कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले

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(आज मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्य तिथि है । इस मौके पर साहिर साहब को याद कर रहे हैं रंगकर्मी महदी हुसैन)

महदी हुसैन

साहिर का मतलब होता है जादू करने वाला, यकीनन साहिर एक जादूगर ही था, उसका जादू ज़माने के सर चढ़कर बोला, उसके हर गीत आज भी ज़िन्दा दिलों को अपनी ओर खींचने की ताकत रखते हैं – ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, मन रे तू काहे न धीर धरे, अभी न जाओ छोड़के, वो सुबह कभी तो आएगी, मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, माँग के साथ तुम्हारा जैसे हज़ारों गीत आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं।

साहिर का जन्म लुधियाना के एक जागीरदार चौधरी फ़ज़ल मोहम्मद के घर 8 मार्च सन् 1921 ई0 को हुआ था। इनकी माँ का नाम सरदार बेगम था। चौधरी फ़ज़ल मोहम्मद ने ग्यारह शादियाँ की, सरदार बेगम को उसने छोड़ ही दिया था, लेकिन उसकी ग्यारह बीवियां ज़रुर थीं पर लड़का एक ही था-साहिर। उसने अपने इकलौते वारिस को हासिल करने के लिए सरदार बेगम पर ज़ोर डाला, सरदार बेगम ने अदालत में गुहार लगाई, आखि़रकार अदालत ने उस नौ-दस बरस के बच्चे से पूछा कि तुम अपने बाप के साथ रहना चाहते हो या माँ के और उस नौ-दस बरस के बच्चे ने एक जागीरदार और हर तरह के ऐश व आराम देने वाले बाप के बदले अपनी ग़रीब, मुफ्लिस माँ के साथ रहना पसन्द किया। चौधरी ने सरदार बेगम को धमकी दी कि मैं या इस लड़के को किडनैप करा लूंगा या मरवा डालूंगा।

यह घटना सन् 1930-31 के आस-पास की है। साहिर ने माँ का जो रुप देखा, जिसने तमाम मुश्किलों और मुसीबतों से अकेले लड़ते हुए कैसे अपने बेटे को परवान चढ़ाया इसकी झलक हमेशा उनकी शायरी में नज़र आती रही, ख़ासकर फिल्म त्रिशूल का एक गीत-‘तू मेरे साथ रहेगा, ताकि तू जान सके, कितने पांव मेरी ममता के कलेजे पे पड़े, कितने ख़न्जर मेरी आंखों मेरे कानों मे गड़े, तू मेरे साथ रहेगा, मैं तुझे रहम के साए में न पलने दूंगी, ज़िन्दगी की कड़ी धूप में चलने दूंगी, ताकि तप-तप के तू फ़ौलाद बने, माँ की औलाद बने

साहिर माँ की औलाद बना, माँ के ख़ाबों की ताबीर बना, उसने ख़ाब देखना और उसे पूरा करना माँ से विरसे में पाया था, वो पूरी ज़िन्दगी ख़ाब देखता रहा आने वाले ख़ूबसूरत कल का, बिना कभी मायूस हुए-‘इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा, जब सुख के सागर छलकेंगे, जब ग़म का बादल पिघलेगा, जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नग़मे गाएगी, वो सुबह कभी तो आएगी’ |

सन् 1945 में वो लाहौर की एक मैगज़ीन में नौकरी करते थे और तभी उनकी पहली किताब ‘तलखि़यां’ छपी, साहिर की ज़िन्दगी किन हालात में गुज़र रही थी इसकी गवाही उनकी पहली किताब का शीर्षक ही देता है। साहिर की ज़िन्दगी के तल्ख़ तजुरबे ने समाज के चेहरे पर चढ़े मुखौटे को नोचकर फेंक देने में देर नहीं की, वो समाजी और मज़हबी ढोंगो को बहुत जल्दी भली-भांति परख चुके थे, इसका नतीजा था सवेरा में छपा उनका एक मज़मून कि जिसपर मुल्लाओं ने फ़तवे जारी किए, वारंट निकल आया और मजबूरन उन्हें दिल्ली आना पड़ा।

