दूसरे मुल्कों के आज़ादी के वादों के पीछे छुपे ख़ून, धोखे और तबाही की कहानी फ़िलीस्तीन से इराक़ और लेबनान से सीरिया की सात औरतों की ज़बानी।
अंग्रेज़ी अनुवाद: फ़िरूज़ेह फ़र्वर्दिन
हिंदी अनुवाद: धर्मेश चौबे
(यह लेख फ़ारसी में हम-मिहन अखबार में छपा था। इसे अन्टोल्डमैग ने सहमति से अंग्रेज़ी में छापा।)
ग्यारह बरस की अया के दिमाग़ में एक बदहाल अंधेरे कमरे की तस्वीर ज़ब्त है। औरतें उसके चाचा के जली हुई देह के पास चीख रही हैं— अमेरिकी हवाई हमले में उनका हाँथ बराबर लोथड़ा भर बचा था। उस वक्त से ही उसका दिमाग़ बग़दाद में टूटी हुई, रोती औरतों की तस्वीरों के लिए तैयार हो गया था। बिल्कुल फ़िलिस्तीन से फ़िदा, लेबनान से माया और डायना, सीरिया से औला, और अफ़ग़ानिस्तान से माज़्दा और ज़ोया की तरह— ये वो आंदोलनकारी और पत्रकार औरतें हैं जिन्होंने जंग के दौरान के औरतों के अनुभवों के बारे में बताया है। भले ही फ़िरंगी ताकतों नें इन्हें ‘आज़ाद’ करने का दावा किया हो, लेकिन औरतों को मिली तो केवल तबाही, कब्जा और गहरे सामाजिक भेद।
दुनिया का सबसे हिंसक सैनिक नेता बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर हमला करने के लिए इंसाफ़ का चोला ओढ़कर जिना महशा अमीनी और “जिन, ज़ियान, आज़ादी” का हवाला देकर “औरतों के हकों” को जंग और कब्जे को जायज़ बताने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये वही रहनुमा है जिसने पिछले दो सालों में ग़ज़ा में हज़ारों औरतों की हत्या की है। ये साम्राज्यवादी दोहन का वही जाना-पहचाना खाका है जो हर तरफ़ दोहराया जा रहा है।
अया और दूसरी ईराकी औरतों के लिए अमेरिकी कब्जा कभी भी आज़ादी का स्त्रोत नहीं रहा। बच्चों के साथ-साथ औरतों को भी गिरफ़्तार किया गया, आदमियों को उनके परिवारों के सामने कत्ल किया गया। अक्सर ये वही हथियारबंद सिपाही करते जो शांति की बातें करते थे। अमेरिका के आने के बाद जो हुआ वो राहत का नहीं तबाही का मंज़र था। ईराकी औरतें आज़ाद नहीं हुईं; वे तानाशाही और खोखले वादों के साथ आई फ़िरंगी आग के बीच फँस कर रह गईं। आज, ये जो आंदोलनकारी औरतें जंग और तबाही से ऊबरकर आई हैं वे अपने निजी तजुर्बे की ही नहीं बल्कि एक साझी आवाज़ की नुमाइंदगी करती हैं। उन औरतों की आवाज़ जिन्होंने विद्रोह को जीया है और बमों से ‘आज़ाद’ होने को इंकार किया है।
ईराक़ से: नकली आज़ादी, असली जंजीरें
इराक़ी पत्रकार और औरतों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली अया ने उन औरतों को गिनना शुरू किया जिन्हें वे पिछले सालों खो चुकीं थीं— लेकिन कहीं उनका दिल दुख से फट ना पड़े इसलिए वो थोड़ी ही देर में रुक गईं। उनकी बचपन की यादें उस बदहाल कमरे में अपने चाचा की जली हुई देह और औरतों की चीखों से शुरू होतीं। उसके बाद से ही एक टूटी हुई औरत की तस्वीर उनके मन में चस्पा हो गई: एक दमनकारी निजाम में जंग, मौत की सज़ाएँ, गायब कर दिए जाने और भेदभाव के बोझ तले दबी औरत।
सद्दाम हुसैन के राज में जवान लड़कों को कोई मज़हबी या साम्यवादी किताब रखने के लिए उनकी माँओं के सामने ही मौत के घाट उतार दिया जाता। 2003 के बाद ये मंज़र तो नहीं बदला बस तरीके बदल गए। लोगों को या तो मार दिया जाता या गायब कर दिया जाता। कई तो कभी वापस लौटकर नहीं आए, उनकी लाश तक नहीं मिली। माँओं को मिली तो केवल उनकी ग़ैर-हाज़िरी।
अया का कहना है कि 2003 के अमेरिकी हमले के बाद ज़्यादतियों का दौर ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि और ज़्यादा भयानक हो गया, “सद्दाम का जाना ज़रूरी था, लेकिन वो जिस तरह से गए तबाही और भयानक हो गई। अमेरिका ने तय किया कि इराक़ कैसे ‘बदलेगा’, नए हुक्मरान चुने और ऐसी तरजीहें लगा दी जिनका लोगों से कुछ भी लेना-देना नहीं था। इराक़ ना तो आज़ाद हुआ और ना ही महफ़ूज़; वो जेलखाने का दूसरा चेहरा बन गया— और अभी तक है।”
