वैसा होता तो कहानी बनावटी और अविश्वसनीय हो जाती।

हिरानी दिखाते हैं कि दत्त परिवार हालिया इतिहास के एक दुर्भाग्यपूर्ण दौर का शिकार होता है, ठीक उसी तरह जैसे कोई भी संवेदनशील इंसान हो सकता है।

सुनील दत्त बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस के बाद भड़के दंगों के बीच दंगा पीड़ितों की सहायता करते हैं। साम्प्रदायिक उन्माद के माहौल में अल्पसंख्यकों को राहत पहुंचानेवाला यह मानवीय प्रयास भी कुछ लोगों को सख़्त नागवार गुजरता है। उन्हें जान की धमकियां मिलती हैं।

सरकारी एजेंसियों की सुरक्षा पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए संजय घर पर रखने के लिए एक बंदूक का इंतजाम करते हैं। हिंसक अविश्वास के माहौल में यह बंदूक सरकारी संदेह का आधार बन जाती है। टाडा जैसे जंगली कानून इस संदेह के निराकरण को नामुमकिन बना देते हैं।

इसके बाद सनसनी बेचने वाले मीडिया तंत्र का खेल शुरू होता है। वो हर ख़बर को ऐसा रूप देना चाहता है, जो सनसनी भी मचाए और जनता के मन में गहरे बैठे साम्प्रदायिक डरों को भी उकसाए।

इसके लिए उसके पास उसके पास सबसे चमत्कारिक साधन है ‘प्रश्नवाचक चिह्न’। अंट-शंट कोई भी सुर्खी लगा दो और अंत में एक प्रश्नवाचक चिह्न। जनता सुर्खी देखती है, चिह्न नहीं। इस तरह बिना झूठ बोले झूठ छापा जा सकता है। पीत पत्रकारिता के उस्ताद आज भी इस साधन का खुल कर इस्तेमाल करते हैं।

कहानी के इस खुलाव में कुछ भी तर्क, विवेक और सहजबोध के विरुद्ध नहीं है, इसलिए वह आसानी से दर्शकों का भरोसा जीत लेती है।

कसौटी

संजय दत्त के जीवन की “प्रामाणिक” जानकारी रखने का दावा करने वाले शंकालु समीक्षकों को हमारी सलाह यह कि वे इस फ़िल्म को बायोपिक की तरह न देख कर देखें।

फ़िल्म संजय दत्त की ज़िंदगी की तमाम सचाइयों को दिखाती हो या नहीं, जिस कहानी को वह सचमुच दिखाती है, वह भरोसेमंद, मार्मिक और इतिहास-संगत है या नहीं ? फ़िल्म के मूल्यांकन की सही कसौटी यह होनी चाहिए।

संजय दत्त के साथ वास्तविक जीवन में जो हुआ सो हुआ, लेकिन फ़िल्म में पेश किए गए संजू के साथ फ़िल्म में इंसाफ हुआ या नहीं?

रही बात रणबीर कपूर के अभिनय की तो उसकी चंहुओर जयजयकार हो ही रही है और आनेवाले काफी समय तक होती रहेगी। वे असली संजय दत्त सरीखे दिखे हैं वो तो एक बात है, लेकिन वे संजू और उसके समय की त्रासदी को भी ठीक से दिखा सके हैं, यह असली बात है।

 

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