दिल्ली में वो छोटी-मोटी नौकरियां करते रहे और यहीं उनकी मुलाकात अमृता प्रीतम से हुई। अमृता प्रीतम और साहिर के इश्क के चर्चे नसीम के झोंकों की तरह पूरी दिल्ली में फैले हुए थे। अमृता का ये हाल था कि साहिर अगर सिगरेट पीकर फेंक देते थे तो वो उसे उठाकर ओठों से लगातीं और अपने पास रख लेतीं यानी उनका इश्क अकीदत, आस्था के मुकाम को पहुंच चुका था लेकिन ज़िन्दगी की तल्ख़ हक़ीक़त इश्क की मजाज़ी दुनिया को ज़्यादा वक्त तक रहने नहीं देती-ज़िन्दगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है, ज़ुल्फ़ व रुख़सार की जन्नत नहीं कुछ और भी है, भूक और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में, इश्क ही एक हक़ीक़त नहीं कुछ और भी है।

इसी ‘कुछ और भी‘ की तलाश में साहिर अमृता को अलविदा कह मुम्बई आ पहुंचे, मुम्बई आकर अमृता को याद करते हुए यकीनन साहिर ने कहा होगा- ‘मैंने जो गीत तेरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे, आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ’।

साहिर जिस दौर में मुम्बई आए वो दौर तरक्की पसन्द तहरीक का दौर था. चूंकि साहिर ख़ुद इस तहरीक से जुड़े हुए थे इसलिए उनके फिल्मी गानों में भी इस तहरीक का खा़स असर दिखाई देता है- ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा’ | उस वक्त फ़िल्मी दुनिया में कृश्नचंदर , बेदी, इस्मत चुगताई, शकील बदायूँनी, राजा मेंहदी, मजरुह सुल्तानपुरी जैसे अज़ीम लेखक पहले से ही मौजूद थे और उन्हीं के साथ सफ़र करने को अब तयार हो चुके थे साहिर।

साहिर मुम्बई में वरसुआ के चारबंगले के पास रहते थे और वहीं उनके साथ उर्दू अदब के एक नामवर शायर मजाज़ लखनवी भी रहते थे, लेकिन मुम्बई मजाज़ के मिजा़ज से हरगिज़ मेल नहीं खाती थी, इसीलिए वो जल्द ही मुम्बई छोड़ लखनऊ वापस आ गए। साहिर को उस मायावी दुनिया में अपनी जगह बनाने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा, इसकी एक वजह ये थी कि साहिर मुम्बई आने से पहले ही काफी मशहूर हो चुके थे और दूसरी ख़ास वजह ये भी थी कि उस दौर के फ़िल्मी गानों में आज की तरह काफी बचकानापन आ गया था, एक-दो-तीन, आजा मौसम है रंगीन जैसे गाने लिखे जा रहे थे। साहिर के आने से फिल्मी गीतों को अपनी खोई हुई आवाज़ दोबारा मिल गई- ठण्डी हवाएं लहरा के आएं; ताबीर से बिगड़ी हुई तदबीर बना ले’ |

साहिर कामयाबी की मंज़िल-दर-मंज़िल तय करते जा रहे थे। सन् 1957 में साहिर की ज़िन्दगी में एक अजब सानिहा घटा, उस दौर का दस्तूर था कि पहले म्यूजिक डाएरेक्टरम्यूजिक कम्पोज़ करता था फिर गीतकार उस धुन पर गीत लिखता था, (साहिर ने ही इस परम्परा को मानने से नकारा और फिर ये ख़त्म हो गई ) इसी बात को मद्देनज़र रखते हुए उनकी एक म्यूज़िक डाएरेक्टर से बहस हो गई। म्यूज़िक डाएरेक्टर का कहना था कि गाने लिरिक्स की वजह से नहीं बल्कि कम्पोज़िंग की वजह से हिट होते हैं, साहिर ने कहा कि अगर ऐसा होता तो मैं गाने लिखने से बेहतर पान की गुमटी खोलना पसंद करता। बात झगड़े में बदल गई, उस वक्त साहिर के पास ग्यारह फिल्में थीं लेकिन इतने पॉपुलर और स्थापित म्यूज़िक डाएरेक्टर से झगड़ा मोल लेने की वजह से उनके हाथ से नौ फ़िल्में फिसल गईं और सिर्फ दो बचीं, बची हुई दो फिल्मों में एक थी ‘नया दौ’र और दूसरी थी ‘प्यासा’, इत्तेफ़ाक ये कि यही दो फ़िल्में सबसे ज़्यादा हिट हुई।