अया का मानना है कि ना केवल अमेरिका इराक़ी औरतों को आज़ाद करने में नाकामयाब रहा बल्कि उसने निज़ाम उन आदमियों के हाँथों दे दिया जो औरतों से नफ़रत करते हैं, “कानून अब बच्चियों को दुल्हन बनाने की मंजूरी देता है, आदमी औरतों को ‘मर्दानगी’ के नाम पर कत्ल कर देते हैं और सज़ा होने से बच भी जाते हैं। हमें औरतों के खिलाफ़ कानूनी अत्याचार मिले हैं, बेहतरी नहीं।”
उनका कहना है कि ‘औरतों के लिए शिक्षा’ और ‘नागरिक समाज’ के बनावटी मुखौटे में बर्बादी छुपी थी, “सामने से तो कार्यशाला और सेमिनार हो रहे थे, लेकिन दरअसल औरतें एक पितृशाही समाज में जकड़ी रहीं। आंदोलनकारी औरतों, अनुवादकों और पत्रकारों को देशद्रोही और साझेदार करार दे दिया गया। हमें ना तो सहारा मिला और ना ही आवाज़।”
अया का कहना है कि चालबाजी का यह अमेरिकी तरीका जाना-पहचाना है, “नारे वही रहते हैं: आज़ादी, मानवाधिकार, औरतों को बचाना। लेकिन इन लफ़्ज़ों के पीछे हमेशा एक राजनैतिक एजेंडा छुपा होता है। उम्मीद से हारकर हम भी कई बार उनपर भरोसा कर लेते हैं।” वो इस बात से वाकिफ़ हैं कि आज़ादी कब्जे से नहीं आती, “हमारी तकलीफ़ का हथियार की तरह इस्तेमाल ना हो पाए सही मायने में यही विद्रोह होगा। जब फ़िरंगी ताकतें नारीवादी नारों का इस्तेमाल करती हैं तब वो इसके मानी बदल उसे जंग का प्रोपोगैंडा बना देते हैं। ये आज़ाद करना नहीं बल्कि काबू करना है।”
अया का कहना है कि नेतन्याहू “जिन, ज़ियान, आज़ादी” की बात अपने ज़ुल्मों को छुपाने के लिए ही करता है। वही तरीका, वही नारा, वही झूठ, “वो हमें इंसानों की बजाय मिसाल के तौर पर पेश करते हैं। वो किसी नीति को सही ठहराने के लिए हमें रणनीतिक मौकों पर दिखाते हैं, और जैसे ही हमारा काम हो जाता है, हमें छोड़ देते हैं।”
वो इरान, सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान की औरतों को अपना मजबूत समर्थन देती हैं, “मेरा समर्थन बिना किसी शर्त के है। मैं इरान की औरतों से गुज़ारिश करती हूँ: किसी को भी अपनी कहानी बयाँ मत करने देना। ये कहानियाँ हमारी अमूल्य धरोहर हैं। लेकिन आज ये हमसे छीनी जा रही हैं, हमारी जान की परवाह किए बिना हमारा इस्तेमाल हो रहा है।” वो आगाह करती हैं, “जब हम अंतर्राष्ट्रीय समाज से हमारी तकलीफ़ पर ध्यान देने को कहते हैं तो कई बार जवाब यही होता है कि ये तुम्हारा आपसी मसला है। लेकिन अगर इसमें उनका फ़ायदा होता हो तो अचानक हमारी ज़िंदगियों की कीमत उनके लिए बढ़ जाती है। हमारी तकलीफ़ों के लिए ये चुनिंदा नज़र शोषण का सबसे घिनौना रूप है।”
ग़ज़ा से: “हम विद्रोह करना जानते हैं”
फ़िदा जंग में तपी हुई औरत हैं— ग़ज़ा में पली-बढ़ी जेंडर स्ट्डीज़ की शोधकर्ता। उन्हें जितना याद है, वह जंग के खौफ़नाक साये में ही रही हैं, बमों और कब्ज़े की ओट में। हालाँकि पिछले दो सालों में यह बर्बादी भयानक तरीके से बढ़ी है: पूरी तबाही, दोस्तों और चाहने वालों की अपूरणीय क्षति, और उनके घरों तक का ज़मींदोज़ हो जाना। उनके हिसाब से मलबे में सबसे ज़्यादा औरतें झेलती हैं।
जब फ़िदा ने सुना की नेतन्याहू ईरान में हमला करने के लिए “जिन, ज़ियान, आज़ादी” का इस्तेमाल कर रहा है तो उन्हें ज़रा भी अचरज नहीं हुआ। उनका कहना है, “इज़रायली हुकूमत ने हमेशा यही किया है: अपनी हिंसा को वैध बताने के लिए दूसरों की तकलीफ़ों का इस्तेमाल करना। यह एक औपनिवेशिक, नस्लभेदी मानसिकता को दिखाता है जो दूसरों को इंसान से कमतर बनाता है।”
