इलाहाबाद विश्वविद्यालय में परिवेश व आइसा द्वारा आज़ादी की बरसी की पूर्व संध्या पर परिसर के बरगद लॉन में युवा कवियों के कविता पाठ का आयोजन किया गया।
कविता पाठ की शुरुआत में ही विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की गई लेकिन छात्र-छात्राओं के दबाव में अंततः कार्यक्रम की अनुमति दी गई.
कार्यक्रम की शुरुआत विवेक सुल्तानवी द्वारा जनगीतों की प्रस्तुती से हुई. उसके बाद गोविन्द निषाद ने ‘ विदाई ‘, ‘ सूनापन ‘, ‘ रमता जोगी बहता पानी ‘ आदि कविताएँ सुनाई. पूजा कुमारी ने ‘ वे मुझसे अच्छा रो लेते हैं ‘, ‘ गलत आदर्श ‘ , शिवांगी गोयल ने ‘ देश का नक्शा ‘, ‘ विद्रोही जड़ें ‘ , कंचन ने ‘ मेरी पहचान अलग से दर्ज़ की जाएं ‘, ‘ छूटना ‘ , पवन ने ‘ जवान होती लड़की ‘, ‘ जिन्होंने आत्महत्या को चुना ‘ कविता पढ़ी।

वसुंधरा यादव, नीरज आदि कवियों ने अपने कविताओं का पाठ किया। सचिन गुप्ता ने अपने दो गजलें भी प्रस्तुत की।
काव्यपाठ के दौरान देश और शैक्षणिक परिसरों में लगातार नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर होते हमले और समाज के हाशिए पर धकेल दी गई स्त्रियों, दलितों , शोषितों के स्वर सुनाई देते रहे। महिलाओं पर बढ़ते हमलों के खिलाफ कविताएँ पढ़ी गई। साथ ही लगातार भयावह ढंग से बढ़ती बेरोजगारी और फीसवृद्धि का दर्द भी कवियों ने बयाँ किया।
कार्यक्रम में कई बुद्धिजीवियों के साथ सैकड़ों शोधार्थी और छात्र-छात्राएं बहुत उत्साह से इस कार्यक्रम में शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन शशांक अनिरुद्ध ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आर्यन ने किया।