साहिर एक ख़ुद्दार इन्सान थे, उन्हे अपनी काबिलियत और हुनर पर पूरा यकीन था और इसीलिए अकसर तमाम बड़े-बड़े म्यूज़िक डाएरेक्टर से साहिर का झगड़ा हो जाता और आखि़रकार साहिर ने इन म्यूज़िक डाएरेक्टरों को छोड़, काबिल लेकिन नाकामियाब म्यूज़िक डाएरेक्टरों के साथ काम करना पसन्द किया- एन. दत्ता, रौशन, ख़य्याम आदि और इनके साथ किया उनका काम खूब सराहा गया | । आखि़र उन बड़े म्यूज़िक डाएरेक्टरों को मानना पड़ा कि इस बन्दे में वो दम है कि ये सिर्फ अपने कलम के दम पर गाने चला सकता है।

साहिर की एक ख़ूबी ये थी कि वो मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल बख़ूबी करना जानते थे, ये ख़ूबी यकीनन एक मंझे हुए और तजुर्बेकार गीतकार में ही पाई जा सकती है- ‘न तो कारवां की तलाश है, न तो हम सफ़र की तलाश है, मेरे शौके ख़ाना ख़राब को, तेरी रह गुज़र की तलाश है’।

साहिर रुमानी गानों में भी अपनी अदबी सलाहियत को हमेशा बरकरार रखते हैं। वो इन गानों को सिर्फ एक लड़का और एक लड़की की इश्कबाजी तक सीमित नहीं रखते बल्कि उसे सीधे तौर पर प्रकृति से जोड़ देते हैं- ‘ये रात ये चांदनीं फिर कहाँ’ या ‘चांद मद्धम है आसमां चुप है, नींद की गोद में जहां चुप है’ |
साहिर ने कभी ख़ुशामदी होना पसन्द नहीं किया, ये सबक भी उन्होंनें अपनी माँ से ही सीखा था, उसने न कभी किसी डाएरेक्टर, प्रोड्यूसर न ही सरकार की ख़ुशामद की |

फिल्मी दुनिया जोकि आज भी काफी हद तक पुरुष प्रधानता की ज़न्जीरों में जकड़ा हुआ है, न कि साहिर का दौर कि जब औरत बस एक नाज़ुक मिजा़ज, काग़ज़ी तबियत, नख़रे वाली फिल्मी गानों में पेश की जाती थी, उस दौर में साहिर ने अपने गीतों में औरत का वो रूप उभारा कि जिससे फिल्मी दुनिया हमेशा परहेज़ करती थी, जैसे त्रिशूल में या साधना का ये गाना- ‘औरत ने जनम दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाज़ार दिया’।

यूँ तो साहिर अपने मिज़ाज की वजह से हमेशा अकेले रहे, कोई साथी ज़्यादा वक्त तक न टिकता था लेकिन एक साथी हमेशा उनके साथ रही और वो थीं उनकी माँ। साहिर ने अपनी के हुक्म के बग़ैर एक कदम भी नहीं उठाया, यहां तक कि अगर वो किसी मुशायरे में जाते थे तो उनकी माँ हमेशा उनके साथ जाती थी क्योंकि वो माँ के बग़ैर एक दिन भी नहीं रह सकते थे। साहिर हमेशा अपनी प्रेमिकाओं में अपनी माँ को तलाशते रहे। आखि़रकार एक दिन माँ ने इस दयारे फ़ानी से रुख़सत ली और उसी दिन वो ग़ैरतमन्द इन्सान जो अपनी ग़ैरत की ख़ातिर हर किसी से टकराने को तयार रहता था, टूट गया।

उन्हें 1971 में पद्मश्री अवार्ड मिला, उनके नाम पर लुधियाना में एक पार्क है, एक फूल का नाम उनके नाम पर रखा गया गुले साहिर, आर्मी ने अपनी एक चौकी का नाम साहिर चौकी रखा, लेकिन ये सारी मोहब्बतें भी साहिर का अकेलापन दूर न कर सकीं और आखि़रकार उन्होंने अपने इसी अकेलेपन के साथ इस दुनिया से 25 अक्टूबर 1980 को रुख़सत ली और जाते-जाते ये पैग़ाम देते हुए गए-

‘कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले।
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले’।।

( लेखक महदी हुसैन से मोबाइल न0: 9918912367 पर संपर्क किया जा सकता है )

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