फ़िदा नेतन्याहू को ट्रंप जैसे सियासतदानों के जैसा ही मानती हैं— ऐसे लोग जो केवल उन्हीं आंदोलनों को मानते हैं जिसे वे अपना पिट्ठू बना सकें: “जो कोई भी आंदोलन उनकी जंगी मशीनरी, अर्थ्व्यवस्था या भौगोलिक-राजनैतिक रुझानों को खाद-पानी दे सके, वो उसे दबोच लेते हैं। ‘हम औरतों को आज़ाद करने के लिए बमबारी करते हैं’ बोलना कोई नई बात नहीं है— अफ़ग़ानिस्तान, ईराक़ और अब ईरान। पश्चिम में यह बकवास मान ली जाती है क्योंकि मुस्लिमों से नफ़रत, गोरों का वर्चस्व और नस्लभेद आपस में गुथे हुए हैं।”
जवाब में वो एक सामान्य लेकिन बेहद ज़रूरी बात पर ध्यान दिलाती हैं, “हाँ, हमारी तरफ़ हैं औरतें शोषित, लेकिन ये हमारी लड़ाई है। हमें मालूम है कैसे विरोध करना है, कैसे संगठित होना है और कैसे लड़ना है। जंग, कब्ज़े और संसाधनों के दोहन के लिए ज़िम्मेदार किसी भी राज्य के पास आज़ादी पर भाषण देने का नैतिक अधिकार नहीं है।”
वो आगाह करती हैं कि कई सारे तरक्कीपसंद आंदोलनों के साम्राज्यवादी ताकतों के कब्ज़े में आ जाने का खतरा है, जो न्याय देने और बंधनों को तोड़ने की बजाय भ्रष्ट संस्थाओं में मुँहजोरी करने भर का प्रतिनिधित्व देता है, “ये खतरनाक है— क्योंकि अमेरिका, इज़रायल और जर्मनी जैसे मुल्क अपने सीमा बढ़ाने के मंसूबों को नैतिक नारों के पीछे छुपाते हैं।”
फ़िदा के हिसाब से पश्चिम एशियाई औरतों को निष्क्रिय पीड़ित दिखाने का हथकंडा अपनाना पश्चिमी ताकतों का सामान्य तरीका है—ऐसी औरतें जो अपने उद्धार के लिए “सभ्य” गोरे मर्दों का इंतज़ार कर रही हैं। वो कहती हैं, “यह प्रदर्शन ना केवल भौंडा है, बल्कि इसका रणनीतिक इस्तेमाल भी होता है। ये दिखावा इन ताकतों के क़ब्ज़ा करने और काबू करने के ढांचों को बनाने में इनकी हिस्सेदारी छुपाकर उसकी ज़िम्मेदारी ‘संस्कृति’ और ‘मज़हब’ पर डाल देता है।”
फ़िदा ने आज़ादी के लिए कभी भी विदेशी सरकारों का मुँह नहीं देखा, और उनका कहना है कि ऐसी उम्मीद करना भी बेजा हैं। “जब ऐसे राज्य ‘औरतों के हकों’ की बात करते हैं तो वो किसी साझेपन या हकीकी त’अल्लुक से नहीं बल्कि मिलिट्री दखल को सही साबित करने के लिए करते हैं।”
साथ ही उनकी आलोचना केवल फ़िलीस्तीन या ग़ज़ा के संदर्भ में ही नहीं है। फ़िदा आगाह करती हैं कि ईरान के नारीवादी आंदोलन को हथिया लिए जाने के खतरे से बचकर रहना होगा। उनके हिसाब से, जन संघर्ष का कोई भी आंदोलन तभी अपनी ताकत और असलीयत बनाए-बचाए रख सकता है जब उसे उसके ही लोग चलाएँ ना कि दखल करने वाली विदेशी ताकतें। “हमें अपने आंदोलनों पर पूरी स्वसत्ता रखनी होगी। उपनिवेशवाद, हिंसा और युद्ध का परचम लहराते किसी भी राज्य को यह नैतिक अधिकार नहीं है कि वो हमारी आज़ादी की शर्तें तय करे।”
लेबनान से: वही पुरानी चाल
सालों तक माया जैसी लेबनानी औरतों ने हिंसा, तकलीफ़ और गरीबी का बोझ उठाया है। वे केवल किस्सागो नहीं हैं बल्कि उन्होंने इसे जीया है। एक नारीवादी पत्रकार माया ने यह तकलीफ़ जी है, अब वो औरतों के उस अनुभव और हिम्मत से बात करती हैं जो तबाहियों के बीच परिवारों का सहारा बना।
माया दक्षिण लेबनान में अपने घर के बारे में बताती हैं जहाँ हज़ारों परिवारों ने अपना घर और अपनी ज़मीन खो दी— और जहाँ इज़रायल ने हाल ही में बमबारी की। कई तो लौट भी नहीं सकते हैं, “ऐसे विपत्ति के क्षणों में इन औरतों ने अपने आस-पास के लोगों का खयाल रखा। भीड़-भाड़ के आश्रयों में उन्होंने अपने दोनों हाथों से रसोईघर बनाए, खेल बुने और बच्चों के लिए सीखने की जगहें बनाईं। उन्होंने परिवारों को बिखरने से बचाया।”
2024 के खत्म होते-होते लेबनान में 12 लाख विस्थापितों में से 50% महिलाएं और बच्चे थे जिनमें से लगभग 12000 ऐसी गर्भवती औरतें थी जिनके पास किसी भी तरह की कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध नहीं थी। 2019 के बाद से आर्थिक और वित्तीय विध्वंस, कोविड महामारी और बेरूत के बंदरगाह पर हुए हमले ने औरतों, खासकर गैर-संगठित, छोटे स्तर पर काम करने वाली औरतों पर दबाव बढ़ाया है।
लेबनान “हर संकट के बाद एक नये संकट का मुल्क” है। 1975 में हुए गृहयुद्ध के बाद लगातार पाँच पीढ़ियों ने कम से कम एक बड़ा सुरक्षा या आर्थिक संकट झेला है। माया कहती हैं, “हर पीढ़ी ने यह उम्मीद बाँधे रखी कि उनकी अगली पीढ़ी चैन से रहेगी। लेकिन अब हम हमेशा तैयार रहना सीख गए हैं— हमेशा अगले हमले के लिए तैयार रहना।” ये भयंकर संकट एक बेहद पितृसत्तात्मक ढांचे और ऐसे कानूनी खांचे में होते हैं जो औरतों को कायदे से हाशियाकृत करते हैं।
वह एक दबी हिंसा की बात करती हैं— जो आपकी देह को नहीं बल्कि आपकी आत्मा को तोड़ती है। “अगर तुम गोलियों से नही मरते तो युद्ध तुम्हें भीतर से तोड़ने के लिए एक अलग रास्ता खोजता है। कई सारी बूढ़ी औरतें मानसिक आघात और शहर में लगातार कैद होने के भाव के साथ जी रही हैं। वे दक्षिण में अपने घर, अपने खेत-खलिहान, अपने बाग-बगीचे की ओर नहीं लौट सकते। उनके जुड़े होने का भाव हिंसात्मक तरीके से काट दिया गया है। मानो इज़रायल औरतों का ज़मीन से रिश्ता हिंसाओं के ज़रिए मिटाना चाहता है।”
माया बताती हैं कि 2000 की शुरुआत में जब तक इज़रायल काबिज़ लेबनान आज़ाद नहीं हुआ था उन्हें अपने जन्मस्थान जाने की भी इज़ाज़त नहीं थी। इसके मद्देनज़र जब नेतन्याहू “जिन, ज़ियान, आज़ादी” का नारा देकर इरान पर हमला करने के लिए माहौल बनाता है तो उन्हें जानी पहचानी तरकीब का नया रूप दिखता है, “ये वही पुरानी तरकीब है जिसे ताकतवर राज्यों ने औरतों के अधिकारों को खत्म करने के लिए सालों इस्तेमाल किया है। वे आज़ादी के विजेता बनने का दावा करते हैं लेकिन असल में वे ऐसे नारों का इस्तेमाल युद्ध, दखलअंदाज़ी और अपने [भौगोलिक-राजनैतिक] दबदबे को बढ़ाने के लिए करते हैं।”
वो उदाहरण देती हैं: अफ़ग़ानिस्तान, सऊदी अरब, फ़िलीस्तीन और अब इरान। “जब भी असली फ़ैसले लेने होते हैं तब ये सरकारें औरतों को उनके रटी-रटाई कहानी ना दोहराने पर किनारे कर देती हैं। औरतों का इस तरह से चुनिंदा इस्तेमाल उनके असली मकसद को उजागर करता है। वे औरतों का इस्तेमाल उन्हें आज़ाद करने के लिए नहीं बल्कि अपने सैन्य और राजनैतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं।”
माया के लिए नेतन्याहू इस दोगलेपन के चरम पर है— एक ऐसा राजनेता जो फ़िलीस्तीन, लेबनान, सीरिया में बच्चों और औरतों की मौत के लिए ज़िम्मेदार है। “उस जैसे आदमी के लिए, जो इतने गुनाहों का ज़िम्मेदार है, माह्सा (जिना) अमीनी का नाम लेना नैतिक आघात है। अगर किसी को अभी भी ये लगता है कि इज़रायल इरानी औरतों को आज़ाद करेगा तो उसे केवल ग़ज़ा या कब्ज़े के बाद के अफ़ग़ानिस्तान को देखना चाहिए।”
इरानी औरतों के लिए उनका संदेश साफ़ है, “जब तक युद्ध की मशीनें ज़िंदा हैं और उसे सैन्य आदमी चला रहे हैं, औरतों के दुख इस्तेमाल होते रहेंगे। हमे होशियार रहना होगा— आज़ादी बमों से नहीं शुरु हो सकती।”
डाएना एक लेबनानी पत्रकार हैं। वे बताती हैं कि युद्ध की परत-दर-परत हकीकतों ने लेबनान में औरतों की ज़िंदगी मूल रूप से बदल दी है। जिसे वो “पितृसत्तत्मक शांति” कहती हैं उनके मुताबिक इसमें ज़िंदा रहना एक पीढ़ीगत संघर्ष हो गया है। “बूढ़ी दादियाँ और नानियाँ बमबारी के बीच घर संभाल रही हैं, विस्थापन के बाद माँए दुबारा बना रही हैं, बेटियाँ आर्थिक संकट और भीषण पलायन झेल रही हैं। इन सबके बावजूद औरतों ने समाज को बांधे रखा है। हालाँकि कानून और राजनैतिक प्रतिनिधित्व में ढांचागत बदलाव अभी भी पहुँच से दूर हैं।”
वो बताती हैं कि गृहयुद्ध और उसके बाद कब्ज़े में औरतों की ज़िम्मेदारियाँ काफ़ी हद तक बदल गईं। वे नर्स, लड़ाकू, स्मगलर और समझौतेकार बनीं। “काबिज़ दक्षिण में औरतों ने सामाजिक जीवन बनाए रखने और विरोधी संघटकों में, खासकर धर्मनिरपेक्ष घटकों में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन युद्ध ने उन्हें ‘दुश्मन’ और अपनों के बीच कमज़ोर किया। जैसा कि लेबनानी मानवविज्ञानी सऊद जोसफ़ कहते हैं, युद्ध केवल शहीदों की बेवाएं और माँएं नहीं बनाता, बल्कि हथियारों के चुप हो जाने के बाद भी पितृसत्तात्मक नियमों को गहरा करता है जिससे औरतों की आज़ादी बंधती है।”
डायना मानती हैं कि नेतन्याहू का ईरान में औरतों की बात करना लेबनान के अनुभव की याद दिलाता है— ताकतवर लोग हिंसा छुपाने के लिए नारीवादी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। “जैसा कि कुछ विदेशी संस्थाओं या राजनेताओं ने औरतों के अधिकारों का इस्तेमाल बिना बात के अपने एजेंडे को सही साबित करने के लिए किया है। जब नारीवाद प्रोपेगैंडा बन जाए, तब वो शांति का नहीं बल्कि युद्ध मशीनरी का हिस्सा हो जाता है।”
वे कहती हैं कि ऐसे उलझाव नारीवाद को खोखला करते हैं, न्याय की लड़ाई को खोखले बाज़ारू नारों तक सीमित कर सीमा पर लड़ रहीं उन असली नारीवादियों की आवाज़ को खामोश करते हैं जिनकी भाषा इन्होंने हथिया ली है। ईरान जैसे दूसरे संकट की जगहों पर उनका संदेश साफ़ है, “तुम अकेली नहीं हो और तुम केवल पीड़ित नहीं हो। तुम्हारी लड़ाई एक बड़ी वैश्विक लड़ाई का हिस्सा है— लेकिन इसकी दिशा और अर्थ तुम्हें ही तय करने होंगे। और अधिक हिंसा को सही ठहराने के लिए दूसरों को अपनी तकलीफ़ का इस्तेमाल मत करने देना।”
सीरिया से: पितृसत्ता वहाँ भी लड़ती है
विदेशी सैन्य ताकतें युद्ध के समय औरतों के हक की बात क्यों छेड़ती हैं, इसपर औला, एक सीरियन नारीवादी शोधार्थी, एक शब्द का जवाब देती हैं, “पितृशाही।”
“चाहें वो सत्ता हो, भाड़े की फ़ौज हो या राज्य वे सब एक ही तर्क दुहराते हैं, कि उन्हें पता है कि औरतों के लिए क्या सही है, हमारे पास क्या अधिकार होने चाहिए, हमारी दिक्कतें क्या हैं और हमारा भविष्य कैसा हो।”
पाथ्स ऑफ़ द फ़ेमिनिस्ट मूवमेंट आफ़्टर 2011 की लेखिका औला कहती हैं कि औरतों के बारे में बोलना आसान है— लेकिन उन्हें सुनने के लिए सत्ता पर से पकड़ छोड़नी होगी, और पितृशाही ये कभी नहीं करेगी। “जब 2011 में सीरियाई उठ खड़े हुए तो उन्होंने गरिमा, आज़ादी और इंसानी हकों की मांग की। वो आंदोलन गरिमा के लिए था— और औरतों के पूरे अधिकारों के बिना गरिमा का कोई मतलब नहीं है।”
युद्ध, विस्थापन और दमन के बाद भी सीरिया में नारीवादी संगठन ना केवल रहे बल्कि फले-फूले। औरतों ने क्षेत्रीय कदम उठाए, बचने वालों को सहारा दिया और सीरिया और निष्कासन में नारीवादी जगहें बनाईं— ऐसी जगहें जिनकी जड़ें परंपरागत संस्थाओं में नहीं बल्कि साथ, खयाल और रोज़मर्रा के विरोध में थीं।
लेकिन फिर भी जब वक्त आया, यहीं औरतें एक बार फिर हाशिये पर ढकेल दी गईं। सीरिया में बदलाव की अवधि की शुरुआत के बाद के राजनीतिक तरीके को आलोचना की नज़र से देखते हुए औला कहती हैं, “सालों के काम और नारीवादी नेतृत्व के बाद, बदलाव की सरकार के 23 मंत्रालयों में से केवल एक ही मंत्रालय महिला को दिया गया। ये उपलब्धियाँ असली तो हैं लेकिन हल्की भी। ये जीत युद्ध की वजह से नहीं बल्कि उसके बावजूद मिली है।” उनके हिसाब से 14 साल का युद्ध और विस्थापन सभी सीरियाईयों के लिए तकलीफ़देह था, लेकिन औरतों पर इसने खासतरह की हिंसा की, “कैदखानों में बलात्कार और यौन हिंसा से लेकर जबर्दस्ती गायब कर दिए जाना, उग्रवादी संगठनों द्वारा खुलेआम सज़ा और जंग के मैदान पर औरतों के शरीर को हथियार की तरह इस्तेमाल करना।”
इस भयंकर सच्चाई के बावजूद औला सीरियाई औरतों का किस्सा दावानल के बीचोंबीच लड़ाई का बताती हैं। आईसिस के नियंत्रण वाले इलाकों में औरतों ने जबरन गायब करने का विरोध किया, चुपके से पढ़ाया, सहारे के ढांचे बनाए, दिमाग खाली करने के खिलाफ़ डँटी रहीं। विदेशी या क्षेत्रीय भाड़े के फ़ौजों के इलाकों में दमन का दस्तावेजीकरण, मानवीय सहायता पहुँचाना और सुरक्षित जगहें बनाना रोज़ का काम हो गया। औला के लिए जीने का मतलब सबकुछ फिर से बनाना, और उसका एक अलग अंजाम देखना भी था, “विद्रोह हमेशा बड़े-बड़े प्रदर्शन नहीं थे। ये समाज को साथ रखने और मुल्क के भविष्य को बनाने में औरतों की मौजूदगी तय करना था।”
यह पूछने पर कि सीरिया में औरतों का जैसे इस्तेमाल होता है और ईरानी औरतों की लड़ाईयों के वैश्विक पटल में कुछ समानांतर है तो औला साफ़-साफ़ कहती हैं, “बिल्कुल। युद्ध अपराधियों और कब्ज़ा करने वालों ने हमारी लड़ाईयों को अपने मकसद के लिए हमेशा ही इस्तेमाल किया है। अल्जीरिया में फ़्रांसिसियों से लेकर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकियों तक उपनिवेशवाद ने हिंसा को सही ठहराने के लिए हमेशा ‘औरतों को बचाने’ का नाटक किया है। आज वही दुबारा हो रहा है— जब नेतन्याहू लड़ाई को सही ठहराने के लिए ईरानी औरतों के विरोध का इस्तेमाल करता है तो ये उसी हिंसात्मक इतिहास का दुहराव है।”
अफ़ग़ानिस्तान: जंजीरों के बस रंग बदले
2001 में अमरिका ने ‘अफ़ग़ान औरतों को आज़ाद’ करने का वादा कर अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया। यह नारा उस मुहिम का चेहरा बना जिसमें तालिबान के अंधेरे से अफ़ग़ान औरतों को मुक्ति का चिन्ह बनाया गया। लेकिन 20 साल के “गणतंत्र” में रहने के औरतों का अनुभव एक अंधेरी कहानी बयाँ करता है।
औरतों के अधिकारों की कार्यकर्ता माज़्दा अपने उसी अनुभव से बताती हैं कि चमकदार दुकानों के शीशों की चमक हिंसा और कालातीत हो जाने की दुर्गंध नहीं रोक सकते। वो कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में आज़ादी फूली हुई और खोखली थी, एक गुब्बारा जो आखिरकार फूट ही गया। उन 20 सालों में केवल कुछ ही शहरी औरतों को विश्वविद्यालयों में जाने और नौकरियाँ करने का मौका मिला। लेकिन सामाजिक स्वीकृति लिंगभेदी ही रही। “रूप बदल गए; हिजाब ना पहनने के लिए औरतों को बीच सड़क चाबुक से मारा नहीं जा रहा था लेकिन हिंसा बेतरतीब चलती रही— मौखिक उत्पीड़न, पकड़ना, बिना मर्ज़ी के छुना— सड़कों से लेकर राष्ट्रपति के महल तक। औरतों की हिफ़ाज़त करने का दावा करने वाले कानून इस्तेमाल नहीं किए जाते थे, और उनके भीतर का ढांचा महिलाविरोधी ही रहा।”
माज़्दा का कहना है कि अमेरिका ने सड़कों से तालिबान की दाढ़ी हटा दी लेकिन महिला विरोधी ढाँचों को जस का तस रखा, “अफ़ग़ान औरतों की असल आवाज़ कभी भी कब्ज़ा करने वालों की प्रमुखता नहीं रही— ना तो राजनीति में और ना ही पुनर्निर्माण की परियोजनाओं में।” माज़्दा कहती हैं कि चाहें आदमी हो या औरत उनकी आवाज़ का काबिज ताकतों के लिए कोई मतलब नहीं था। वो केवल आपस में एक-दूसरे की सुनते थे और बाकि लोगों को बमों, गोलियों और हिंसा से चुप करा देते थे, “हमने विद्रोह किया, धरने दिए लेकिन जवाब हमेशा वही रहा: हिंसा।”
खुद तय करने की ताकत मकामी नारीवाद को बाहर से आये हुए इसके रूपों से अलग करती है। माज़्दा कहती हैं, “मकामी नारीवाद में औरतें कारक हैं, फ़ैसले करने वाली हैं, फिरंगी संस्थाओं और सेनाओं के फ़ैसले लेने का सामान नहीं।” बॉन समिति में लागू हुए अमेरिका-नाटो के “लोकतंत्र” के पैकेज में औरतों के अधिकारों की परिभाषा शामिल थी— लेकिन ये कब्ज़े को वैध ठहराने के लिए केवल एक पर्दा था। “हमारी जंजीरों के केवल रंग बदले थे, हमें दरअसल कोई आज़ादी नहीं मिली थी।”
वे अफ़ग़ान औरतों की देह के निजी और साझे अनुभव के बारे में बताती हैं जो युद्धभूमि और सत्ता का प्रतीक बन गया था। जहाँ प्रताड़ित होने पर भी औरतों को ही दोष दिया जाता था, “समाज उसे उसके कपड़ो के लिए दोष देता, कानून उसकी हिफ़ाज़त नही करता और पुलिस तो भक्षक थी ही। औरतों की हत्या या यौन हिंसा पर जिस माहौल में कोई काम नहीं हो रहा था, वहाँ राह चलता कोई भी आदमी कानून लागू करने वाला हो सकता था। गणतंत्र ने भले ही आधिकारिक हिजाब पैट्रोल हटा दिए हों लेकिन पितृशाही समाज में फैली रही और औरतों की ज़िंदगी पर काबू करती रही।”
माज़्दा कहती हैं कि वहाँ औरतों के शरीर ताकत के बैनर बन गए। गणतंत्र वाले उन्हें लोकतंत्र का रूपक बताते तो तालिबान उन्हें “राजनैतिक इस्लाम” के लिए इस्तेमाल करता। दोनों हालातों में औरतें सत्ताओं को सही ठहराने के लिए रूपक भर बन कर रह गईं। वो पूछती हैं, “राज्य युद्धों के समय औरतों की इतनी बातें करते हैं लेकिन कभी उनकी सुनते क्यों नहीं? क्योंकि औरतें ‘इज़्ज़त’ की तरह देखी जाती हैं, इंसान की तरह नहीं। राजनैतिक ताकत हमेशा ही सत्ता काबिज करने के तरीके ढूंढती है ना कि खुद से फैसले ले सकने वाले लोग जो बने बनाए ताकत के पैमाने को हिला सकें।”
जब नेतन्याहू ईरान पर हमला करने के लिए “जिन, ज़ियान, आज़ादी” का इस्तेमाल करता है तो माज़्दा उसी तस्वीर का दुहराव देखती हैं जिसने अफ़ग़ान औरतों का इस्तेमाल कब्ज़े को सही ठहराने के लिए किया गया, “ये हास्यास्पद है कि बमों से आज़ादी आती है— हमारे हाथों में लाशों के बीच। बच्चों के हत्यारों को मसीहा मानना बेहूदा है।”
उन्होंने “आयातित आज़ादी” का अनुभव जीया है। “आज लाखों अफ़ग़ान औरतों की झोली में अवसाद, अकेलापन और आयातित लोकतंत्र से प्रतिबंध है। औरतों के दुखों का फ़ायदा उठाने का खतरा बेईज़्ज़ती से कहीं ज़्यादा है। यह युद्ध चाहने वालों को छूट देता है और औरतों के खिलाफ़ हो रही हिंसा को सामान्य बनाता है।”
ईरानी औरतों और दूसरों के लिए जिनकी आवाज़ हथियाई जा सकती है, माज़्दा का संदेश है, “ध्यान रहे, औजार की तरह इस्तेमाल मत होना। शांति समझ से पनपती है, बमों से नहीं। कोई भी मुल्क बमों से आज़ाद नहीं हुआ। उससे सिर्फ़ एक चीज़ बदलती है, हमारे जंजीरों का रंग।”
अफ़ग़ैक्टिविस्ट कलेक्टिव पहली और दूसरी पीढ़ी के उन अफ़ग़ानियों का समूह है जो वैश्विक दक्षिण आंदोलन से जुड़े हैं। उसकी सदस्य ज़ोया अमरीकी कब्ज़े और तालिबान दोनों का विरोध करती हैं। समूह अफ़ग़ान के संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय आंदोलनों से जोड़ने का काम करता है।
शांत लेकिन बेबाक ज़ोया “अफ़ग़ान औरतों को बचाने” के नाम पर पश्चिम के हमले के बारे में व्यंग्य करती हैं, “तालिबान को तालिबान से बदलने के लिए उन्होंने बीस साल की लड़ाई लड़ी।”
ज़ोया के लिए मुक्ति की गप्प ने आर्थिक और भौगोलिक राजनैतिक फ़ायदों के ऊपर पर्दा डालने का काम किया। ये औरतों के अधिकारों के लिए नहीं बल्कि प्राकृतिक संपदाओं पर अधिकार और अफ़ग़ानिस्तान की रणनीतिक स्थिति के लिए था। उनका कहना है कि ये ढोंग साफ़ दिख रहा था, “सब कुछ हमारी आँखों के सामने हुआ।” उनका कहना है कि दोहा समझौते ने ये साफ़ कर दिया कि आज़ादी के पर्दे के पीछे खुद की भलाई छुपी थी।
वो कहती हैं, “हमारी ज़मीन उन संसाधनों से भरी हुई है जो पूंजीवादी युद्ध मशीनरी को चाहिए। औरतों की देह केवल प्रचार का औज़ार था।” उनके अनुसार अफ़ग़ानी औरतों का विद्रोह भीतर से पैदा हुआ। घर छिपी हुई कक्षाएँ बने, हाँथों ने बिना पैसों या सहारे के प्रगति बुनी, “अफ़ग़ानिस्तान में जितना भी पैसा आया उसमें हमारी अपनी मेहनत ही साफ़-साफ़ दिखी ना कि फ़िरंगी संस्थाएँ।”
वो विकास के भ्रष्ट मॉडलों के बारे में बताती हैं जिन्होंने किसानों को बेहाल किया, घर खरीदे, प्रोसेस्ड बाज़ारू खाने पर निर्भरता बढ़ाई, ऐसा खाना जिसने फ़िरंगी फ़ायदे के लिए सेहत और दवाओं का बाज़ार खड़ा किया। ज़ोया कहती हैं, “आज अफ़ग़ान का संकट इसी फ़ायदे के तर्क का परिणाम है।”
तालिबान के लौटने के साथ ही दबाव के नए तरीके पनपे, बिना किसी आधार के लेकिन मज़हबी तौर पर सही। “छठीं क्लास के बाद से लड़कियों का स्कूल बंद होना, औरतों के हमाम बंद करना, और यहाँ तक की रसोईघर की खिड़कियाँ भी बंद रखना, ये सब संसाधनों की चोरी से हमारा ध्यान हटाने का तरीका है।”
वो गुस्से से तिलमिलाती हैं, “तालिबान को कौन हथियार देता है? बीस साल के ‘संघर्ष’ के बाद उन्हें कैसे सत्ता मिली? जो ताकतें आज़ादी का भाषण देती हैं वही अफ़ग़ानी तकलीफ़ से फ़ायदा भी कमाती हैं— दवाओं, सेनाओं, बिजली के सामान की कंपनियाँ।”
वो “श्वेत नारीवाद” को भी नहीं बख़्शतीं। जर्मनी की तथाकथित नारीवादी विदेश नीति की खुली अलोचना करते हुए वे कहती हैं, “अफ़ग़ान औरतों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, फ़िलीस्तीनी औरतें तो हैं ही नहीं, और ईरानी औरतों को बचाना है।” उनके लिए नारीवाद का यह रूप प्रगतिशील भाषा का चोला पहने उपनिवेशवाद ही है। “वो एक झूठे नारीवाद का झांसा देते हैं- वो जो ना तो पितृशाही को तोड़े और ना ही ज़ुल्मी ढांचो को चुनौती दे।”
उनका जवाब? ज़मीनी, असली आवाज़ों को बढ़ाओ। “केवल सही किस्से ही नारीवादी लीपापोती- युद्ध और कब्ज़े को छुपाने के लिए नारीवादी नारों के इस्तेमाल के खिलाफ़ खड़े हो सकते हैं।” ईरानी औरतों और कोई भी औरतें जिनका आंदोलन हथियाया जा सके उनके लिए उनका संदेश साफ़ है, “हम अफ़ग़ानिस्तान, फ़िलीस्तीन, ईरान, कुर्दीस्तान, कोंगो, सोमालिया, बलूचिस्तान में एक संघर्ष के खिलाफ़ साझे हैं: पितृशाही, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद।”
अलग-अलग क्षेत्रों में युद्ध से प्रभावित औरतों के किस्से अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन वे एक आवाज़ में कहती हैं: आज़ादी कब्ज़े या बमों से नहीं आती और “जिन, ज़ियान, आज़ादी” जैसे नारे उन ताकतों का औज़ार नहीं बनने चाहिए जो खुद इन तीनों का भारी नुकसान करते हैं।
एक ऐसी दुनिया में जहाँ ढाँचागत हिंसा और साम्राज्यवाद वैश्विक दक्षिण के समाजों पर “बचाने” और “आज़ादी” के नकाब के भीतर से निशाना साध रहा हो, यह पहले से और भी जरूरी हो जाता है कि हम इन समुदायों के भीतर की औरतों की असली आवाज़ें सुनें।
उन्हें मुक्तिदाता नहीं चाहिए।
धर्मेश एक क्वीयर कवि, अनुवादक और शोधकर्ता हैं। वे पन्ना में राजगोंड समुदाय के साथ विस्थापन पर अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा है और वे रोहिन कुमार की लाल चौक के अंग्रेज़ी अनुवादक हैं।
फ़िरूज़ेह फ़रवर्दीन बर्लिन और विएना में नारीवादी कार्यकर्ता, लेखिका और विदुषी हैं। वे विएना विश्वविद्यालय में राजनीति और जेंडर के विषय में विश्वविद्यालय सहायिका हैं, जहाँ वे वैश्विक दक्षिण में जेंडर (विरोध)रणनीतियों के बारे में पढ़ाती और शोध करती हैं।
एलाहेह मोहम्मदी एक ईरानी पत्रकार और नारी कार्यकर्ता हैं। वे ईरान के हम-मिहन अखबार के लिए समाज और औरतों के मुद्दों पर लिखती हैं।
फ़ीचर्ड इमेज में Hamidreza Rafatnejad का डिज़ाइन किया पोस्टर

